Saturday, 11 May 2019

राजस्थान में संत सम्प्रदाय | Rajasthan ke Pramukh Sant Sampraday

राजस्थान में संत सम्प्रदाय | Rajasthan ke Pramukh Sant Sampraday

rajasthan ke sant sampraday
 Rajasthan ke Pramukh Sant Sampraday

इस पोस्ट में आप राजस्थान के प्रमुख  संत or सम्प्रदाय ( Rajasthan ke Pramukh Sant Sampraday in Hindi ) Raj. GK, राजस्थान के संत संप्रदाय trick  के बारे में संपूर्ण जानकारी प्राप्त करेंगे 

संत रज्जब जी

  • संत रज्जब जी का जन्म सांगानेर (जयपुर) मे 16वी सदी में हुआ ।
  •  विवाह के लिए जाते समय दादूजी के उपदेश सुनकर ये उनके शिष्य बन गये तथा जीवनभर दूल्हे के वेश में रहते हुए ' दादू के उपदेशों ' का बखान किया । " रज्जब वाणी एवं 'सर्वगी' इनके प्रमुख ग्रन्थ है । 
  • रज्जब जी की प्रधान गद्दी सांगानेर में है । 
  • रज्जब जी की मृत्यु भी सांगानेर (जयपुर) में हुई ।

संत सुन्दरदास जी

  • संत सुन्दरदास जी का जन्म दौसा जिले के खण्डेलवाल वैश्य परिवार में हुआ । 
  • सुन्दरदास जी के पिता का नाम श्री परमानन्द (शाह चोखा ) व माता का नाम सती था ।
  • दादू पंथ में नागा साधु वर्ग प्रारम्भ किया ।

संत पीपा जी

  • संत पीपा जी का जन्म 1525 ई. (सं. 1380) की चैत्र पूर्णिमा को गागरोन दुर्ग के राजा खींची चौहान कड़ावा राव के यहाँ हुआ ।
  • पीपा जी की माता का नाम लक्ष्मीवती था ।
  • पीपा जी के बचपन का नाम प्रतापसिंह था ।
  • संत पीपा जी रामानन्द जी के शिष्य थे ।
  • संत पीपा जी वस्त्रों की सिलाई का कार्य करते थे ।
  • दर्जी समुदाय पीपा जी को अपना आराध्य देवता मानता है । 
  • समदडी, जोधपुर के मसूरिया, गढ गागरोन में पीपाजी के मेले आयोजित होते हैं ।
  • समदडी ग्राम (बाडमेर) में पीपाजी का मंदिर स्थित है ।
  • दिल्ली के सुल्तान फिरोजशाह तुगलक के द्वारा गागरोण पर हमला किये जाने पर संत पीपा जी ने फिरोजशाह तुगलक को पराजित किया था ।
  • टोडा (टोंक) में पीपाजी की गुफा है । पीपाजी की 20 रानियाँ थी । 
  • पीपाजी ने अपनी छोटी पत्नी रानी सीता पद्मावती की प्रेरणा व कुलदेवी की कृपा अपना राजकाज अपने भतीजे को सौंपकर वैराग्य धारण कर लिया । 
  • पीपाजी का श्रीहरि साक्षात दर्शन "द्वारकाधीश मंदिर' में हुआ । 
  • संत पीपाजी की चमत्कारिक घटनाओं में तेली जाति के एक व्यक्ति को मारकर पुन: जीवित करना और खूँखार जानवर शेर को भी पालतू बना लेना आदि शामिल है । 
  • पीपाजी ने अपना अंतिम समय टोंक जिले के ' टोडा ग्राम ' में स्थित एक गुफा में भजन करते हुए व्यतीत किया जहाँ पर चैत्र कृष्ण नवमी को देवलोक (मृत्यु) को प्राप्त हुए । वह गुफा आज " संत पीपा की गुफा' (तहसील-टोड़ारायसिंह, जिला टोंक) के नाम से जानी जाती है । 
  • संत पीपाजी की छतरी कालीसिंध नदी के किनारे गागरोण दुर्ग (झालावाड) में स्थित है जहाँ उनके चरण चिह्न की पूजा होती है । 
  • संत पीपाजी के त्याग व सेवा रूपी कार्यो के बारे में संत रविदास के विचार इस प्रकार से है
 न कबीर के लक्ष्मी ना कोऊ मेरे ठाट ।
धन पीपा जिन तज दियो, रबिया राज अरू पाट । ।

माव जी

  • संत माव जी को महामनोहर जी के नाम से भी जाना जाता है ।
  • संत मावजी का जन्म बागड़ प्रदेश के सांबला ग्राम (डूंगरपुर) में हुआ ।
  • 1727 ई में बेणेश्वर नामक स्थान पर संत मावजी को ज्ञान की प्राप्ति हुई और यहीं इन्होंने बेणेश्वर धाम की स्थापना की ।
  • मावजी की वाणी 'चोपडा' कहलाती है ।
  • संत मावजी की पीठ-साबला ग्राम में स्थित है ।
  • संत मावजी का प्रमुख मंदिर माही नदी तट पर साबला गाँव में है ।
  • इन्हें श्रीकृष्ण के निकलंकी अवतार के रूप में माना जाता है ।
  • संत मावजी ने निष्कलंक सम्प्रदाय की स्थापना की ।

रामचरण जी

  • रामचरण जी का जन्म 1718 ई. में माघ शुक्ल चर्तुदशी लोडा ग्राम (जयपुर) में हुआ ।
  • इनके बचपन का नाम रामकिशन था ।
  • रामचरण जी के माता का नाम देऊजी तथा पिता का नामा बख़तराम था ।
  • इनकी पत्नी का नाम गुलाम कंवर था !
  • रामचरण जी एक रात को घूमते-घूमते मेवाड़ के  शाहपुर पहुंचे । वहाँ दातड़ा ग्राम में रह रहे स्वामी श्री कृपाराम जी महाराज को अपना गुरू स्वीकार किया ।
  • सोडा ग्राम रामचरण जी का ननिहाल था, जहाँ उनका जन्म हुआ, ' इनका वास्तविक गाँव बनवाडो था ।
  • रामचरण जी के कूल 12 प्रधान शिष्य थे ।
  • गुरू कृपाराम जी ने रामकिशन को रामचरण जी नाम प्रदान किया ।
  • इनके अनुयायी गुलाबी वस्त्र धारण करते है ।
  • वि. संवत् 1817 ई. में रामचरण जी ने रामस्नेही सम्प्रदाय की स्थापना की
  • शाहपुरा ( भीलवाडा) में रामस्नेही सम्प्रदाय की प्रधान पीठ स्थित है ।
  • रामचरण जी के उपदेश ' अणर्भवाणी ' आनाभाई वैणी' नामक ग्रन्थ में संग्रहित है ।

रामस्नेही सम्प्रदाय की राजस्थान में चार पीठे है

1. शाहपुरा 
2. रैण
3. सिंहथल 
4. खेड़ापा

  • शाहपुरा पीठ की नींव संत रामचरण जी ने डाली थी ।
  •  रैण (मैड़ता सिटी, नागौर) इसके संस्थापक संत दरियाव जी है ।
  • खेड़ापा (जोधपुर) इसके संस्थापक रामदास जी है ।
  • सिंहथल (बीकानेर) इसके संस्थापक संत हरिराम दास जी है ।
  • रामचरण जी ने गुरु के महत्व पर सर्वाधिक बल दिया । इनके अनुसार गुरू से दीक्षा प्राप्त किये बिना कोई भी राम स्नेही भवसागर से छुटकारा प्राप्त नहीं कर सकता ।
  • रामस्नेही सम्प्रदाय में निर्गुण भक्ति तथा सगुण भवित की रामधुनी एवं भजन कीर्त्तन की परम्परा के समन्वय से निर्गुण-निराकार परब्रह्म राम की उपासना की जाती है ।
  • इनका राम दशरथ पुत्र राम न होकर कण-कण में व्याप्त निर्गुण-निराकार परब्रह्म है ।
  • रामद्वारा - रामस्नेही सम्प्रदाय का प्रार्थना स्थल ।
  • बैशाख कृष्णा पंचमी गुरूवार विक्रम संवत् 1855 ( 5 अप्रेल, 1797 ) को रामचरण महाराज ने शाहपुरा ( भीलवाडा) में महानिर्वाण प्राप्त किया । 
  • होली के दूसरे दिन चैत्र कृष्ण एकम् से चैत्र कृष्ण पंचमी तक फूलडोल का मेला लगता है ।

संत चरणदास जी

  • चरणदास जी का जन्म अलवर जिले में डेहरा नामक गाँव में 1703 में मुरलीधर वैश्य के यहाँ हुआ ।
  • इनके गुरू का नाम शुकदेव मुनि था ।
  • चरणदास जी की माता का नाम कुंजो देवी था ।
  • इनका प्रारम्भिक नाम रणजीत था ।
  • इनके प्रमुख ग्रन्थ -' ब्रह्म ज्ञान सागर ', ' ब्रह्मचरित्र ' भक्ति सागर' तथा ' ज्ञान सर्वोदय ' है ।
  • चरणदास जी पीले वस्त्र पहनते थे ।
  • चरणदास जी ने नादिरशाह के आक्रमण की भविष्यवाणी की थी ।
  • श्रीमद् भागवत को चरणदास जी ने आधार धर्मग्रन्थ माना ।
  • चरणदास जी का पंथ चरणदासी पंथ कहलाया ।
  • चरणदासी पंथ सगुण एवं निर्गुण  भक्ति मार्ग का मिश्रण है ।
  • चरणदासी पंथ का मेवात तथा दिल्ली के क्षेत्र में अत्यधिक प्रभाव है ।
  • राज्य का एकमात्र संत जिसका जन्म राजस्थान में हुआ परंतु इनके द्वारा चलाए गए चरणदासी संप्रदाय की मुख्य पीठ दिल्ली में है ।
  • सहजोबाईं तथा दयाबाई इनकी दो प्रमुख शिष्या थी ।

