Sunday, 14 July 2019

Rajasthan ke Lok Nritya Part 6 | राजस्थान के लोक नृत्य

नट जाति के नृत्य

Rajasthan ke Lok Nritya Part 6 | राजस्थान के लोक नृत्य
Rajasthan ke Lok Nritya Part 6 | राजस्थान के लोक नृत्य

कठपुतली नृत्य 

  • यह नृत्य नट जाति के लोग करते है ।
  • कठपुतली नचाने वाला नट अपने हाथ में डोरियों का गुच्छा थाम कर नृत्य संचालन करता है ।

'मोर/शारीरिक नृत्य

  • यह नृत्य नट जाति के द्वारा किया जाता है । 
  • इस नृत्य में नट अपनी शारीरिक कौशल का प्रदर्शन करते है ।

मेवों के नृत्य 

रणबाजा नृत्य  

  • मेव जाति में प्रचलित एक विशेष नृत्य है । 
  • रणबाजा नृत्य में स्त्री-पुरुष दोनों भाग लेते है । 

रतबई नृत्य 

  • यह अलवर क्षेत्र की मेव महिलाओं द्वारा किया जाने वाला नृत्य है 
  • इस नृत्य में महिलाएँ सिर पर इंडोणी व सिरकी (खारी)रखकर नृत्य करती है ।
  • रतबई नृत्य में पुरुष (अलागोजा दमामी (टामक) वाद्य यंत्र बजाते है तथा स्त्रियाँ हरी चूडियों को खनखनाती है ।

कामड जाति के नृत्य 

तेरहताली नृत्य


  • तेरहताली नृत्य बाबा रामदेव के भोपे (कामड़ जाति के) जो बाबा की अराधना में रात को लीलाएँ,ब्यावले तथा यशोगाथाएं गाते है । तेरहताली नृत्य में कामड़ स्त्री नौ मंजीरे अपने दाएँ पाँव पर, दो मंजीरे दोनों हाथ की (एक-एक) कोहनी पर बाँधती है । दो मंजीरे दोनों हाथों में एक-एक रखती हैं इस प्रकार तेरहमंजीरों के साथ इस नृत्य को किया जाता है ।
  • इस नृत्य में पुरुष (मंजीरा तानपुरा व चौतारा) बजाते है । तेरहताली नृत्य के प्रमुख कलाकार माँगी बाई, मोहनी, नारायणी, लक्ष्मणदास कापड आदि है ।
  • तेरहताली नृत्य पोकरण, डीडवाना, डूंगरपुर आदि स्थानों पर किया जाता है
  • इन्होनें 1954 ईं. मे जवाहरलाल नेहरू के समक्ष गाडिया लौहार सम्मेलन में तेरहताली नृत्य प्रस्तुत किया ।

हरीजन जाति के नृत्य

बोहरा बोहरी नृत्य 

  • यह नृत्य होली के अवसर पर हरिजन जाति में किया जाता है ।  
  • इस नृत्य में दो पात्र बोहरा (बोरा) एवं बोहरी (बोरी) होते है । 

घुमन्तु जाति के नृत्य 

बालदिया नृत्य


  • बालदिया एक घुमन्तु जाति है जो गेरू को खोदकर बेचने का व्यापार करती है
  • यह नृत्य गेरू को खोदकर बेचने के व्यापार को चित्रित करती है ।

माली समाज का नृत्य 

चरवा नृत्य 

  • माली समाज की स्त्रियों के द्वारा किसी स्त्री  के संतान होने पर कांसे के घडे में दीपक रखकर उसे सिर पर धारण कर चरवा नृत्य किया जाता है ।
  • सामान्यत  काँसे के घडे चरवा के कारण ही इसका यह नाम पडा 

मछली नृत्य 

  • बणजारा जाति के लोगों द्वारा किया जाने वाला नृत्य ।
  • मछली नृत्य पूर्णिमा की चांदनी रात को बनजारों के खेमों में किया जाने वाला नृत्य नाटक है ।

कुम्हार जाति के नृत्य 

चाक नृत्य


  • चाक नृत्य विवाह के समय कुम्हार के घर चाक (घडे) लेने जाते समय महिलाएं करती है ।

भांड जाति के नृत्य 

नकल नृत्य 

  • भांड जाति के लोग नकल नृत्य करते है । 

गोगा नृत्य


  • गोगा नृत्य गोगा नवमीं (भाद्रकृष्ण नवमी) पर किया जाता है ।
  • इस नृत्य में चमार लोग जो गोगा जी के भक्त होते हैं वे एक जुलूस निकालकर उसमें नृत्य करते है । इसके नृत्य बडे उत्तेजक होते है ।
  • गोगा नृत्य में गोगा भक्त अपनी पीठपर सांकल से मारते है । सिर पर भी उसे चक्कर खाते हुए मारते है इस नृत्य में इनकी मीठ जख्मी हो जाती है ।
  • गोगा नृत्य मे ढोल-डैरू नामक वाद्य यंत्र का प्रयोग किया जाता है

भोपों के नृत्य  

  • राजस्थान में गोगाजी पाबूजी, देवी जी हड़भूजी भैरू जी आदि के भोपे-भोपिन इनकी फड के सामने इनकी गाथा का वर्णन करते हुए नृत्य करते है । 

वीर तेजा नृत्य


  • वीर तेजा नृत्य तेजा जी की अराधना में कच्छी घोडी पर सवार होकर तलवार से युद्ध कौशल प्रदर्शन करते हुए गले में सर्प डालकर-छतरी व भाला हाथ में लेकर तेजा जी की कथा के साथ पुरुषों द्वारा किया जाने वाला नृत्य है ।
  • तेजाजी के नृत्य के अंत में तेजा भगत नाग को अपनी जीभ पर कटवाते है ।
  • तेजाजी के नृत्य में अलगोजा-ढोलक-मंजीरा नामक वाद्य यंत्रों का प्रयोग किया जाता है

साँसियों के नृत्य 

  • इनके नृत्य अटपटे तथा कामुकतापूर्ण होते है । लेकिन इनका अंग संचालन उत्तम होता है ये नृत्य उल्लास एवं मनोरंजन की दृष्टि से उत्तम होते हैं ।

मीणों के नृत्य

  • मीणा जाति के नृत्यों में वाद्य यंत्र बडे आकार का नगाडा होता है । मीणा जाति के प्रमुख नृत्य रसिया लागुरिया नृत्य है ।

गाडिया लुहारों का नृत्य


  • इनके नृत्यों में सामूहिक संरचना न होकर गीत के साथ स्वच्छंद रूप से नृत्य किया जाता है ।

Thursday, 11 July 2019

Rajasthan ke Lok Nritya - Part 5

कालबेलियों के नृत्य  

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Rajasthan ke Lok Nritya

इंडोणी नृत्य

  • इंडोणी नृत्य स्त्री-पुरुष दोनों मिलकर करते है ।
  • यह नृत्य गोलाकार पथ पर पुंगी, खंजरी वाद्य यंत्र के साथ किया जाता है ।
  • इंडोणी घडे व सिर के बीच रखी जाने वाली एक गोलाकार वस्तु होती है ।
  • इंडोणी नृत्य में औरतो की पोशाकें बडी कलात्मक होती हैं तथा इनके वदन पर मणियों की सजावट रहती है ।

पणिहारी नृत्य

  • पणिहारी नृत्य पणिहारी गीत पर आधारित एक युगल नृत्य है ।
  • इस नृत्य के प्रमुख वाद्य ढोलक, बाँसुरी है ।
  • इसमें पनिहारिन स्त्रियाँ अपने सिर पर 5-7 मटके रखकर नृत्य करती है ।

शंकरिया नृत्य

  • यह प्रेम कथा पर आधारित स्त्री-पुरुषों का नृत्य है ।
  • इस नृत्य में अंग संचालन बहुत सुन्दर होता है ।
  • इस नृत्य की प्रमुख नृत्यांगना कंचन, सपेरा, गुलाबो, कमली एवं राजकी है ।

बांगडिया नृत्य

  • कालबेलिया महिलाओ द्वारा यह नृत्य भीख माँगते समय किया जाता है ।
  • बागडिया नृत्य में मुख्य वाद्य यंत्र चंग होता है ।
  • गुलाबों कालबेलिया नृत्य की अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कलाकार है ।

सहरिया जाति के नृत्य

झेला नृत्य

  • झेला नृत्य शाहबाद (बाराँ) की सहरिया जनजाति की स्त्री व पुरुषों (युगल जोडी) द्वारा सम्मिलित रूप से खेतों पर फसल की पकाई के समय किया जाता है ।

लहंगी नृत्य

  • सहरिया जनजाति के द्वारा किया जाने वाला नृत्य ।

सांग नृत्य

  • सहरिया जनजाति का सांग नृत्य एक युगल नृत्य है, जिसमें स्त्री-पुरुष दोनों सम्मिलित रूप से नृत्य करते है ।


बिछवा नृत्य

  • बिछवा नृत्य सहरिया जनजाति की केवल स्त्रियों का नृत्य हैं, जो महिलाओ द्वारा समूह में किया जाता है ।

इंद्रपरी नृत्य

  • इंद्रपरी नृत्य सहरिया जनजाति का नृत्य है जिसमें रागिनी गीत गाया जाता है । 
  • इस नृत्य का आयोजन विवाह के अवसर पर किया जाता है ।

शिकारी नृत्य

  • इस नृत्य में पुरुष शिकार काने का नाटक करते हैं तथा शिकार हो जाने पर शिकार के चारों और नृत्य करते हैं अत: यह नृत्य नाटिका है ।

बणजारा जाति के नृत्य 

मछली नृत्य  

  • मछली नृत्य एक नृत्य नाटक एवं धार्मिक नृत्य है जो हर्षोल्लास से शुरू होता है, लेकिन दुःख के साथ समाप्त होता है । 
  • यह नृत्य बाडमेर का प्रसिद्ध है, क्योंकि सर्वाधिक बणजारा जाति बाडमेर में रहती है ।

