Mewar Vansh ka Itihas | मेवाड़ का इतिहास PART-10

नमस्कार दोस्तों ये पोस्ट Mewar Vansh के इतिहास का Part - 9 है इस पोस्ट में आप Mewar Vansh History in Hindi, मेवाड़ के महान राजा के बारे में जानकारी प्राप्त करोगे हमारी ये पोस्ट Rajasthan GK की दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण है जो की पटवारी राजस्थान पुलिस और rpsc में पूछा जाता है

राणा भीमसिंह (1778-1828 ई.)

Mewar Vansh ka Itihas | मेवाड़ का इतिहास PART-10
Mewar Vansh ka Itihas | मेवाड़ का इतिहास PART-10

1807 ईं. कृष्णा कुमारी विवाद (गिगोंली का युद्ध,परबतसर नागौर ) हुआ । कृष्णा कुमारी राणा भीम सिंह की पुत्री थी ।
1818 ई. में मराठों के डर से राणा भीमसिंह ने अंग्रजों से संधि की ।
अमीर खाँ पिंडारी व अजीत सिंह चूंडावत के दबाव में कृष्णा कुमारी ने 21 जुलाई , 1810 ई. में ज़हर पीकर आत्महत्या कर ली ।
महाराणा सरदार सिंह (1838-1842 )
भीलों के उपद्रवों को दबाने हेतु इन्होने 1841 ई. में मेवाड भील कोर का गठन किया । जिसका विलय 1950 ई. में राजस्थान पुलिस विभाग में कर दिया गया है ।
स्वरूप सिंह (1842-1861 ई.)
विजय स्तम्भ का जीर्णोद्धार करवाया ।
1857 की क्रांति में अंग्रेजों का साथ देने वाला राजस्थान का पहला राजा स्वरूप सिह था ।
इसने मेवाड़ में स्वरूप शाही सिक्के चलवाये
राणा लाखा के काल में बनी पिछोला झील का जीर्णोद्धार करवाया ।

शम्भू सिंह (1861-1874 ई.)


शम्भूसिंह के काल में श्यामलदास द्वारा 1871 ई. में वीरविनोद का लेखन प्रारम्भ किया गया । जिसे 1892 ई. में पूरा किया गया इस उल्लेखनीय रचना के कारण मेवाड के महाराणा ने इनको कवि राज की उपाधि दी । तथा ब्रिटिश सरकार ने केसर-ए-हिन्द की उपाधि से अलकृंत किया ।
शम्मूसिंह को लार्ड रिपन के समय ब्रिटिश सरकार द्वारा ग्रांड कमांडर आँफ दी स्टार आँफ इंडिया की उपाधि प्रदान की गई ।

सज्जनसिंह (1874-1884 ई)


सज्जन सिंह के काल में मेवाड़ में 1881 ई. में प्रथम बार जनगणना का कार्य किया गया ।
सज्जन सिंह के द्वारा सज्जनगढ़ पैलेस/मानसून पैलेस/ मुकुटमणि/वाणी विलास महल का निर्माण किया गया ।
सत् 1877 ई. में लॉर्ड लिटेन द्वारा आयोजित दिल्ली के शाही दरबार में भाग लेने वाला मेवाड़ का प्रथम शासक सज्जन सिंह था ।
2 जुलाई 1877 ई. को सज्जन सिंह के द्वारा देश हितेषणी सभा का गठन किया गया । जिसका उद्देश्य राजपूताना में वैवाहिक समस्याओं का निराकरण करना था ।
मेवाड़ में 1877 ई. में महाराणा के कोर्ट का नाम बदलकर इजलास खास कर दिया गया ।
1879 ई. मे राजस्थान की प्रथम साप्ताहिक पत्रिका सज्जन कीर्ति सुधाकर का शुभारम्भ किया गया । जिसके सम्पादक बंशीधर थे ।
सज्जन सिंह के संरक्षण में स्वामी दयानन्द सरस्वती के द्वारा सत्यार्थ प्रकाश की रचना जग मंदिर में प्रारम्भ की गई ।
सज्जन सिंह ने सत्यार्थ प्रकाश का उदयपुर से ही प्रकाशन करवाया ।
188० ई मे सज्जन सिंह के द्वारा सज्जन यंत्रालय के नाम से उदयपुर में प्रथम बार छापे खाने की स्थापना की गई ।

फतेह सिंह (1883-1930 ई.)


महाराणा फतेह सिंह सज्जन सिंह के दत्तक पुत्र थे ।
चितौडगढ़ दुर्ग मे फतेह सिंह द्वारा निर्मित फतेह प्रकाश महल है जो वर्तमान में संग्रहालय है ।
फतेह सिंह के समय में 1888-89 ई. मे ए.जी जी. वाल्टर ने राजपूत हितकारिणी सभा का गठन किया । जिसका उद्देश्य राजपूताना में व्याप्त समाजिक बुराईयों को समाप्त करना था ।
बिजौलिया किसान आन्दोलन के समय मेवाड़ के महाराणा फतेह सिंह थे ।
जब फ्तेह सिंह 19०3 ई. में एडवर्ड सप्तम के दरबार में शामिल होने जा रहे थे । तब केसरी सिंह बारहठ ने इनके पौरूष को जगाने हेतु 13 सौरठों का खत इनको लिखा जिन्हें चेतावनी रा चूगंटिया कहा जाता है ।
महाराणा फतेहसिंह को अंग्रेजों द्वारा आर्डर आँफ द क्राउन आँफ इंडिया की उपाधि प्रदान की गई ।

भूपाल सिंह (1930-1955)


राजस्थान के एकीकरण के समय मेवाड़ के महाराणा थे । जो महाराज प्रमुख का पद प्राप्त करने वाले एकमात्र शासक थे । एकीकरण के समय एकमात्र अपाहिज शासक महाराणा भूपाल सिंह ही थे ।

मेवाड़ की प्रारम्भिक वंशावली में गुहादित्य नागादित्य, अपराजित तथा 1200 ई के आस-पास मेवाड़ का शासक राहेय/राहप नामक शासकों का उल्लेख मिलता है महाराणा प्रताप को जब युवराज का खिताब दिया गया तो वह मेवाड़ की वंशावली का 54वाँ शासक नियुक्त हुआ


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