  1. सहजोबाई  - सहजोवाई का जन्म डेहरा गाँव (अलवर) के एक वैश्य परिवार में 1800 ईं. में हुआ । इन्होनें सहज प्रकाश नामक ग्रंथ की रचना की ।
  2. दयाबाई - दयाबाई का जन्म मेहरा ग्राम (अलवर) में हुआ । इन्होनै 'दया बोध ' और 'विनय मालिका ' नामक दो ग्रंथों की रचना की ।
  • इस सम्प्रदाय के 42 नियम है ।
  • चरणदास जी का निधन दिल्ली में 1782 में हुआ । यहाँ इनकी समाधि पर वसंत पंचमी को मेला लगता है ।

धन्ना जी

  • इनका जन्म 1415 ई. में धुवन(टोंक) में हुआ था। 
  • धन्ना जी जाति से जाट थे ।
  •  इनके द्वारा रचित पदों को ' धन्नाजी की आरती ' कहा जाता है ।  
  • 5 वें सिक्ख गुरू अर्जुनदेव ने भी धन्नाजी की भक्तिभाव के बारे में गुरू ग्रंथ साहिब में उल्लेख किया है । 
  • इनका मुख्य मेला धूवन गाँव (टोंक) में लगता है, जहाँ सर्वाधिक अनुयायी पंजाब से आते है । 
  • धन्ना जी निर्गुण उपासक थे । 
  • धन्ना जी राजस्थान छोडकर बनारस गए और रामानंद के शिष्य बन गए । 
  • राजस्थान में भक्ति अन्दोलन के जनक संत धन्ना जी माने जाते है । 
  • धना जी का स्मारक जोबनेर (जयपुर) में स्थित है ।

भक्ति कवि दुर्लभ

  • इनका जन्म 1753 में बागड क्षेत्र में हुआ था । 
  • इनको ' राजस्थान का नृसिंह ' भी कहा जाता है ।
  • दुर्लभ जी ने डूंगरपुर और बाँसवाड़ा को अपना कार्य क्षेत्र बनाया । 
  • दुर्लभ जी ने लोगों को कृष्ण भक्ति के उपदेश दिये ।

हरिराम दास जी

  • हरिराम दास जी का जन्म व मृत्यु सिंहथल (बीकानेर) में हुआ ।
  •  इनके पिता का नाम श्री भागचन्द जी जोशी था ।
  •  हरिराम दास जी के गुरू संत श्री जैमलदास जी थे ।
  • हरिराम दास जी ने जैमलदास जी से रामस्नेही पंथ की दीक्षा ली तथा रामस्नेही सम्प्रदाय की सिंहथल शाखा स्थापित की । 
  • इनकी प्रमुख कृति ' निशानी ' थी । इसमें प्राणायाम, समाधि एवं योग के तत्त्वों का उल्लेख है ।
  • इन्होंने गुरू को पारस पत्थर से भी उच्च स्थान दिया ।
  • सिंहथल (बीकानेर) में रामस्नेही पंथ के संस्थापक संत हरिराम दास जी है ।

लालदास जी

  • इनका जन्म मेवात प्रदेश के धोलीदूव गाँव में श्रावण कृष्ण पंचमी को 1540 ई. में हुआ । 
  • इनके माता-पिता का नाम सपदा-चांदमल था । 
  • लालदास जी मेव जाति के लकड़हारे थे । 
  • इनके पूजा स्थल अलवर, शेरपुर व नगला में हैं । 
  • भरतपुर व अलवर की मेव जाति मे लालदास जी की अधिक मान्यता है । 
  • लालदासी सम्प्रदाय के उपदेश 'वाणी' नामक ग्रन्थ में संग्रहित है । 
  • लालदासजी 'लालदासी सम्प्रदाय ' के संस्थापक है । 
  • इनका समाधि स्थल नगला (भरतपुर) में है ।
  • लालदास जी ने हिन्दू-मुस्लिम एकता पर बल दिया ।
  • लालदास जी ने तिजारा के मुस्लिम संत गद्दन चिश्ती (मद्दाम) से दीक्षा ली थी ।
  • इनकी मृत्यु नगला गाँव (भरतपुर रियासत) में हुईं थी । 
  • लालदासजी की चेतावनियाँ उनका प्रमुख काव्य ग्रंथ है ।
  • इस संप्रदाय में दीक्षित करने के लिए शिष्य को गधे पर काला मुँह 'करके उल्टा बिठाया जाता है और फिर उसे गाँव की गलियों में घुमाया जाता है ता कि उसके जीवन में लेशमात्र भी अभिमान न रहे । 
  • शाहजहाँ का पुत्र दाराशिकोह संत लालदासजी से मिलने आया था । तब संत ने कहा कि दिल्ली के तख्त पर तो वही बैठेगा, जो अपने भाईयों की हत्या करेगा । आगे चलकर यह भविष्यवाणी सिद्ध हुई । औरंगजेब ने अपने भाईयों दाराशिकोह, शुजा व मुराद का वध करके दिल्ली के तख्त पर कब्जा किया था ।
  • इस पंथ के लोग मेव जाति की कन्या से विवाह करते है । 
  • लालदास जी ने समाज में व्याप्त मिथ्याचारों और अंधविश्वासों का विरोध किया व भक्ति तथा नैतिक शुद्धता पर बल दिया ।

हरिदास निरंजनी

  • इनका जन्म कापडोद (नागौर) में हुआ । 
  • हरिदास जी सांखला क्षत्रिय परिवार के थे । 
  • इनका मूल नाम हरिसिंह था ।
  • हरिदास जी ने निर्गुण भक्ति का उपदेश देकर 'निरंजनी सम्प्रदाय ' चलाया ।
  • इनके उपदेश 'मंत्र राज प्रकाश ' तथा ' हरिपुरुष जी की वाणी' में संग्रहित है ।
  • हरिदास जी संत बनने से पहले डकैत थे ।
  • हरिदास (हरिपुरुष) जी को 'कलियुग 'का वाल्मिकी' कहा जाता है ।
  • इनको कुटुम्बियों के महात्मा ने समझाया कि ' जो हत्यालूट करेगा, वही उस पाप का भागीदार होगा' यह सुनकर हरिदास जी ने डकैत का मार्ग छोड़ दिया ।
  • हरिदास जी ने 'तीखी डूंगरी' पर जाकर घोर तपस्या की ।
  • गाढा बास/गाढा धाम-नागौर की डीडवाना तहसील के गाँव में हरिदास जी ने समाधि ग्रहण की ।
  • पहले ये डकैती का काम करते थे,परंतु एक दिन एक महात्मा ने इन्हें समझाया कि' जो व्यक्ति हत्या व लूटमार करता है वही उस पाप का भागीदार होता है न कि उसको खाने वाला । ' यह सुनकर हरिसिंह डकैती का कार्य छोडकर कापडौद के नजदीक ' तीखी डूगरी ' पर घोर तपस्या कर अपना एक 'निरंजनी संप्रदाय चलाया । 
  • इनके द्वारा रचित प्रमुख ग्रंथ भक्त विरदावली ‘, भरथरी संवाद तथा "साखी" है ।
  • संत हरिदास जी ने गाढा बाँस गांव (डीडवाना-नागौर) में समाधि ली जहाँ प्रतिवर्ष फाल्गुन शुक्ल एकम् से फाल्गुन शुक्ल द्वादशी तक मेला लगता है ।

संत रैदास

  • संत रैदास जी के गुरू का नाम रामानन्द था ।
  • रैदास जी की वाणियों को ' रैदास की परची ' भी कहते है । रैदास चमार जाति से थे ।
  • संत रैदास जी जाति-पांति व बाह्य आडम्बरों के कट्टर विरोधी थे ।
  • रैदास की वाणियां मानवता, सहिष्णुता, आत्मसमर्पण, भक्ति आदि विषयों से सम्बन्धित्त रसों को लोगों के दिलों में आज तक प्रेरणा की स्त्रोत बनी हुई है ।
  • कबीरदास जी ने रैदास को संतो का संत कहा ।
  • रैदास जी की छतरी चित्तौड़गढ के कुम्भश्याम मंदिर के एक कोने में है ।
  • मीरां बाई के गुरू का नाम रैदास था ।
  • रैदास के ग्रंथ परची कहलाते है ।

संत जैमलदास जी

  • संत जैमलदास जी रामस्नेही सम्प्रदाय के प्रसिद्ध संत श्री माधोदास जी दीवान के शिष्य थे ।
  • जैमलदास जी ने हरिराम दास जी को दीक्षा दी थी ।
  • जैमलदास जी को सिंहथल खेड़ापा शाखा का आचार्य भी माना जाता है ।

आचार्य परशुराम

  • इनका जन्म 16वी शताब्दी में ठीकरिया गाँव (सीकर) में हुआ था ।
  • आचार्य परशुराम 36वे निम्बाकाचार्य थे ।
  • इन्होंने हरिव्यास देवाचार्य से दीक्षा प्राप्त कर मथुरा में नारद टीले पर तप किया ।
  • सलेमाबाद (अजमेर) में निम्बार्क संप्रदाय की पीठ की स्थापना के साथ एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया जहाँ पर इन्होंने जीवित समाधि ली ।
  • सलेमाबाद में आज भी उनकी चरण यादुकाओं की पूजा की जाती है ।
  • जयपुर नरेश जगतसिंह ने सलेमाबाद जाकर आचार्य का आशीर्वाद प्राप्त किया तत्पश्चात् राजकुमार जयसिंह का जन्म हुआ ।
  • 19वीं सदी में इस राजवंश ने इस संप्रदाय को काफी आश्रय प्रदान किया ।

गूदड़ सम्प्रदाय

  • गूदड़ संप्रदाय के प्रवर्तक संतदास जी थे । 
  • इस संप्रदाय की प्रमुख गद्दी दाँतड़ा (भीलवाडा) में है ।
  • संतदास जी गूदडी से वने कपडे पहने थे । इसलिए इस संप्रदाय का नाम मूदड संप्रदाय पडा ।

परनामी सम्प्रदाय

  • कृष्ण भगवान को अपना अराध्य देव मानने वाले प्राणनाथ जी (जामनगर-गुजरात) ने अपने गुरू निजानंद स्वामी से दीक्षा लेकर 'परनामी संप्रदाय' की स्थापना की ।
  • प्राणनाथ जी की शिक्षाएँ एवं उपदेश "कुंजलभ स्वरूपं' नामक ग्रंथ में उल्लेखित है ।
  • परनामी संप्रदाय मुख्य पीठ 'पना' (मध्यप्रदेश) में है ।
  • राजस्थान में परनामी संप्रदाय के सर्वाधिक अनुयायी आदर्श नगर (जयपुर) में रहते है । जहाँ इनकी पीठ है ।

