Monday, 20 January 2020

Ganeswar Sabhyata - गणेश्वर सभ्यता की विशेषता
गणेश्वर सभ्यता सीकर के नीम का थाना क्षेत्र में रैवासा गांव की खंडेला पहाडियों में स्थित है । गणेश्वर सभ्यता कांतली/कांटली/मौसमी नदी के किनारे विकसित हुई । ( पटवार-2011 , राज पुलिस-2014 )

Ganeswar Sabhyata - गणेश्वर सभ्यता की विशेषता

rajasthan ki sabhyata
Ganeswar Sabhyata - गणेश्वर सभ्यता की विशेषता

  • गणेश्वर सभ्यता की खोज 1972 ई. में राजस्थान विश्वविद्यालय के पुरातत्व विभाग के प्रोफेसर रतन चंद्र अग्रवाल ने की व 1977-78 ई. में इसका उत्खनन रतन चंद्र अग्रवाल व विजय कुमार ने की
  • गणेश्वर सभ्यता का कालक्रम 3000 ई. पू. से 2800 ई. पू. के आसपास माना जाता है ।
  • भारत में ताम्रयुगीन सभ्यता की उत्पत्ति तथा ताम्रयुगीन सभ्यताओं का विकास और प्रसार इसी सभ्यता से माना जाता है ।
  • गणेश्वर सभ्यता को ताम्रयुगीन सभ्यता की जननी कहा जाता है । ( PTI ग्रेड द्वितीय-2012 )
  • गणेश्वर सभ्यता के उत्खनन के दौरान मिली दोहरी पेंचदार शिरेवाली ताम्र पिन इसकी प्रमुख विशेषता है, जो मध्य एशिया के विभिन्न सभ्यताओं से भी प्राप्त हुई है । ऐसा अनुमान है कि गणेश्वर से ही दोहरी पेचदार शिरेवाली ताम्र पिन का निर्यात इन स्थलों पर किया जाता था । गणेश्वर सभ्यता से छ: प्रकार के मृदभाण्ड की जानकारी मिलती. है, ये मृदभाण्ड संग्रहण के मर्तबान, कलश तसले प्याले हांडी तथा मिट्टी के छलेदार बर्तन प्राप्त हुए है, जिसे कपि मृदभाण्ड / कपिषवर्णी मृदपात्र कहते है ।
  • इस सभ्यता के निवासी मासाहारी थे ।
  • यहाँ पर मछली पकडने का कांटा मिला है ।
  • गणेश्वर सभ्यता से ताँबे के फरसे व बाणाग्र आदि मिले है । गणेश्वर सभ्यता के लोग संभवत: ताँबा खैतडी व अलवर की खो-दरीबा खान से प्राप्त करते थे ।

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Bairath Civilization in Rajasthan - बैराठ सभ्यता
बैराठ राजस्थान की राजधानी जयपुर से लगभग 85 किलोमीटर की दुरी पर स्थित है। इसका नाम प्राचीन ग्रंथों में विराटपुर के रूप में मिलता है। राजस्थान राज्य के उत्तर-पूर्व में जयपुर जिले का विराट नगर या बैराठ कस्बा एक तहसील मुख्यालय है, जो  शाहपुरा उपखण्ड ( जयपुर ) में स्थित है । बैराठ बाणगंगा नदी के किनारे अवस्थित है।

Bairath Civilization in Rajasthan - बैराठ सभ्यता

बैराठ सभ्यता
Bairath Civilization in Rajasthan - बैराठ सभ्यता

  • बैराठ प्राचीन काल में मत्स्य जनपद की राजधानी थी । ( RPSC-2010 )
  • पर्वतीय कंदराओं, गुफाओं एवं वन्यप्राणियों वाला यह बैराठ क्षेत्र प्रागैतिहासिक मानव के आकर्षण का केन्द्र था।
  • महाभारत काल के पांडवों ने अज्ञातवास का अंतिम वर्ष छद्मवेश में विराट नगर के राजा विराट की सेवा में व्यतीत किया । (पटवार-2011 )
  • बैराठ सभ्यता की सर्वप्रथम खोज व उत्खनन कार्य 1936-37 ई. में दयाराम साहनी द्वारा किया गया ।
  • बैराठ का उत्खनन 1962 ई. में कैलाश दीक्षित व नील रतन बनर्जी ने किया ।
  • महाराजा रामसिंह के शासनकाल में किलेदार किताजी खंगारोत ने उत्खनन के दौरान स्वर्ण मंजूषा ( कलश ), जिसमें भगवान बुद्ध के अस्थि अवशेष प्राप्त हुए ।
  • बैराठ से प्रागैतिहासिक काल के अवशेष, मौर्यकालीन अवशेष, मध्यकालीन अवशेष मिलते है ।
  • विराट नगर की पहाडियों में गणेश डूंगरी, बीजक डूंगरी तथा भीम डूंगरी पर इस सभ्यता का फैलाव है । ( महिला सुपरवाइजर -2016 )
  • बैराठ स्थल से प्रागैतिहासिक काल के मानव के अवशेष मिले है विराट नगर में प्रागैतिहासिककालीन( पाषाणकाल ) हथियारों के निर्माण का एक बडा कारखाना मिला है ।
  • प्रागैतिहासिक काल के मानव ने पेबुलटूल प्रकार के पाषाणों का प्रयोग किया था । जिसके अवशेष बैराठ से मिलते है । इस प्रकार के उपकरण इस क्षेत्र में स्थित ढिंगारिया एवं भानगढ़ से प्रात हुए है । इस काल का मानव पूर्णत: प्रकृतिजीवी था ।
  • बैराठ से 1990 ई. में गणेश, बीजक व भीम डूंगरी से चित्रित शैलाश्रयों ( राज पुलिस 2014 ) की खोज की गई ।
  • यह चित्रांकन लघुपाषाणयुग से प्रारंभ होकर दीर्घकाल तक चलता रहा ।
  • बैराठ से ताम्रयुग के मृदभाण्डों का निर्माण चाक द्वारा किया जाता था । ये पात्र 'आकर कलर पात्र ' परम्परा के नाम से जाने जाते है । इन पात्रों को हाथ लगाने से सिन्दूर या गेरूआं रंग लगने लगता है । इन मृदभाण्डों पर उंकेरण विधि द्वारा अलंकरण किया जाता था और ऐसे मृदभाण्ड जोधपुरा ( जयपुर ) एवं गणेश्वर ( सीकर ) के उत्खनन से भी प्राप्त हुए है ।

आर. सी. अग्रवाल के अनुसार - बैराठवासी अपने ताम्र उपकरणों को तत्कालीन सैंधव केंद्रों को निर्यात किया करते थे ।
  • बैराठ से लोहयुगीन मृदभाण्ड ( NBPW -Northern Black Polished Ware ) उत्तरी काले चमकदार मृदभाण्ड परम्परा के अवशेष प्राप्त हुए है ।
  • बैराठ से लोहयुगीन सलेटी रंग के चित्रित पात्र प्राप्त हुए हैं, जो गंगा घाटी के समकालीन प्रचलित मृदभाण्नडों के समान थे ।

अशोक का भाब्रू शिलालेख


  • बैराठ की बीजक पहाडी ( आर पी एस सी-2010 ) से 1837 ई. में कैप्टन बर्ट ने सम्राट अशोक के भाब्रू शिलालेख की खोज की । ( पटवार-2011 , काँलेज व्याख्याता, सामान्य ज्ञान -2016 )
  • भाब्रू शिलालेख अशोक को बुद्ध व बौद्ध धर्म में आस्था का अभिलेखीय स्रोत है । भाब्रू शिलालेख पत्थर के पहिये पर ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण है ।
  • इस शिलालेख पर 'बुद्ध ,धम्म व संघ' का उल्लेख है ।
  • भाब्रू शिलालेख में अशोक को मगध का राजा कहा गया है ।
  • भाब्रू शिलालेख को चट्टान से काटकर 1840 ई. में कलकत्ता के संग्रहालय में रखवा दिया गया । संग्रहालय का वर्तमान नाम रॉयल एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल, कलकत्ता संग्रहालय है ।

नोट - विराट नगर या बैराठ में स्थित भीम की डूंगरी पर कींचक नामक राक्षस रहता था, जिसका भीम ने वध किया । बैराठ में कौरवों के पदचिह्न मिले है, वे यहाँ राजा विराट की गाय चोरी करने के लिए आए थे ।

शंख लिपि बैराठ 

  • बैराठ की भीम डूंगरी से सी एल. कार्लाइल ने 1871 ई. में शंख लिपि से उत्कीर्ण शिलालेख की खोज की ।
  • शंख लिपि - ब्राह्मी लिपि को अत्याधिक अलंकृत करके गुप्त रूप प्रदान करना कूटलिपि/गुप्तलिपि/शंखलिपि कहा जाता है ।

ह्वेनसांग की बैराठ यात्रा

  • चीनी यात्री ह्वेनसांग सम्राट हर्षवर्धन के काल में भारत आया था ।
  • ह्वेनसांग ने 634 ई. में बैराठ की यात्रा का उल्लेख करता है । उसने बैराठ का क्षेत्र लगभग ढाई मील बताया था । ह्वेनसांग बैराठ में आठ बौद्ध मठों का उल्लेख करता है । ( ग्रेड द्वितीय-2015 )
  • ह्वेनसांग ने बैराठ के लिए पारयात्र शब्द का उल्लेख करता है ।

बैराठ से मिली वस्तुएँ 

  • virat sabhyata की बीजक पहाडी से मौर्यकालीन बोद्ध विहार ( मंदिर ), स्तूप (हीनयान शाखा) तथा बुद्ध की मथुरा शैली में बनी हुई मूर्ति के अवशेष मिले है । ये बौद्ध विहार भारत में सर्वप्रथम मंदिर के प्राचीनतम अवशेष को दशति है ।
  • बैराठ में एक खण्डहर मिला है जिसमें 67 छोटे कमरे बने हुए है ।
  • बैराठ में 36 मुद्राएं सूती कपडे में बंधी हुई मिली है । जिसमें आठ पंच मार्क, चाँदी को मुद्राएं, 28 इण्डो ग्रीक/हिन्द यूनानी, जिसमें से 16 यूनानी राजा मिनेण्डर की है । ( कॉलेज व्याख्याता, इतिहास-20 16 ) 
  • यहां पर सूती कपडा हाथ से बना हुआ मिला है

बैराठ का विनाश कैसे हुआ 

  • प्रवृत्तिकाल में बैराठ के विनाश के अवशेष मिलते है, क्योंकि स्तंभ , छंत्र, स्तूप आदि के हजारों टुकड़े प्राप्त हुए है ।
  • दयाराम साहनी के मतानुसार यह विनाश लीला हूण शासक मिहिरकुल द्वारा की गई । हुण शासक मिहिरकुल ने छठी शताब्दी ईस्वी के प्रारंभिक काल में पश्चिमोत्तर भारतीय क्षेत्र में 15 वर्षो तक शासन किया था ।
  • चीनी यात्री ह्वेनसांग अपने विवरण में लिखता है कि मिहिरकुल ने पश्चिमोत्तर भारत में 1600 स्तूपों और बौद्ध विहारों को ध्वस्त किया तथा नौ कोटि बौद्ध उपासकों का वध किया । संभवत: इस विनाशकाल में ही बौद्ध धर्मानुयायियों ने कुटलिपि ( गुप्तलिपि ) का इन पहाडियों के शैलाश्रयों में प्रयोग किया था । इसका लाल रंग से 200 से अधिक शिलाखण्डों की सतहों पर अवशेष प्राप्त होता है ।

बैराठ सभ्यता के अन्य विशेषता

  • बैराठ मे मौर्यकाल के अलावा मध्यकाल के अवशेष मिलते है ।
  • वर्तमान विराट नगरी 16वी शताब्दी में बसी, उस समय यहाँ से ताम्बा निकाला जाता था ।
  • बैराठ के मध्य में अकबर ने एक टकसाल खोली जिसमें अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ के समय में ताम्बे के सिक्के ढाले जाते थे । 
  • इतिहासकार महावीर प्रसाद शर्मा ने अपनी पुस्तक तोरावाटी का इतिहास मे चंद्रगुप्त मौर्य का जन्म स्थान बैराठ बताया है । परंतु यह बौद्ध ग्रंथों के आधार पर प्रमाणित नहीं होता । 

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Sunday, 19 January 2020

Aahad Sabhyata Udaipur in Hindi - आहड़ सभ्यता
राजस्थान की प्राचीन सभ्यता आहड़ के बारे में पूरी जानकारी आप को इस पोस्ट में मिल जाये गी यह पोस्ट कॉम्पीशन एग्जाम को ध्यान में रखा कर बनाई गयी है  

आहड़ सभ्यता

Aahad Sabhyata Udaipur in Hindi - आहड़ सभ्यता
Aahad Sabhyata Udaipur in Hindi - आहड़ सभ्यता

  • आहड़ उदयपुर नगर/ मेवाड़ क्षेत्र ( ग्रेड द्वितीय-2015 ,ग्रेड तृतीय 2013 ) के पूर्व में बहने वाली आयड़/बेड़च नदी के तट पर स्थित है । 
  • आहड़ को प्राचीनकाल में ताम्बवती/ताम्रवती के नाम से जाना जाता था । ( आर पी एस सी-2010 ) 
  • 10 वीं व 11वीं शताब्दी में आहड़ को अघाटपुर या अघाटदुर्ग भी कहा जाता था ।
  • वर्त्तमान में आहड़ के स्थानीय लोग इसे धूलकोट के नाम से जानते हैं । ( जेईएन, मैकेनिकल, डिप्लोमा-2०16 )

आहड़ संस्कृति की मुख्य विशेषताएं

  • कालीबंगा सभ्यता नगरीय सभ्यता थी, आहड़ सभ्यता ग्रामीण संस्कृति की सभ्यता है ।
  • आहड़ के उत्खनित स्थल को महासत्तियों का टीला कहा जाता है ।
  • बनास संस्कृति आहड़ स्थल से संबंधित है ।
  • आहड़ को मेवाड के महाराणाओं का शमशान भी कहते है
  • आहड़ सभ्यता की खोज 1953 ई. में पं. अक्षय कीर्ति व्यास द्वारा तथा सर्वप्रथम लघु स्तर पर उत्खनन भी पं॰ अक्षय कीर्ति व्यास द्वारा किया गया । इसके पक्षात् 1954-56 ई. में धूलकोट टीले का उत्खनन व्यापक स्तर पर रत्तनचंद्र अग्रवाल द्वारा किया गया । तत्पश्चात् आहड़ का उत्खनन 1961 -62 ई. में बी.एन॰ मिश्रा व एच डी. सांकलिया ( पूना विश्वविद्यालय ) द्वारा किया गया  ( आरपी एस सी-2011 )

आहड़ सभ्यता का काल

  • डॉ. गोपीनाथ शर्मा ने आहड़ सभ्यता का काल 1900 ई.पू. से 1200 ई. पूर्व  माना है ।
  • कार्बन-14 वैज्ञानिक पद्धति के अनुसार आहड़ सभ्यता का काल 2000 ई. पू. से 1200 ई. पू. के मध्य माना जाता है तथा बर्तन व मृदभांड के डिजाईन के आधार पर 2000 ई. पू. से 1000 ई. पू. के काल में आहड़वासियों का सम्बन्ध ईरान से था ।

आहड़ सभ्यता के स्तर 

  • आहड़ के उत्खनन के दौरान 8 स्तर मिले है, जिन्हें पुरातात्विक सामग्री के आधार पर 3 चरणों में बांटा गया है
  1. स्फटिक पत्थरों के प्रयोग व औजार व उपकरण के आधार पर ।
  2. ताम्र , कांस्य व लोहे के उपकरण के आधार पर ।
  3. मृदभांड से संबंधित सामग्री तथा मिट्टी व काले मुलायम पत्थर से निर्मित भवनों के आधार पर ।