कंजर जाति के नृत्य

चकरी मृत्य

  • कंजर युवतियों द्वारा किया जाने वाला चक्राकार नृत्य है ।
  • इस नृत्य में प्रमुख वाद्य ढ़प (ढोलका) , मंजीरा, नगाड़ा है । चकरी नृत्य हडौती अंचल का प्रसिद्ध नृत्य है ।
  • चकरी नृत्य में महिलाएं अपने प्रियतम से श्रृंगार की वस्तु लाने के लिए कहती है ।
  • चकरी नृत्य की प्रमुख कलाकार शांति, फुलवा तथा फिलमा बाई है । 
  • इस नृत्य में मुख्यत: अविवाहित युवतियाँ ही भाग लेती है ।

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Tuesday, 9 July 2019

Rajasthan ke Lok Nritya - Part 4 | कथौडी जाति or गुर्जरों के नृत्य

कथौडी जाति के नृत्य


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मावलिया नृत्य

  • मावलिया नृत्य नवरात्रा मे नौ दिनो तक 10-12 पुरुषो द्वारा किया जाता है ।
  • यह नृत्य ढोलक, बाँसुरी की लय पर देवी-देवताओं के गीत गाते हुए किया जाता है।
  • कथौडी जाति के लोग इसमें समूह बनाकर 'गोल-गोल नृत्य करते है ।

होलो नृत्य

  • यह नृत्य होली के अवसर पर महिलाओं द्वारा किया जाने वाला प्रमुख नृत्य है ।
  • होली के अवसर पर यह नृत्य लगातार 7 दिनों तक चलता है । 
  • होली नृत्य में पुरुष ढोलक पावरी बाँसुरी आदि बजाते है । होली नृत्य में महिलाएं नृत्य के दौरान एक दूसरे के कंधे पर चढ़कर पिरामिड भी बनाती है ।
  • कचौडी जनजाति मूलत: महाराष्ट्र से आकर राजस्थान में उदयपुर की झाडोल व कोटड़ा तहसीलों में बसी हुई है ।
  • यह जाति कैर वृक्ष से कत्था तैयार करती है, इसलिए इस जाति का नाम कैथोडी है ।

गुर्जरों के नृत्य 

चरी नृत्य


  • चरी नृत्य गुर्जर जाति का प्रसिद्ध नृत्य है । 
  • इस नृत्य में स्त्रियाँ सिर पर कलश व उसमें काकड़े (कपास) के बीज में तेल डालकर आग लगाती है। इस कलश से आग की लपटें निकलने लगती है ।
  • स्त्रियाँ लपट निकलते कलश को सिर पर रखकर हाथ की कलाइयों को घूम-घूम कर नृत्य करती है । 
  • चरी नृत्य मे ढोलक, ढोल बाँकिया आदि वाद्य यंत्रों का प्रयोग किया जाता है।
  • चरी नृत्य मुख्य रूप से किशनगढ (अजमेर) का है ।
  • यह नृत्य गणगौर, जन्म, विवाह आदि अवसरों पर किया जाता है ।
  • चरी नृत्य अब व्यावसायिक रूप ग्रहण कर चुका है ।
  • किशनगढ़ की फलकूबाई चरी नृत्य की लोकप्रिय कलाकार है । वर्तमान में श्री मोहन सिंह गौड़ व कुमारी सुनीता रावत इसके प्रमुख कलाकार है ।
  • चरी नृत्य अतिथि सत्कार के लिए भी किया जाता है ।
  • यह नृत्य मांगलिक अवसरों पर किया जाता है, जिसें गुर्जर जाति पवित्र मानती है ।
  • चरी नृत्य में स्त्रियाँ सात चरियां (पीतल के घडे) रखकर नृत्य करती है ।

झूमर नृत्य 

  • गुर्जर और अहीर जाति में यह नृत्य आज भी जीवित है ।
  • झूमर नृत्य पुरुषों का वीर रस प्रधान नृत्य है ।
  • यह नृत्य धार्मिक मेलों आदि के अवसरों पर किया जाता है ।
  • यह नृत्य कोटा-बूंदी में मुख्य रूप से स्त्रियों द्वारा सामाजिक पर्वो व त्यौहारों पर किया जाता है ।
  • इसमें झूमरा नामक वाद्य यंत्र का प्रयोग होने के कारण इसे झूमर नृत्य कहा जाता है ।

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Sunday, 7 July 2019

Rajasthan ke Lok Nritya - Part 3 | गरासिया जाति के नृत्य

गरासिया जाति के नृत्य

गरासिया जाति के नृत्य

मोरिया नृत्य

  • विवाह के अवसर पर गणपति स्थापना के पश्चात रात्रि को किया जाने चाला नृत्य है ।
  • मोरिया नृत्य पुरुषों द्वारा किया जाता है ।

मांदल नृत्य

  • यह गरासिया महिलाओ द्वारा किया जाने वाला वृत्ताकार नृत्य हैं 
  • इस नृत्य में मांदल वाद्य यंत्र का प्रयोग किया जाता है ।

वालर नृत्य

  • वालर नृत्य स्त्री-पुरुष द्वारा किया जाने वाला प्रसिद्ध नृत्य है । 
  • इस नृत्य को बिना वाद्य यंत्र के धीमी गति से किया जाता है ।
  • वालर नृत्य में दो अर्द्धवृत बनते है, बाहर के अर्द्धवृत में पुरुष तथ अन्दर के अर्द्धवृत में महिलाएं होती है ।
  • वालर नृत्य का प्रारम्भ एक पुरुष हाथ में छाता या तलवार लेकर करता है। 
  • इस नृत्य में पुरुष-स्त्रियाँ गीत के साथ नृत्य प्रारम्भ करते हैं । पुरुषों के गीत की पंक्ति की समाप्ति से एक पंक्ति पहले स्त्रियाँ गीत उटा लेती है । 
  • वालर नृत्य विशेष कर सिरोही क्षेत्र में किया जाता है ।
  • इस नृत्य में नर्तक व नर्तकी अपने आगे वाले नर्तक व नर्तकी के कंधे पर अपना दायाँ हाथ रखते है । 
  • वालर नृत्य को गरासिया घूमर भी कहते है । 
  • पडियाँ कौढी काल जैसे गीतों के साथ यह नृत्य सम्पन होता है । 
  • यह नृत्य विवाह के अलावा हौली व गणगौर पर भी किया जाता है ।

लूर नृत्य

  • लूरु नृत्य गरासिया महिलाओ द्वारा मुख्यत: मेले व शादी के अवसर पर किया जाता है ।
  • गरासिया स्त्रियों में इस नृत्य को मुख्यत लूर गोत्र की स्त्रियों द्वारा किया जाता है ।
  • लूर नृत्य में एक दल (वर पक्ष) दूसरा दल (वधू पक्ष) से रिश्ते की माँग करता हुआ नृत्य करता है ।
  • यह नृत्य घूमर नृत्य का ही एक रूप है ।

कूद नृत्य

  • गरासिया स्त्रियो-पुरुषो द्वारा सम्मिलित रूप में किया जाता है ।
  • कूद नृत्य बिना वाद्य के किया जाता है ।
  • कूद नृत्य करते समय तालियों का प्रयोग किया जाता है ।

गौर नृत्य

  • गौर नृत्य गणगौर के अवसर पर गरासिया स्त्री-पुरुष द्वारा किया जाने वाला आनुष्ठानिक नृत्य है ।
  • यह नृत्य गणगौर के अवसर पर शिव-पार्वती (गण-गौर यानि शिव पार्वती) को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है ।

जवारा नृत्य

  • होली दहन से पूर्व स्त्री पुरुषों द्वारा किया जाने वाला सामूहिक नृत्य है ।
  • यह नृत्य गोल घेरा बनाकर ढोल के गहरे घोष के साथ किया जाता है ।
  • इस नृत्य में स्त्रियाँ हाथ में जवारों की बालियाँ लिए नृत्य करती है । 

रायण नृत्य

  • इसमें नर्तक केवल पुरुष होते है जो महिलाओं के वेश धारण कर नृत्य करते है ।

गर्वा नृत्य

  • गर्वा नृत्य गरासिया जाति की स्त्रियों के द्वारा किया जाता है
  • गर्व नृत्य मुख्य रूप से उदयपुर-सिरोही में किया जाता है गर्वा नृत्य गरासियों का अत्यन्त मोहक नृत्य है ।

बेरीहाल नृत्य 

  • उदयपुर के खैरचाड़ा के पास भाण्दा गाँव में रंग पंचमी को विशाल आदिवासी मेले का मुख्य आकर्षण बेरीहाल नृत्य है ।

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Saturday, 6 July 2019

Rajasthan ke Lok Nritya - Part 2 भीलों के नृत्य With PDF

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भीलों के नृत्य


गैर नृत्य 


  • गैर नृत्य मुख्यतः फाल्गुन मास में भील पुरुषो के द्वारा किया जाता है ।
  • गोल घेरे की आकृति में होने के कारण इस नृत्य का नाम घेर पडा । जो आगे चलकर गैर कहलाया । 
  • गैर नृत्य करने वाले नृत्यकार गैरिये कहलाते हैं । मेवाड व बाडमेर क्षेत्र में गैर नृत्य किया जाता है ।  
  • यह नृत्य होली के अवसर पर किया जाता है । इस नृत्य को गैर/घेर/गेहर आदि नामों से भी पुकारते है । 
  • पुरुष लकड़ी की छडी लेकर गोल घेरे में नृत्य करते है । गैर नृत्य के प्रमुख वाद्य यंत्र दोल बाकिया थाली है । 
  • गैर नृत्य करते समय कहीं-कहीं श्रृंगार रस एवं भक्ति रस के गीत गाए जाते है । 
  • गैर के प्रत्युत्तर में गाये जाने वाले श्रृंगार रस एवं भक्ति रस के गीत फाग कहलाते है । गैर नृत्य में प्रयुक्त होने वाली छड को खाडा कहा जाता है । 
  • मेवाड तथा बाडमेर में मूल रूप से नृत्य समान है परन्तु नृत्य की चाल व माण्डक बनाने की कला भिन्न है ।
  • इसके परिधान सफेद अंगरखी व सफेद धोती आदि है ।
  • मेवाड में लाल/कैसरिया पगडी पहनी जाती है ।
  • बाडमेर में सफेद आंगी (लम्बा फ्राक) कमर पर चमडे का पट्टा व तलवार आदि लेकर नृत्य किया जाता है ।
  • गैर नृत्य की प्रमुख विशेषता विचित्र वेशभूषा का प्रदर्शन है । 
  • भीलवाड़ा का घूमर गैर अत्यन्त प्रसिद्ध है ।
  • मेणार/मेनार गाँव (उदयपुर) के ऊंकारेश्वर चौराहे पर चैत्रबदी (कृष्ण ) बीज (दूज ) /जमरा बीज को तलवारों की गैर खेली जाती है । 
  • नाथद्वारा (राजसमंद) में शीतला सप्तमी (चैत्र कृष्ण सप्तमी) से एक माह तक गैर नृत्य का आयोजन होता है ।