संत रामदास जी

  • इनका जन्म भीकमकोर ग्राम (जोधपुर) में हुआ तथा मृत्यु खेड़ापा में हुई ।
  • रामदास जी ने रामस्नेही सम्प्रदाय के श्री हरिरांमदास जी से दीक्षा ग्रहण कर इस सम्प्रदाय की खेड़ापा शाखा स्थापित की ।

संत नवलदास जी (नवल सम्प्रदाय )

  • नवल संप्रदाय के प्रवर्तक संत नवल दास जी थे ।
  • संत नवल दास जी का जन्म हस्सोलाव गाँव (नागौर) में जन्म हुआ था ।
  • नवल संप्रदाय की प्रमुख पीठ जोधपुर में है ।
  • इनकी वाणी का संगृह 'नवलेश्वर अनुभव वाणी' में है

अलखिया सम्प्रदाय 

  • चूरू जिले में जन्मे स्वामी लाल गिरी द्वारा 10वीं शताब्दी में इस निर्गुण भक्ति संप्रदाय की स्थापना की गई । 
  • आलखिया संप्रदाय की प्रमुख पीठ बीकानेर में है । ' अखल स्तुति प्रकाश ' इस संप्रदाय का प्रमुख ग्रंथ है ।

नरहड़ के पीर

  • नरहड़ के पीर का नाम हज़रत शक्कर बाबा बताया जाता है । 
  • इनकी दरगाह चिड़ावा (झुंझुनू) के पास नरहड़ ग्राम में है ।
  • शेख सलीम चिश्ती नरहड़ पीर के शिष्य थे, जिनके नाम पर बादशाह अकबर ने अपने पुत्र का नाम सलीम (बादशाह जहांगीर) रखा ।
  • नरहड़ पीर को शेखावटी (सीकर, चूरू, झुंझुनू) क्षेत्र में पूरी मान्यता है।
  • नरहड़ के पीर का उर्स जन्माष्टमी पर भरता है ।
  • पुरानी मान्यता के अनुसार पागलपन के असाध्य रोगी भी इनकी जात से ठीक हो जाते है ।
  • नरहड़ के पीर 'बागड के धणी' के रूप में प्रसिद्ध है ।
  • नरहड पीर की दरगाह साम्प्रदायिक सद्भाव का अनूठा स्थल है ।

ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती 

  • गरीब नवाज ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती का जन्म फारस के एक गाँव सर्जरी में हुआ था ।
  • अजमेर जिले में ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह है, जहाँ उर्स पर विशाल मेला लगता है । यह उर्स रज्जब मास की 1 से 6 तारीख तक भरता है ।
  • मुईनुद्दीन चिश्ती ने पृथ्वीराज चौहान तृतीय के काल में अजमेर को अपनी कर्मस्थली बनाया ।
  • उर्स का मेला हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिक सद्भाव का सर्वोत्तम केन्द्र है ।
  • अकबर पुत्र प्राप्ति की अभिलाषा से पैदल जियारत करने यहाँ आया था ।

पीर फखरुद्दीन

  • ये दाउदी बोहरा सम्प्रदाय के आराध्य पीर है । 
  • पीर फखरूद्दीन की गलियाकोट (डूंगरपुर) में दरगाह है

राजस्थान के संत संप्रदाय trick एवं उनकी प्रमुख गद्दी 

  1. अलखिया संप्रदाय बीकानेर
  2. बिश्नोई संप्रदाय मुकाम तालवा नोखा (बीकानेर) 
  3. ज़सनाथी संप्रदाय कतरियासर (बीकानेर)
  4. गूदड़ संप्रदाय , दाँतडा (भीलवाड़ा)
  5. रामस्नेही संप्रदाय शाहपुरा (भीलवाडा)
  6. लालदासी संप्रदाय नगला (भरतपुर)
  7. दादूपंथ नारायणा(जयपुर)
  8. गौडीय (ब्रह्म) संप्रदाय गोविंद देवजी (जयपुर)
  9. रामानन्दी संप्रदाय गलताजी (जयपुर)
  10. रसिक संप्रदाय रैवासा (सीकर)  
  11. निरंजवी संप्रदाय गाढा डीडवाना-नागौर'
  12. नाथ संप्रदाय जोधपुर
  13. नवल संप्रदाय जोधपुर
  14. वल्लभ संप्रदाय नाथद्वासा राजसमंद 
  15. निम्बार्क संप्रदाय सलेमाबाद (अजमेर) 
  16. चिश्ती संप्रदाय अजमेर 
  17. चरणदासी संप्रदाय दिल्ली

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  1. संत - दादूदयाल
  2. संत जसनाथ जी 
  3. संत जांभोजी विश्नोई
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Saturday, 27 April 2019

Short Notes on Dadu dayal ji | राजस्थान के संत - दादूदयाल
नमस्कार दोस्तों इस पोस्ट में आप राजस्थान के प्रमुख  संत दादूदयाल दादू सम्प्रदाय  के संस्थापक के बारे में संपूर्ण जानकारी प्राप्त करेंगे अगर आपको यह पोस्ट अच्छी लगे तो अपने दोस्तों को जरूर शेयर करें

राजस्थान के प्रमुख संत dadu दयाल


Rajasthan ke sant dadu dayal ji
राजस्थान के संत - दादूदयाल

  • दादूदयाल जी का जन्म 1544 ईं. (फाल्गुन शुक्ल अष्टमी) अहमदाबाद में हुआ ।
  • संत दादू की शिष्य परम्परा में 152 शिष्य माने जाते हैं, जिनमें 52 प्रमुख शिष्य अब 52 स्तम्भ कहलाते हैं ।
  • दादूजी की रचनाएँ दादूदयाल री वाणी और दूहा हरड़ेवाणी है । इनकी भाषा ढूंढाडी है ।
  • दादूदयाल जी की कर्म भूमि राजस्थान थी ।
  • भगवत् भक्ति के साथ-साथ दादू धुनिये का कार्यं भी करते थे । नरैना या नरायणा (जयपुर) में दादूपंथियों की प्रधान गद्दी स्थित है । 
  • 1585 ईं. में फतेहपुर सीकरी की यात्रा के दौरान उन्होंने अकबर से भेंट की तथा उसे अपने विचारों से प्रभावित किया ।
  • संत दादूजी ने ईश्वर गुरू में आस्था, प्रेम और नैतिकता,आत्मज्ञान, जात-पात की निस्सारता तथा सत्य एवं संयमित जीवन पर जोर दिया । 

दादू सम्प्रदाय की स्थापना

  • 1574 ई. में दादू दयाल ने साम्भर में दादू सम्प्रदाय की स्थापना की तथा मृत्यु के बाद दादूपंथ नाम से जाने गये ।
  • दादूपंथ के सत्संग स्थल अलख दरीबा कहलाते है ।
  • 1568 ई. में सांभर में आकर प्रथम उपदेश दिया । सन् 1602 में नरैना (फुलेरा) आ गये और वही ज्येष्ठ कृष्ण अष्टमी 1605 ईं. में महाप्रयाण किया ।
  • नारायणा/नराणां (जयपुर) में दादूजी के कपडे और पोथियां वर्त्तमान समय तक सुरक्षित रखी गई है ।
  • दादूजी के शरीर को भैराण की पहाडी दादूखोल नामक गुफा में समाधि ज्येष्ठ कृष्ण अष्टमी संवत् 1660 या 1605 ई को दी गई । 
  • सांभर में जब विद्रोहियों ने दादू जी के विरुद्ध षडयंत्र रचना प्रारम्भ किया तो 1575 ई० में दादू अपने 25 शिष्यों दो साथ आमेर चले गये ।
  • दादू पंथी हमेशा अविवाहित रहते है ।
  • दादूपंथी अपनी मृत्यु के बाद शव को पशु-पक्षियों को खिलाते हैं । 
  • संत सुंदरदास एकमात्र ऐसे कवि जिन्हें साहित्य मर्मज्ञ और पद साखियों के अतिरिक्त कवित्त सवैया लिखने में सिद्धहस्त माना जाता है, जिसकी भाषा ' पिंगल ' थी । 
  • दादूजी को दूसरा शंकराचार्य भी कहा जाता है ।
  • इन्होंने 42 ग्रंथों की रचना की जिनमें ' ज्ञान समुद्रा, ज्ञान सवैया (सुंदर विलास) , सुंदर सार, सुंदर ग्रंथावली ' इनके महत्वपूर्ण ग्रंथ है ।

लोक मान्यता के अनुसार… 

  • दादूदयाल साबरमती नदी (अहमदाबाद-गुजरात) में बहते हुए लोदीरामजी (सारस्वत ब्राह्मण) को संदूक में मिले ।
  • दादूजी ने कबीरदास के शिष्य श्री वृंदावन जी (बुड्ढनजी) से 11 वर्ष की उम्र में दीक्षा लेकर घर को त्यागा और मात्र 19 वर्ष की आयु में राजस्थान में प्रवेश कर सिरोही, कल्याणपुर, साँभर, अजमेर होते हुए अंततः दूदू के पास 'नारायणा' में अपना स्थान अंतिम समय व्यतीत किया । 
  • दादूदयाल के 152 शिष्य थे जिनमें से प्रमुख 52 शिष्य जो 52 स्तंभ कहलाते है, जिनमें पुत्र ' गरीबदास” ,मिस्किनदास के अलावा बखनाजी, रज्जबजी, सुंदरदासजी, जगन्नाथ व माधोदासजी आदि प्रमुख है ।
  • नागा पंथदादूजी के शिष्य सुंदरदासजी द्वारा शुरू किया गया नागा पंथ जिसमें साधुओं के पास हथियार भी होते है । 
  • इसी नागा संप्रदाय के संतों ने जयपुर राज्य के सवाई जयसिंह व जोधपुर के राजा मानसिंह की सहायता की थी ।
  • जिस दिन दादूजी की मृत्यु हुई उसी दिन से उन्होनें अपनी आँखें बंद कर ली और जीवनभर नहीं खोली ।
  • इनका निवास स्थल 'रज्जब द्वार' कहलाता है ।
  • इनके शिष्यों को 'रज्जवात‘ अथवा ' रज्जब पंथी ' कहा है । 
  • राजस्थान में भक्ति आंदोलन को फैलाने का श्रेय दादूजी को है । दादूजी के गुरू का नाम वृद्धानन्द था ।
  • दादूदयाल के प्रमुख ग्रन्थ दादूदयाल री वाणी , दादूदयाल रां दूहा , कायाबेली है ।