आहड़ सभ्यता से प्राप्त वस्तुएँ 

  • आहड़ संस्कृति पूर्णत: ग्रामीण संस्कृति थी । यहाँ के निवासी भवन निर्माण के दौरान नींव मे पत्थर डालकर भवनों का निर्माण करते थे । 
  • आहड़ से 45 फुट लम्बे भवन के अवशेष प्राप्त हुए है । 
  • मकानों में औसतन 2 या 3 चूल्हे मिले है । 
  • एक मकान में 6 चूल्हे मिले है, जिनमें एक पर मानव हथेली की छाप है । 
  • आहड़ के भवनों की रसोई में अनेक सिलबट्टे प्राप्त हुए है और आहड़ के एक भवन से 4 × 3 फुट का सिलबट्टा प्राप्त हुआ है । 
  • आहड़ सभ्यता लाल व काले मृदभांड (RBW) वाली संस्कृति का महत्वपूर्ण केन्द्र था ।
  • aahad sabhyata के मृदभाण्ड उल्टी तपाई विधि से पकाये जाने के कारण विशिष्ट रंग के बन जाते थे । इस विधि को विज्ञान की भाषा मे क्रमशः अपचयन की स्थिति में जलन ऑक्सीकरण की स्थिति में जलन कहा जाता है 
  • आहड़ के उत्खनन के दौरान अनाज रखने के मृदभाण्ड मिले है, जिन्हें स्थानीय भाषा में गोरे व कोंठ कहा जाता है ।
  • टेराकोटा/ मृणमूर्ति कोई भी कलाकृति जो मिट्टी से निर्मित हो तथा अग्नि से पक्का ली गई हो उसे मृणमूर्ति कहा जाता था
  • आहड़ के उत्खनन में चार मानव मृणमूर्तियाँ प्राप्त हुई है ।
  • aahad sabhyata से नारी की खण्डित मृणमूर्ति मिली है । जो कमर के नीचे लहंगा धारण किये हुए है ।
  • आहड़ की मृणमूर्तियों में हाथी, घोड़े व बैलगाड़ी के पहियों की मृणमूर्तियाँ मुख्य रूप से मिली है ।
  • आहड़ से मिली बैल की मृणमूर्ति को 'बनासियन बुल्स टेराकोटा की संज्ञा दी गई है ।
  • इन मृणमूर्तियों में कार्नेलियन, क्रिस्टल, फेन्यास, जैस्पर,सेलखडी तथा लेपिस लाजूली जैसे कीमती उपकरणों का प्रयोग किया जाता था ।
  • आहड़ की खुदाई में 6 तांबे की मुद्राएं और 3 मुहरें मिली है ।
  • एक मुद्रा पर त्रिशुल खुदा है, जिसकी दूसरी तरफ यूनानी शासक अपोलो के हाथ में तीर व तरकश है । मुद्रा के किनारों पर यूनानी भाषा में लेख है, जिसके आधार पर यह दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व का माना गया है ।

आहड़ सभ्यता की अन्य प्रमुख विशेषता

  • आहड़ संस्कृति के निवासी ताम्र उपकरणों का निर्माण करना जानते थे और हड़प्पा संस्कृति और गंगा घाटी की ताम्र निधि संस्कृति के अतिरिक्त आहड़ संस्कृति के पुरास्थलों से ही सर्वाधिक मात्रा मे ताम्र उपकरण प्राप्त हुए है ।
  • आहड़ क्षेत्र में लगभग 40 ताँबे की खदानें है जहाँ वर्तमान में भी खुदाई कर ताँबा खनिज निकाला जाता है ।
  • आर सी. अग्रवाल ने आहड़ से 12 किमी. दूर मतून एवं उमरा नामक स्थलों पर ताम्र शोधन के साक्ष्य प्राप्त किए है ।
  • आहड़ से ताम्र कुल्हाडी तथा आयताकार , सपाट व अर्द्धचन्द्राकार उपकरण प्राप्त हुए है तथा ताँबा गलाने की भट्टी भी मिली है ।
  • आहड़ से 79 लोहे के उपकरण, कुल्हाड़ी चाकू,कील आदि प्राप्त हुए है । इसलिए माना जाता है कि आहड़ क्षेत्र में लौह युग का प्रवेश हो चुका था ।
  • आहड़ से अवतल चक्की/आटा पीसने की चक्की मिली है ।
  • खाद्यान्न फ़सल ज्वार व चावल के अवशेष व पालतू
  • कुत्ते, मिट्टी के मनकों के आभूषण के अवशेष मिले है ।
  • इस सभ्यता के लोग चावल से परिचित थे तथा पशुपालन इनका प्रमुख व्यवसाय था ।
  • आहड़ में कुछ मिट्टी के दीपक मिले है, जिनका प्रयोग धार्मिक दृष्टिकोण से पूजा करना या रोशनी करना था ।
  • आहड़ में रंगाई या छपाई के ठप्पे/छापे मिले है ।
  • आहड़ में माप तोल के बाट मिले है, जिससे इनके व्यापार वाणिज्य के बारे में पता चलता है ।
  • aahad sabhyata के लोग मृतकों के साथ आभूषण भी दफनाते थे ।

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Saturday, 18 January 2020

Kalibangan Facts in Hindi - कालीबंगा सभ्यता की विशेषता
Rajasthan ki Prachin Kalibangan Sabhyata  - राजस्थान की प्राचीन कालीबंगा सभ्यता के बारे में पूरी जानकारी Kalibangan Facts in Hindi - कालीबंगा सभ्यता की विशेषता आप को इस पोस्ट में मिल जाये गी 
Rajasthan ki Prachin Kalibangan Sabhyata
Rajasthan ki Prachin Kalibangan Sabhyata

कालीबंगा सभ्यता

  • कालीबंगा सभ्यता हनुमानगढ जिले में स्थित है ।
  • यह सभ्यता वैदिक कालीन सरस्वती/द्वषद्वती नदी घाटी में फैली हुई थी ।
  • कालीबंगा घग्घर/नट/नाली/मृत/सोतर/हकरा/वाहिद नदी के किनारे स्थित है ।
  • कालीबंगा का शाब्दिक अर्थ है काले रंग की चूडियाँ
  • इस सभ्यता की खोज 1952 ई. में अमलानंद घोष ने की । (माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की कक्षा 12 की पुस्तक में 1951 ईं. में खोज करना बताया गया है ।) 
  • कालीबंगा का उत्खनन कार्य बी बी. लाल व बी के. थापर के नेतृत्व में 1961 से1969 ई. में किया गया तथा श्री एम. डी. खरे, के एम. श्रीवास्तव व एस पी. जैन द्वारा भी उत्खनन किया गया । 
  • कालीबंगा विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं से सर्वश्रेष्ठ तो नहीं परंतु उनके समकक्ष मानी जा सकती है । इसीलिए डाँ. दशरथ शर्मा के अनुसार कालीबंगा को सामरिक व पुरातात्विक महत्व की दृष्टि से सिंधु घाटी सभ्यता की तीसरी राजधानी कहा जा सकता है ।
  • पिग्गट महोदय ने हड़प्पा व मोहनजोदडो को सिंधु घाटी सभ्यता की जुडवाँ राजधानियाँ कहा है । 
  • सिंधु घाटी सभ्यता के स्थलों का सर्वाधिक संकेन्द्रण / घनत्व घग्घर हकरा क्षेत्र में पाया जाता है । सिंधु घाटी सभ्यता के काल को प्रथम नगरीकरण का युग कहा जाता है । 
  • कालीबंगा में मुख्यत घग्घर नदी के बायें तट पर दो टीले मिले है प्रथम पश्चिमी टीला तथा द्वितीय पूर्वी टीला ।

प्रथम पश्चिमी टीला - जो अपेक्षाकृत छोटा लेकिन ऊँचा है । पश्चिमी टीले के निम्न स्तरों में प्राक् हड़पा संस्कृति के अवशेष प्राप्त हुए है । इन्हीं प्राक् हड़प्पाकालीन ऊपरी स्तरों में हड़प्पाकालीन संस्कृति के पुरावशेष प्राप्त हुए है । जिनमें दुर्ग या गढी के अवशेष प्रमुख है ।
द्वितीय पूर्वी टीला - जो अपेक्षाकृत कम ऊँचाई तथा विशाल क्षेत्र में फैला हुआ है । इस टीले से प्रस्तर धातुकाल या हड़प्पाकाल के अवशेष मिलते है ।

प्राक् हड़प्पा युगीन कालीबंगा

  • इस बस्ती में मकानों के निर्माण के लिए कच्ची ईंटों का ही प्रयोग हुआ था । इसलिए कालीबंगा को दीनहीन बस्ती कहा जाता है । 
  • पक्की ईटों का प्रयोग केवल स्नानागार नाली एवं कुएं आदि के निर्माण में हुआ है । 
  • अन्य घरेलू सामग्री के अंतर्गत त्रिभुजाकार पक्की मिट्टी के पिण्ड ( टेराकोटा केक ), पत्थर के सिलबट्टे आदि प्राप्त हुए है

प्राक् हड़प्पायुगीन सामाजिक जीवन

  • प्राक् हड़प्पा युगीन कालीबंगा की बस्ती के चारों तरफ परकोटे की उपस्थिति तत्कालीन समाज में असुरक्षा की भावना ( संभवत: बाढ़ से ) का संकेत है ।
  • प्राक् हड़प्पाकालीन आवास का निर्माण कच्ची ईटों से किया गया था । स्नानागार तथा नालियो का निर्माण पक्की ईंटों से किया जाता था ।
  • मकानों की दीवारों में दरारें होने के कारण यहाँ भूकंप के अवशेष होने का प्रमाण है ।
  • कालीबंगा में समकोण दिशा मे जूते हुए खेत के साक्ष्य मिले है ।
  • प्राक् हड़प्पाकालीन मनुष्यों का आर्थिक जीवन में कृषि का महत्वपूर्ण स्थान था । उत्खनन मे एक साथ दो फसलों की उपज के दोहरे जूते खेत के प्रमाण मिले है । ( आर पी एस सी-2०11 )
  • कालीबंगा मे खेत के दो पाडे थे कम दूरी चना, अधिक दूरी सरसों बोई जाती थी ।
  • कालीबंगा में प्राक् हड़प्पा व हड़प्पाकालीन संस्कृति के अवशेष मिले है ।
  • कपास की खेती के साक्ष्य सर्वप्रथम कालीबंगा में मिले है । जिसे यूनानियों ने सिंडन कहा है ।
  • कार्बन 14 पद्धति के आधार पर प्राक् हड़प्पाकालीन बस्ती का तिथिक्रम 2400 ई पू निर्धारित हुआ है ।

हड़प्पायुगीन कालीबंगा

  • हड़प्पा संस्कृति का विस्तार राजस्थान के उत्तरी भाग तक ही सीमित था ।
  • कालीबंगा एक नगरीय सभ्यता है । जिसमे नगर योजना हडप्पा संस्कृति के अन्य पुरास्थलों की भांति कालीबंगा में भी दो टीले दिखाई देते है । इन दोनों को अलग-अलग परकोटे ( कालीबंगा से दोहरे परकोटे के प्रमाण मिले है ) से सुरक्षित किया गया था । 
  • यहाँ की बस्ती सुरक्षात्मक दीवार ( परकोटे) से सुरक्षित से की गई थी ।
  • कालीबंगा में सभी प्रकार की ईंटों का अनुपात 4:2:1 है । कालीबंगा के अलावा हड़प्पा सभ्यता के अन्य नगरों में निचला नगर रक्षा प्राचीर से नहीं घिरा, इसलिए कालीबंगा को दोहरे परकोटे की सभ्यता कहा गया ।
  • कालीबंगा से हड़प्पाकालीन ( पश्चिमी टीले से ) गढी या दुर्ग के अवशेष मिले है । यह दुर्ग/गढी हड़प्पा और मोहनजोदडो के समकालीन थी ।
  • इस सभ्यता का नगर एक निश्चित योजना के आधार पर बसाया गया लगता है । सड़कों को पक्का बनाने की पद्धति का प्रचार कालीबंगा से हुआ । संपूर्ण नगर में उत्तर से दक्षिण की ओर तथा पूर्व से पश्चिम की और जाने वाली चौडी सडकें जो 5 मीटर से 7.20 मीटर तक चौड़ी थी । जो एक-दूसरे को समकोण पर काटती थी । जिसे जाल पद्धति/ग्रीड पद्धति/चेम्सफौर्ड पद्धति/आक्सफोर्ड पद्धति कहा जाता है ।
  • कालीबंगा में सड़को की चौड़ाई 7.2 मीटर तथा गलियों की चौड़ाई 1.8 मीटर थी । कालीबंगा में भवनों के द्वार सड़को पर न खुलकर गलियों मे खुलते थे ।
  • दुर्ग के दक्षिण में कच्ची ईटों से निर्मित चबूतरे मिले है । इनमें एक चबूतरे पर एक कुआँ तथा सात अग्निवेदिकाएं प्राप्त हुई है । अग्निवेदिकाओं की आकृति आयताकार कुण्डनुमा है
  • इन अग्निवेदिकाओं के मध्य में बेलनाकार स्तंभ व कोयलों की भस्म भी मिली है तथा इनमें कुछ अन्न के दाने भी मिले है । इस प्रकार की अग्निवेदिकाएं तत्कालीन अन्य पुरास्थलों जैसे बणवाली, राखी गढी व लोथल से प्रात हुई है ।
  • कालीबंगा में फर्श में लगी हुई अलंकृत ईटे मिली है ।
  • कालीबंगा से मिट्टी, ताँबे व काँसे की चूहिडयाँ मिली है । कालीबंगा समाज में बलि प्रथा का प्रचलन था, यहाँ पर मिली हरिण तथा जैल को हड्डियों से बलि प्रथा का पता चलता है । कालीबंगा में बेलनाकार तंदूर मिले है तदूरों की प्रथा का होना ईरान (मेसोपोटामिया) से इस सभ्यता के सम्बन्ध के प्रमाण है । कालीबंगा के प्रमुख पशु गाय, बैल, भैंस, बकरी, कुत्ता, ऊंट, सुअर आदि थे ।
  • कुत्ता कालीबंगा सभ्यता का प्रमुख पालतु जानवर था ।
  • कालीबंगा से अवतल चक्की/सालन पत्थर/सिलबट्टे मिले है, जो अनाज पीसने या मिलाने के काम आता था । इस प्रकार का पत्थर सर्वप्रथम अरनेस्ट मैके ने हड़प्पा से खोजा था ।
  • इस सभ्यता के नगर की समृद्धि का मुख्य स्रोत उनत व्यापार, वाणिज्य व कृषि था ।
  • कालीबंगा से हड़प्पा संस्कृति के अन्य केद्रों को अनाज, मणके तथा ताँबा भेजा जाता था । कालीबंगा को ताँबा संभवत: गणेश्वर क्षेत्र ( सीकर एवं झुंझुनूं) से प्राप्त होता था । ताँबे का प्रयोग अस्त्र-शस्त्र तथा दैनिक जीवन में उपयोग होने वाले उपकरण बर्तन एवं आभूषण बनाने में होता था ।
  • कालीबंगा में सोना, चाँदी, अर्द्धबहुमूल्य पत्थर, शंख आदि से आभूषणों का निर्माण किया जाता था । 
  • इनमें स्त्रियाँ कानों में कर्णफूल व बालियाँ पहनती थी,गले में मणकों का हार तथा हाथों में शंख, मिट्टी, ताँबे व काँसे से निर्मित चूडियाँ पहनती थी ।