गवरी या राई नृत्य  


  • गवरी या राई एक नृत्य नाटक है
  • यह राज्य की सबसे प्राचीन लोक नाटक कला है । जिसे लोकनाट्यों का मेरूनट्य भी कहा जाता है
  • इस नृत्य नाटक के प्रमुख पात्र भगवान शिव होते है ।
  • शिव की अर्धांगिनी गौरी (पार्वती) के नाम के कारण ही इस नृत्य का नाम गवरी पड़ा ।
  • गवरी नृत्य में शिव को पुरिया कहा जाता है । 
  • नृत्याकार त्रिशूल के चारो तरफ इकट्ठे हो जाते है जो मांदल व थाली की ताल पर नृत्य करते है ।  कुटकुडिया इस नाट्य का सूत्रधार होता है । 
  • गवरी लोकनाट्य का मुख्य आधार शिव तथा भस्मासुर की कथा है । 
  • गवरी लोक नाट्य का राखी के बाद से इसका प्रदर्शन सवा माह ( 40 ) दिन चलता है । 
  • इस नाट्य में शिव भरमांसुर का प्रतीक राई बुढिया होती है ।
  • गवरी नाटक दिन में प्रदर्शितं किया जाता है ।  
  • गवरी नाटक के दौरान 12 नाटिकाएँ प्रस्तुत की जाती है, जो गवरी की घाई कहलाती है । जैसे कालुकी शेर-सुअर लड़ाई, भीयांवड आदि
  • इस में मादल वाद्ययंत्र का प्रयोग होता है ।
  • दोनों पार्वतियों की प्रतिमूर्ति (मोहिनी तथा असली पार्वती) दोनों राइयाँ कुटकुडिया तथा पाट भोपा ये पाँचों गवरी के मुख्य पात्र होते है । अन्य पात्र खेल्ये कहलाते है ।
  • इस नृत्य नाट्य के विभिन्न कथानक या सहकथानक क्रमबद्ध नहीं होते परन्तु गवरी की घाई नृत्य द्वारा मूल कथानक से जुडे रहते है ।
  • गवरी नृत्य भील पुरुषों के द्वारा उदयपुर, डूंगरपुर, बाँसवाड़ा में किया जाता है ।
  • झामत्या पात्र लोकभाषा में कविता को बोलता है तथा ख़टकड़िया उसको दोहराता है । ये पात्र इसके प्रमुख कलाकार हैं ।
  • इस नृत्य नाट्य की प्रमुख विशेषता यह है कि इसे भीलों के अलावा कोई नहीं खेल सकता तथा इसमें महिलाओँ की भूमिका पुरुषों के द्वारा निभाई जाती है ।
  • गवरी के दिनों में स्त्री-गमन-माँस मदिरा एवं हरी सब्जी सेवन पर गवरी पात्रो के लिए पूर्णत: प्रतिबंध होता है ।
  • गवरी नाट्य कला सांस्कृतिक , परम्परागत , अभिनय तीनों में समृद्ध लोककला है
  • गौरी (पार्वती) भीलों की प्रमुख आराध्य देवी है ।
  • गवरी नाट्य कला भीलों के जन्म-मरण और पुनर्जन्म आस्था की प्रतीक भी मानी जाती है ।
  • नेशनल स्कूल आँफ ड्रामा की शिष्य दीक्षित भानू भारती ने इस नाट्य कला को भारतीय गायकी नामक नाम दिया । 
  • गवरी नाट्य को वर्तमान में शिक्षा व विकास कार्यक्रमों से जोड दिया गया । 
  • गवरी का प्रमुख प्रसंग देवी अमुड़ वास्या की सवारी है । गोरी का खेल खेत को बोने व काटने के बीच में खेला जाता है । 
  • इस नृत्य में सर्वप्रथम राई बुडिया (शिव) को नृत्य स्थल पर लाया जाता है । 
  • शिव की त्रिशूल को जमीन में गाड दिया जाता है फिर त्रिशूल के चारों और आठ-नौ कलाकार मुखौटा हाथों में तीर, धनुष , तलवार, बर्छी आदि धारण कर यह नृत्य किया जाता है ।

द्विचक्की नृत्य


  • विवाह के अवसर पर महिला-पुरुषों द्वारा दो वृत बनाकर यह नृत्य किया जाता है । 
  • इस नृत्य मे बाहरी वृत पुरुष बाएँ से दाहिनी ओर तथा अन्दर के वृत में महिलाएं दाएं से बाएँ और नृत्य करती हुई चलती हैं ।
  • द्विचक्की नृत्य में दो चक्र पूरे होने के कारण ही इसे द्विचक्की कहते है ।
  • इस नृत्य के दौरान ऊँची हुंकारे भरते है तथा ऊंची आवाज में फाइरे-फाइरे रणघोष कहकर मांदल बजाते है । यह नृत्य बेहद भयानक होता है ।
  • द्विचक्की नृत्य में बहुत से नर्तक घायल भी हो जाते है । इसी कारण राज्य सरकार ने इस नृत्य पर प्रतिबंध लगा रखा है ।

घूमरा नृत्य


  • महिलाओं द्वारा ढोल व थाली वाद्य के साथ अर्द्धवृत बनाकर घूम-घूम कर किया जाने वाला नृत्य है ।
  • घूमरा नृत्य में दो दल होते है एक दल गाता है तथ दूसरा उसकी पुनरावृति करता है ।
  • यह नृत्य उदयपुर, डूंगरपुर, बाँसवाड़ा में किया जाता है ।
  • घूमरा नृत्य हाथ में रूमाल या अन्य कपडा लेकर किया जाता है । 
  • घूमरा नृत्य गुजरात के गरबा नृत्य से काफी मिलता-जुलता है ।


नेजा मृत्य


  • इस नृत्य को भील व मीणा जाति के लोग मिलकर करते हैं ।
  • यह भीलों का एक खेल नृत्य है ।
  • होली के तीसरे दिन खम्भे को भूमि में रोपकर उसके उपरी सिरे पर नारियल रखकर इस नृत्य को किया जाता है ।
  • खम्बे से नारियल उतारने वाले पुरुष को घेरकर खड़ी स्त्रियाँ छडियों व कोडों से पीटती है ।
  • इस नृत्य के अवसर पर ढोल पर पगाल्या लेना नामक थाप दी जाती है।
  • नेजा नृत्य मेवाड क्षेत्र में किया जाता है ।

गौरी नृत्य 


  • यह नृत्य मुख्य रूप से पार्वती पूजा से सम्बन्धित नृत्य है ।
  • इस नृत्य को खेत में फसल बोने व काटने के मध्य अपनी पत्नी के साथ किया जाता है ।
  • यह भाद्रपद पूर्णिमा के एक दिन पहले किया जाता है । 
  • इस नृत्य नाटक में माता पार्वती के पीहर गमन आदि की घटनाएं जुडी हुई है ।

सुकर का मुखौटा नृत्य


  • भील जनजाति द्वारा किया जाने वाला सुकर का मुखौटा नृत्य, नृत्य में तीर धनुष से लैस एक शिकारी स्थल पर आता है और वह शिकारी वहाँ पर बैठे सुकर मुखौटा धारी आदिवासी युवक को मार गिराने का अभिनय करता है ।
  • यह एक नृत्य नाटक है जो सिर्फ राजस्थान में किया जाता है ।

रमणी नृत्य


  • भील जनजाति में रमणी नृत्य विवाह मंडप के सामने विवाह के अवसर पर किया जाता है ।
  • पुरुष साफे की चमकीले पट (पट्टी) से सजाकर बाँसूरी एवं मांदल वाद्य यंत्रों का वादन करते है ।

पालीनोच नृत्य


  • भीलों में विवाह के अवसर पर किए जाने वाले स्त्री - पुरुषों के 'सामूहिक युगल नृत्य को पालीनोच नृत्य कहा जाता है ।

गोसाईं नृत्य  


  • जोगणिया माता को समर्पित होली के अवसर पर भील पुरुषों के द्वारा किया जाने वाला नृत्य गोसाई नृत्य कहलाता है । 


हाथीमना नृत्य  


  • भीलों द्वारा विवाह के अवसर पर किया जाने वाला नृत्य हाथीमना है। 
  • यह घुटनों के बल बैठकर किया जाने वाला नृत्य है ।

बेरीहाल नृत्य


  • उदयपुर के खैरवाड़ा के पास भाण्दा गाँव में रंग पंचमी को विशाल आदिवासी मेले का मुख्य आकर्षण बेरीहाल नृत्य है ।

साद नृत्य


  • भीलों में आध्यात्मिक एवं धार्मिक समय पर किए जाने वाले नृत्य को साद नृत्य कहा जाता है ।