दादूजी को ' राजस्थान का कबीर ' कहा जाता है ।  सम्भवत: दादूजी मुसलमान एवं व्यवसाय से धुनिया थे ।

दादू पंथ की शाखाएं

दादूपंथी पांच प्रकार के होते है
  1.  खालसा गरीबदास जी की आचार्य परम्परा से सम्बद्ध साधु ।
  2. विरक्त - रमते फिरते गृहस्थियों को दादू धर्म का उपदेश देने वाले साधु ।
  3. उत्तरादे व स्थानधारी - जो राजस्थान को छोडकर उत्तरी भारत में चले गये ।
  4. खाकी - जो शरीर पर भस्म लगाते है व जटा रखते है । 
  5. इसके अलावा इनमें नागा साधु भी होते हैं । नागा शाखा सुंदरदास प्रवर्तक ।

Friday, 26 April 2019

जसनाथ सम्प्रदाय | Sant Jasnath ji ka Itihas in Hindi
संत जसनाथ जी का जन्म 1482 ईं. (वि सं. 1539) की कार्तिक शुक्ला एकादशी (देवोसत्थान एकादशी) को बीकानेर जिले के कतरियासर ग्राम में हुआ ।

जसनाथजी का जीवन परिचय

jasnath ji rules in hindi
Sant Jasnath ji ka Itihas

  • जन मान्यता है कि कतरियासर गाँव के जागीरदार हमीर जाट को एक रात स्वपन में दिखाई दिया कि गाँव की उत्तर दिशा में स्थित तालाब के किनारे एक बालक बैठा है । प्रात: तालाब के तट पर सचमुच एक सुन्दर बालक को देखकर नि: संतान हमीर जी अत्यन्त प्रसन्न हुए । उसे घर लाकर उन्होंने अपनी पत्नी रूपादे को सौंप दिया । यही बालक संत जसनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ । इनकी माता रूपादे थी ।
  • नाथ सम्प्रदाय के लोग भगवान शिव के अनन्य भक्त होते हैं ।
  • भगवान आशुतोष शिव की प्रसन्नता के लिए अघोर पूजा पद्धति को भी वे ठीक मानते है ।
  • इन्होंने 36 धार्मिक नियमों का निर्धारण 15०4 ई. में किया ।
  • नाथ सम्प्रदाय में ही इन 36 नियमों का पालन करने वाले लोग जसनाथ कहलाने लगे ।
  • गोरक्ष पीठ के गोरख आश्रम में जसनाथ जी की शिक्षादीक्षा हुई । बालक जसनाथ के गुरू गोरखनाथ थे ।
  • विक्रम संवत् 1551 की अश्विनी शुक्ल सप्तमी को उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ ।
  • इस संप्रदाय के लोग गले में काले रंग का डोरा पहनते है ।
  • जसनाथी सम्प्रदाय के वे अनुयायी जो सम्पूर्ण जीवन और संसार से विरक्त हो गये, वे परमहंस कहलाये ।
  • जसनाथी सम्प्रदाय में भगवा वस्त्र पहनने वाले अनुयायी सिद्ध कहलाये ।

अग्नि नृत्य

  • जसनाथी सम्प्रदाय के अनुयायियों द्वारा धधकते हुये अंगारों पर किया जाने वाला नृत्य है इसमें जसनाथी अग्नि में प्रवेश करने से पहले फ्ते-फ्ते कहते है ।
  • श्री जसनाथ जी मात्र 24 वर्ष की आयु में ब्रह्मलीन हो गये । इन्होंने आश्विन शुक्ल सप्तमी को समाधि ग्रहण की ।
  • जसनायी संत जीवित समाधि लेते है ।
  • जसनाथी के चमत्कारों से प्रभावित होकर सिकंदर लोदी ने जसनाथ जी को कतरियासर (बीकानेर) में 500 बीघा जमीन भेंट की ।
  • ज़सनाथ जी को प्रमुख पाँच उप पीठें मालासर (बीकानेर) , लिखमादेसर (बीकानेर) , पूनरासर (बीकानेर) , बमलू (बीकानेर) एवं पाँचला (नागौर) है ।
  • ये आजन्म ब्रह्मचारी रहे तथा गोरखमालिया नामक स्थान पर 12 वर्ष तक तपस्या क्री ।
  • जसनाथजी के उपदेश ' सिंभूदडा ' एवं ' कोड़ा ' ग्रन्थों मे संग्रहित है

Monday, 22 April 2019

Jambho ji History in Hindi | जाम्भोजी का इतिहास
नमस्कार दोस्तों इस पोस्ट में आप  राजस्थान के प्रमुख संत जांभोजी विश्नोई संप्रदाय के संस्थापक के इतिहास ( Jambho ji History in Hindi )  के बारे में संपूर्ण जानकारी प्राप्त करेंगे अगर आपको यह पोस्ट अच्छी लगे तो अपने दोस्तों को जरूर शेयर करें

Jambho ji History in Hindi | जाम्भोजी का इतिहास

jambheshwar ki photo
guru jambheshwar

  • जाम्भो जी का मूल नाम धनराज था ।
  • जम्भेश्वर जी का जन्म 1451 ईं (विक्रम सम्वत 1508) में जन्माष्टमी के दिन नागौर जिले के पीपासर गाँव में हुआ था । 
  • जम्मेश्वर जी के पिता का नाम लोहट जी तथा माता का नाम हंसादेवी था ।
  •  इनके पिता पंवार राजपूत थे ।
  • इनके गुरू का नाम गोरखनाथ था ।
  • इनकी माता हंसादेवी ने उन्हें श्रीकृष्ण का अवतार माना । 

Jambhoji ki Jivani

  • जम्मेश्वर जी ने 34 वर्ष की उम्र में सारी सम्पति दान कर दी और दिव्य ज्ञान प्राप्त करने बीकानेर के संभराथल नामक स्थान पर चले गये ।
  • जाम्भो जी ने बिश्नोई समाज में धर्म की प्रतिष्ठा के लिए 29 नियम बनाये ।
  • इसी तरह बीस और नौ नियमों को मानने वाले बीसनोई या बिश्नोई कहलाये ।
  • संत जम्भेश्वर जी को पर्यावरण वैज्ञानिक कहा जाता है । जाम्भो जी ने 1485 में समराथल (बीकानेर) में बिश्नोई सम्प्रदाय का प्रवर्तन किया ।

jambhoji ki pramukh granth

  • जाम्भो जी ने ' जम्भसंहिता ' ' जम्भसागर शब्दावली ' और ' बिश्नोई धर्म प्रकाश ' आदि ग्रन्थों की रचना की गई ।
  • जम्भेश्वर जी के द्वारा रचित 120 शब्द जम्भवाणि में जम्भ सागर संग्रहित है ।
  • संत जाम्भो जी ने हिन्दू तथा मुस्लिम धर्मों में व्याप्त भ्रमित आडम्बरों का विरोध किया ।
  • पुरानी मान्यता के अनुसार जम्मेश्वर जी के प्रभाव के फलस्वरूप ही सिकन्दर लोदी ने गौ हत्या पर प्रतिबन्ध लगाया था । 

बिश्नोई सम्प्रदाय की स्थापना

  • संत जाम्भो जी ने बिश्नोई सम्प्रदाय की स्थापना कार्तिक बदी अष्टमी को संभराथल के एक ऊंचे टीले पर की थी, उस टीले को इस पंथ में ' धोक धोरे ' के नाम से जाना जाता है ।
  • गुरू जम्भेश्वर जी के मुख से उच्चारित वाणी शब्दवाणी कहलाती है । इसी को जम्भवाणि और गुरू वाणी भी कहा जाता है 
  • बीकानेर नरेश ने संत जाम्भो जो के सम्मान में अपने राज्य बीकानेर के झंडे में खेजड़े के वृक्ष को माटों के रूप में रखा ।
  • जाम्भो जो के अनुयायी 151 शब्दों का संकलन जम्भ गीत को ' पांचवां वेद ‘ मानते है । यह राजस्थानी भाषा का अनुपम ग्रंथ है ।
  • राव दूदा जम्भेश्वर के समकालीन थे ।
  • बिश्नोई नीले वस्त्र का त्याग करते है ।
  • जाम्भो जो के उपदेश स्थल साथरी कहलाते है
  • बिश्नोई सम्प्रदाय में गुरू जाम्भो जी को विष्णु का अवतार मानते है । गुरू जाम्भो जी का मूलमंत्र था हृदय से विष्णु का नाम जपो और हाथ से कार्य करो ।
  • गुरू जाम्भो जी ने संसार को नाशवान और मिथ्या बताया । इन्होंने इसे 'गोवलवास (अस्थाई निवास) कहा ।

पाहल

  • गुरू जाम्भीजी द्वारा तैयार ' अभिमंत्रित जल ' जिसे पिलाकर इन्होंने आज्ञानुवर्ती समुदाय को बिश्नोई पंथ में दीक्षित किया था ।

"कथा जैसलमेर की'…

  • संतं कवि वील्होजी (सन्  1532-1616) द्वारा लिखित इतिहास प्रसिद्ध कविता, जिसमें ऐसे छ: राजाओं के नामों का पता चलता है, जो उनके समकालीन थे और उनकी शरण में आये थे ।
  •  ये छ: राजा थे…
  1.  दिल्ली के बादशाह सिकन्दर लोदी 
  2. नागौर का नवाब मुहम्मद खान नागौरी, 
  3. मेड़ता का राव दूदा, 
  4. जैसमलेर का राव जैतसी 
  5. जोधपुर का राठौड़ राव सातल देव 
  6. मेवाड का महाराणा सागा ।

पीपासर

  • नागौर जिले में स्थित पीपासर गुरू जम्मेश्वर जी की जन्म स्थली है ।
  • यहाँ उनका मंदिर है तथा उनका प्राचीन घर और उनकी खडाऊ यहीं पर है ।