कालीबंगा मे दाह सरकार

  • कालीबंगा के दुर्ग से 300 मीटर की दूरी पर उत्तर-पश्चिम में तथा बस्ती के दक्षिण में एक कब्रिस्तान भी मिला है ।
  • यहां के लोग मुख्यत: शव को दफनाते थे । कालीबंगा के कब्रिस्तान में प्रतीकात्मक शवाधान के अवशेष मिलते है । जैसे हडप्पा से आंशिक शवाधान , मोहनजोदडो से कलश : शवाधान उसी प्रकार कालीबंगा से प्रतीकात्मक शवाधान के अवशेष मिलते है ।
  • शव विसर्जन के 37 उदाहरण कालीबंगा से मिले है ।
  • कालीबंगा में अन्तयेष्टि के पूर्ण समाधि, आशिक समाधि, दाह संस्कार तीनों प्रकार मिलते है ।
  • कालीबंगा से तांबा, सैलखडी व मिट्टी की मोहरें मिली है । कालीबंगा सभ्यता से मिली मोहरों से लिपि का ज्ञान होता है । इस लिपि को सर्पिलाकार (बूस्ट्रोफेडन लिपि)/भाव चित्रात्मक (पिक्टोग्राफिक)/तृन्र्धव लिपि कहा जाता है ।
  • यहां की लिपी दांई से बाँई ओर लिखी जाती थी जो अभी तक पढी नहीं जा सकी है ।
  • लिपि के अधिकांश नमूने मोहरों से प्राप्त होते है ।
  • कालीबंगा व मोहनजोदडो से प्राप्त कुछ मोहरों पर पशुबलि के प्रमाण मिलते है ।
  • यहाँ से बेलनाकार मोहर, जो मेसोपोटामिया सभ्यता की है, मिली है
  • ईटों से निर्मित चबूतरे फर्श पर अलंकृत ईटों का प्रयोग तथा मिट्टी का पैमाना मिला है ।

कालीबंगा से मिली प्रमुख सामग्री 

  1. मिट्टी से निर्मित केक, 
  2. बैल की खंडित मूर्ति , 
  3. धीया तथा तामडे के मणके , 
  4. शंख की चूड़ी , 
  5. पक्की मिट्टी का खिलौना गाडी , 
  6. पहिए , 
  7. हड्डियों की वनी सलाइयाँ , 
  8. पत्थर के सिलबट्टे, 
  9. मिट्टी की गेंद,ताँबे का परशु, 
  10. मेसोपोटामिया की मोहर, 
  11. ऊँट की अस्थियाँ, 
  12. भग्न वेदिकाएं और शल्य चिकित्सा सम्बन्धी प्रमाण प्रात हुए है ।
  13. मकानों की दीवारों में दरारें होने के कारण यहाँ भूकम्प के अवशेष मिले है ।
नोट - कालीबंगा से मातृदेवी की कोई भी मूर्ति नहीं मिली है । सिंधुघाटी सभ्यता के स्थलों से नहरों द्वारा सिंचाई, नदी उपासना, मंदिर, सिंह, पन्ना व लोहे के अवशेष नहीं मिले है ।

राज्य सरकार द्वारा कालीबंगा में प्राप्त पुरावशेषों के संरक्षण हेतु यहाँ एक संग्रहालय की स्थापना 1983 ( आर्कियो लाॅजिकल सर्वे आँफ इंडिया के अनुसार ) में की गई व 1985-86 में यह सुचारू रूप से कार्य करने लगा ।
डी पी. अग्रवाल व रफीक मुगल ने घग्घर हकरा नदी क्षेत्र का सूखना कालीबंगा का नष्ट होने का कारण था ।
एस. आर. राव ने कालीबंगा के नष्ट होने का कारण बाढ को माना है । के. यू. आर. केनेडी ने कालीबंगा के नष्ट होने को प्राकृतिक आपदा या महामारी फैलना बताया है ।
कालीबंगा के पुरातात्विक अवशेषों की समानता रखने वाले दो स्थल सोंथी, बीकानेर ( कालीबंगा प्रथम ) तथा कोटदीजी, पाकिस्तान है ।

Friday, 17 January 2020

Rajasthan ki Prachin Sabhyata PDF - राजस्थान की प्राचीन सभ्यताएँ
Rajasthan ki Prachin Sabhyata PDF - राजस्थान की प्राचीन सभ्यताएँ के बारे में पूरी जानकारी आप को इस पोस्ट में मिल जाये गी 
Rajasthan ki Prachin Sabhyata PDF Download in Hindi - दोस्तों आज Rajgk आपके लिये Rajasthan GK in Hindi me Rajasthan ki Prachin Sabhyata PDF share कर रहे है, जो की General Knowledge (सामान्य ज्ञान) से सम्बंधित है. इस PDF Ebook में  Rajasthan ki Prachin Sabhyata का  सामान्य ज्ञान आपको पढने को मिलेगा.
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हड़प्पा सभ्यता/सिंधु घाटी सभ्यता के टीलों की और सर्वप्रथम 1826 ईं. में चार्ल्स मैसन ने ध्यान आकर्षित किया ।
हड़प्पा सभ्यता के टीलों से प्राप्त ईटों का प्रयोग 1856 ईं. में जॉन बर्टन व विलियम बर्टन ने लाहोर से कराची रेलवे लाइन बिछाने में किया ।
अलेवजेण्डर कनिंघम ने हड़प्पा के टीलों का सर्वेक्षण 1853 व 1856 ईं. में किया ।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की स्थापना सर्वप्रथम 1861 ईं. में अलेक्जेंडर कनिंघम द्वारा की गई । इसलिए इन्हें भारत में पुरातत्व का जनक कहा जाता है ।
राजस्थान में पुरातात्विक सर्वेक्षण कार्य सर्वप्रथम ( 1871 ईं. ) प्रारम्भ करने का श्रेय ए.सी.एल॰ कार्लाईल को दिया जाता है
लॉर्ड कर्जन के काल में 1902 ईं. में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग का पुर्नगठन किया गया । जॉन मार्शल ने इस विभाग में 1902 से 1928 ईं. तक महानिदेशक पद पर कार्य किया 
जॉन मार्शल के निर्देशन पर दयाराम साहनी के नेतृत्व में 1921 ईं. में हड़प्पा स्थल का सर्वप्रथम खोज की गई ।
विधिवत् रूप से सिंधु घाटी सभ्यता की घोषणा 1924 ई. में लंदन वीकली नामक समाचार पत्र में सर्वप्रथम जॉन मार्शल ने लंदन में की ।

स्वतंत्रता के बाद उत्खनित किया गया प्रथम स्थल रंगपुर था । जिसका उत्खनन 1952 ई. में रंगनाथ राय ने किया तथा रंगपुर की खोज स्वतंत्रता पूर्व ही 1933 ई में माधोस्वरूप वत्स ने की थी ।

कालीबंगा सभ्यता

  • स्थिति - हनुमानगढ़
  • इस स्थान की पहचान डॉ एल पी टैस्सीटोरी ने की थी
  • यह स्थल घग्घर (प्राचीन सरस्वती) नदी के किनारे पर स्थित है
  • खोजकर्ता - अमलानंद घोष 1952
  • कालीबंगा को हडप्पा सभ्यता की तृतीय राजधानी कहा जाता है
  • उत्खनन बी. बी. लाल व बी के. थापर 1961 में किया 
  • हड़प्या की दीनहीन बस्ती कालीबंगा को कहा जाता है
  • कालीबंगा का अर्थ काली चूड़ियाँ है
  • स्वतंत्रता के बाद भारत में खोजा गया प्रथम हड़प्पाई स्थल रोपड़ (पंजाब) -1950 ई है

 कालीबंगा से प्राप्त वस्तुऐं

  1. मिट्टी की बैलगाडी
  2. ताम्र वृषभ ( सांड) प्रतिमा ( राजस्थान में धातु प्रतिमा का प्राचीनतम उदाहरण)
  3. भूकप के साक्ष्य
  4. अग्नि वेदिकाऐ ( यज्ञकुंड)
  5. हल की लकीरें (प्राचीनतम जुते खेत )
  6. जाल पद्धति कृषि व्यवस्था (एक खेत में एक ही समय दो  दिशाओ में दो भिन्न फसलें )
  7. हड़प्पाई लिपि युक्त मृदमांड
  8. लकडी की नालियाँ
  9. शंख की चूडियाँ हाथी दांत की कंघी
  10. तौल के बाट
  11. कांस्य दर्पण
  12. ताम्र पिन
  13. ताम्र चाकू
  14. हड्डी की सलाईंया
  15. बेलनाकार मेसोपोटामियाई मुहर
  16. मकानों मे कच्ची ईटों का प्रयोग

गणेश्वर सभ्यता

  • स्थिति - नीमकाथाना (सीकर)
  • नदी - काँत्तली के पास 
  • समय 2800 ईसा पूर्व से 2200 ईसा पूर्व
  • खोज व उतखननकर्ता - आर सी. अग्रवाल

प्रसिद्ध

  • सबसे प्राचीन ताम्र-युगीन सभ्यता
  • सर्वाधिक शुद्ध ताम्र-उपकरण प्राप्त

अन्य नाम

  • ताम्र युगीन सभ्यताओं की जननी
  • पुरातत्त्व का पुष्कर

गणेश्वर सभ्यता से प्राप्त वस्तुऐं 

  1. 400 बाणाग्र
  2. 58 कुल्हाडियाँ
  3. 50 मछली पकडने के कांटे

आहड सभ्यता

  • स्थिति - उदयपुर
  • नदी - बनास बेडच
  • खोजकर्ता - अक्षयकीर्ति व्यास 1953
  • उत्खननकर्ता - H C सांकलिया, R C अग्रवाल

अन्य नाम

  • बनास संस्कृति
  • धूलकोट
  • ताम्रवती नगरी
  • यह सभ्यता सर्वाधिक मात्रा मे ताम्र उपकरणो के कारण प्रसिद्ध है

आहड सभ्यता प्राप्त वस्तुऐ

  • मकानों की नीवो में पत्थरों का प्रयोग
  • तांबा गलाने की भट्टियाँ
  • कपड़े की छपाई हेतु लकडी के बने ठप्पे
  • ईरानी शैली के छोटे हत्थेदार बर्तन
  • हड्डी का चाकू
  • सिर खुजलाने का यंत्र
  • मिट्टी का तवा
  • सुराही
  • एक मकान में 7 चूल्हे एक पंक्ति में
  • टेराकोटा निर्मित 2 स्त्री धड़

बैराठ सभ्यता

  • स्थिति - जयपुर
  • नदी - बाणगंगा
  • खोज - दयाराम साहनी, सुंदर राजन, ए. घोष, के. एन.दीक्षित
  • अशोक का भाब्रू शिलालेख विशेषता राजस्थान में बौद्ध संस्कृति का प्रमुख केन्द्र बुद्ध प्रतिमा युक्त स्वर्ण मंजूषा
  • हूण आक्रमणों का साक्षी
  • सूती वस्त्र अवशेष इण्डोग्रीक नरेश मिनाण्डर से संबधित क्षेत्र
  • नाचते पक्षी की मृण्मूर्ति छठी शताब्दी ई पू. में मत्स्य महाजनपद की राजधानी
  • ह्वेसांग ने बैराठ की यात्रा करके 'पारयात्र' नाम प्रदान किया ।

गिलुण्ड सभ्यता

  • गिलुण्ड सभ्यता राजसमंद जिले में बनास नदी के तट पर स्थित है ।
  • गिलुण्ड सभ्यता ग्रामीण संस्कृति थी तथा बनास व आहड़ संस्कृति का महत्वपूर्ण स्थल है । इसलिए इसे ताम्रयुगीन सभ्यता कहते है ।
  • गिलुण्ड सभ्यता का उत्खनन 1957 - 58 ईं. में ब्रजवासी लाल द्वारा किया गया ।
  • गिलुण्ड सभ्यता से 100×80 आकार के विशाल भवनों के अवशेष मिले है ।
  • गिलुण्ड सभ्यता से लाल व काले मृदभाण्ड संस्कृति के अवशेष भी प्राप्त हुए है ।
  • गिलुण्ड सभ्यता से मिले मृदंभाण्डो पर सफेद व काले रंग से चित्रित चिकतेदार हरिण उत्कीर्ण पाये गये है 

बालाथल सभ्यता

  • बालाथल सभ्यता उदयपुर नगर से 42 किमी दक्षिण-पूर्व में वल्लभनगर तहसील उदयपुर में स्थित है । बालाथल ग्राम के पूर्वी छोर पर पाँच एकड में फैला एक टीला है जो बेडच नदी के किनारे स्थित है।
  • इस सभ्यता की खोज 1962-63 मे हुई तथा उत्खनन वी एन मिश्र के नेतृत्व मे मार्च 1993 ईं० में डॉ वी एस शिंदे डा आर के मोहन्ते तथा डॉ॰ ललित पाण्डेय के द्वारा की गई ।
  • बालाथल के उत्खनन में 22 परतों की पहचान की गई है प्रथम चार स्तर ऐतिहासिक युगीन भण्डार है तथा शेष ताम्र-पाषाणयुगीन भण्डार है
  • बालाथल की ताम्र पाषाणयुगीन सभ्यता के मध्य भाग का समय 2350 ई पू के आसपास का माना जाता है ।

ओझियाना सभ्यता

  • भीलवाड़ा के बदनोर के पास ओझियाना सभ्यता कोठारी नदी पर स्थित है । यह सभ्यता आहड़ संस्कृति या बनास संस्कृति का ताम्रपाषाणिक स्थल है ।
  • ओझियाना सभ्यता का उस्खनन 2000 ईं. में वी आर. मीणा व आलोक त्रिपाठी के नेतृत्व में किया गया ।
  • ओझियाना सभ्यता के उरुखनन के दौरान पुरातात्विक सामग्री के आधार पर इस सभ्यता को तीन चरणों में बाँटा जा सकता है
  1. कृषक 
  2. भवन निर्माण के आधार 
  3. मृदभांड को पकाने की विधि के आधार पर ।
  • ओझियाना सभ्यता से सफेद बैल की मृण मूर्तियों को ओझियाना बुल्स नाम दिया गया है ।
  • ओझियाना सभ्यता का कालखण्ड 2000 ईं पू॰ से 1500 ई पू के लगभग माना जाता है ।

बागौर सभ्यता

  • बागौर सभ्यता भीलवाड़ा में कोठारी नदी के किनारे स्थित है ।
  • इस सभ्यता का उत्खनन कार्य 1967-69 ईं. में वी एन. मिश्र तथा डॉ. एल. एस. लैशनि (जर्मनी ) के निर्देशन में संयुक्त रूप से किया गया ।
  • बागौर सभ्यता से प्रागैतिहासिक कालीन भारत के सर्वाधिक प्राचीन पशुपालन के अवशेष मिलते है ।
  • बागौर से 14 प्रकार के सर्वाधिक कृषि किये जाने के अवशेष मिले है ।
  • यहां से प्राप्त प्रस्तर उपकरण अभी भी सुन्दर अवस्था में मौजूद है तथा पर्याप्त मात्रा में है, इसलिए इसे आदिम संस्कृति का सग्रहालय भी कहते है ।
  • यहां पर भारत का सबसे सम्पन्न पाषाणीय सभ्यता स्थल स्थित है । बागौर में ज्यादातर पत्थर के उपकरण मिले है ।
  • हस्त व कुठार इस सभ्यता के लोगों के प्रमुख हथियार थे ।
  • यहाँ के लोग स्वास्तिक के चिह्न का प्रयोग करते थे तथा यहाँ से मछली मारने, शिकार करने ,चमडा सिलने व छेद निकालने के औजार प्राप्त हुए है ।
  • यहां पर हाथ व कान के आभूषण कांच के बने हुए मिले है ।

नगरी सभ्यता

  • नगरी सभ्यता स्थल चित्तौड़गढ में बेड़च नदी के किनारे स्थित है । नगरी शिवी जनपद की राजधानी थी, जिसे प्राचीनकाल में मध्यमिका या मेदपाट कहा जाता था ।
  • नगरी स्थल से 1887 ई में वीर विनोद के रचयिता कवि राजा श्यामलदास ने घोसुण्डी के शिलालेख व हाथी बरकला के शिलालेखों की खोज की थी ।
  • नगरी सभ्यता स्थल का उत्खनन 1904 ईं. में डी. आर. भंडारकर व 1962-63 ईं. में केन्दीय पुरातत्व विभाग द्वारा किया गया । नगरी सभ्यता के उत्खनन के दौरान शिवी जनपद के सिक्के मिले है ।
  • नगरी सभ्यता से चार चक्राकार कुएँ ( Ring wells ) मिले हैं । नगरी सभ्यता में गुप्तकालीन कला के अवशेष मिले है ।