युद्ध नृत्य  


  • युद्ध नृत्य भीलों द्वारा सुदूर पहाड़ी क्षेत्रों में हथियार के साथ किया जाने वाला तालबद्ध नृत्य है ।

लाठी नृत्य 


  • लाठी नृत्य भीलों का पुरुष प्रधान नृत्य है ।  
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राजस्थान में गाए जाने वाले गीतों  

  




Thursday, 4 July 2019

राजस्थान के लोक नृत्य | rajasthan ke lok nritya PDF
राजस्थान के लोक नृत्य राजस्थान का एक मात्र शास्त्रीय नृत्य 'कत्थक' है । कत्थक नृत्य के प्रवर्त्तक भानुजी को माना जाता है ।
जयपुर घराना कत्थक नृत्य का आदिम घराना है । वर्तमान में कत्थक नृत्य उत्तर भारत का शास्त्रीय नृत्य है ।
कत्थक नृत्य के अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कलाकार बिरजू महाराज है । अन्य कलाकार प्रेरणा श्रीमाली, उदयशंकर ।

Folk Dance of Rajasthan in hindi

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rajasthani ke lok nritya

यदि नृत्य को निश्चित नियमों व व्याकरण के माध्यम से किया जाए तो यह शास्त्रीय नृत्य कहलाता है ।
राजस्थान में नृत्य कला दो तरह से पनपी शास्त्रीय स्वरूप में लोक नृत्य के रूप में ।
उमंग में भरकर सामूहिक रूप से ग्रामीणों द्वारा किये जाने चाले नृत्य जिनमें केवल लय के साथ क्रमश तीव्र गति से अंगों का संचालन होता है, उन्हें देशी नृत्य अथवा लोकनृत्य  कहा जाता है ।

जातीय लोक नृत्य


  • भीलों के नृत्य - गैर नृत्य,गवरी राई, युद्ध नृत्य,द्विचकी नृत्य , नेजा नृत्य , घूमरा नृत्य , रमणी नृत्य , हाथी मना नृत्य, भगोरिया नृत्य, लाठी नृत्य, गल खीचरियां नृत्य
  • भील व मीणा जनजाति के नृत्य - नेजा, हुन्दरी 
  • मीणा जाति का नृत्य - लांगुरिया
  • गरासियों के नृत्य - मोरिया, मांदल, वालर, लूर, कूद, गौर , गर्वा , ज्वारा ,रायण , ढेंकण
  • गुर्जरों के नृत्य - चरी नृत्य, झूमर नृत्य, बलेदी नृत्य
  • घुमंतू जाति का नृत्य - बालदिया
  • कथौडी जाति के नृत्य - मावलिया नृत्य, होली नृत्य
  • कालबेलियों के नृत्य - इंडोणी, पणिहारी, शंकरिया, बागडिया, सपेरा, पुंगी नृत्य
  • कंजर जाति के नृत्य - चकरी, धाकड़, तोडा
  • कामड़ जाति का नृत्य - तेरहताली नृत्य
  • कुम्हार जाति का नृत्य - चाक चानण
  • मेवों के नृत्य - रणबाजा, रतबई
  • माली जाति के नृत्य - चरवा, सुगनी
  • जसनाथी सिद्धों का नृत्य - अग्नि नृत्य
  • बणजारा जाति के नृत्य - मछली, गेरू, माघरी, रासतुङा
  • सहरिया जाति के नृत्यझेला , लहंगी , सांग , बिछवा नृत्य , इंद्रपरी नृत्य
  • नट जाति का नृत्य - कठपुतली
  • थोरी जाति का नृत्य - फड नृत्य
  • हरिजन जाति के नृत्य बोहरा बोहरी नृत्य
  • मांड जाति के नृत्य - नकल नृत्य



क्षेत्रीय स्तर पर विकसित नृत्य


  • मरूस्थलीय क्षेत्र का नृत्य - कीलियो बारियो नृत्य
  • मेवाड के नृत्य - भवाई नृत्य, रण नृत्य, गैर नृत्य, हरणो नृत्य, छमछडी नृत्य
  • बागड़ के नृत्य - धाड़ नृत्य, पेजण नृत्य
  • हाडोती क्षेत्र का नृत्य - चकरी नृत्य
  • ब्रज क्षेत्र का नृत्य - बम रसिया नृत्य
  • शेखावटी के नृत्य - र्गीदड़ नृत्य, चंग नृत्य, ढ़प नृत्य, कच्ची घोडी नृत्य  लहुर लूहर नृत्य, जिन्दाद नृत्य 
  • मारवाड़ के नृत्य - घुड़ला या जांझी नृत्य
  • श्रीगंगानगर का नृत्य - भांगड़ा नृत्य
  • बीकानेर का नृत्य - अग्नि नृत्य
  • जैसलमेर का नृत्य - हिंडो या हिंडौल्या नृत्य
  • बाडमेर के नृत्य - कानूडा नृत्य, आँगी बाँगी नृत्य
  • जालौर के नृत्य - ढोल नृत्य, झालर नृत्य, सूकर नृत्य, नौटंकी नृत्य, लुम्बर नृत्य
  • उदयपुर के नृत्य - भवाई नृत्य, साद नृत्य, वेरिहाल नृत्य
  • डूंगरपुर के नृत्य - पेंजण नृत्य, चोगोला नृत्य
  • बांसवाडा का नृत्य - पालीनोच नृत्य
  • प्रतापगढ़ का नृत्य - मोहिली नृत्य
  • चितौडगढ़ के नृत्य - तुर्रा कलंगी नृत्य, बारूद नृत्य
  • भीलवाडा के माण्डल का नृत्य - नाहर नृत्य, सिंगवाले शेरों का नृत्य, घूमर गैर
  • झालावाड के नृत्य - बिन्दोरी नृत्य, ढोलामारू नृत्य
  • बारां जिले का नृत्य - शिकारी नृत्य
  • करौली का नृत्य - लांगुरिया नृत्य
  • भरतपुर के नृत्य - बम रसिया नृत्य चरकूला नृत्य, हुरंगा नृत्य 
  • अलवर का नृत्य - खारी नृत्य  
  • जयपुर का नृत्य - तमाशा नृत्य
  • चूरू का नृत्य - कबूतरी नृत्य 
  • जोधपुर के नृत्य - घुड़ला नृत्य, थाली नृत्य डांडिया नृत्य, धमक मूसल नृत्य, झांझी नृत्य
  • पाली के नृत्य - तेरहताली नृत्य, सुगनी नृत्य
  • नाथद्वारा रांजसमंद का नृत्य - डांग नृत्य 
  • अजमेर का नृत्य - मयूर नृत्य / भैरव नृत्य चरी नृत्य
  • टोंक का नृत्य - डिग्गीपुरी का राजा नृत्य
  • विवाह के नृत्य - मेहंदी नृत्य, टूंटिया नृत्य
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Saturday, 11 May 2019

राजस्थान में संत सम्प्रदाय | Rajasthan ke Pramukh Sant Sampraday

राजस्थान में संत सम्प्रदाय | Rajasthan ke Pramukh Sant Sampraday

rajasthan ke sant sampraday
 Rajasthan ke Pramukh Sant Sampraday

इस पोस्ट में आप राजस्थान के प्रमुख  संत or सम्प्रदाय ( Rajasthan ke Pramukh Sant Sampraday in Hindi ) Raj. GK, राजस्थान के संत संप्रदाय trick  के बारे में संपूर्ण जानकारी प्राप्त करेंगे 

संत रज्जब जी

  • संत रज्जब जी का जन्म सांगानेर (जयपुर) मे 16वी सदी में हुआ ।
  •  विवाह के लिए जाते समय दादूजी के उपदेश सुनकर ये उनके शिष्य बन गये तथा जीवनभर दूल्हे के वेश में रहते हुए ' दादू के उपदेशों ' का बखान किया । " रज्जब वाणी एवं 'सर्वगी' इनके प्रमुख ग्रन्थ है । 
  • रज्जब जी की प्रधान गद्दी सांगानेर में है । 
  • रज्जब जी की मृत्यु भी सांगानेर (जयपुर) में हुई ।

संत सुन्दरदास जी

  • संत सुन्दरदास जी का जन्म दौसा जिले के खण्डेलवाल वैश्य परिवार में हुआ । 
  • सुन्दरदास जी के पिता का नाम श्री परमानन्द (शाह चोखा ) व माता का नाम सती था ।
  • दादू पंथ में नागा साधु वर्ग प्रारम्भ किया ।

संत पीपा जी

  • संत पीपा जी का जन्म 1525 ई. (सं. 1380) की चैत्र पूर्णिमा को गागरोन दुर्ग के राजा खींची चौहान कड़ावा राव के यहाँ हुआ ।
  • पीपा जी की माता का नाम लक्ष्मीवती था ।
  • पीपा जी के बचपन का नाम प्रतापसिंह था ।
  • संत पीपा जी रामानन्द जी के शिष्य थे ।
  • संत पीपा जी वस्त्रों की सिलाई का कार्य करते थे ।
  • दर्जी समुदाय पीपा जी को अपना आराध्य देवता मानता है । 
  • समदडी, जोधपुर के मसूरिया, गढ गागरोन में पीपाजी के मेले आयोजित होते हैं ।
  • समदडी ग्राम (बाडमेर) में पीपाजी का मंदिर स्थित है ।
  • दिल्ली के सुल्तान फिरोजशाह तुगलक के द्वारा गागरोण पर हमला किये जाने पर संत पीपा जी ने फिरोजशाह तुगलक को पराजित किया था ।
  • टोडा (टोंक) में पीपाजी की गुफा है । पीपाजी की 20 रानियाँ थी । 
  • पीपाजी ने अपनी छोटी पत्नी रानी सीता पद्मावती की प्रेरणा व कुलदेवी की कृपा अपना राजकाज अपने भतीजे को सौंपकर वैराग्य धारण कर लिया । 
  • पीपाजी का श्रीहरि साक्षात दर्शन "द्वारकाधीश मंदिर' में हुआ । 
  • संत पीपाजी की चमत्कारिक घटनाओं में तेली जाति के एक व्यक्ति को मारकर पुन: जीवित करना और खूँखार जानवर शेर को भी पालतू बना लेना आदि शामिल है । 
  • पीपाजी ने अपना अंतिम समय टोंक जिले के ' टोडा ग्राम ' में स्थित एक गुफा में भजन करते हुए व्यतीत किया जहाँ पर चैत्र कृष्ण नवमी को देवलोक (मृत्यु) को प्राप्त हुए । वह गुफा आज " संत पीपा की गुफा' (तहसील-टोड़ारायसिंह, जिला टोंक) के नाम से जानी जाती है । 
  • संत पीपाजी की छतरी कालीसिंध नदी के किनारे गागरोण दुर्ग (झालावाड) में स्थित है जहाँ उनके चरण चिह्न की पूजा होती है । 
  • संत पीपाजी के त्याग व सेवा रूपी कार्यो के बारे में संत रविदास के विचार इस प्रकार से है
 न कबीर के लक्ष्मी ना कोऊ मेरे ठाट ।
धन पीपा जिन तज दियो, रबिया राज अरू पाट । ।