मुक्तिधाम मुकाम

  • यहाँ गुरू जम्भेश्वर जी का समाधि स्थल हैं। 
  • बीकानेर जिले की नोखा तहसील में स्थित मुकाम में सुन्दर मंदिर भी बना हुआ है । 
  • जहाँ प्रतिवर्ष फाल्गुन और अश्विन की अमावस्या को मेला लगता है ।

लालसर (बीकानेर)

  • जम्मेश्वर जी ने यहाँ निर्वाण प्राप्त किया था ।

जाम्भा 

  • जोधपुर जिले के फलौदी तहसील में जाम्भा गाँव है। जम्भेश्वर जी के कहने पर जैसलमेर के राजा जैतसिंह ने यहाँ एक तालाब बनाया था । बिश्नोई समाज के लिए यह पुष्कर के समान पावन तीर्थ है ।
  •  यहाँ प्रत्येक वर्ष चैत्र अमावस्या व भाद्र पूर्णिमा को मेला लगता है ।

जागलू

  • यह बीकानेर की नोखा तहसील में स्थित है । जम्भेश्वर जी का यहाँ पर सुन्दर मंदिर है ।

रामड़ावास

  • यह जोधपुर जिले में पीपल के पास स्थित है । यहाँ जम्भेश्वर जी ने उपदेश दिये थे ।

लोदीपुर

  • उत्तरप्रदेश के मुरादाबाद जिले में स्थित है । अपने भ्रमण के दौरान जम्मेश्वर जी यहाँ आये थे ।
  • बिश्नोई संप्रदाय भेड पालना पसंद नहीं करते, क्योंकि भेड़ नव अंकुरित पौधों को खा जाती है ।
  • 1526 ईं. (वि सं 1593) में त्रयोदशी के दिन मुकाम नामक गाँव में समाधि ली थी ।

Tuesday, 19 March 2019

Rajasthan ke Lok Geet GK in Hindi - राजस्थानी लोकगीत
Rajasthan ke Lok Geet राजस्थान में गाए जाने वाले गीतों के अनुपात में लोकगीतों का दायरा अधिक बड़ा है लोक गीत राजस्थानी संस्कृति के अभिन्न अंग है प्राचीन काल से ही राजस्थानी लोक संगीत प्रेमी है

रविन्द्र नाथ टैगोर ने लोक गीतों को संस्कृति का सुखद संदेश ले जाने वाली कला कहा है ।

महात्मा गाँधी के शब्दों में - लोकगीत जनता की भाषा है ...... लोक गीत हमारी संस्कृति के पहरेदार है ।
देवेन्द सत्यार्थी के अनुसार' लोकगीत किसी सस्कृति के मुँह बोले चित्र है ।

rajasthan ke lok geet gk - राजस्थानी लोकगीत

rajasthan ke lok geet par nibandh
Rajasthan ke Lok Geet GK in Hindi - राजस्थानी लोकगीत

लोकगीत सरल तथा साधारण वाक्यों से ओत-प्रोत होते है और इसमें लय को ताल से अधिक महत्व दिया गया है Rajasthan ke Lok Geet में मुख्यत. तीन वस्तुओं का समायोजन होता है, ये निम्न है गीत ( शब्द योजना ) , धुन ( स्वर योजना ) , वाद्य ( स्वर तथा लय योजना ) ।
rajasthan ke lok geet मे तीन, सात, नौ, बत्तीस व छप्पन संख्याओं का प्रयोग मिलता है और साथ ही लय बनाने के लिए उनमें निरर्थक शब्दों का भी समायोजन कर लिया जाता है ।
कुछ विद्वान लोक वार्ता का प्रथम संकलनकर्ता कर्नल जेम्स टॉड को मानते है, किन्तु वास्तविक अर्थों में 1892 ईं ० में प्रकाशित C. E. गेब्हर का ग्रंथ ' फोक सांग्स आँफ सदर्न इंडिया ' को भारत में लोक साहित्य का प्रथम ग्रंथ माना जाना चाहिए ।

राजस्थान के लोकगीत

राजस्थान लोक संगीत
 प्रमुख लोक गीत

  • राजस्थान के लोक गीतों को संग्रह करने का कार्यं जैन कवियों द्वारा आज से लगभग 500 वर्ष पूर्व किया गया था ।

आंगो मोरियों

  • यह एक राजस्थानी लोक गीत है , जिसमें पारिवारिक सुख का चित्रण मिलता है ।
औल्यूँ
  • यह किसी की याद में गाया जाने वाला गीत है ।
आंबो
  • यह गीत पुत्री की विदाई पर गाया जाता है ।

अजमो

  • यह गीत गर्भावस्था के आठवें महीने में गाया जाता है ।

इडूणी

  • यह गीत स्त्रियां पानी भरने जाते समय गाती है ।

उमादे

  • राजस्थान में यह रूठी रानी का गीत है ।

ढोलामारू

  • यह सिरोही का प्रेमकथा पर आधारित गीत है । इसे ढाढी गाते है । इसमें ढोला मारू की प्रेमकथा का वर्णन किया गया है ।

झोरावा

  • जैसलमेर जिले में पति के प्रदेश जाने पर उसके वियोग मे गाया जाने वाला गीत है ।

झूलरिया

  • यह गीत माहेरा या भात भरते समय गाया जाता है ।

फतमल

  • यह गीत हाड़ौती के राव फतहल तथा उसकी टोडा की रहने वाली प्रेमिका की भावनाओं से संबंधित है ।

फतसड़ा

  • विवाह के अवसर पर अतिथियों के आगमन पर यह गीत गाया जाता है ।

फाग

  • यह होली के अवसर पर गाया जाने वाला गीत है ।

तेजा

  • यह तेजाजी की भक्ति में खेत की बुवाई/जुताई करते समय गाया जाता है ।


मोरिया थाईं रे थाईं

  • इस गरासिया गीत में दूल्हे की प्रशंसा की जाती है और महिलाएं इसके इर्द गिर्द नृत्य करती है । 

मरसिया

  • मारवाड़ क्षेत्र मे किसी प्रसिद्ध व्यक्ति की मृत्यु के अवसर पर गाया जाने वाला गीत ।

मोरिया

  • इसमें ऐसी बालिका की व्यथा है, जिसका संबंध तो तय हो चुका है, लेकिन विवाह में देरी है यह एक विरह गीत है । मोरिया का अर्थ मोर होता है ।

माहेरा

  • बहिन के लडके या लडकी की शादी के समय भाई उसको चूनडी ओंढाता है और भात भरता है । अतः इस प्रसंग से संबधित गीत भात/माहेरा के गीत कहलाते है ।

मूमल

  • जैसलमेर में गाया जाने वाला श्रृंगारित एव प्रेम गीत है । मूमल लोद्रवा ( जैसलमेर ) की राजकुमारी थी ।

लाखा फुलाणी के 'गीत-

  • ये गीत मध्यकाल से प्रारंभ माने जाते है और इनकी उत्पत्ति सिंध प्रदेश से हुई थी ।

लांगुरिया

  • करौली क्षेत्र की कुल देवी 'केला देवी' की आराधना में गाए जाने वाले ये भक्ति गीत है ।

लसकरिया

  • लसकरिया गीत कच्छी घोडी नृत्य करते समय गाया जाता है ।

बीन्द

  • बीन्द गीत कच्छी घोडी नृत्य करते समय गाया जाता हैं

रसाला

  • रसाला गीत कच्छी घोडी नृत्य करते समय गाया जाता है ।

रमगारिया

  • रमगारिया गीत कच्छी घोडी नृत्य करते समय गाया जाता है ।

लावणी

  • लावणी का अर्ध बुलाने से है । नायक के द्वारा नायिका को बुलाने के लिए यह गीत गाया जाता है । मोरध्वज, ऊसंमन, भरथरी आदि प्रमुख लावणियां है ।

लूर

  • यह राजपूत स्त्रियों द्वारा गाया जाने वाला गीत है ।

लोरी

  • ये गीत माँ द्वारा अपने बच्चे को सुलाने के लिए गाती है ।

गोरबंद

  • यह गणगौर पर स्त्रियों द्वारा गाया जाने वाला गीत है । गोरबंद ऊँट के गले का आभूषण होता है । राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों विशेषत: मरूस्थली व शेखावाटी क्षेत्रों में लोकप्रिय 'गोरबन्द' गीत प्रचलित है ।

गोपीचन्द

  • इसमें बंगाल के शासक गोपीचन्द द्वारा अपनी रानियों के साथ किया संवाद चर्चित है ।

गणगौर

  • गणगौर के अवसर पर गाया जाने वाला गीत । राज्य में सर्वाधिक गीत इसी अवसर पर गाये जाते है ।

गढ़

  • ये गीत सामन्तो राज दरबारों और अन्य समृद्ध लोगों द्वारा आयोजित महफिलों में गाए जाते है । ये रजवाडी व पेशेवर गीत है । ढोली दमापी मुसलमान तवायफें इन गीतों को गाते है ।

बना-बन्नी

  • विवाह के अवसर पर वार-वधू के लिए ये गीत गाये जाते है ।

बीणजारा

  • यह एक प्रश्नोत्तर परक गीत है । इस गीत में पत्नी पति को व्यापार हेतु प्रदेश जाने की प्रेरणा देती है ।


विनायक

  • विनायक मांगलिक कार्यो के देवता है किसी भी शुभ कार्य को करने से पहले विनायक (गणेशजी की पूजा) पूजा कर गीत गाये जाते है ।

बंधावा

  • यह शुभ कार्यं के सम्पत्र होने पर गाया जाने वाला लोकगीत है ।

बादली गीत

  • बादली गीत शेखावाटी, मेवाड़ व हाडौती क्षेत्र में गाया जाने वाला वर्षा ऋतु से संबंधित गीत है ।

बीरा गीत

  • बीरा नामक लोकगीत ढूंढाड़ अंचल में भात सम्पन्न होने के समय गाया जाता है ।

बेमाता गीत

  • नवजात शिशु का भाग्य लिखने वाली बेमाता के लिए यह गीत गाया जाता है ।

भणेत

  • राजस्थान में श्रम करते समय परिश्रम से होने वाली थकान को दूर करने के लिए इस गीत को गाया जाता हैं ।

पडवलियों

  • बालक के जन्म होने के पश्चात बालमनुहार के लिए गाये जाने वाला गीत है । पडवलियों का अर्थ घास से बनाया हुआ छोटा मकान होता है