नोह सभ्यता 

  • नोह सभ्यता भरतपुर जिल में रूपारेल नदी के किनारे पर स्थित हैं ।
  • नोह सभ्यता का उत्खनन 1963-67 ईं. के बीच राजस्थान पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के रत्तन चंद्र अग्रवाल व केलिफोर्निया विश्वविद्यालय के डॉ. डेविडसन के संयुक्त निर्देशन में किया गया ।
  • नोह सभ्यता के उत्खनन में पाँच सांस्कृतिक युगों के अवशेष मिलते है । नोह सभ्यता में महाभारत काल से लेकर शक, कुषाणकालीन व मौर्यकालीन अवशेष प्राप्त हुए है । 
  • मृदभांड PGW चित्रित धूसर /गेरू रंग के व इससे पूर्व के (RBC) लाल व काले मृदभांड मिले है । नोह सभ्यता में पक्षी चित्रित इटे मिली है । नोह सभ्यता से दूसरी शताब्दी ईं .पू. की विशालकाय 1.5 मीटर ऊंची यक्ष की मूर्ति मिली है, जो शक कालीन है । इस मूर्ति को जोख बाबा की मूर्ति भी कहते है ।

चन्द्रावती सभ्यता, सिरोही

  • चन्द्ररवती सभ्यता सिरोही जिले के माउंट आबू के निकट खोजी गई है । यह स्थल 11वीं शताब्दी में परमारों के राज्य की राजधानी रही थी ।
  • चंद्रावती से विकास के तीन स्तर प्राप्त हुए है, इनमें पहला छठी से आठवीं सदी का, दूसरा नोवीं से दसवीं सदी का और तीसरा ग्यारहवीं से पन्दहवीं सदी का ।
  • चंद्रावती सभ्यता के उत्खनन के दौरान गरूड़ासन्न विष्णु की प्रतिमा मिली है, जो दुनिया में अपने प्रकार की इकलौती प्रतिमा है ।
  • चंद्रावती के बारे में कहा जाता है कि इनके पत्थरों को बजाने पर उनमें से जो आवाजें होती है । वह यहाँ की आरती है ।
  • चंद्रावती विशाल मंदिरों का शहर भी कहा जाता है ।
  • कर्नल टॉड ने इस नगरी को देखा था तथा मैडम विलियम हंटर ब्लेयर ने चंद्रावती में अपनी यात्रा के दौरान खींचे विभिन्न चित्रों को कर्नल टॉड की पुस्तक ट्रेवल इन वेस्टर्न इंडिया के लिए उपलब्ध करवाया । इसलिए कर्नल जेम्स टॉड ने अपने यात्रा वृतांत ट्रेवल्स इन वेस्टर्न इंडिया को मैडम विलियम हंटर ब्लेयर को समर्पित किया
  • जिसमें चन्दावती की भव्य नगरी का उल्लेख किया है ।

नालियासट सभ्यता

  • यह सभ्यता सांभर ( जयपुर ) में स्थित है । यहाँ पर चौहान युग से पूर्व की जानकारी मिलती है । नालियासर में प्रतिहार कालीन मंदिर के अवशेष मिले है ।

जोधपुरा सभ्यता

  • यह सभ्यता जयपुर में स्थित है ।
  • जोधपुरा में शुंग व कुषाण कालीन सभ्यता के अवशेष मिले है । जोधपुरा में डिश आन स्टैण्ड भी मिला है ।
  • जोधपुरा में लौहा प्राप्त करने की भाट्टियां मिली है ।

आर्य सभ्यता

  • इस सभ्यता की खोज श्रीगंगानगर के अनुपगढ एवं तरखान वाला डैरा नामक स्थान पर की गई ।

सोंथी सभ्यता

  • वह सभ्यता बीकानेर में स्थित है । इस सभ्यता की खोज 1953 ईं. में ए॰घोष के द्वारा की गई इस सभ्यता को कालीबंगा प्रथम के नाम से भी जाना जाता है ।

ओला सभ्यता

  • यह सभ्यता जैसलमेर में स्थित है ।
  • यहाँ पर पाषाणयुगीन कुल्हाडी मिली है ।

तिलवाड़ा सभ्यता

  • यह सभ्यता बाडमेर में स्थित है । यह सभ्यता स्थल लूणी नदी के किनारे स्थित है । यहाँ पर पशुपालन सम्बन्धी प्राचीनतम साक्ष्य मिले है ।

भीनमाल सभ्यता

  • यह सभ्यता स्थल जालौर में स्थित है । यहाँ पर मृदपात्रों पर रोमन एम्फोरा के अवशेष मिले है ।

ईसवाल सभ्यता

  • यह सभ्यता उदयपुर में स्थित है । ईसवाल में लौहकालीन सभ्यता के अवशेष मिले है ।

जहाजपुर सभ्यता भीलवाड़ा

  • यहाँ महाभारत कालीन अवशेष मिले है । 

तिपटिया सभ्यता

  • यह सभ्यता कोटा में स्थित है । कोटा के दर्रा वन्य जीव अभ्यारण्य में यह स्थल स्थित है ।
  • यहाँ पर प्रागैतिहासिक काल के शैल चित्र मिले है ।

कोटड़ा सभ्यता

  • यह सभ्यता स्थल झालावाड में स्थित है ।
  • यहाँ पर खुदाई में दीपक शोध संस्थान मिले है ।

आलनियाँ सभ्यता

  • आलनियाँ सभ्यता वर्तमान में कोटा जिले में स्थित है
  • राजस्थान में आलनियाँ के प्रागैतिहासिक शैलचित्रों की खोज डॉ जगतनारायण ने की ।

ढंढीकर सभ्यता

  • यह सभ्यता स्थल अलवर में स्थित है । इस सभ्यता में पाषागाकालीन शैल चित्र मिले है

गुराटरा सभ्यता

  • गुरारा सभ्यता सीकर में स्थित है । यहाँ पर 2744 चांदी क्रं पंचमार्क सिक्के मिले है ।

सुजारी सभ्यता (झुंझुनू)

  • यह कांतली नदी के किनारे स्थित है । यहाँ से एक लोहे का प्याला प्राप्त हुआ है ।

रंगमहल सभ्यता

  • यह सभ्यता हनुमानगढ में स्थित है ।
  • रंगमहल सभ्यता घग्घर नदी के किनारे स्थित है ।
  • 1952 ईं. में रंगमहल का उत्खनन स्वीडीश एक्सपीडिशन दल के नेतृत्व में डॉ. हन्नारिड़ने किया ।
  • यहाँ से हड़प्पा सभ्यता व कुषाण कालीन तथा पूर्व गुप्तकाल के अवशेष मिलते है । जो प्रथम शताब्दी ईसापूर्व से 300 ई. तक के है । कनिष्क प्रथम व कनिष्क तृतीय की मुद्रा व पंचमार्क सिक्के मिले है । रंगमहल में 105 तांबे के सिक्के मिले है ।
  • मृदभांड घंटाकार व टोंटीदार घड़े ( लाल व गुलाबी रंग के ) मिले है ।
  • यहाँ पर मिली मूर्तियाँ गंधार शैली की प्राप्त होती है ।
  • रंगमहल में गुरू-शिष्य की मूर्तियां मिली है ।

रेढ़ सभ्यता

  • रेढ़ सभ्यता ढील नदी के किनारे, निवाई तहसील , टोंक में स्थित है ।
  • उत्खनन 1938-40 ईस्वी के एम. पुरी ( केदारनाधपुरी ) ।
  • यहां पर लोह सामग्री का विशाल भंडार मिला है ।
  • रेढ़ को प्राचीन भारत का टाटा नगर के उपनाम से जाना जाता है  एशिया में सिक्कों का सबसे बड़ा भंडार यही पर मिला है ।
  • रेढ़ में पूर्व गुप्तकालीन सभ्यता के अवशेष मिले है ।

नगर सभ्यता

  • नगर सभ्यता टोंक के उणियारा कस्बे में स्थित है । उणियारा को प्राचीन काल में मालव नगर के नाम से जाना जाता था ।
  • यहाँ पर मालव व आहत मुद्रा मिली है ।

गरड़दा सभ्यता

  • यह सभ्यता बुंदी में स्थित है ।
  • गरड़दा छाजा नदी के किनारे स्थित है ।
  • गरड़दा में पहली बर्ड राइडर रॉक पेंटिंग ( शैल चित्र ) मिली है ।
  • पक्षी पर सवार व्यक्ति का चित्र भी मिला है 

Rajasthan ki Prachin Sabhyata PDF Details

Name of The Book : *Rajasthan ke Durg PDF in Hindi*
Document Format: PDF
Total Pages: 8
PDF Quality: Normal
PDF Size: 2 MB
Book Credit: S. R. Khand