माव जी

  • संत माव जी को महामनोहर जी के नाम से भी जाना जाता है ।
  • संत मावजी का जन्म बागड़ प्रदेश के सांबला ग्राम (डूंगरपुर) में हुआ ।
  • 1727 ई में बेणेश्वर नामक स्थान पर संत मावजी को ज्ञान की प्राप्ति हुई और यहीं इन्होंने बेणेश्वर धाम की स्थापना की ।
  • मावजी की वाणी 'चोपडा' कहलाती है ।
  • संत मावजी की पीठ-साबला ग्राम में स्थित है ।
  • संत मावजी का प्रमुख मंदिर माही नदी तट पर साबला गाँव में है ।
  • इन्हें श्रीकृष्ण के निकलंकी अवतार के रूप में माना जाता है ।
  • संत मावजी ने निष्कलंक सम्प्रदाय की स्थापना की ।

रामचरण जी

  • रामचरण जी का जन्म 1718 ई. में माघ शुक्ल चर्तुदशी लोडा ग्राम (जयपुर) में हुआ ।
  • इनके बचपन का नाम रामकिशन था ।
  • रामचरण जी के माता का नाम देऊजी तथा पिता का नामा बख़तराम था ।
  • इनकी पत्नी का नाम गुलाम कंवर था !
  • रामचरण जी एक रात को घूमते-घूमते मेवाड़ के  शाहपुर पहुंचे । वहाँ दातड़ा ग्राम में रह रहे स्वामी श्री कृपाराम जी महाराज को अपना गुरू स्वीकार किया ।
  • सोडा ग्राम रामचरण जी का ननिहाल था, जहाँ उनका जन्म हुआ, ' इनका वास्तविक गाँव बनवाडो था ।
  • रामचरण जी के कूल 12 प्रधान शिष्य थे ।
  • गुरू कृपाराम जी ने रामकिशन को रामचरण जी नाम प्रदान किया ।
  • इनके अनुयायी गुलाबी वस्त्र धारण करते है ।
  • वि. संवत् 1817 ई. में रामचरण जी ने रामस्नेही सम्प्रदाय की स्थापना की
  • शाहपुरा ( भीलवाडा) में रामस्नेही सम्प्रदाय की प्रधान पीठ स्थित है ।
  • रामचरण जी के उपदेश ' अणर्भवाणी ' आनाभाई वैणी' नामक ग्रन्थ में संग्रहित है ।

रामस्नेही सम्प्रदाय की राजस्थान में चार पीठे है

1. शाहपुरा 
2. रैण
3. सिंहथल 
4. खेड़ापा

  • शाहपुरा पीठ की नींव संत रामचरण जी ने डाली थी ।
  •  रैण (मैड़ता सिटी, नागौर) इसके संस्थापक संत दरियाव जी है ।
  • खेड़ापा (जोधपुर) इसके संस्थापक रामदास जी है ।
  • सिंहथल (बीकानेर) इसके संस्थापक संत हरिराम दास जी है ।
  • रामचरण जी ने गुरु के महत्व पर सर्वाधिक बल दिया । इनके अनुसार गुरू से दीक्षा प्राप्त किये बिना कोई भी राम स्नेही भवसागर से छुटकारा प्राप्त नहीं कर सकता ।
  • रामस्नेही सम्प्रदाय में निर्गुण भक्ति तथा सगुण भवित की रामधुनी एवं भजन कीर्त्तन की परम्परा के समन्वय से निर्गुण-निराकार परब्रह्म राम की उपासना की जाती है ।
  • इनका राम दशरथ पुत्र राम न होकर कण-कण में व्याप्त निर्गुण-निराकार परब्रह्म है ।
  • रामद्वारा - रामस्नेही सम्प्रदाय का प्रार्थना स्थल ।
  • बैशाख कृष्णा पंचमी गुरूवार विक्रम संवत् 1855 ( 5 अप्रेल, 1797 ) को रामचरण महाराज ने शाहपुरा ( भीलवाडा) में महानिर्वाण प्राप्त किया । 
  • होली के दूसरे दिन चैत्र कृष्ण एकम् से चैत्र कृष्ण पंचमी तक फूलडोल का मेला लगता है ।

संत चरणदास जी

  • चरणदास जी का जन्म अलवर जिले में डेहरा नामक गाँव में 1703 में मुरलीधर वैश्य के यहाँ हुआ ।
  • इनके गुरू का नाम शुकदेव मुनि था ।
  • चरणदास जी की माता का नाम कुंजो देवी था ।
  • इनका प्रारम्भिक नाम रणजीत था ।
  • इनके प्रमुख ग्रन्थ -' ब्रह्म ज्ञान सागर ', ' ब्रह्मचरित्र ' भक्ति सागर' तथा ' ज्ञान सर्वोदय ' है ।
  • चरणदास जी पीले वस्त्र पहनते थे ।
  • चरणदास जी ने नादिरशाह के आक्रमण की भविष्यवाणी की थी ।
  • श्रीमद् भागवत को चरणदास जी ने आधार धर्मग्रन्थ माना ।
  • चरणदास जी का पंथ चरणदासी पंथ कहलाया ।
  • चरणदासी पंथ सगुण एवं निर्गुण  भक्ति मार्ग का मिश्रण है ।
  • चरणदासी पंथ का मेवात तथा दिल्ली के क्षेत्र में अत्यधिक प्रभाव है ।
  • राज्य का एकमात्र संत जिसका जन्म राजस्थान में हुआ परंतु इनके द्वारा चलाए गए चरणदासी संप्रदाय की मुख्य पीठ दिल्ली में है ।
  • सहजोबाईं तथा दयाबाई इनकी दो प्रमुख शिष्या थी ।

  1. सहजोबाई  - सहजोवाई का जन्म डेहरा गाँव (अलवर) के एक वैश्य परिवार में 1800 ईं. में हुआ । इन्होनें सहज प्रकाश नामक ग्रंथ की रचना की ।
  2. दयाबाई - दयाबाई का जन्म मेहरा ग्राम (अलवर) में हुआ । इन्होनै 'दया बोध ' और 'विनय मालिका ' नामक दो ग्रंथों की रचना की ।
  • इस सम्प्रदाय के 42 नियम है ।
  • चरणदास जी का निधन दिल्ली में 1782 में हुआ । यहाँ इनकी समाधि पर वसंत पंचमी को मेला लगता है ।

धन्ना जी

  • इनका जन्म 1415 ई. में धुवन(टोंक) में हुआ था। 
  • धन्ना जी जाति से जाट थे ।
  •  इनके द्वारा रचित पदों को ' धन्नाजी की आरती ' कहा जाता है ।  
  • 5 वें सिक्ख गुरू अर्जुनदेव ने भी धन्नाजी की भक्तिभाव के बारे में गुरू ग्रंथ साहिब में उल्लेख किया है । 
  • इनका मुख्य मेला धूवन गाँव (टोंक) में लगता है, जहाँ सर्वाधिक अनुयायी पंजाब से आते है । 
  • धन्ना जी निर्गुण उपासक थे । 
  • धन्ना जी राजस्थान छोडकर बनारस गए और रामानंद के शिष्य बन गए । 
  • राजस्थान में भक्ति अन्दोलन के जनक संत धन्ना जी माने जाते है । 
  • धना जी का स्मारक जोबनेर (जयपुर) में स्थित है ।

भक्ति कवि दुर्लभ

  • इनका जन्म 1753 में बागड क्षेत्र में हुआ था । 
  • इनको ' राजस्थान का नृसिंह ' भी कहा जाता है ।
  • दुर्लभ जी ने डूंगरपुर और बाँसवाड़ा को अपना कार्य क्षेत्र बनाया । 
  • दुर्लभ जी ने लोगों को कृष्ण भक्ति के उपदेश दिये ।

हरिराम दास जी

  • हरिराम दास जी का जन्म व मृत्यु सिंहथल (बीकानेर) में हुआ ।
  •  इनके पिता का नाम श्री भागचन्द जी जोशी था ।
  •  हरिराम दास जी के गुरू संत श्री जैमलदास जी थे ।
  • हरिराम दास जी ने जैमलदास जी से रामस्नेही पंथ की दीक्षा ली तथा रामस्नेही सम्प्रदाय की सिंहथल शाखा स्थापित की । 
  • इनकी प्रमुख कृति ' निशानी ' थी । इसमें प्राणायाम, समाधि एवं योग के तत्त्वों का उल्लेख है ।
  • इन्होंने गुरू को पारस पत्थर से भी उच्च स्थान दिया ।
  • सिंहथल (बीकानेर) में रामस्नेही पंथ के संस्थापक संत हरिराम दास जी है ।