पणिहारी

  • पनघट से पानी भरने वाली स्त्री को पणिहारी कहते है । इस गीत में राजस्थानी स्त्री का पतिव्रत धर्म पर अटल रहना बताया गया है ।

परणेत

  • इस गीत का सम्बन्थ विवाह से है । राजस्थान में विवाह के गीत सबसे अधिक प्रचलित है । परणेत के गीतों में बिदाई के गीत बहुत ही मर्म स्पर्शी होते है ।

पावणा

  • यह गीत दामाद के ससुराल आगमन पर गाया जाता है ।

पपैया

  • पपैया एक प्रसिद्ध पक्षी है । इसमें एक युवती किसी विवाहित युवक को भ्रष्ट करना चाहती है, किन्तु युवक उसको अन्त में यही कहता है कि मेरी स्त्री ही मुझे स्वीकार होगी । अत: इस आदर्श गीत में पुरूष अन्य स्त्री से मिलने के लिए मना करता है ।

पंछीड़ा

  • यह गीत हाडौती व ढूंढाड़ क्षेत्र में मेलों के अवसर पर अलगोजे, ढोलक व मंजीरे के साथ गाया जाता है ।

पवाड़ा

  • किसी महापुरूष, वीर के विशेष कार्यों को वर्णित करने वाली रचनाएं 'पवाडा' कहलाती है ।

पटैल्या

  • यह पर्वतीय क्षेत्रों में आदिवासियों के द्वारा गाया जाने वाला गीत है ।

बिछिया

  • यह पर्वतीय क्षेत्रों में आदिवासियों के द्वारा गाया जाने वाला गीत है ।

लालर

  • यह पर्वतीय क्षेत्रों में आदिवासियों के द्वारा गाया जाने वाला गीत है ।

पीपली

  • यह रेगिस्तानी क्षेत्र विशेषत: शेखावाटी, बीकानेर, मारवाड़ के कुछ भागों में स्त्रियों द्वारा वर्षा ऋतु में गाया जाने वाला लोकगीत है । इसमें प्रेयसी अपने परदेश गये पति को बुलाती है । यह तीज के त्यौहार के कुछ दिन पूर्व गाया जाता है ।

पीठी

  • विवाह के अवसर पर दोनों पक्ष के यहाँ वर-वधु को नहलाने से पूर्व पीठी या उबटन लगाते है, जिससे उनमें रूपनिखार आए, उस समय 'पीठी गीत' गाया जाता है । यह कार्य भौजाई (भाभी) द्वारा किया जाता हैं ।

सुपियारदे

  • इस गीत में त्रिकोणीय प्रेम कथा का वर्णन किया गया है ।

पील्लो गीत

  • यह शिशु जन्म के पश्चात जलवा पूजन के समय गाया जाता है ।

सुवंटिया

  • इस गीत में भील स्त्री द्वारा परदेश गये पति को संदेश भेजती है ।

सहसण या सैंसण माता के गीत

  • सैंसण माता का जैन धर्म के तेरापंथी संप्रदाय में भारी महत्व है । जैन श्रावकों की निराहार तपस्या के दौरान सहसण माता के गीत गाये जाते है ।

सुपणा

  • यह विरहणी का एक स्वप्न गीत है । इस गीत के द्वारा रात्रि में आये स्वप्न का वर्णन किया जाता हैं ।

सींठणा/सीठणी

  • विवाह के अवसर पर भोजन के समय गाये जाने वाले गीत सीठणा गाली गीत है ।

सेजा

  • इसमें प्रकृति पूजन, लोकगीत, परम्परा , कला और संस्कृति का जीवंत प्रतीक है । इसमें कुँवारियां श्रेष्ठ वर की कामना, अखण्ड सौभाग्य एवं सुखी दामपत्य जीवन की शुभेच्छा से पूजा अर्चना करती है ।

सारंग

  • यह संगीत दोपहर के समय में गाया जाता है ।

केसरिया बालम

  • यह राज्य गीत है । इस गीत के माध्यम से प्रदेश गये पति को आने का संदेश भेजा जाता है ।

कांगसियो 

  • यह बालों के श्रृंगार का गीत है ।

काजलियौ

  • भारतीय संस्कृति में काजल सोलह श्रृंगारो में से एक श्रृंगारिक गीत हैं । यह विवाह के समय वर की आँखों में भोजाई काजल डालते समय गाती है ।

कोयलडी

  • परिवार की स्त्रियां वधू को विदा करते समय विदाई गीत कोयलडी गाती है ।

कुकड़लू

  • शादी के अवसर पर जब दूल्हा तोरण पर पहुंचता है तो महिलाएं ये गीत गाती है ।

कामण

  • राजस्थान के कई क्षेत्रों मे वर को जादू-टोने से बचाने हेतु गाये जाने वाले गीत कामण कहलाते है ।

कलाकी

  • कलाकी एक वीर रस प्रधान गीत है ।

कलाली

  • कलाली लोग शराब निकालने और बेचने का काम करते है । ये ठेकेदार होते है । कलाली गीत में सवाल-जवाब है । इस गीत में श्रृंगारिक एवं मन 'की चंचलता दिखाई देती है ।

कुरंजा


  • राजस्थानी लोक जीवन में विरहणी द्वारा अपने प्रियतम को संदेश भिजवाने हेतु कुरंजा पक्षी को माध्यम बनाकर यह गीत गाया जाता है ।

कुकडी

  • यह रात्रि जागरण का अंतिम गीत होता है ।

केवडा

  • केवडा एक वृक्ष है । यह प्रेयसी द्वारा गाया जाने वाला गीत है ।

काछबा

  • यह प्रेम गाथा पर आधारित लोक गीत है, जो पश्चिमी राजस्थान मे गाया जाता है ।

कागा

  • इसमें विरहणी नायिका कौए को सम्बोधित करके अपने प्रियतम के आने का शगुन मानती है और कौए को प्रलोभन देकर उड़ने को कहती है ।

हिन्डो/हिन्डोल्या

  • श्रावण मास मे राजस्थानी महिलाएं झूला झूलते समय यह लालित्यपूर्ण गीत गाती है ।

हमसीढ़ो

  • उत्तरी मेवाड़ में भीलों का प्रसिद्ध लोकगीत है । इसे स्त्री-पुरुष साथ मिलकर गाते है ।

हरजस

  • राजस्थानी महिलाओं द्वारा गाया जाने वाला सगुण भक्ति का लोकगीत है, जिसमें राम और कृष्णा की लीलाओं का वर्णन है । यह गीत शेखावाटी क्षेत्र में किसी को मृत्यु के अवसर पर गाया जाता है ।

हालरिया

  • यह जैसलमेर मे बच्चे के जन्म के अवसर पर गाया जाने वाला गीत है ।

हिचकी

  • किसी के द्वारा याद किये जाने पर हिचकी आती है । उस समय गाया जाने वाला गीत हिचकी गीत है ।

हरणी

  • यह गीत दीपावली के त्यौहार पर 10-15 दिन पहले मेवाड क्षेत्र में छोटे-छोटे बच्चों की टोलीयों द्वारा घर-घर जाकर गाया जाता है इसे लोवडी गीत भी कहते है । इस गीत के द्वारा बच्चे दीपावली पर खर्च करने के लिए थोड़ा-थोड़ा पैसा एकत्रित करते है ।

होलर

  • यह गीत पुत्र जन्म से संबंधित है

हीड

  • यह गीत मेवाड क्षेत्र में दीपावली के अवसर पर आदिवासी लोग समूह रूप में घर-घर जाकर एक गाथा के रूप में गाते है हीड़ का तात्पर्य दीपक होता है ।

हूंस

  • इस गीत के माध्यम से राजस्थान गर्भवती महिला को दो जीवों वाली कहते है । हूंस का अर्थ गर्भवती की इच्छा होती है इस तरह के गीतों में घेवर, केरी मत्तीरा फली एवं बेर की इच्छापूर्ति के गीत गाते है ।

हर का हिंडोला

  • यह गीत किसी वृद्ध की मृत्यु के अवसर पर गाया जाता हैं ।

दारूडी

  • यह गीत रजवाडों में शराब पीते समय गाया जाता है

दुपट्टा

  • यह गीत दूल्हे की सालियों द्वारा गाया जाता है ।

धुंसो/धुंसा

  • यह मारवाड़ का राज्य गीत है । इस गीत में अजीत सिंह की धाय माता गोरा धाय का वर्णन है ।

घूमर

  • यह गणगौर के त्यौहार व विशेष पर्वो तथा उत्सवों पर मुख्य रूप से गाया जाता है ।

घुड़ला

  • यह मारवाड़ क्षेत्र में होली के बाद घुड़ला त्यौहार के अवसर पर कन्याओं द्वारा गाया जाने चाला लोकगीत हैं ।

घुघरी

  • बच्चे के जन्म के अवसर पर गाया जाने वाला गीत ।

घोडी

  • लडके के विवाह के अवसर पर निकासी के समय गाया जाने वाला गीत है ।

रतन राणा

  • यह अमरकोट (पाकिस्तान) के सोढा राणा रतन सिंह का गीत है । यह पश्चिमी क्षेत्र में गाया जाने वाला सगुन भक्ति का गीत है ।

रातिजगा

  • रातभर जाग कर गाये जाने वाले गीत रातिजगा गीत कहलाते है ।

रसिया

  • यह गीत भरतपुर, धौलपुर मे गाया जाता है ।

जलो और जलाल/जला

  • वधू के घर जब स्त्रियाँ वर की बारात का डेरा देखने जाती है, तब यह गीत गाया जाता है ।

जीणमाता का गीत

  • यह गीत राजस्थान के समस्त गीतों में सबसे लम्बा लोक गीत है । इस गीत में भाईं-बहन के प्रेम, पहाडों की तपस्या, मन्नतों का पूरा होना और आक्रमणकारियों से क्षेत्र की रक्षा का वर्णन किया जाता है

जकडियां

  • यह पीर ओलियों की प्रशंसा में गाया जाने वाला धार्मिक गीत है । राजस्थानी मुस्लिम समाज मे इन गीतों का प्रचलन सर्वाधिक है ।