Rajasthan ki Prachin Sabhyata Download pdf 




Tuesday, 14 January 2020

Indian Constitution Articles in Hindi

सारे अनुच्छेद एक साथ Indian Constitution Articles:-

 Indian Constitution Articles
 Indian Constitution Articles

*अनुच्छेद 1* :- संघ कानाम और राज्य क्षेत्र
*अनुच्छेद 2* :- नए राज्यों का प्रवेश या स्थापना
*अनुच्छेद 3* :- राज्य का निर्माण तथा सीमाओं या नामों मे परिवर्तन
*अनुच्छेद 4* :- पहली अनुसूचित व चौथी अनुसूची के संशोधन तथा दो और तीन के अधीन बनाई गई विधियां
*अच्नुछेद 5* :- संविधान के प्रारंभ पर नागरिकता
*अनुच्छेद 6* :- भारत आने वाले व्यक्तियों को नागरिकता
*अनुच्छेद 7* :-पाकिस्तान जाने वालों को नागरिकता
*अनुच्छेद 8* :- भारत के बाहर रहने वाले व्यक्तियों का नागरिकता
*अनुच्छेद 9* :- विदेशी राज्य की नागरिकता लेने पर नागरिकता का ना होना
*अनुच्छेद 10* :- नागरिकता के अधिकारों का बना रहना
*अनुच्छेद 11* :- संसद द्वारा नागरिकता के लिए कानून का विनियमन
*अनुच्छेद 12* :- राज्य की परिभाषा
*अनुच्छेद 13* :- मूल अधिकारों को असंगत या अल्पीकरण करने वाली विधियां
*अनुच्छेद 14* :- विधि के समक्ष समानता
*अनुच्छेद 15* :- धर्म जाति लिंग पर भेद का प्रतिशेध
*अनुच्छेद 16* :- लोक नियोजन में अवसर की समानता
*अनुच्छेद 17* :- अस्पृश्यता का अंत
*अनुच्छेद 18* :- उपाधीयों का अंत
*अनुच्छेद 19* :- वाक् की स्वतंत्रता
*अनुच्छेद 20* :- अपराधों के दोष सिद्धि के संबंध में संरक्षण
*अनुच्छेद 21* :-प्राण और दैहिक स्वतंत्रता
*अनुच्छेद 21 क* :- 6 से 14 वर्ष के बच्चों को शिक्षा का अधिकार
*अनुच्छेद 22* :- कुछ दशाओं में गिरफ्तारी से सरंक्षण
*अनुच्छेद 23* :- मानव के दुर्व्यापार और बाल आश्रम
*अनुच्छेद 24* :- कारखानों में बालक का नियोजन का प्रतिशत
*अनुच्छेद 25* :- धर्म का आचरण और प्रचार की स्वतंत्रता
*अनुच्छेद 26* :-धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता
*अनुच्छेद 29* :- अल्पसंख्यक वर्गों के हितों का संरक्षण
*अनुच्छेद 30* :- शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन करने का अल्पसंख्यक वर्गों का अधिकार
*अनुच्छेद 32* :- अधिकारों को प्रवर्तित कराने के लिए उपचार
*अनुच्छेद 36* :- परिभाषा
*अनुच्छेद 40* :- ग्राम पंचायतों का संगठन
*अनुच्छेद 48* :- कृषि और पशुपालन संगठन
*अनुच्छेद 48क* :- पर्यावरण वन तथा वन्य जीवों की रक्षा
*अनुच्छेद 49:-* राष्ट्रीय स्मारक स्थानों और वस्तुओं का संरक्षण
*अनुछेद. 50* :- कार्यपालिका से न्यायपालिका का प्रथक्करण
*अनुच्छेद 51* :- अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा
*अनुच्छेद 51क* :- मूल कर्तव्य
*अनुच्छेद 52* :- भारत का राष्ट्रपति
*अनुच्छेद 53* :- संघ की कार्यपालिका शक्ति
*अनुच्छेद 54* :- राष्ट्रपति का निर्वाचन
*अनुच्छेद 55* :- राष्ट्रपति के निर्वाचन की रीती
*अनुच्छेद 56* :- राष्ट्रपति की पदावधि
*अनुच्छेद 57* :- पुनर्निर्वाचन के लिए पात्रता
*अनुच्छेद 58* :- राष्ट्रपति निर्वाचित होने के लिए आहर्ताए
*अनुच्छेद 59* :- राष्ट्रपति पद के लिए शर्ते
*अनुच्छेद 60* :- राष्ट्रपति की शपथ
*अनुच्छेद 61* :- राष्ट्रपति पर महाभियोग चलाने की प्रक्रिया
*अनुच्छेद 62* :- राष्ट्रपति पद पर व्यक्ति को भरने के लिए निर्वाचन का समय और रीतियां
*अनुच्छेद 63* :- भारत का उपराष्ट्रपति
*अनुच्छेद 64* :- उपराष्ट्रपति का राज्यसभा का पदेन सभापति होना
*अनुच्छेद 65* :- राष्ट्रपति के पद की रिक्त पर उप राष्ट्रपति के कार्य
*अनुच्छेद 66* :- उप-राष्ट्रपति का निर्वाचन
*अनुच्छेद 67* :- उपराष्ट्रपति की पदावधि
*अनुच्छेद 68* :- उप राष्ट्रपति के पद की रिक्त पद भरने के लिए निर्वाचन
*अनुच्छेद69* :- उप राष्ट्रपति द्वारा शपथ
*अनुच्छेद 70* :- अन्य आकस्मिकता में राष्ट्रपति के कर्तव्यों का निर्वहन
*अनुच्छेद 71*. :- राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के निर्वाचन संबंधित विषय
*अनुच्छेद 72* :-क्षमादान की शक्ति
*अनुच्छेद 73* :- संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार
*अनुच्छेद 74* :- राष्ट्रपति को सलाह देने के लिए मंत्रिपरिषद
*अनुच्छेद 75* :- मंत्रियों के बारे में उपबंध
*अनुच्छेद 76* :- भारत का महान्यायवादी
*अनुच्छेद 77* :- भारत सरकार के कार्य का संचालन
*अनुच्छेद 78* :- राष्ट्रपति को जानकारी देने के प्रधानमंत्री के कर्तव्य
*अनुच्छेद 79* :- संसद का गठन
*अनुच्छेद 80* :- राज्य सभा की सरंचना
*अनुच्छेद 81* :- लोकसभा की संरचना
*अनुच्छेद 83* :- संसद के सदनो की अवधि
*अनुच्छेद 84* :-संसद के सदस्यों के लिए अहर्ता
*अनुच्छेद 85* :- संसद का सत्र सत्रावसान और विघटन
*अनुच्छेद 87* :- राष्ट्रपति का विशेष अभी भाषण
*अनुच्छेद 88* :- सदनों के बारे में मंत्रियों और महानयायवादी अधिकार
*अनुच्छेद 89* :-राज्यसभा का सभापति और उपसभापति
*अनुच्छेद 90* :- उपसभापति का पद रिक्त होना या पद हटाया जाना
*अनुच्छेद 91* :-सभापति के कर्तव्यों का पालन और शक्ति
*अनुच्छेद 92* :- सभापति या उपसभापति को पद से हटाने का संकल्प विचाराधीन हो तब उसका पीठासीन ना होना
*अनुच्छेद 93* :- लोकसभा का अध्यक्ष और उपाध्यक्ष
*अनुचित 94* :- अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का पद रिक्त होना
*अनुच्छेद 95* :- अध्यक्ष में कर्तव्य एवं शक्तियां
*अनुच्छेद 96* :- अध्यक्ष उपाध्यक्ष को पद से हटाने का संकल्प हो तब उसका पीठासीन ना होना
*अनुच्छेद 97* :- सभापति उपसभापति तथा अध्यक्ष,उपाध्यक्ष के वेतन और भत्ते
*अनुच्छेद 98* :- संसद का सविचालय
*अनुच्छेद 99* :- सदस्य द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान
*अनुच्छेद 100* - संसाधनों में मतदान रिक्तियां के होते हुए भी सदनों के कार्य करने की शक्ति और गणपूर्ति
*अनुच्छेद 108* :- कुछ दशाओं में दोनों सदनों की संयुक्त बैठक
*अनुत्छेद 109* :- धन विधेयक के संबंध में विशेष प्रक्रिया
*अनुच्छेद 110* :- धन विधायक की परिभाषा
*अनुच्छेद 111* :- विधेयकों पर अनुमति
*अनुच्छेद 112* :- वार्षिक वित्तीय विवरण
*अनुच्छेद 118* :- प्रक्रिया के नियम
*अनुच्छेद 120* :- संसद में प्रयोग की जाने वाली भाषा
*अनुच्छेद 123* :- संसद विश्रांति काल में राष्ट्रपति की अध्यादेश शक्ति
*अनुच्छेद 124* :- उच्चतम न्यायालय की स्थापना और गठन
*अनुच्छेद 125* :- न्यायाधीशों का वेतन
*अनुच्छेद 126* :- कार्य कार्य मुख्य न्याय मूर्ति की नियुक्ति
*अनुच्छेद 127* :- तदर्थ न्यायमूर्तियों की नियुक्ति
*अनुच्छेद 128* :- सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की उपस्थिति
*अनुच्छेद 129* :- उच्चतम न्यायालय का अभिलेख नयायालय होना
*अनुच्छेद 130* :- उच्चतम न्यायालय का स्थान
*अनुच्छेद 131* :- उच्चतम न्यायालय की आरंभिक अधिकारिता
*अनुच्छेद 137* :- निर्णय एवं आदेशों का पुनर्विलोकन
*अनुच्छेद 143* :- उच्चतम न्यायालय से परामर्श करने की राष्ट्रपति की शक्ति
*अनुच्छेद144* :-सिविल एवं न्यायिक पदाधिकारियों द्वारा उच्चतम न्यायालय की सहायता
*अनुच्छेद 148* :- भारत का नियंत्रक महालेखा परीक्षक
*अनुच्छेद 149* :- नियंत्रक महालेखा परीक्षक के कर्तव्य शक्तिया
*अनुच्छेद 150* :- संघ के राज्यों के लेखन का प्रारूप
*अनुच्छेद 153* :- राज्यों के राज्यपाल
*अनुच्छेद 154* :- राज्य की कार्यपालिका शक्ति
*अनुच्छेद 155* :- राज्यपाल की नियुक्ति
*अनुच्छेद 156* :- राज्यपाल की पदावधि
*अनुच्छेद 157* :- राज्यपाल नियुक्त होने की अर्हताएँ
*अनुच्छेद 158* :- राज्यपाल के पद के लिए शर्तें
*अनुच्छेद 159* :- राज्यपाल द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान
*अनुच्छेद 163* :- राज्यपाल को सलाह देने के लिए मंत्री परिषद
*अनुच्छेद 164* :- मंत्रियों के बारे में अन्य उपबंध
*अनुच्छेद 165* :- राज्य का महाधिवक्ता
*अनुच्छेद 166* :- राज्य सरकार का संचालन
*अनुच्छेद 167* :- राज्यपाल को जानकारी देने के संबंध में मुख्यमंत्री के कर्तव्य
*अनुच्छेद 168* :- राज्य के विधान मंडल का गठन
*अनुच्छेद 170* :- विधानसभाओं की संरचना
*अनुच्छेद 171* :- विधान परिषद की संरचना
*अनुच्छेद 172* :- राज्यों के विधानमंडल कि अवधी
*अनुच्छेद 176* :- राज्यपाल का विशेष अभिभाषण
*अनुच्छेद 177* सदनों के बारे में मंत्रियों और महाधिवक्ता के अधिकार
*अनुच्छेद 178* :- विधानसभा का अध्यक्ष और उपाध्यक्ष
*अनुच्छेद 179* :- अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का पद रिक्त होना या पद से हटाया जाना
*अनुच्छेद 180* :- अध्यक्ष के पदों के कार्य व शक्ति
*अनुच्छेद 181* :- अध्यक्ष उपाध्यक्ष को पद से हटाने का कोई संकल्प पारित होने पर उसका पिठासिन ना होना
*अनुच्छेद 182* :- विधान परिषद का सभापति और उपसभापति
*अनुच्छेद 183* :- सभापति और उपासभापति का पद रिक्त होना पद त्याग या पद से हटाया जाना
*अनुच्छेद 184* :- सभापति के पद के कर्तव्यों का पालन व शक्ति
*अनुच्छेद 185* :- संभापति उपसभापति को पद से हटाए जाने का संकल्प विचाराधीन होने पर उसका पीठासीन ना होना
*अनुच्छेद 186* :- अध्यक्ष उपाध्यक्ष सभापति और उपसभापति के वेतन और भत्ते
*अनुच्छेद 187* :- राज्य के विधान मंडल का सविचाल.
*अनुच्छेद 188* :- सदस्यों द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान
*अनुच्छेद 189* :- सदनों में मतदान रिक्तियां होते हुए भी साधनों का कार्य करने की शक्ति और गणपूर्ति
*अनुच्छेद 199* :- धन विदेश की परिभाषा
*अनुच्छेद 200* :- विधायकों पर अनुमति
*अनुच्छेद 202* :- वार्षिक वित्तीय विवरण
*अनुच्छेद 213* :- विधानमंडल में अध्यादेश सत्यापित करने के राज्यपाल की शक्ति
*अनुच्छेद 214* :- राज्यों के लिए उच्च न्यायालय
*अनुच्छेद 215* :- उच्च न्यायालयों का अभिलेख न्यायालय होना
*अनुच्छेद 216* :- उच्च न्यायालय का गठन
*अनुच्छेद 217* :- उच्च न्यायालय न्यायाधीश की नियुक्ति पद्धति शर्तें
*अनुच्छेद 221* :- न्यायाधीशों का वेतन
*अनुच्छेद 222* :- एक न्यायालय से दूसरे न्यायालय में न्यायाधीशों का अंतरण
*अनुच्छेद 223* :- कार्यकारी मुख्य न्याय मूर्ति के नियुक्ति
*अनुच्छेद 224* :- अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति
*अनुच्छेद 226* :- कुछ रिट निकालने के लिए उच्च न्यायालय की शक्ति
*अनुच्छेद 231* :- दो या अधिक राज्यों के लिए एक ही उच्च न्यायालय की स्थापना
*अनुच्छेद 233* :- जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति
*अनुच्छेद 241* :- संघ राज्य क्षेत्र के लिए उच्च-न्यायालय
*अनुच्छेद 243* :- पंचायत नगर पालिकाएं एवं सहकारी समितियां
*अनुच्छेद 244* :- अनुसूचित क्षेत्रो व जनजाति क्षेत्रों का प्रशासन
*अनुच्छेद 248* :- अवशिष्ट विधाई शक्तियां
*अनुच्छेद 252* :- दो या अधिक राज्य के लिए सहमति से विधि बनाने की संसद की शक्ति
*अनुच्छेद 254* :- संसद द्वारा बनाई गई विधियों और राज्यों के विधान मंडल द्वारा बनाए गए विधियों में असंगति
*अनुच्छेद 256* :- राज्यों की और संघ की बाध्यता
*अनुच्छेद 257* :- कुछ दशाओं में राज्यों पर संघ का नियंत्रण
*अनुच्छेद 262* :- अंतर्राज्यक नदियों या नदी दूनों के जल संबंधी विवादों का न्याय निर्णय
*अनुच्छेद 263* :- अंतर्राज्यीय विकास परिषद का गठन
*अनुच्छेद 266* :- संचित निधी
*अनुच्छेद 267* :- आकस्मिकता निधि
*अनुच्छेद 269* :- संघ द्वारा उद्ग्रहित और संग्रहित किंतु राज्यों को सौपे जाने वाले कर
*अनुच्छेद 270* :- संघ द्वारा इकट्ठे किए कर संघ और राज्यों के बीच वितरित किए जाने वाले कर
*अनुच्छेद 280* :- वित्त आयोग
*अनुच्छेद 281* :- वित्त आयोग की सिफारिशे
*अनुच्छेद 292* :- भारत सरकार द्वारा उधार लेना
*अनुच्छेद 293* :- राज्य द्वारा उधार लेना
&अनुच्छेद 300 क* :- संपत्ति का अधिकार
*अनुच्छेद 301* :- व्यापार वाणिज्य और समागम की स्वतंत्रता
*अनुच्छेद 309* :- राज्य की सेवा करने वाले व्यक्तियों की भर्ती और सेवा की शर्तों
*अनुच्छेद 310* :- संघ या राज्य की सेवा करने वाले व्यक्तियों की पदावधि
*अनुच्छेद 313* :- संक्रमण कालीन उपबंध
*अनुच्छेद 315* :- संघ राज्य के लिए लोक सेवा आयोग
*अनुच्छेद 316* :- सदस्यों की नियुक्ति एवं पदावधि
*अनुच्छेद 317* :- लोक सेवा आयोग के किसी सदस्य को हटाया जाना या निलंबित किया जाना
*अनुच्छेद 320* :- लोकसेवा आयोग के कृत्य
*अनुच्छेद 323 क* :- प्रशासनिक अधिकरण
*अनुच्छेद 323 ख* :- अन्य विषयों के लिए अधिकरण
*अनुच्छेद 324* :- निर्वाचनो के अधिक्षण निर्देशन और नियंत्रण का निर्वाचन आयोग में निहित होना
*अनुच्छेद 329* :- निर्वाचन संबंधी मामलों में न्यायालय के हस्तक्षेप का वर्णन
*अनुछेद 330* :- लोक सभा में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिये स्थानो का आरणण
*अनुच्छेद 331* :- लोक सभा में आंग्ल भारतीय समुदाय का प्रतिनिधित्व
*अनुच्छेद 332* :- राज्य के विधान सभा में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थानों का आरक्षण
*अनुच्छेद 333* :- राज्य की विधानसभा में आंग्ल भारतीय समुदाय का प्रतिनिधित्व
*अनुच्छेद 343* :- संघ की परिभाषा
*अनुच्छेद 344* :- राजभाषा के संबंध में आयोग और संसद की समिति
*अनुच्छेद 350 क* :- प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की सुविधाएं
*अनुच्छेद 351* :- हिंदी भाषा के विकास के लिए निर्देश
*अनुच्छेद 352* :- आपात की उदघोषणा का प्रभाव
*अनुछेद 356* :- राज्य में संवैधानिक तंत्र के विफल हो जाने की दशा में उपबंध
*अनुच्छेद 360* :- वित्तीय आपात के बारे में उपबंध
*अनुच्छेद 368* :- सविधान का संशोधन करने की संसद की शक्ति और उसकी प्रक्रिया
*अनुच्छेद 377* :- भारत के नियंत्रक महालेखा परीक्षक के बारे में उपबंध
*अनुच्छेद 378* :- लोक सेवा आयोग के बारे

TOP 30 IMPORTANT NOTE


संविधान के किस भाग में अस्थायी संक्रमणकालीन और विशेष उपबन्धों के प्रावधान हैं? –
*भाग 21*
वर्तमान में भारतीय संविधान में कुल कितनी अनुसूचियां हैं? –
*12*
संसद का निम्न सदन एवं उच्च सदन है? –
*लोकसभा एवं राज्यसभा*
बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री थे? –
*डॉ. श्रीकृष्ण सिंह*
विधानपरिषद् का सदस्य होने के लिए कम-से-कम कितनी आयु सीमा होनी चाहिए? – *30 वर्ष*
किसी राज्य विधान सभा के सदस्यों की न्यूनतम संख्या कितनी हो सकती है? – *60*
अखिल भारतीय सेवा का गठन कर सकता है? – *संसद*
मतदाताओं के पंजीयन का उत्तरदायित्व किस पर है? – *निर्वाचन आयोग*
मूल संविधान में क्षेत्रीय महत्त्व के 66 विषय राज्य सूची में थे। अब उनकी संख्या कितनी है? – *61*
संयुक्त प्रवर समिति में कितने सदस्य होते हैं? – *45*
वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश के अतिरिक्त कितने न्यायाधीश का प्रावधान किया गया है? – *30*
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय कहाँ स्थित है? – *बिलासपुर*
राज्यपाल राज्य में किसका प्रतिनिधि होता है? – *राष्ट्रपति का*
भारतीय संविधान के किन अनुच्छेदों में राज्य के नीति निर्देशक तत्त्वों का उल्लेख है? – *अनुच्छेद 36-51*
राज्य पुनर्गठन अधिनियम कब पारित किया गया? – *1956 ई.*
भारतीय नागरिकता नहीं प्राप्त की जा सकती है? –
*भारतीय बैंक में धन जमा करके*
भारतीय जनता पार्टी का चुनाव चिन्ह क्या है? – *कमल*
मौलिक कर्तव्यों की अवहेलना करने वालों को? –
*दंड देने की व्यवस्था नहीं है*
संसद के दो क्रमिक अधिवेशनों के बीच अधिकतम कितने समयान्तराल की अनुमति है? – *6 माह*
भारत के राष्ट्रपति निर्वाचित होने के पात्र बनने के लिए किसी व्यक्ति की आयु पूर्ण होनी चाहिए? – *35 वर्ष*
राष्ट्रपति पद्धति में समस्त कार्यपालिका की शक्तियाँ किसमें निहित होती हैं? – *राष्ट्रपति में*
किस संवैधानिक संशोधन द्वारा अरुणाचल प्रदेश को राज्य का दर्जा प्रदान किया गया? – *55वाँ*
गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट-1935 किस पर आधारित था? –
*साइमन कमीशन*
भारतीय संविधान सभा की स्थापना कब हुई? –
*9 दिसम्बर, 1946*
अब तक भारत के संविधान की उद्देशिका में कितनी बार संशोधन किया जा चुका है? – *एक बार*
पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन कौन करता है? – *राष्ट्रपति*
विश्व का सबसे बड़ा, लिखित एवं सर्वाधिक व्यापक संविधान किस देश का है? – *भारत*
भारत की संघीय व्यवस्था किस देश की संघीय व्यवस्था से अधिक समानता रखती है? – *कनाडा*
किस राज्य के आरक्षण विधेयक को 9वीं अनुसूची में सम्मिलित किया गया है? – *तमिलनाडु*
भारतीय लोक प्रशासन संस्थान की स्थापना कब हुई? – *मार्च 1954*
*This article is important for your exams*