लालदास जी

  • इनका जन्म मेवात प्रदेश के धोलीदूव गाँव में श्रावण कृष्ण पंचमी को 1540 ई. में हुआ । 
  • इनके माता-पिता का नाम सपदा-चांदमल था । 
  • लालदास जी मेव जाति के लकड़हारे थे । 
  • इनके पूजा स्थल अलवर, शेरपुर व नगला में हैं । 
  • भरतपुर व अलवर की मेव जाति मे लालदास जी की अधिक मान्यता है । 
  • लालदासी सम्प्रदाय के उपदेश 'वाणी' नामक ग्रन्थ में संग्रहित है । 
  • लालदासजी 'लालदासी सम्प्रदाय ' के संस्थापक है । 
  • इनका समाधि स्थल नगला (भरतपुर) में है ।
  • लालदास जी ने हिन्दू-मुस्लिम एकता पर बल दिया ।
  • लालदास जी ने तिजारा के मुस्लिम संत गद्दन चिश्ती (मद्दाम) से दीक्षा ली थी ।
  • इनकी मृत्यु नगला गाँव (भरतपुर रियासत) में हुईं थी । 
  • लालदासजी की चेतावनियाँ उनका प्रमुख काव्य ग्रंथ है ।
  • इस संप्रदाय में दीक्षित करने के लिए शिष्य को गधे पर काला मुँह 'करके उल्टा बिठाया जाता है और फिर उसे गाँव की गलियों में घुमाया जाता है ता कि उसके जीवन में लेशमात्र भी अभिमान न रहे । 
  • शाहजहाँ का पुत्र दाराशिकोह संत लालदासजी से मिलने आया था । तब संत ने कहा कि दिल्ली के तख्त पर तो वही बैठेगा, जो अपने भाईयों की हत्या करेगा । आगे चलकर यह भविष्यवाणी सिद्ध हुई । औरंगजेब ने अपने भाईयों दाराशिकोह, शुजा व मुराद का वध करके दिल्ली के तख्त पर कब्जा किया था ।
  • इस पंथ के लोग मेव जाति की कन्या से विवाह करते है । 
  • लालदास जी ने समाज में व्याप्त मिथ्याचारों और अंधविश्वासों का विरोध किया व भक्ति तथा नैतिक शुद्धता पर बल दिया ।

हरिदास निरंजनी

  • इनका जन्म कापडोद (नागौर) में हुआ । 
  • हरिदास जी सांखला क्षत्रिय परिवार के थे । 
  • इनका मूल नाम हरिसिंह था ।
  • हरिदास जी ने निर्गुण भक्ति का उपदेश देकर 'निरंजनी सम्प्रदाय ' चलाया ।
  • इनके उपदेश 'मंत्र राज प्रकाश ' तथा ' हरिपुरुष जी की वाणी' में संग्रहित है ।
  • हरिदास जी संत बनने से पहले डकैत थे ।
  • हरिदास (हरिपुरुष) जी को 'कलियुग 'का वाल्मिकी' कहा जाता है ।
  • इनको कुटुम्बियों के महात्मा ने समझाया कि ' जो हत्यालूट करेगा, वही उस पाप का भागीदार होगा' यह सुनकर हरिदास जी ने डकैत का मार्ग छोड़ दिया ।
  • हरिदास जी ने 'तीखी डूंगरी' पर जाकर घोर तपस्या की ।
  • गाढा बास/गाढा धाम-नागौर की डीडवाना तहसील के गाँव में हरिदास जी ने समाधि ग्रहण की ।
  • पहले ये डकैती का काम करते थे,परंतु एक दिन एक महात्मा ने इन्हें समझाया कि' जो व्यक्ति हत्या व लूटमार करता है वही उस पाप का भागीदार होता है न कि उसको खाने वाला । ' यह सुनकर हरिसिंह डकैती का कार्य छोडकर कापडौद के नजदीक ' तीखी डूगरी ' पर घोर तपस्या कर अपना एक 'निरंजनी संप्रदाय चलाया । 
  • इनके द्वारा रचित प्रमुख ग्रंथ भक्त विरदावली ‘, भरथरी संवाद तथा "साखी" है ।
  • संत हरिदास जी ने गाढा बाँस गांव (डीडवाना-नागौर) में समाधि ली जहाँ प्रतिवर्ष फाल्गुन शुक्ल एकम् से फाल्गुन शुक्ल द्वादशी तक मेला लगता है ।

संत रैदास

  • संत रैदास जी के गुरू का नाम रामानन्द था ।
  • रैदास जी की वाणियों को ' रैदास की परची ' भी कहते है । रैदास चमार जाति से थे ।
  • संत रैदास जी जाति-पांति व बाह्य आडम्बरों के कट्टर विरोधी थे ।
  • रैदास की वाणियां मानवता, सहिष्णुता, आत्मसमर्पण, भक्ति आदि विषयों से सम्बन्धित्त रसों को लोगों के दिलों में आज तक प्रेरणा की स्त्रोत बनी हुई है ।
  • कबीरदास जी ने रैदास को संतो का संत कहा ।
  • रैदास जी की छतरी चित्तौड़गढ के कुम्भश्याम मंदिर के एक कोने में है ।
  • मीरां बाई के गुरू का नाम रैदास था ।
  • रैदास के ग्रंथ परची कहलाते है ।

संत जैमलदास जी

  • संत जैमलदास जी रामस्नेही सम्प्रदाय के प्रसिद्ध संत श्री माधोदास जी दीवान के शिष्य थे ।
  • जैमलदास जी ने हरिराम दास जी को दीक्षा दी थी ।
  • जैमलदास जी को सिंहथल खेड़ापा शाखा का आचार्य भी माना जाता है ।

आचार्य परशुराम

  • इनका जन्म 16वी शताब्दी में ठीकरिया गाँव (सीकर) में हुआ था ।
  • आचार्य परशुराम 36वे निम्बाकाचार्य थे ।
  • इन्होंने हरिव्यास देवाचार्य से दीक्षा प्राप्त कर मथुरा में नारद टीले पर तप किया ।
  • सलेमाबाद (अजमेर) में निम्बार्क संप्रदाय की पीठ की स्थापना के साथ एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया जहाँ पर इन्होंने जीवित समाधि ली ।
  • सलेमाबाद में आज भी उनकी चरण यादुकाओं की पूजा की जाती है ।
  • जयपुर नरेश जगतसिंह ने सलेमाबाद जाकर आचार्य का आशीर्वाद प्राप्त किया तत्पश्चात् राजकुमार जयसिंह का जन्म हुआ ।
  • 19वीं सदी में इस राजवंश ने इस संप्रदाय को काफी आश्रय प्रदान किया ।

गूदड़ सम्प्रदाय

  • गूदड़ संप्रदाय के प्रवर्तक संतदास जी थे । 
  • इस संप्रदाय की प्रमुख गद्दी दाँतड़ा (भीलवाडा) में है ।
  • संतदास जी गूदडी से वने कपडे पहने थे । इसलिए इस संप्रदाय का नाम मूदड संप्रदाय पडा ।

परनामी सम्प्रदाय

  • कृष्ण भगवान को अपना अराध्य देव मानने वाले प्राणनाथ जी (जामनगर-गुजरात) ने अपने गुरू निजानंद स्वामी से दीक्षा लेकर 'परनामी संप्रदाय' की स्थापना की ।
  • प्राणनाथ जी की शिक्षाएँ एवं उपदेश "कुंजलभ स्वरूपं' नामक ग्रंथ में उल्लेखित है ।
  • परनामी संप्रदाय मुख्य पीठ 'पना' (मध्यप्रदेश) में है ।
  • राजस्थान में परनामी संप्रदाय के सर्वाधिक अनुयायी आदर्श नगर (जयपुर) में रहते है । जहाँ इनकी पीठ है ।

संत रामदास जी

  • इनका जन्म भीकमकोर ग्राम (जोधपुर) में हुआ तथा मृत्यु खेड़ापा में हुई ।
  • रामदास जी ने रामस्नेही सम्प्रदाय के श्री हरिरांमदास जी से दीक्षा ग्रहण कर इस सम्प्रदाय की खेड़ापा शाखा स्थापित की ।

संत नवलदास जी (नवल सम्प्रदाय )

  • नवल संप्रदाय के प्रवर्तक संत नवल दास जी थे ।
  • संत नवल दास जी का जन्म हस्सोलाव गाँव (नागौर) में जन्म हुआ था ।
  • नवल संप्रदाय की प्रमुख पीठ जोधपुर में है ।
  • इनकी वाणी का संगृह 'नवलेश्वर अनुभव वाणी' में है

अलखिया सम्प्रदाय 

  • चूरू जिले में जन्मे स्वामी लाल गिरी द्वारा 10वीं शताब्दी में इस निर्गुण भक्ति संप्रदाय की स्थापना की गई । 
  • आलखिया संप्रदाय की प्रमुख पीठ बीकानेर में है । ' अखल स्तुति प्रकाश ' इस संप्रदाय का प्रमुख ग्रंथ है ।

नरहड़ के पीर

  • नरहड़ के पीर का नाम हज़रत शक्कर बाबा बताया जाता है । 
  • इनकी दरगाह चिड़ावा (झुंझुनू) के पास नरहड़ ग्राम में है ।
  • शेख सलीम चिश्ती नरहड़ पीर के शिष्य थे, जिनके नाम पर बादशाह अकबर ने अपने पुत्र का नाम सलीम (बादशाह जहांगीर) रखा ।
  • नरहड़ पीर को शेखावटी (सीकर, चूरू, झुंझुनू) क्षेत्र में पूरी मान्यता है।
  • नरहड़ के पीर का उर्स जन्माष्टमी पर भरता है ।
  • पुरानी मान्यता के अनुसार पागलपन के असाध्य रोगी भी इनकी जात से ठीक हो जाते है ।
  • नरहड़ के पीर 'बागड के धणी' के रूप में प्रसिद्ध है ।
  • नरहड पीर की दरगाह साम्प्रदायिक सद्भाव का अनूठा स्थल है ।

ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती 

  • गरीब नवाज ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती का जन्म फारस के एक गाँव सर्जरी में हुआ था ।
  • अजमेर जिले में ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह है, जहाँ उर्स पर विशाल मेला लगता है । यह उर्स रज्जब मास की 1 से 6 तारीख तक भरता है ।
  • मुईनुद्दीन चिश्ती ने पृथ्वीराज चौहान तृतीय के काल में अजमेर को अपनी कर्मस्थली बनाया ।
  • उर्स का मेला हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिक सद्भाव का सर्वोत्तम केन्द्र है ।
  • अकबर पुत्र प्राप्ति की अभिलाषा से पैदल जियारत करने यहाँ आया था ।

पीर फखरुद्दीन

  • ये दाउदी बोहरा सम्प्रदाय के आराध्य पीर है । 
  • पीर फखरूद्दीन की गलियाकोट (डूंगरपुर) में दरगाह है

राजस्थान के संत संप्रदाय trick एवं उनकी प्रमुख गद्दी 

  1. अलखिया संप्रदाय बीकानेर
  2. बिश्नोई संप्रदाय मुकाम तालवा नोखा (बीकानेर) 
  3. ज़सनाथी संप्रदाय कतरियासर (बीकानेर)
  4. गूदड़ संप्रदाय , दाँतडा (भीलवाड़ा)
  5. रामस्नेही संप्रदाय शाहपुरा (भीलवाडा)
  6. लालदासी संप्रदाय नगला (भरतपुर)
  7. दादूपंथ नारायणा(जयपुर)
  8. गौडीय (ब्रह्म) संप्रदाय गोविंद देवजी (जयपुर)
  9. रामानन्दी संप्रदाय गलताजी (जयपुर)
  10. रसिक संप्रदाय रैवासा (सीकर)  
  11. निरंजवी संप्रदाय गाढा डीडवाना-नागौर'
  12. नाथ संप्रदाय जोधपुर
  13. नवल संप्रदाय जोधपुर
  14. वल्लभ संप्रदाय नाथद्वासा राजसमंद 
  15. निम्बार्क संप्रदाय सलेमाबाद (अजमेर) 
  16. चिश्ती संप्रदाय अजमेर 
  17. चरणदासी संप्रदाय दिल्ली

Read also

  1. संत - दादूदयाल
  2. संत जसनाथ जी 
  3. संत जांभोजी विश्नोई
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 राजस्थान के संत संप्रदाय pdf download

Saturday, 27 April 2019

Short Notes on Dadu dayal ji | राजस्थान के संत - दादूदयाल
नमस्कार दोस्तों इस पोस्ट में आप राजस्थान के प्रमुख  संत दादूदयाल दादू सम्प्रदाय  के संस्थापक के बारे में संपूर्ण जानकारी प्राप्त करेंगे अगर आपको यह पोस्ट अच्छी लगे तो अपने दोस्तों को जरूर शेयर करें

राजस्थान के प्रमुख संत dadu दयाल


Rajasthan ke sant dadu dayal ji
राजस्थान के संत - दादूदयाल

  • दादूदयाल जी का जन्म 1544 ईं. (फाल्गुन शुक्ल अष्टमी) अहमदाबाद में हुआ ।
  • संत दादू की शिष्य परम्परा में 152 शिष्य माने जाते हैं, जिनमें 52 प्रमुख शिष्य अब 52 स्तम्भ कहलाते हैं ।
  • दादूजी की रचनाएँ दादूदयाल री वाणी और दूहा हरड़ेवाणी है । इनकी भाषा ढूंढाडी है ।
  • दादूदयाल जी की कर्म भूमि राजस्थान थी ।
  • भगवत् भक्ति के साथ-साथ दादू धुनिये का कार्यं भी करते थे । नरैना या नरायणा (जयपुर) में दादूपंथियों की प्रधान गद्दी स्थित है । 
  • 1585 ईं. में फतेहपुर सीकरी की यात्रा के दौरान उन्होंने अकबर से भेंट की तथा उसे अपने विचारों से प्रभावित किया ।
  • संत दादूजी ने ईश्वर गुरू में आस्था, प्रेम और नैतिकता,आत्मज्ञान, जात-पात की निस्सारता तथा सत्य एवं संयमित जीवन पर जोर दिया । 

दादू सम्प्रदाय की स्थापना

  • 1574 ई. में दादू दयाल ने साम्भर में दादू सम्प्रदाय की स्थापना की तथा मृत्यु के बाद दादूपंथ नाम से जाने गये ।
  • दादूपंथ के सत्संग स्थल अलख दरीबा कहलाते है ।
  • 1568 ई. में सांभर में आकर प्रथम उपदेश दिया । सन् 1602 में नरैना (फुलेरा) आ गये और वही ज्येष्ठ कृष्ण अष्टमी 1605 ईं. में महाप्रयाण किया ।
  • नारायणा/नराणां (जयपुर) में दादूजी के कपडे और पोथियां वर्त्तमान समय तक सुरक्षित रखी गई है ।
  • दादूजी के शरीर को भैराण की पहाडी दादूखोल नामक गुफा में समाधि ज्येष्ठ कृष्ण अष्टमी संवत् 1660 या 1605 ई को दी गई । 
  • सांभर में जब विद्रोहियों ने दादू जी के विरुद्ध षडयंत्र रचना प्रारम्भ किया तो 1575 ई० में दादू अपने 25 शिष्यों दो साथ आमेर चले गये ।
  • दादू पंथी हमेशा अविवाहित रहते है ।
  • दादूपंथी अपनी मृत्यु के बाद शव को पशु-पक्षियों को खिलाते हैं । 
  • संत सुंदरदास एकमात्र ऐसे कवि जिन्हें साहित्य मर्मज्ञ और पद साखियों के अतिरिक्त कवित्त सवैया लिखने में सिद्धहस्त माना जाता है, जिसकी भाषा ' पिंगल ' थी । 
  • दादूजी को दूसरा शंकराचार्य भी कहा जाता है ।
  • इन्होंने 42 ग्रंथों की रचना की जिनमें ' ज्ञान समुद्रा, ज्ञान सवैया (सुंदर विलास) , सुंदर सार, सुंदर ग्रंथावली ' इनके महत्वपूर्ण ग्रंथ है ।

लोक मान्यता के अनुसार… 

  • दादूदयाल साबरमती नदी (अहमदाबाद-गुजरात) में बहते हुए लोदीरामजी (सारस्वत ब्राह्मण) को संदूक में मिले ।
  • दादूजी ने कबीरदास के शिष्य श्री वृंदावन जी (बुड्ढनजी) से 11 वर्ष की उम्र में दीक्षा लेकर घर को त्यागा और मात्र 19 वर्ष की आयु में राजस्थान में प्रवेश कर सिरोही, कल्याणपुर, साँभर, अजमेर होते हुए अंततः दूदू के पास 'नारायणा' में अपना स्थान अंतिम समय व्यतीत किया । 
  • दादूदयाल के 152 शिष्य थे जिनमें से प्रमुख 52 शिष्य जो 52 स्तंभ कहलाते है, जिनमें पुत्र ' गरीबदास” ,मिस्किनदास के अलावा बखनाजी, रज्जबजी, सुंदरदासजी, जगन्नाथ व माधोदासजी आदि प्रमुख है ।
  • नागा पंथदादूजी के शिष्य सुंदरदासजी द्वारा शुरू किया गया नागा पंथ जिसमें साधुओं के पास हथियार भी होते है । 
  • इसी नागा संप्रदाय के संतों ने जयपुर राज्य के सवाई जयसिंह व जोधपुर के राजा मानसिंह की सहायता की थी ।
  • जिस दिन दादूजी की मृत्यु हुई उसी दिन से उन्होनें अपनी आँखें बंद कर ली और जीवनभर नहीं खोली ।
  • इनका निवास स्थल 'रज्जब द्वार' कहलाता है ।
  • इनके शिष्यों को 'रज्जवात‘ अथवा ' रज्जब पंथी ' कहा है । 
  • राजस्थान में भक्ति आंदोलन को फैलाने का श्रेय दादूजी को है । दादूजी के गुरू का नाम वृद्धानन्द था ।
  • दादूदयाल के प्रमुख ग्रन्थ दादूदयाल री वाणी , दादूदयाल रां दूहा , कायाबेली है ।

दादूजी को ' राजस्थान का कबीर ' कहा जाता है ।  सम्भवत: दादूजी मुसलमान एवं व्यवसाय से धुनिया थे ।

दादू पंथ की शाखाएं

दादूपंथी पांच प्रकार के होते है
  1.  खालसा गरीबदास जी की आचार्य परम्परा से सम्बद्ध साधु ।
  2. विरक्त - रमते फिरते गृहस्थियों को दादू धर्म का उपदेश देने वाले साधु ।
  3. उत्तरादे व स्थानधारी - जो राजस्थान को छोडकर उत्तरी भारत में चले गये ।
  4. खाकी - जो शरीर पर भस्म लगाते है व जटा रखते है । 
  5. इसके अलावा इनमें नागा साधु भी होते हैं । नागा शाखा सुंदरदास प्रवर्तक ।

Friday, 26 April 2019

जसनाथ सम्प्रदाय | Sant Jasnath ji ka Itihas in Hindi
संत जसनाथ जी का जन्म 1482 ईं. (वि सं. 1539) की कार्तिक शुक्ला एकादशी (देवोसत्थान एकादशी) को बीकानेर जिले के कतरियासर ग्राम में हुआ ।