जच्चा

  • यह गीत पुत्र जन्म के अवसर पर गाया जाता है, इसका अन्य नाम होलर है ।

जीरो

  • इस गीत में पत्नी अपने पति को जीरे की खेती न करने का अनुरोध करती है ।

चरचरी

  • ताल और नृत्य के साथ उत्सव में गाई जाने वाली रचना 'चरचरी' कहलाती है ।

चाक गीत

  • विवाह के समय स्त्रियों द्वारा कुम्हार के घर जाकर पूजने (घड़ा) के समय गाया जाता है ।

चिरमी

  • यह गीत चिरमी पौधे को सम्बोधित करके नववधु द्वारा भाई व पिता की प्रतीक्षा में गाया जाता है ।

हींडा

  • यह गीत सहरिया जनजाति में दीपावली के अवसर पर गाया जाता है ।

लहंगी

  • यह गीत जनजाति के द्वारा वर्षा ऋतु में गाया जाता है ।

आल्हा

  • यह गीत सहरिया जनजाति के द्वारा वर्षा वस्तु में गाया जाता है ।

चौबाली

  • राजस्थानी लोकगीतों का संस्मरण चौबाली कहलाता है ।

रामदेवजी के गीत

  • लोकदेवताओं में सबसे लम्बे गीत रामदेवजी के गीत है ।
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Tuesday, 12 March 2019

Rajasthan Map District Wise in Hindi - जिला दर्शन GK

नमस्कार दोस्तों इस पोस्ट से आप राजस्थान के सभी जिलों के महत्वपूर्ण तथ्य के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकोगे rajasthan map in hindi में जिला वाइज Rpsc और Ras GK तैयार करने के लिए आसान Nots निम्नलिखित है

Rajasthan Map District Wise in Hindi - जिला दर्शन GK

rajasthan map with districts Photo
rajasthan map

अजमेर

ajmer map image
ajmer tourist places

  • उत्तर भारत का सर्वप्रथम पूर्ण साक्षर जिला
  • अजमेर जिले का संस्थापक चौहान राजा अजयराज है
  • अजमेर दुर्ग राजस्थान का जिब्राल्टर गढ़ बिठली कहा जाता है
  • दोराई औरंगजेब द्वारा उत्तराधिकार का युद्ध यहां जीता गया था
  • अजमेर को राजस्थान का हृदय कहा जाता है
  • ढाई दिन का झोपड़ा भी अजमेर जिले में स्थित है
  • अजमेर में मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह स्थित है

अलवर

alwar tourist map
alwar map rajasthan

  • यहां 80 खंभों की मूसी महारानी की छतरी है
  • अलवर पूर्ण रूप से राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में शामिल जिला है
  • सर्वाधिक औद्योगिक इकाइयां अलवर जिले में है
  • अलवर जिले का संस्थापक राजा राव प्रताप सिंह था

बाड़मेर

barmer map in hindi
barmer map

  • वर्तमान में प्राकृतिक तेल क्षेत्र के कारण चर्चित जिला मंगला शक्ति एवं ऐश्वर्या तेल क्षेत्र कहां स्थित है
  • सर्वाधिक पशुधन वाला जिला बाड़मेर है
  • बाजरा उत्पादक जिला बाड़मेर
  • अजरक प्रिंट छप्पन की पहाड़ियां नाकोड़ा पर्वत बाड़मेर में स्थित है

बांसवाड़ा

banswara district map in Hindi
banswara map


  • 100 द्वीपों का शहर बांसवाड़ा
  • आदिवासियों का शहर बांसवाड़ा
  • कंठल प्रतापगढ़ से बांसवाड़ा जिले में माही नदी के किनारे का क्षेत्र
  • माही जल विद्युत परियोजना बांसवाड़ा जिले में है

बारां

baran map in hindi
baran map


  • सर्वाधिक सहरिया जनजाति बारां जिले में है
  • भिंड देवरा मिनी खजुराहो कहलाता है यह भी बारां जिले में है
  • कपिलधारा तीर्थ स्थल बारां जिले में है

भरतपुर

bharatpur map in hindi
bharatpur district map

  • लोहागढ़ दुर्ग महाराजा सूरजमल द्वारा निर्मित
  • 1804 में लॉर्ड लेक भी महाराजा रणजीत सिंह के समय आक्रमण करने पर नहीं कर सका था तभी से यह गढ़ लोहागढ़ कहलाता है
  • जवाहर बुर्ज महाराजा जवाहर सिंह की दिल्ली विजय का प्रतीक है

भीलवाड़ा

bhilwara map photo
map of bhilwara district

  • टेक्सटाइल सिटी राजस्थान का मैनचेस्टर भीलवाड़ा को कहा जाता है
  • सर्वाधिक अभ्रक भीलवाड़ा जिले में है
  • अभ्रक ईट उद्योग भीलवाड़ा का प्रसिद्ध है
  • सर्वाधिक सूती वस्त्र मिले भीलवाड़ा में है

बीकानेर जिला

bikaner map image
map of bikaner district

  • जूनागढ़ रायसिंह द्वारा निर्मित किला
  • भांडाशाह जैन मंदिर इस मंदिर की नीव में घी का प्रयोग किया गया था
  • बीकानेर के संस्थापक राव बिका थे
  • राजस्थान राज्य अभिलेखागार का मुख्यालय बीकानेर में है

बूंदी जिला

bundi district map
bundi district map in hindi

  • 84 खंभों की छतरी राव अनिरुद्ध द्वारा निर्मित
  • तारागढ़ का किला राज महल गढ़ पैलेस बादल महल अनिरुद्ध महल रतन दौलत आदि बूंदी जिले में स्थित है
  • बावरियों का शहर बूंदी
  • प्रसिद्ध कजली तीज का मेला बूंदी जिले में लगता है

चित्तौड़गढ़

chittorgarh map in hindi
chittorgarh tourism map

  • मेसा पठार पर चित्तौड़गढ़ का प्रसिद्ध दुर्ग स्थित है
  • यह दुर्ग चित्रांगद मौर्य द्वारा निर्मित है
  • यहां जैन कीर्ति स्तंभ जीजा द्वारा निर्मित स्थित है
  • काला सोना अफीम सर्वाधिक चित्तौड़गढ़ जिले में पैदा होती है

चुरु

churu map image
churu map

  • चूड़ा जाट चुरू का निर्माता
  • जिले में कोई भी नदी नहीं बहती है
  • दुधवाखारा प्रसिद्ध किसान आंदोलन चूरू में हुआ था
  • सबसे कम वन क्षेत्र वाला जिला

धौलपुर

dholpur map image
Dholpur map

  • क्षेत्रफल की दृष्टि से राजस्थान का सबसे छोटा जिला धौलपुर है
  • धौलपुर का संस्थापक धवल देव है
  • आईटेक प्रिंसिजन ग्लास फैक्ट्री धौलपुर में स्थित है

दौसा

Dausa map
Dausa map gk

  • कच्छवाहा शासकों की प्रथम राजधानी
  • झांझीरामपुरा झांझेश्वर महादेव का मंदिर
  • हींगवा नाथ सम्प्रदाय का प्रसिद्ध स्थल
    गुढा का किला , गीजगढ़ का किला 
  • देवगिरी पहाड़ी 

डूंगरपुर 

Dungarpur map
Dungarpur

  • नौलखा बावडी रानी प्रीमल देवी द्वारा निर्मित 
  • संस्थापक 1458 ई . में डूंगरसिंह द्वारा डूंगरपुर कस्बे की स्थापना 
  • चतुर्भुज जी का मंदिर ( आसकरण द्वारा निर्मित), उदयविलास महल व उदयबाव बावडी (उदयसिंह द्वारा निर्मित)
  • एडवर्ड समुद्र ( विजयसिंह द्वारा निर्मित) 
  • विजयराज राजेश्वर मंदिर ( गैबसागर की पाल पर )
  • एक थम्बिया महल ( शिवज्ञानेश्वर शिवालय है जिसे इस नाम से जाना जाता है )

गंगानगर 

ganganagar district map
sri ganganagar map

  • राज्य के छठा शुष्क बंदरगाह
  • किन्नू, अंगूर का सर्बाधिक उत्पादक
  • राज्य में सूर्य की किरणों का सर्वाधिक तिरछापन इसी जिले में होता है ।
  • श्री गंगानगर सहकारी कॉटन कॉम्पलेक्स
  • गजल गायक जगजीत सिंह का जन्म स्थल
  • बीकानेर के शासक महाराजा गंगासिंह द्वारा गंगानगर बसाया गया । 
  • पूर्व नाम रामनगर
  • इंदिरा गाँधी नहर परियोजना की सूरतगढ़ व अनूपगढ़ शाखा गंगानगर जिले में निकाली गयी हैं । 
  • सर्वाधिक गेहूँ उत्पादक जिला , सर्वाधिक गन्ना उत्पादन अन्न का कटोरा बागानों को भूमि
  • गंगनहर 1927 ईं . में महाराजा गंगासिंह द्वारा निर्माण करवाया गया ।
  • कंवरसेन लिपट नहर द्वारा गंगानगर जिले मे पेय जलापूर्ति की जा रही है ।

हनुमानगढ

hanumangarh map photo
hanumangarh map


  • नदी (घग्घर)
  • 12 जुलाई 1994 को श्रीगंगानगर से अलग करके 31वॉ जिला बनाया गया।
  • भद्रकाली मंदिर बीकानेर के महाराजा रामसिंह द्वारा निर्मित
  • सर्वाधिक कपास उत्पादक जिला
  • भटनेर का किला यादव वंशज भट्टी के पूत्र भूपत ने 285 ई में भटनेर किले का निर्माण करवाया ।
  • इन्दिरा गाँधी नहर परियोजना रावतसर शाखा इसकी 9 मुख्य शाखाओं में पहली शाखा जो बांयी तरफ से निकाली गयी है शेष दांयी तरफ से है ।
  • चौधरी कुंभाराम लिफ्ट नहर

जयपुर

Jaipur map photo
Jaipur map

  • संस्थापक महाराजा सवाई जयसिंह 2
  • विद्याधर भट्टाचार्य जयपुर शहर की योजना बनाने वाले वास्तुकार
  • राज्य में सर्वप्रथम मेट्रो ट्रेन प्रोजेक्ट जयपुर से प्रारम्भ 
  • विश्व में प्रथम हहोम्योपैथिक विश्वविद्यालय जयपुर 
  • घाट की गुणी सुरंग परियोजना
  • गलीचा निर्माण
  • राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लि. का मुख्यालय    
  • सीतापुर देश का प्रथम निर्यात संवर्धन औद्योगिक पार्क जयपुर मे है
  • कूकस इलेक्ट्रॉनिक हार्डवेयर टेक्नोलॉजी पार्क
  • पानी के कैप्सन मीटर का कारखाना  सिटी पैलेस चंद्रमहल, सुखनिवास महल आदि जयपुर मे है