भारतीय संविधान की विशेषताएँ

IMPORTANTS  OF INDIAN CONSTITUENCY
● भारत का संविधान कैसा है—  *लिखित एंव विश्व का सबसे व्यापक संविधान *
● भारतीय संविधन का स्वरूप होता है—  *संरचना में संघात्मक *
● भारत में किस प्रकार का शासन व्यवस्था अपनाई गई है—
*ब्रिटिश संसदात्मक प्रणाली*
● भारतीय संविधान का अभिभावक कौन है—  *सर्वोच्च न्यायालय*
● भारत के संविधान में संघीय शब्द की जगह किन शब्दों को स्थान दिया गया है— *राज्यों का संघ *
● भारतीय संविधान में कितनी सूचियाँ हैं—  *12*
● भारतीय संविधान अपना अधिकार किससे प्राप्त करता है—
*भारतीय जनता से *
● भारत में वैद्य प्रभुसत्ता किस में निहित है—
*संविधान में *
● भारतीय संविधान की संरचना किस प्रकार की है—
*कुछ एकात्मक, कुछ कठोर *
● लिखित संविधान की अवधारणा ने कहाँ जन्म लिया— * फ्रांस *
● अध्यक्षात्मक शासन का उदय सर्वप्रथम कहाँ हुआ—
*संयुक्त राज्य अमेरिका*
● भारतीय संविधान में नागरिकों को कितने मूल अधिकार प्राप्त है—
* 6 *
● भारतीय संघीय व्यवस्था की प्रमुख विशेषता क्या है—
*संविधान की सर्वोच्चता*
● भारतीय संघवाद व्यवस्था की प्रमुख विशेषता क्या है—
*संविधान की सर्वोच्चता*
● भारतीय संघवाद को किसने सहकारी संघवाद कहा—
*जी. ऑस्टिन ने*
● भारत में प्रजातंत्र किस तथ्य पर आधरित है—  *जनता को सरकार चनने व बदलने का अधिकार है*

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*राजनीति विज्ञानं से सम्बंधित परीक्षा में पूछे गये (40) एेसे  प्रश्न-  जो  आगामी प्रतियोगिता परीक्षा जैसे*
भारतीय लोक प्रशासन संस्थान की स्थापना कब हुई? –
*मार्च 1954*
समवर्ती सूची में लिखे विषयों पर अधिनियम बनाने का अधिकार किसके पास है? –
*राज्य और संघ*
प्रथम राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा के समय देश के राष्ट्रपति कौन थे? –
*डॉ. एस. राधाकृष्णन*
42वें संशोधन द्वारा संविधान के किस अनुच्छेद में मौलिक कर्तव्यों को जोड़ा गया है? –
*अनुच्छेद-51 A*
वर्तमान में भारतीय संविधान के कुल कितने भाग है? –
*22*
संविधान लागू होने के पश्चात् निम्न में से कौन भारतीय संघ का एक आरक्षित राज्य था? –
*सिक्किम*
संविधान के किस भाग में भारत के नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लेख किया गया है? –
*भाग-3*
मौलिक अधिकार संविधान के किस भाग में वर्णित है? –
*भाग III*
राज्यसभा की बैठकों का सभापतित्व कौन करता है? –
*उपराष्ट्रपति*
कोई वित्तीय बिल प्रस्तावित हो सकता है? –
*केवल लोकसभा में*
भारत में किसकी स्वीकृति के बिना कोई भी सरकारी खर्चा नहीं किया जा सकता? –
*संसद*
मंत्रिपरिषद् में कितने स्तर के मंत्री होते हैं? –
*3*
आमतौर पर भारत के प्रधानमंत्री होते हैं? –
*लोकसभा का सदस्य*
भारत सरकार का प्रमुख विधि अधिकारी कौन है? –
*भारत के महान्यायवादी*
भारत के सर्वोच्च न्यायालय का एक न्यायाधीश कितनी उम्र तक अपने पद पर बना रह सकता है? –
*65 वर्ष*
किन राज्यों में साझा उच्च न्यायालय है? –
*महाराष्ट्र व गोवा*
राष्ट्रपति किसकी सलाह पर किसी राज्य के राज्यपाल की नियुक्ति करते है? –
*प्रधानमंत्री*
राज्य का मुख्यमंत्री किसके प्रति उत्तरदायी होता है? –
*विधान सभा*
राज्य विधानमंडल का ऊपरी सदन कौन-सा है? –
*विधान परिषद्*
उस संघ राज्य का नाम बताइए जहाँ निर्वाचित विधानसभा एवं मंत्रिपरिषद् है? –
*पुदुचेरी*
भारतीय संविधान में कितनी भाषाएँ क्षेत्रीय भाषाओं के रूप में मान्यता प्राप्त हैं? –
*22*
जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री की कार्य अवधि होती है? –
*छह वर्ष*
पंचायत समिति का गठन होता है? – *प्रखंड स्तर पर*
भारत में साम्यवाद आधारित दल है? –  *CPI*
वर्तमान समय में लोकसभा की 543 सीटों में से कितनी सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं? –
*84*
किस संवैधानिक संशोधन अधिनियम द्वारा गोवा को राज्य का दर्जा प्रदान किया गया? –
*56वाँ*
किसी क्षेत्र को अनुसूचित जाति और जनजाति क्षेत्र घोषित करने का अधिकार किसे है? –
*राष्ट्रपति*
स्थायी संसद भारत में कब तक अस्तित्व में रही है? –
*17 अप्रैल, 1952*
भारत के चौथे राष्ट्रपति थे? –
*वी. वी. गिरि*
उपराष्ट्रपति को उसके कार्यकाल की समाप्ति के पूर्व पद से हटाने का अधिकार किसको है? –
*संसद*
संसद का चुनाव लड़ने के लिए प्रत्याशी की न्यूनतम आयु कितनी होनी चाहिए? –
*25 वर्ष*
राज्यसभा द्वारा लोकसभा को धन विधेयक कितने समय में लौटा दिये जाने चाहिए? –
*14 दिन*
राजनीतिक शब्दावली में ‘शून्यकाल’ का अर्थ है? –
*प्रश्न-उत्तर सत्र*
इन्दिरा गाँधी दूसरी अवधि के लिए प्रधानमंत्री बनी? –
*1980 से 1984 तक*
मुख्य सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति कौन करता है? –
*राष्ट्रपति*
उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि करने की शक्ति किसके पास है? –
*संसद*
भारत में कुल कितने उच्च न्यायालय हैं? –
*24*
उपराज्यपाल की नियुक्ति कौन करता है? –
*राष्ट्रपति*
विधानपरिषद् के कितने सदस्य प्रत्येक दूसरे वर्ष अवकाश ग्रहण करते हैं? –
*1/3*
राजनीति और नीतियों से व्युत्पन्न शब्द ‘इन्द्रधनुषी गठबंधन’ शब्द किसने दिया? –
*पिट


Monday, 13 January 2020

Coins-Archaeological Sources - राजस्थान के इतिहास के पुरातात्विक स्त्रोत -सिक्के

राजस्थान मे प्रचलित सिक्के

rajasthan ke prachin sikke in hindi
Rajasthan ke Prachin Sikke

  • "bibliography of Indian coins" नामक ग्रंथ में भारतीय सिक्कों को सचित्र क्रमबद्ध वैज्ञानिक विवेचन उपलब्ध है ।
  • केव ने 1893 ईं . में  द करेंसीज आफ दी स्टेट्स आफ राजपूताना पुस्तक लिखी ।
  • सिक्कों के अध्ययन को न्यूमिसमेटिक्म कहा जाता है ।
  • सर्वप्रथम भारत में शासन करने वाली यूनानी शासकों के सिक्कों पर लेख एवं तिथियाँ उत्कीर्ण मिलती है ।
  • सर्वाधिक सिक्के उत्तरी मौर्यकाल में मिलते है ।
  • सर्वाधिक सोने के सिक्के गुप्तकाल में जारी किसे गये थे
  • कुषाणवंशी शासक विम कदफिसस ने सर्वप्रथम भारत मे सोने का सिक्का तैयार करवाया ।
  • कुषाणों के समय सर्वाधिक शुद्ध सोने के सिके प्रचलित थे ।
  • ब्रिटिश भारत का राजस्थान में सर्वाधिक प्राचीन चाँदी का सिक्का 'कलदार’ था ।
  • शेरशाह के सिक्कों मे' 180 ग्रेन को 'रुपया' नाम दिया गया । जो वर्तमान में प्रचलित है ।
  • राजस्थान में किसी राजवंश द्वारा जारी सिक्कों में सर्वप्रथम चौहानवंशीय सिक्कों का जिक्र हुआ है ।
  • इनमे वासुदेव का दम/विशोषक ( ताँबे ) , रूपक ( चांदी ) दीनार( सोने का सिक्का ) था ।
  • रंगमहल ( हनुमानगढ ) यहाँ पर कुषाण कालीन सिक्के मिले है जिन्हें 'मुरण्डा' कहा गया है ।
  • गुरारा सीकर जिले के इस गांव से 2744 पंचमार्क प्राप्त हुए है । इनमें से 61 सिक्कों पर ' थ्री मैन' अंकित है ।

रेड से प्राप्त सिक्के

  • रेड के उत्खनन से 3075 चाँदी के पंचमार्क सिक्के उपलब्ध हुए है जौ देश के उत्खनन में एक स्थान से प्राप्त सबसे बडी निधि मानी जाती है ।
  • इन सिक्कों को धरण या पण कहा जाता था ।
  • रेढ ( टोंक ) से ताँबे के सिक्के भी मिले है, जिन्हें गण मुद्राएं कहा जाता है ।
  • अपोलोडोट्स का सिक्का रैढ़ से प्राप्त हुआ है ।

आहत सिक्के

  • 1835 ईं. में जेम्स प्रिंसेप ने निर्माण शैली के आधार पर इन सिक्कों को पंचमार्क नाम दिया ।
  • ठप्पा मारकर बनाये जाने के कारण ये आहत सिक्के कहलाये । यूनानियों के आने से पूर्व भारत में आहत सिक्के प्रचलित थे । 
  • आहत सिक्के भारत के सबसे प्राचीन सिक्के माने जाते है ।

जयपुर राज्य के सिक्के

  • माधोसिंह के रूपये को 'हाली' सिक्का कहते थे ।
  • जयपुर में तांबे के सिक्के का प्रचलन 1760 ईं. से माना जाता है । इसे झाड़शाही पैसा कहते थे । 
  • झाड़शाही सिक्के जयपुर में कच्छवाहावंश द्वारा प्रचलित सिक्के थे । झांड़शाही एक बोली का भी प्रकार है । 
  • जयपुर की टकसाल का चिह्न छ: शाखाओं वाला झाड होने के कारण जयपुरी सिक्कों को झाड़शाही सिक्के कहा गया है ।
  • सवाई जयसिंह द्वितीय ने सन् 1728 ईं. में जयपुर नगर में इस टकसाल की स्थापना की ।
  • सबसे अधिक सिक्के जयपुर/सवाई माधोपुर टकसाल के मिलते है । जयपुर की सिरहड्योढी बाजार ' चांदी की टकसाल ' के नाम मे प्रसिद्ध है ।

जोधपुर राज्य के सिक्के

  • मारवाड़ में प्राचीन काल में ' पंचमार्क/ आहत ' सिक्कों का प्रचलन था । अकबर की चितौड़ विजय के बाद मेवाड़ में प्रचलित मुगल सिक्कों को एलची के नाम से जाना जाता है ।
  • जोधपुर में बनने वाले सोने के सिक्कों को 'मोहर' कहते थे ।
  • सोजत की टकसाल से निकलने वाले सिक्के ललूलिया कहलाते थे ।
  • सोने के सिक्के मोहर कहलाते थे, जो जोधपुर की टकसाल में बनते थे । महाराजा विजयसिंह द्वारा प्रचलित होने के कारण ये ' विजयशाही' कहलाते थे । 
  • मारवाड़ के शासकों में ' विजयशाही ' सिक्का सर्वाधिक लोकप्रिय है । मारवाड़ राज्य के ही अधीन कुचामन की टकसाल में भी अटन्नी, चवन्नी तथा इकतीसदा सिक्के ढाले जाते थे । 
  • रियासती सिक्कों का युग समाप्त होने के पश्चात्‌ इन सिक्कों का स्थान बिटिशकालीन सिक्कों ने ले लिया ।

बूंदी राज्य के सिक्के

  • बूंदी में 1759 से 1859 ईं. तक 'पुराना रूपया’ नाम का सिक्का चलता था ।
  • 1817 ईं. में यहाँ 'ग्यारह-सना' रूपया चलन में आया, जो मुगल सम्राट अकबर द्वितीय ( 1806-37 ई. ) के शासन के ग्यारहवें वर्ष को चालू होने का सूचक था । यहाँ 'हाली' रूपया भी प्रचलन में था । 
  • 1901 ईं. में बूंदी दरबार ने कलदार के साथ 'चेहरेशाही’ रूपया प्रचलित किया । यह रूपया पूरा चाँदी का था ।
  • ताँबे का सिक्का "पुराना बूंदी का पैसा' कहलाता था ।
  • 1925 ईं. में यहाँ कलदार चलने लगा ।

मालवगण के सिक्के

  • ये सिके उस जाति के है, जो मौर्य, कुषाण, गुप्त आदि की अधीनता में थे ।

मेवाड़ राज्य के सिक्के

  • मेवाड़ में प्राचीनकाल से ही सोने, चाँदी और ताँबे के सिक्के चलते थे, जिन पर मनुष्य, पशु-पक्षी, सूर्य, चंद्र, धनुष, वृक्ष आदि का चित्र अंकित रहता था ।
  • मेवाड़ में 'गधिया मुद्रा' का प्रचलन भी था । महाराणा कुंभा ने चाँदी एवं ताँबे के गोल तथा चौकोर सिक्के चलाए थे, जिन पर कुंभकर्ण, कुँभलमेरू अंकित मिलता हैं ।
  • मुगल सम्राट मुहम्मदशाह ( 1719-48 ईं. ) के काल में मेवाड में चितौड़, भीलवाड़ा और उदयपुर की टकसाल में सिक्के बनते थे, जिनको चितौडी, शाहआलमी, भिलाडी और उदयपुरी रूपया कहते थे ।
  • महाराणा भीमसिंह ने अपनी बहिन चंद्रकुँअर बाई की स्मृति मे चाँदोडी रुपया, अठन्नी, चवन्नी दोअन्नी व एक अन्नी चलाई जिस पर फारसी अक्षर अंकित थे ।
  • चांदोडी मेवाड की टकसाल से निर्मित सोने का सिक्का था । मेवाड में ताँबे के सिक्कों को 'ढीगला''भिलाडी 'त्रिशूलिया 'भीडरिया '' नाथद्वारिया ' आदि नामों से जाना जाता था । ये विभिन्न आकार तथा तौल एवं मोटाई के होते थे ।
  • द्रम, ऐला मेवाड में चलाये गये सोने/चांदी के सिक्के थे ।

नगर मुद्राएँ

  • नगर या कर्कोट नगर जो उणियारा ठिकाने के क्षेत्र में जयपुर के निकट है । अपनी प्राचीनता के लिए बड़ा प्रसिद्ध है । यहां पर मालवगण की टकसाल रही होगी । ये सिके संसार में प्राप्त सिक्कों मे सबसे हल्के व छोटे है रंगमहल से प्राप्त सिक्के
  • रंगमहल के उत्खनन से कुल 105 ताँबे के सिक्के उपलब्ध हुए है, जो कुषाणोत्तर काल के माने गये है और उन्हें मुरण्डा नाम दिया गया हैं ।

बैराठ से प्राप्त सिक्के

  • बैराठ के उत्खनन में प्रात एक कपड़े की थैली जिसमें 8 पंचमार्क चाँदी की मुद्राएँ तथा 28 इण्डोग्रीक़ तथा युनानी शासकों की मुद्राएं प्राप्त हुई है ।

गुप्तकालीन सिक्के

  • ये सिक्के भरतपुर के बयाना जिले में नगलाछेल नामक ग्राम से एक ढेर के रूप में मिले है । जो लगभग 180० के आसपास है ।