जसनाथजी का जीवन परिचय

jasnath ji rules in hindi
Sant Jasnath ji ka Itihas

  • जन मान्यता है कि कतरियासर गाँव के जागीरदार हमीर जाट को एक रात स्वपन में दिखाई दिया कि गाँव की उत्तर दिशा में स्थित तालाब के किनारे एक बालक बैठा है । प्रात: तालाब के तट पर सचमुच एक सुन्दर बालक को देखकर नि: संतान हमीर जी अत्यन्त प्रसन्न हुए । उसे घर लाकर उन्होंने अपनी पत्नी रूपादे को सौंप दिया । यही बालक संत जसनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ । इनकी माता रूपादे थी ।
  • नाथ सम्प्रदाय के लोग भगवान शिव के अनन्य भक्त होते हैं ।
  • भगवान आशुतोष शिव की प्रसन्नता के लिए अघोर पूजा पद्धति को भी वे ठीक मानते है ।
  • इन्होंने 36 धार्मिक नियमों का निर्धारण 15०4 ई. में किया ।
  • नाथ सम्प्रदाय में ही इन 36 नियमों का पालन करने वाले लोग जसनाथ कहलाने लगे ।
  • गोरक्ष पीठ के गोरख आश्रम में जसनाथ जी की शिक्षादीक्षा हुई । बालक जसनाथ के गुरू गोरखनाथ थे ।
  • विक्रम संवत् 1551 की अश्विनी शुक्ल सप्तमी को उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ ।
  • इस संप्रदाय के लोग गले में काले रंग का डोरा पहनते है ।
  • जसनाथी सम्प्रदाय के वे अनुयायी जो सम्पूर्ण जीवन और संसार से विरक्त हो गये, वे परमहंस कहलाये ।
  • जसनाथी सम्प्रदाय में भगवा वस्त्र पहनने वाले अनुयायी सिद्ध कहलाये ।

अग्नि नृत्य

  • जसनाथी सम्प्रदाय के अनुयायियों द्वारा धधकते हुये अंगारों पर किया जाने वाला नृत्य है इसमें जसनाथी अग्नि में प्रवेश करने से पहले फ्ते-फ्ते कहते है ।
  • श्री जसनाथ जी मात्र 24 वर्ष की आयु में ब्रह्मलीन हो गये । इन्होंने आश्विन शुक्ल सप्तमी को समाधि ग्रहण की ।
  • जसनायी संत जीवित समाधि लेते है ।
  • जसनाथी के चमत्कारों से प्रभावित होकर सिकंदर लोदी ने जसनाथ जी को कतरियासर (बीकानेर) में 500 बीघा जमीन भेंट की ।
  • ज़सनाथ जी को प्रमुख पाँच उप पीठें मालासर (बीकानेर) , लिखमादेसर (बीकानेर) , पूनरासर (बीकानेर) , बमलू (बीकानेर) एवं पाँचला (नागौर) है ।
  • ये आजन्म ब्रह्मचारी रहे तथा गोरखमालिया नामक स्थान पर 12 वर्ष तक तपस्या क्री ।
  • जसनाथजी के उपदेश ' सिंभूदडा ' एवं ' कोड़ा ' ग्रन्थों मे संग्रहित है

Monday, 22 April 2019

Jambho ji History in Hindi | जाम्भोजी का इतिहास
नमस्कार दोस्तों इस पोस्ट में आप  राजस्थान के प्रमुख संत जांभोजी विश्नोई संप्रदाय के संस्थापक के इतिहास ( Jambho ji History in Hindi )  के बारे में संपूर्ण जानकारी प्राप्त करेंगे अगर आपको यह पोस्ट अच्छी लगे तो अपने दोस्तों को जरूर शेयर करें

Jambho ji History in Hindi | जाम्भोजी का इतिहास

jambheshwar ki photo
guru jambheshwar

  • जाम्भो जी का मूल नाम धनराज था ।
  • जम्भेश्वर जी का जन्म 1451 ईं (विक्रम सम्वत 1508) में जन्माष्टमी के दिन नागौर जिले के पीपासर गाँव में हुआ था । 
  • जम्मेश्वर जी के पिता का नाम लोहट जी तथा माता का नाम हंसादेवी था ।
  •  इनके पिता पंवार राजपूत थे ।
  • इनके गुरू का नाम गोरखनाथ था ।
  • इनकी माता हंसादेवी ने उन्हें श्रीकृष्ण का अवतार माना । 

Jambhoji ki Jivani

  • जम्मेश्वर जी ने 34 वर्ष की उम्र में सारी सम्पति दान कर दी और दिव्य ज्ञान प्राप्त करने बीकानेर के संभराथल नामक स्थान पर चले गये ।
  • जाम्भो जी ने बिश्नोई समाज में धर्म की प्रतिष्ठा के लिए 29 नियम बनाये ।
  • इसी तरह बीस और नौ नियमों को मानने वाले बीसनोई या बिश्नोई कहलाये ।
  • संत जम्भेश्वर जी को पर्यावरण वैज्ञानिक कहा जाता है । जाम्भो जी ने 1485 में समराथल (बीकानेर) में बिश्नोई सम्प्रदाय का प्रवर्तन किया ।

jambhoji ki pramukh granth

  • जाम्भो जी ने ' जम्भसंहिता ' ' जम्भसागर शब्दावली ' और ' बिश्नोई धर्म प्रकाश ' आदि ग्रन्थों की रचना की गई ।
  • जम्भेश्वर जी के द्वारा रचित 120 शब्द जम्भवाणि में जम्भ सागर संग्रहित है ।
  • संत जाम्भो जी ने हिन्दू तथा मुस्लिम धर्मों में व्याप्त भ्रमित आडम्बरों का विरोध किया ।
  • पुरानी मान्यता के अनुसार जम्मेश्वर जी के प्रभाव के फलस्वरूप ही सिकन्दर लोदी ने गौ हत्या पर प्रतिबन्ध लगाया था । 

बिश्नोई सम्प्रदाय की स्थापना

  • संत जाम्भो जी ने बिश्नोई सम्प्रदाय की स्थापना कार्तिक बदी अष्टमी को संभराथल के एक ऊंचे टीले पर की थी, उस टीले को इस पंथ में ' धोक धोरे ' के नाम से जाना जाता है ।
  • गुरू जम्भेश्वर जी के मुख से उच्चारित वाणी शब्दवाणी कहलाती है । इसी को जम्भवाणि और गुरू वाणी भी कहा जाता है 
  • बीकानेर नरेश ने संत जाम्भो जो के सम्मान में अपने राज्य बीकानेर के झंडे में खेजड़े के वृक्ष को माटों के रूप में रखा ।
  • जाम्भो जो के अनुयायी 151 शब्दों का संकलन जम्भ गीत को ' पांचवां वेद ‘ मानते है । यह राजस्थानी भाषा का अनुपम ग्रंथ है ।
  • राव दूदा जम्भेश्वर के समकालीन थे ।
  • बिश्नोई नीले वस्त्र का त्याग करते है ।
  • जाम्भो जो के उपदेश स्थल साथरी कहलाते है
  • बिश्नोई सम्प्रदाय में गुरू जाम्भो जी को विष्णु का अवतार मानते है । गुरू जाम्भो जी का मूलमंत्र था हृदय से विष्णु का नाम जपो और हाथ से कार्य करो ।
  • गुरू जाम्भो जी ने संसार को नाशवान और मिथ्या बताया । इन्होंने इसे 'गोवलवास (अस्थाई निवास) कहा ।

पाहल

  • गुरू जाम्भीजी द्वारा तैयार ' अभिमंत्रित जल ' जिसे पिलाकर इन्होंने आज्ञानुवर्ती समुदाय को बिश्नोई पंथ में दीक्षित किया था ।

"कथा जैसलमेर की'…

  • संतं कवि वील्होजी (सन्  1532-1616) द्वारा लिखित इतिहास प्रसिद्ध कविता, जिसमें ऐसे छ: राजाओं के नामों का पता चलता है, जो उनके समकालीन थे और उनकी शरण में आये थे ।
  •  ये छ: राजा थे…
  1.  दिल्ली के बादशाह सिकन्दर लोदी 
  2. नागौर का नवाब मुहम्मद खान नागौरी, 
  3. मेड़ता का राव दूदा, 
  4. जैसमलेर का राव जैतसी 
  5. जोधपुर का राठौड़ राव सातल देव 
  6. मेवाड का महाराणा सागा ।

पीपासर

  • नागौर जिले में स्थित पीपासर गुरू जम्मेश्वर जी की जन्म स्थली है ।
  • यहाँ उनका मंदिर है तथा उनका प्राचीन घर और उनकी खडाऊ यहीं पर है ।

मुक्तिधाम मुकाम

  • यहाँ गुरू जम्भेश्वर जी का समाधि स्थल हैं। 
  • बीकानेर जिले की नोखा तहसील में स्थित मुकाम में सुन्दर मंदिर भी बना हुआ है । 
  • जहाँ प्रतिवर्ष फाल्गुन और अश्विन की अमावस्या को मेला लगता है ।

लालसर (बीकानेर)

  • जम्मेश्वर जी ने यहाँ निर्वाण प्राप्त किया था ।

जाम्भा 

  • जोधपुर जिले के फलौदी तहसील में जाम्भा गाँव है। जम्भेश्वर जी के कहने पर जैसलमेर के राजा जैतसिंह ने यहाँ एक तालाब बनाया था । बिश्नोई समाज के लिए यह पुष्कर के समान पावन तीर्थ है ।
  •  यहाँ प्रत्येक वर्ष चैत्र अमावस्या व भाद्र पूर्णिमा को मेला लगता है ।

जागलू

  • यह बीकानेर की नोखा तहसील में स्थित है । जम्भेश्वर जी का यहाँ पर सुन्दर मंदिर है ।

रामड़ावास

  • यह जोधपुर जिले में पीपल के पास स्थित है । यहाँ जम्भेश्वर जी ने उपदेश दिये थे ।

लोदीपुर

  • उत्तरप्रदेश के मुरादाबाद जिले में स्थित है । अपने भ्रमण के दौरान जम्मेश्वर जी यहाँ आये थे ।
  • बिश्नोई संप्रदाय भेड पालना पसंद नहीं करते, क्योंकि भेड़ नव अंकुरित पौधों को खा जाती है ।
  • 1526 ईं. (वि सं 1593) में त्रयोदशी के दिन मुकाम नामक गाँव में समाधि ली थी ।

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