जैसलमेर

jaisalmer district map
jaisalmer map

  • जैसलमेर नगर के संस्थापक राव जैसलदेव भाटी पाकिस्तान के साथ सबसे लम्बी अन्तर्राष्ट्रीय सीमा वाला जिला (464 km)
  • सोनार किला त्रिकूटगढ विश्व धरोहर मे शामिल
  • न्यूनतम जनघनत्व वाला जिला 
  • सर्वाधिक दशकीय जनसंख्या वृद्धि 
  • सर्वाधिक विपरीत लिंगानुपात वाला जिला 
  • बाघेवाला प्राकृतिक तेल की खोज हेतु चर्चित स्थल ( पी .डी .बी . एस .ए. कंपनी (वेनेजुएला) के सहयोग से पहले भारी आयल के कुए की खुदाई प्रारम्भ की )
  • जैसलमेर मे पलाया झील स्थित हैं ।

जालौर

Jalor map pooto
Jalor map

  • अलाउद्दीन खिलजी की मस्जिद राजस्थान की सर्वप्राचीन मस्जिद जालौर मे है
  • तोपखाना परमार राजा भोज द्वारा बनवाईं गई सरस्वती कण्ठाभरण पाठशाला
  • मोदरां महोदरी( आशापूरी )माता मंदिर जालौर के सोनगरा चौहान शासकों की कुलदेवी है
जालौर दुर्ग हसन निजामी ने कहा "यह शक्तिशाली और अजय दुर्ग है जिसके द्वार कभी भी किसी विजेता के द्वारा नहीं खोले गए चाहे वह कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो"

झालावाड

jhalawar map in hindi
jhalawar map

  • झालावाड़ रियासत का गठन अँग्रेजों द्वारा महारावल झाला मदनसिह ( 1838 में) के लिए किया गया था
  • किसान सहकारी क्रेडिट का राज्य स्तरीय शुभारम्भ इसी जिले से किया गया था
  • झालावाड राज्य प्रजामण्डल कन्हैयालाल द्वारा 
  • अबली मीणी का महल कोटा के राव मुकुन्दसिंह द्वारा निर्मित्त ( दर्रा अभयारण्य में स्थित) है

झुंझुनूं

Jhunjhunu map
Jhunjhunu map gk

  • कमरुद्दीन शाह की दरगाह झुंझुनूं मे है
  • मनसा माता का मंदिर झुंझुनूं मे है
  • झूंझा जाट के नाम पर स्थापित हुआ झुंझुनूं जिला
  • बादलगढ़, चंचलनाथ का टीला, नवाब रूहेलखाँ का मकबरा झुंझुनूं मे है
  • नेतका टीला झुंझुनूं मे है
  • खेतडी महल महाराजा भोपालसिंह द्वारा निर्मित, लखनऊ जैसी भूलभुलैया व जयपुर के हवामहल की झलक के कारण शेखावाटी का हवामहल कहा जाता है

जोधपुर 

Jodhpur map photo
Jodhpur map photo

  • काजरी - केन्द्रीय मरूक्षेत्र अनुसंधान संस्थान जोधपुर मे है
  • मेहरानगढ़ दूर्ग (मोरध्वज, गढ़ चिंतामणी) जोधपुर मे है
  • स्थापना - राठौड़ शासक राव जोधा द्वारा 1459 ईं .
  • बालसमन्द झील - प्रतिहार शासक बालक राव द्वारा निर्मित जोधपुर मे है 
  • कोलूमण्ड पाबूजी का जन्म स्थल जोधपुर मे है
  • अजीत भवन राज्य का पहला हेरिटेज हॉटल जोधपुर मे है 
  • बादला ( जिंक धातु का बना बर्तन ) जोधपुर का प्रसिद्ध है

करौली

Karauli map
Karauli map gk

  • 19 जुलाई 1997 को सवाई माधोपुर से अलग होकर 32वां जिला बना 
  • अंजनी माता का मंदिर (हनुमानजी को स्तनपान कराते हुए मूर्ति) करौली मे है 
  • हरसुख विलास (महाराजा हरबक्षपाल द्वारा निर्मित, सफेद चंदन के वृक्षों का उद्यान) करौली मे है
  • मण्डरायल का किला - बृज बहादुर द्वारा निर्माण इसे ग्वालियर दुर्ग की कुंजी भी कहते हैँ।

कोटा

Kota map photo
Kota map

  • वर्द्धमान महावीर - विश्व विद्यालय राज्य का एकमात्र खुला विश्वविद्यालय जो की कोटा मे है
  • राजस्थान तकनीको विश्वविद्यालय कोटा मे है  
  • सर्वाधिक साक्षरता वाला जिला कोटा है
  • दशहरे मेले के लिए प्रसिद्ध कोटा
  • सेम्कोर ग्लास लिमिटेड कोटा जिले मे है  
  • हाडौती यातायात प्रशिक्षण पार्क कोटा मे है  
  • सावन भादो परियोजना कोटा मे है
  • उम्मेद भवन महल, जग मंदिर, अमर निवास छत्र महल आदि कोटा मे है

नागौर

Nagaur map photo
Nagaur map 

  • मातासुख-कस्वाऊ लिग्नाइट की खानें
  • हसोलाव नवल सम्प्रदाय के प्रवर्तक संत नवलदास जी का जन्म स्थल
  •   जांगलदेश की राजधानी 
  • जिप्सम के भण्डार 
  • अमरसिंह राठीड़ की छतरी 
  • शुक्र तालाब अकबर द्वारा निर्मित  
  • लाखोलाव तालाब पानमैंथी उत्पादन, भुजिया उद्योग, हस्त निर्मित औजार 

पाली

Pali map gk
Pali map

  • गीतमेश्वर सूकडी नदी के किनारे, मीणा जनजाति के इष्टदेव, भूरिया बाबा , मीणा समुदाय पूर्वजों की अस्थियां सूकडी नदी में विसर्जित करते हैं ।
  • फोरेंसिक साइंस लैब (विधि विज्ञान प्रयोगशाला) 
  • फालना जैन स्वर्ण मंदिर
  • सिरियारी जैन श्वेतांबर तरापंथियों का प्रमुख तीर्थ 
  • भद्रावन थोरियम खनिज क्षेत्र
  • नानाकराब टंगस्टन खनिज क्षेत्र
  • खिरची मारवाड़ बायोमास संयंत्र 

राजसमंद

Rajsamand map
Rajsamand map gk

  • राजसमंद झील मेवाड़ के इतिहास का विश्व का सबसे बड़ा शिलालेख
  • दिवेर [महाराणा प्रताप (छापामार पद्धति , विजय प्राप्त हुईं ) व मुगलो के मध्य] युद्ध स्थल जिसे कर्नल टोड ने मेवाड का मेराथन कहा था

सवाई माधोपुर

Sawai Madhopur map photo
Sawai Madhopur map

  • संस्थापक जयपर नरेश माधोसिंह प्रथम 
  • सर्वाधिक बीहड़ भूमि का प्रसार 
  • अमरूद मंडी
  • बेन्टोनाइट खनिज क्षेत्र
  • सपाड़ सवाई माधोपुर व करौली का मध्यप्रदेश को स्पर्श करता हुआ क्षेत्र कहलाता है ।

सीकर

Sikar map photo
Sikar map 

  • संस्थापक राव शिव सिंह 
  • काशी का बास बजाज उद्योग समूह के संस्थपक जमनालाल बजाज का जन्म स्थान
  • डूंगजी व जवाहर जी अंग्रेजों से लोहा लेने वाले व्यक्ति सीकर के थे

सिरोही

Sirohi map photo
Sirohi map

  • ओर गांव विट्ठल भगवान का मंदिर
  • उड़िया पठार - राजस्थान का सबसे ऊँचा पठार
  • अरावली पर्वतमाला दक्षिण-पश्चिम में इसी जिले से प्रारम्भ होकर उत्तर-पूर्व की और जाती है
  • भाकर सिरोही क्षेत्र की पहाडियों का स्थानीय नाम वसन्ती दुर्ग कुम्भा द्वारा निर्मित्त  
  • रामपुर बायोमास संयंत्र

टोंक

Tonk map photo
Tonk map

  • मौलाना अंब्दुल कलाम आजाद अरबी-फारसी शोध संस्थान ( कसरे इल्म ) 
  • सुनहरी कोठी (नवाब वजीउहौला खाँ द्वारा निर्मित)
  • चार बैत लोक गायन शैली 
  • लावा ठिकाना यह ठिकाना टोंक का ही भाग था ।
  • ऊँटों की कुर्बानी (बली)को लेकर चर्चित जिला

उदयपुर

Udaipur map photo
Udaipur map

  • माणिक्यलाल आदिम जाति शोध संस्थान 
  • राज्य का प्रथम योग कॉलेज 
  • राजस्थान साहित्य अकादमी ( 1958) 
  • गिहलोट उदयपुर का पूर्ववर्ती नाम 
  • भक्ति शर्मा इंग्लिश चैनल पार करने वाली राजस्थान की प्रथम तैराक 
  • गुलाब बाग, 
  • पन्ना उत्पादक जिला 
  • भारतीय प्रबंध संस्थान (IIM) 
  • यूरेनियम के भंडार स्थित हैं। 
  • मछला मगरा उदयपुर के चारों तरफ फैली मछली के आकार की पहाडियों

प्रतापगढ़  (कांठल)

  • स्थापना 26 जनवरी 2008 
  • राजस्थान का सबसे युवा जिला  (33 वां जिला) प्रतापगढ़, छोटी सादडी,अरनोद  (चित्तौडगढ), धरियावाद ( उदयपुर ), पीपल खूंट  (बांसवाड़ा) को मिलाकर ये जिला अस्तित्व मे आया 
  • थेवाकला कांच पर सोने का सूक्ष्म चित्रांकन विश्व मे एकमात्र राजसोनी परिवार के पुरूषों द्वारा


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