अलवर राज्य के सिक्के

  • अलवर राज्य की टकसाल राजगढ में थी यहाँ 1772 से 1876 ईं. तक बनने वाले सिक्के रावशाही रूपया कहलाते थे ।
  • 1877 ईं. से अलवर राज्य के सिक्के कलकत्ता की टकसाल में बनने लगे ।
  • यहा के ताँबे के सिके रावशाही टक्का कहलाते थे, जिस पर आलमशाह' ' मुहम्मद बहादुर शाह' 'मलका विक्टोरिया , ' शिवदान सिंह' आदि के नाम अंकित रहते थे ।

करौली राज्य के सिक्के

  • करौली में महाराजा माणकपाल ने सर्वप्रथम 1780 ईं. में चाँदी और ताँबे के सिके ढलवाये जिन पर कटार और झाड़ के चिह्न तथा संवत् मय बिन्दुओँ के अंकित होते थे ।

किशनगढ़ राय के सिक्के

  • किशनगढ़ में भी शाहआलम के नाम का सिक्का प्रचलित था । किशनगढ़ में 166 ग्रेन का चाँदोडी रूपया भी ढाला गया, जिसका प्रयोग दान पुण्य कार्यो में होता था ।

कोटा राज्य के सिक्के

  • कोटा क्षेत्र में प्रारंभ में गुप्तों और हूणों के सिक्के प्रचलित थे
  • मध्यकाल में मण्डू और दिल्ली सल्तनत के सिक्के चलते थे । अकबर के राज्य-विस्तार के बाद यहाँ मुगली सिक्के चले । यहां ' हाली ' और ' मदनशाही ' सिक्के भी प्रचलन में थे ।

जैसलनेर राज्य के सिक्के

  • मुगलकाल में जैसलमेर में चाँदी का " मुहम्मदशाही ' सिक्का चलता था । जैसलमेर का ताँबे का सिक्का ' डोडिया' कहलाता था ।
  • जेसलमेर के महाराजा अखैसिंह ने अखैशाही सिक्का चलाया ।

झालावाड के सिक्के

  • झालावाड में कोटा के सिक्के प्रचलित थे । यहा 1837 से 1857 ई. तक पुराने मदनशाही सिक्के प्रचलन में थे ।

धौलपुर राज्य के सिक्के

  • धौलपुर में 1804 ईं से सिक्के ढलना शूरू हुये । यहाँ के सिक्के को ' तमंचा शाही ' कहा जाता था, क्योंकि उन पर तमंचे का चिह्न अंकित होता था

प्रतापगढ़ राज्य के सिक्के

  • प्रतापगढ में सर्वप्रथम 1784 ईं . में मुगल सम्राट शाह आलम की आज्ञा से महारावल सालिम सिंह ने चाँदी के सिक्के ढाले  इनके एक तरफ ' सिक्कह मुबारक बादशाहा गाजी शाआलम , 1199 ' और दूसरी तरफ जर्ब 25 जुलूस मैमनत मानुस ' फारसी में अंकित होता था । इस सिक्के को 'सालिमशाही' कहते थे ।

बांसवाडा राज्य के सिक्के

  • बांसवाड़ा में सालिमशाही रूपये का प्रचलन था ।
  • 19०4 ई. में सालिमशाही एवं लक्ष्मणशाही सिक्कों के स्थान पर कलदार का प्रचलन शुरू हो गया ।

बीकानेर राज्य के सिक्के

  • बीकानेर में संभवत: 1759 ईं. में टकसाल की स्थब्वपना हुईं और मुगल सम्राट शाहआलम के नाम के सिक्के बनने लगे ।

सिरोही राज्य के सिक्के

  • सिरोही का स्वतंत्र रूप से कोई सिक्का नहीं था और न हीं यहाँ कोई टकसाल थी । यहाँ मेवाड़ का चाँदी का भीलाडी रूपया और मारवाड़ का ताँबे का ढब्बूशाही' रूपया चलता था ।

शाहपुरा राज्य के सिक्के

  • . शाहपुरा के शासकों ने 1760 ईं. में जो सिक्का चलाया उसे 'ग्यारसंदिया' कहते थे ।

गुप्तकालीन सिक्के

  • गुप्तकाल में दीनार स्वर्ण मुद्राओं को कहा गया है । स्वर्ण मुद्राओं की सबसे बड़ी निधि राजस्थान में बयाना ( भरतपुर ) के समीप हुल्लनपुरा गांव में खोजी गई ।
  • इण्डो सौरसैनिक सिक्कों पर नागरी लिपि में लेखांकन होता था । इन सिक्कों पर राजा का चेहरा एवं अग्निवेदिका धीरे-धीरे भद्दा रूप धारण करती गई , जिससे इन्हें गधैया सिक्के कहा जाने लगा ।

Rajasthan ke Prachin Sikke

  1. बीकानेर - राजशाही सिक्का (चाँदी)
  2. जैसलमेर - मुहम्मदशाही, अखैशाही, अखयशाही, डोडिया  (तांबा)
  3. उदयपुर - स्वरूपशाही, चांदोडी, शाहआलमशाही, ढीगला, त्रिशुलियां, भिलाडी, कर्षापण , भीड़रिया, पदमशाही 
  4. डूंगरपुर - उदयशाही सिक्का ।
  5. बाँसवाड़ा - सालिमशाही सिक्का , लक्ष्मणशाही । 
  6. प्रतापगढ - आलमशाही सिक्का ।
  7. शाहपुरा - ग्यारसदिया सिक्का , माधोशाही ।
  8. कोटा - गुमानशाही, लक्ष्मणशाही सिक्के ।
  9. झालावाड - मदनशाही सिक्का ।
  10. करौली - कटार झाड़शाही ।
  11. धौलपुर - तमंचाशाही सिक्का ।
  12. भरतपुर - शाहआलमा
  13. अलवर - अखयशाही, रावशाही सिक्के , रावशाही टक्का ।
  14. जयपुर - झाड़शाही, मुहम्मदशाही, माधोशाही ।
  15. जोधपुर - विजयशाही, भीमशाही, गदिया, फदिया सिक्के , लल्लूलिया रूपया, ढल्यूशाही ।
  16. सोजत - लाल्लू लिया (पाली)
  17. सलूम्बर - पद्यशाही (ताम्रमुद्रा)
  18. किशनगढ़ - शाहआलमा
  19. बूंदी - रामशाही सिक्का ग्यारहसना, कटारशाही,चेहरेशाही

Rajasthan Coins important facts and Quiz

  • राजस्थान में सोने चांदी ,तांबे और सीसे के सिक्के प्रचुर मात्रा में मिले है
  • राजस्थान के विभिन्न भागों में मालव ,शिव,योधेय,शक,आदि जनपदों के सिक्के प्राप्त हुए हैं
  • कई शिलालेखों और साहित्यिक लेखो मे द्रम और एला क्रमशः सोना और चांदी की मुद्रा के रूप में उल्लेखित मिलते हैं
  • इन सिक्कों के साथ-साथ रूपक नाणक नाणा आदि शब्द भी मुद्राओं के वाचक हैं
  • आहड़ के उत्खनन के द्वितीय युग के छह तांबे के सिक्के मिले हैं इनका समय ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी माना जाता है
  • बहुत समय तक मिट्टी में दबे रहने के कारण सिक्कों का अंकन तो स्पष्ट रुप से नहीं पढ़ा गया पर उन पर अंकित त्रिशुल अवश्य दृष्टव्य है
  • बप्पा का सिक्का सातवीं शताब्दी का प्रसिद्ध सिक्का माना गया है जिसका वर्णन डॉक्टर ओझा ने भी किया है
  • 1565 में मुगलों का जोधपुर पर अधिकार हो जाने पर वहा मुगल बादशाह के सिक्के का प्रचलन हुआ
  • 1780 में जोधपुर नरेश विजयसिंह ने बादशाह से अनुमति लेकर अपने नाम से विजय शाही चांदी के रुपए चलाएं
  • तब से ही जोधपुर व नागौर की टकसाल चालू हुई थी
  • 1781 में जोधपुर टकसाल में शुद्ध होने की मौहर बनने लगी
  • 24 मई 1858 में राजस्थान की रियासतो के सिक्कों पर बादशाह के नाम के स्थान पर महारानी विक्टोरिया का नाम लिखा जाने लगा
  • 23 जुलाई 1877 मे अलवर नरेश ने अंग्रेज सरकार से अपने राज्य में अंग्रेजी सिक्के प्रचलित करने और अपने यहां से सिक्के  ना ढालने का इकरारनामा लिखा
  • गज सिंह ने आलमगीर के सिक्के चलाएं इसके उपरांत बीकानेर नरेशों ने भी अपने नाम के सिक्के ढलवाना आरंभ किया
  • 1900 में जोधपुर राज्य की टकसालों मे विजय शाही रुपया बनना बंद हो गया और अंग्रेजी कलदार रुपया चलने लगा
  • राजस्थान में सर्वप्रथम 1900ई.मे स्थानीय सिक्कों के स्थान पर कलदार का चलन जारी हुआ
  • जयपुर नरेशों ने विशुद्ध  चांदी का झाडशाही रुपया चलाया जो तोल में एक तोला होता था
  • उस पर किसी राजा का चिन्ह नहीं होता था केवल उर्दू लिपि में उस पर अंकित रहता था इस रुपए का प्रचलन द्वितीय विश्वयुद्ध के पूर्व तक रहा जब
  • ब्रिटिश सरकार ने अपने शासकों के नाम पर चांदी का कलदार रुपया चलाना आरंभ कर दिया तो राजस्थान के शासकों के स्थानीय सिक्के बंद होते ही चले गए
  • इंग्लैंड के शासकों के नाम की मुद्राएं तो राजस्थान में भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के समय बाद तक चलती रही
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Sunday, 12 January 2020

Rajasthan ke Pramukh Abhilekh | राजस्थान के अभिलेख
पुरातात्विक स्रोतों में अभिलेख एक महत्वपूर्ण स्रोत माने जाते हैं  क्योकि ये तिथि युक्त एवं समसामयिक होना है जिन अभिलेखों में  शासको  की उपलब्धियों का यशोगान किया होता है उसे प्रशस्ति कहते हैं अभिलेखों के अध्ययन को एपिग्राफी कहा जाता  हैं अभिलेखों में स्तंभ लेख, शिलालेख, गुहालेख इत्यादि आते हैं

भारत में सर्वाधिक प्राचीनतम अभिलेख अशोक मौर्य के हैं शक शासक रुद्रदामन का जूनागढ़ अभिलेख भारत में संस्कृत का प्रथम अभिलेख माना जाता है राजस्थान के अभिलेखों की भाषा संस्कृत एवं राजस्थानी है इनकी शैली गद्य-पद्य है तथा लिपि महाजनी एवं हर्ष कालीन है लेकिन नागरी लिपि को विशेष रूप से प्रयोग में लिया गया है
राजस्थान में 162 शिलालेख प्राप्त हुए है इनका वर्णन ”वार्षिक रिपोर्ट राजपुताना अजमेर “ में प्रकाशित हो चुका है  राजस्थान में पुरातात्विक सर्वेक्षण का कार्य सर्वप्रथम 1871 ई. में  प्रारंभ किया गया था

Rajasthan ke Pramukh Abhilekh - राजस्थान के अभिलेख  

Rajasthan ke Pramukh Abhilekh in hindi
Rajasthan ke Pramukh Abhilekh


नगरी का लेख (200 - 150ईं पू.) - यह एक खंड लेख है जो मूल लेख का दाहिनी भाग है यह लेख डॉ ओझा को नगरी नामक स्थान पर प्राप्त हुआ था ।

घोसुन्डी शिलालेख ( द्वितीय शताब्दी ई पू ) 

  • ये लेख घोसुन्डी गाँव से जो चित्तौड़ से लगभग सात मील दूर है, प्राप्त हुआ था । यह लेख कई शिलाखण्डों में टूटा हुआ है। इसके कुछ टुकड़े ही उपलब्ध हो सके हैं। इसमें एक बड़ा खण्ड उदयपुर संग्रहालय में सुरक्षित है। 
  • घोसुंडी का शिलालेख सर्वप्रथम डॉक्टर डी आर भंडारकर द्वारा पढ़ा गया यह राजस्थान में वैष्णव या भागवत संप्रदाय से संबंधित सर्वाधिक प्राचीन अभिलेख है इस अभिलेख से ज्ञात होता है कि उस समय तक राजस्थान में भागवत धर्म लोकप्रिय हो चुका था इसमें भागवत की पूजा के निमित्त शिला प्राकार बनाए जाने का वर्णन है
  • इस लेख में संकर्षण और वासुदेव के पूजागृह के चारों ओर पत्थर की चारदीवारी बनाने और गजवंश के सर्वतात द्वारा अश्वमेघ यज्ञ करने का उल्लेख है। इस लेख का महत्त्व द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व में भागवत धर्म का प्रचार, संकर्शण तथा वासुदेव की मान्यता और अश्वमेघ यज्ञ के प्रचलन आदि में है।

नांदसा यूप स्तम्भ लेख ( 225 ईं. ) 

  • नांदसा भीलवाडा से 36 मील की दूरी पर एक गाँव है जहाँ एक तड़ाग में एक गोल स्तम्भ है । यह वर्ष के अधिकांश भाग में पानी में डूबा रहता है, केवल गर्मीयों में तडाग का पानी सूखने पर ही इसे पढा जाता है ।
बडवा स्तम्भ लेख ( 227 ईं॰ ) - इनमें त्रिरांत्र यज्ञों का उल्लेख है जिनकों बलवर्धन, सोमदेव तथा बलसिंह नामक तीन भाईयों ने सम्पादन किया था ।
बर्नाला यूप-स्तम्भ लेख ( 238 39 ईं॰ ) - इसके अनुसार कृत संवत 284 में सोहर्न-गोत्रोत्पन्न वर्धन नामक व्यक्ति ने सात यूप स्तम्भों की प्रतिष्ठा का पुण्यार्जन किया ।
बरनाला लेख जयपुर ( 278 ईं ) - इसके अन्त में विष्णु भागवान की वन्दना की गई

बड़ली गांव का शिलालेख (443 ईं.) badli ka shilalekh

  • badli ka shilalekh अजमेर जिले के बड़ली गांव में प्राप्त हुआ है, यह राजस्थान का सबसे प्राचीन शिलालेख है । अजमेर जिले के बड़ली गांव में 443 ईसवी पूर्व का शिलालेख वीर सम्वत 84 और विक्रम सम्वत 368 का है यह अशोक से भी पहले ब्राह्मी लिपि का है। स्थानीय आख्यानो के अनुसार पद्मसेन बरली का समृद्ध राजा था जिसने अजमेर की तलहटी में बीद्मावती नगरी इन्दरकोट बसाया था ।अजमेर जिले में 27 km दूर बङली गाँव  में भिलोत माता मंदिर से स्तंभ के टुकडो से प्राप्त हुआ। राजस्थान तथा ब्राह्मी लिपि का सबसे प्राचीन शिलालेख है
  • यह अभिलेख गौरीशंकर हीराचंद ओझा को भिलोत माता के मंदिर में मिला था यह राजस्थान का सबसे प्राचीन अभिलेख है जो वर्तमान में अजमेर संग्रहालय में सुरक्षित है अजमेर के साथ मद्यामिका[ चित्तोड] में जैन धर्म के प्रसार का उल्लेख।

basantgarh shilalekh

  • बसन्तगढ़ का लेख  - सिरोही जिले के बसंतगढ़ में वि॰सं॰ 682 का लेख मिला, जो राजा वर्मलात के समय का है । इस लेख से ज्ञात होता है कि उस समय में वर्मलात अर्बुद देश का स्वामी था । सामन्त प्रथा पर इस लेख से कुछ प्रकाश पड़ता है ।
सांमोली शिलालेख ( 646 ईं. ) - यह लेख सांमोली गाँव से, जो मेवाड़ के दक्षिण में भोमट तहसील में स्थित है । यह लेख मेवाड के गुहिल राजा शीलादित्य के समय का है ।
अपराजित का शिलालेख ( 661 ईं.) - यह लेख नागदे गाँव के निकटवर्ती कुंडेश्वर के मंदिर में डॉ॰ ओझा को मिला । इस लेख से गुहिल शासकों की उत्तरोत्तर विजर्यों का बोध होता है ।
शंकरघट्टा का लेख ( 713 ईं ) - इस लेख में 17 पंक्तिया हैं । इसके प्रारम्भ में शिव की वंदना की गई है । प्रस्तुत लेख का भाग, जहाँ से राजा मानभंग का वर्णन मिलता है सम्भवत यह मानभंग वही मानमोरी है जिसके शिलालेख का जिक्र कर्नल टाॅड ने किया है

मानमोरी का लेख (manmori abhilekh 713 ईं॰) 

  • Manmori abhilekh चित्तौड़ के पास मानसरोवर झील के तट पर एक स्तम्भ पर लिखा हुआ कर्नल जेम्स टॉड को मिला था । इस शिलालेख को इंग्लैण्ड ले जाते समय जेम्स टॉड ने भारी होने के कारण समुद में फेंक दिया । केवल इस लेख का अनुवाद जेम्स टॉड के पास बचा रहा । जिसको उसने अपनी पुस्तक ' द एनाल्स एण्ड एन्टिक्वीटीज आँफ राजस्थान ' में प्रकाशित किया । इसके अन्त में चार राजाओं का वर्णन मिलता है यथा महेश्वर भीम भोज और मान । इस प्रशस्ति का लेखक नागभट्ट का पुत्र पुष्य और पंक्तियों का उत्कीर्ण करुग का पोत्र शिवादित्य था । इसमे अम्रत मथन का उल्लेख मिलता हैं
  • स्थान- चितोड़गढ़, लेखक- पुष्प,  ख़ोजकर्ता – कर्नल जेम्स टोड, उत्कीर्णकर्ता- शिवादित्य
कणसवा का लेख - कोटा के निकट कणसवा गांव के शिवालय में लगा हुआ यह लेख 795 ईं. का है ।
बुचकला शिलालेख ( 815 ईं ) - इस लेख की खोज ब्रह्मभट्ट नानूराम ने बिलाडा ( जिला जोधपुर ) के निकट बुचकला के पार्वती के मंदिर वाले सभा मण्डप से की थी । यह लेख वत्सराज के पुत्र नागभट्ट प्रतिहार के समय का है ।
मंडोर का शिलालेख ( 837 ईं ) - यह लेख मूलत: मंडोर के किसी बिष्णु मंदिर में लगा था । इस लेख को और दूसरे दो घटियाला के लेखों को पढने से प्रतिहारों के सम्बन्ध में कईं नई जानकारियाँ हमें मिलती हैं । यह प्रशस्ति बाउक ने खुदवाई थी ।

घटियाला के शिलालेख 

  • यह लेख चार -लेखों के समुदाय में घटियाला ( जोधपुर से 20 मील उत्तर-पश्चिम ) स्थित एक स्तम्भ के दो पाश्वों पर उत्कीर्ण है । घटियाला के दो लेख ( 861 ईं. )जोधपुर से 20 मील उत्तर में घटियाला गाँव है, जहाँ दो लेख उपलब्ध हुए है । इन शिलालेखों से पता चलता है कि हरिश्चन्द्र  नामक ब्राह्मण , जिसको रोहिल्लरिद्ध भी कहते थे , वेद तथा शास्त्रो का अच्छा ज्ञाता था । उसकी दो स्त्रियां थी एक ब्राह्मण वंश से तथा दूसरी क्षत्रिय कुल से ।

सरणेश्वर (सांडनाथ) प्रशस्ति (953 ईं.) 

  • यह उदयपुर के  शमशान में स्थित सारणेश्वर महादेव के मंदिर में स्थित सभामंडप मे मिली थी । इस प्रशस्ति से वराह मंदिर की व्यवस्था, स्थानीय व्यापार, कर, शासकीय पदाधिकारियों आदि के विषय में पता चलता है।  गोपीनाथ शर्मा की मान्यता है कि मूलतः यह प्रशस्ति उदयपुर के आहड़ गाँव के किसी वराह मंदिर में लगी होगी। बाद में इसे वहाँ से हटाकर वर्तमान सारणेश्वर मंदिर के निर्माण के समय में सभा मंडप के छबने के काम में ले ली हो।
ओसियां का लेख ( 956 ई॰ ) - यह लेख 22 संस्कृत पद्यो में है जिसके जगह-जगह अक्षर खण्डित हो गये है । इसमें मानसिंह भूमि का स्वामी और वत्सराज को रिपुओं का दमन करने वाला कहा गया है । जिसे सूत्रधार पदाजा द्वारा उत्कीर्ण किया गया उल्लिखित है ।
नाथ प्रशस्ति-एकलिंगजी ( 971 ईं. ) - यह एकलिंगजी के मंदिर से कुछ ऊँचे स्थान पर लकुलीश के मंदिर में लगा हुआ शिलालेख है जिसे नाथ-प्रशस्ति भी कहते है ।
हर्षनाथ के मंदिर की प्रशस्ति ( 973 ईं॰ ) - यह प्रशस्ति शेखावटी के प्रसिद्ध हर्षनाथ के मंदिर की है । यह प्रशस्ति साँभर के चौहान राजा विग्रहराज के समय की है । इससे चौहानों के वंशक्रम तथा उनकी उपलब्धियों पर प्रकाश पड़ता है ।
हरितकुपडी शिलालेख ( 996 ईं ) - यह लेख माउंट आबू जाने वाले उदयपुर-सिरोही मार्ग पर कैप्टन बस्ट को मिला था । इस प्रशस्ति के रचयिता सूर्याचार्यं है ।

चित्तौड़ का कुमारपाल का शिलालेख ( 1150 ईं. ) 

  • प्रस्तुत लेख कुमारपाल सोलंकी के समय का चित्तौड़ के समिधेश्वर के मंदिर में लगा हुआ है । चालुक्य वंश का यशोगान किया गया है । इसके अनन्तर मूलराज और सिद्धरांज का वर्णन आता है । कुमारपाल के वर्णन में इसमें शाकंभरी विजय का उल्लेख आता है । प्रशस्ति का रचयिता जयकीर्ति का शिष्य रामकीर्ति था । यह उस समय का दिगम्बर विद्वान था । 

बिजौलिया का लेख ( 1170 ईं॰ ) bijoliya abhilekh

  • बिजोलिया के पाश्वर्नाथ जैन मंदिर के पास एक चट्टान पर उत्कीर्ण  1170 ई. के इस शिलालेख को जैन श्रावक लोलाक द्वारा मंदिर के निर्माण की स्मृति में बनवाया गया था  इसका प्रशस्ति कार गुण भद्र था यह लेख बिजौलिया के पार्श्वनाथ मंदिर की उत्तरी दीवार के पास एक चट्टान पर उत्कीर्ण है । यह लेख मूलत: दिगम्बर लेख है । जिसको दिगम्बर जैन श्रावक लोलाक ने पार्श्वनाथ के मंदिर और कुण्ड के निर्माण की स्मृति में लगाया जाता था । इसमें साँभर और अजमेर के चौहान वंश की सूची तथा उनकी उपलब्धियों की अच्छी जानकारी मिलती है । इन शासकों को वत्सगोत्र के ब्राह्मण कहा गया है ।

एकलिंगजी में एक स्मारक शिलालेख ( 1213 ईं. ) 

  • यह लेख एकलिंगजी के मंदिर के चौक में नंदी के निकट वाली एक स्मारक शिला पर उत्कीर्ण है जिसमें जैत्र सिंह को महाराजाधिराज कहा है उसका समय संवत् 1270 दिया हुआ है ।
लूणवसही ( आबू-देलवाड़ा ) की प्रशस्ति ( 1230 ईं. ) - यह प्रशस्ति पोरवाड़ जातीय शाह वस्तुपाल तेजपाल द्वारा बनवाये हुए आबू के देलवाड़ा गांव के लूणवशाही के मंदिर की संवत् 1287 फाल्गुन कृष्णा 3 रविवार की है । इसकी भाषा संस्कृत है और इसे गद्य में लिखा गया है । इसमें आबू के परमार शासकों तथा वस्तुपाल तेजपाल के वंश का वर्णन है ।
नेमिनाथ ( आबू ) के मंदिर की प्रशस्ति ( 1230 ईं॰ ) - यह प्रशस्ति वि.सं. 1287 श्रावण कृष्णा 3 रविवार की है जिसमें 74 श्लोक हैं । इसको तेजपाल के द्वारा बनवाये गये आबू पर देलवाडा गाँव के नेमिनाथ के मंदिर में लगाई गई थी ।
चितौड़ का लेखा (1266 ईं. ) - यह लेख चित्तौड़ से प्राप्त हुआ है जो तेजसिंह के समय का है । इस लेख में सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इसके द्वारा हमें तेजसिंह के महामात्य समुद्धर की सूचना मिलती हैं ।
गंभीरी नदी के पुल का लेख ( 1267 ईं. ) - चित्तौड़ के निकट वाली गंभीरी नदी का पुल ऐसा मालूम होता है कि चित्तौड़ के आस-पास के कई भवनों और मंदिरों के अवशेषों से, जो तुर्की आक्रमण के कारण नष्ट हो गये थे । खिज्र खाँ ने बनवाया था ।
बीठू का लेख ( 1273 ईं. ) - पाली से चौदह मील उत्तर-पश्चिम में बीठू गाँव के पास वि.सं. 1330 (ई.सं. 1273, ता. 9 अक्टूबर) सोमवार का लेख प्राप्त हुआ है, इससे प्रमाणित होता है कि सीहा सैतकुँवर का पुत्र था और वह उक्त तिथि को देवलोक सिधारा ।

चीरवा का शिलालेख ( 1273 ईं. )  

  • यह शिलालेख चीरवा गाँव के , उदयपुर से 8 मील उत्तर में एक नये मंदिर के बाहरी द्वारा पर लगा हुआ है । जिसमें 51 श्लोक है । इसमें गुहिलवंशीय बापा के वंशधर पद्यसिंह, जैत्रसिह, तेजसिंह और समरसिंह की उपलब्धियाँ का वर्णन है । 
  • भुवनसिंहसूरि के शिष्य रत्नप्रभसूरी ने चित्तौड़ में रहते हुए चीरवा शिलालेख की रचना की और उनके मुख्य शिष्य पार्श्वचन्द ने, जो बड़े विद्वान थे, उसको सुन्दर लिपि में लिखा । पद्यसिंह के पुत्र केलिसिंह ने उसे खोदा और शिल्पी देल्हण ने उसे दीवार में लगाने आदि कार्य का सम्पादन किया ।
रसिया की छतरी का शिलालेख (1274 ईं.) - यह लेख 61 श्लोको में चित्तौड़गढ मे स्थित रसिया की छतरी में लगा हुआ मिला है । यह लेख वेद शर्मा द्वारा रचा गया है । इसके उत्कीर्णकर्ता सज्जन है ।
अचलेश्वर लेख ( 1285 ईं. ) - यह लेख अचलेश्वर (आबू) के मंदिर के पास वाले मठ के एक चौपाल की दीवार में लगाया गया था । इसमें बापा से लेकर समरसिंह के काल की वंशावली दी गई है । इस प्रशस्ति का रचयिता प्रियपटु का पुत्र वेद शर्मा नागर था इसका लेखक शुभचन्द और उत्कीर्णकर्ता कर्मसिंह सूत्रधार था ।
चित्तौड़ के जैन कीर्तिस्तम्भ के तीन लेख ( 13 वीं सदी ) - चित्तौड़ का जैन कीर्तिस्तम्भ 13 वीं सदी में जीजाक के द्वारा बनवाया गया था ।
माचेडी की बावली का लेख ( 1382 ईं.) - माचेडी ( अलवर) की बावली वाले शिलालेख में बड़ गुजर शब्द का प्रयोग पहली बार प्रयुक्त हुआ है । इस बावड़ी का निर्माण खंडेलवाल महाजन कुटुम्ब ने करवाया था ।
समाधीश्वर मंदिर का शिलालेख ( 1428 ईं॰ ) - यह लेख चित्तौड़ के समाधीश्वर मंदिर के सभामण्डप की पूर्वी दीवार में संगमूसा पत्थर पर 53 पंक्तियों में उत्कीर्ण है ।
श्रृंगी ऋषि शिलालेख ( 1428 ईं ) - प्रस्तुत लेख एकलिंगजी से अनुमानत: 6 मील दक्षिण-पूर्व में श्रृंगी ऋषि नामक स्थान पर तिबारे में लगा हुआ है ।

राणकपुर प्रशस्ति ( 1439 ईं ) 

  • प्रस्तुत प्रशस्ति राणकपुर के चौमुखा मंदिर के बाएँ स्तम्भ में लगे हुए । इस प्रशस्ति का ऐतिहासिक महत्त्व है । इसके द्वारा हमें मेवाड के राजवंश का धरणा श्रेष्ठि वंश का तथा उसके शिल्पी का परिचय मिलता है । इसका प्रशस्तिकार देपाक था इसमें बप्पा एवं कालभोज को अलग-अलग व्यक्ति बताया है इसमें महाराणा कुंभा की वीजीयो एवं उपाधियों का वर्णन है इसमें गुहीलो को बप्पा रावल का पुत्र बताया है
कोडमदे-सर का लेख ( 1459 ईं॰ ) - यह लेख कोडमदेसर ( जोधपुर ) नामी तालाब के तट पर स्थापित कीर्तिस्तम्भ पर अंकित है ।

कीर्तिस्तम्भ प्रशस्ति ( 1460 ईं. ) 

  • इसका प्रशस्ति कार महेश भट्ट था प्रस्तुत प्रशस्ति चित्तौड़ के कीर्तिस्तम्भ की कई शिलाओं का सामूहिक नाम है । अब केवल दो ही शिलाएँ अवशेष है । इसमें बपा तथा हम्मीर का वर्णन मिलता है । यह राणा कुंभा की प्रशस्ति है इसमें बप्पा से लेकर राणा कुंभा तक की वंशावली का वर्णन हैb इसमें कुंभा की उपलब्धियों एवं उसके द्वारा रचित ग्रंथों का वर्णन मिलता है प्रशस्ति में चंडी शतक, गीत गोविंद की टीका संगीत राज आदि ग्रंथों का उल्लेख हुआ है
  • इस प्रशस्ति में कुंभा को महाराजाधिराज अभिनव, भरताचार्य, हिंदुस्तान सुरतान, राय रायन, राणो, रासो छाप, गुरु दान गुरु, राजगुरु और सेल गुरु उपाधियों से पुकारा गया है कुंभा ने मालवा और गुजरात की सेना को हराने के बाद इस विजय के उपलक्ष में चित्तौड़ ने विजय स्तंभ का निर्माण करवाया विजय स्तंभ की पांचवी मंजिल पर उत्कीर्ण है
  • उत्कीर्णकर्त्ता- जेता, पौमा, नापा, पूँजा, जइता।
  • महाराणा कुंभा की उपलब्धियां तथा युद्धों का वर्णन।।
  • 179वें श्लोक में गुजरात में मालवा की सम्मिलित सेना को पराजित करने का साक्ष्य।

कुम्भलगढ़ की प्रशस्ति ( 1460 ईं. ) 

  • यह प्रशस्ति कुंभलगढ़ से लाकर उदयपुर संग्रहालय में सुरक्षित रखी हुई है । इसमें मेदपाट तथा चितौड़ का वर्णन दिया गया है जिससे हमें उस समय की मेवाड की भौगोलिक, सामाजिक, धार्मिक ओंर सांस्कृतिक स्थिति का पता चलता है ।
यह शिलालेख कुम्भलगढ़ दुर्ग में सिथत कुंभश्याम के मंदिर ( इसे वर्तमान में मामदेव का मन्दिर कहते हैं) में मिला है, इसकी निम्न विशेषतायें हैं-
  1. इसमे गुहिल वंश का वर्णन हैं!
  2. यह मेवाड़ के महाराणाओं की वंशावली रूप से जानने का महत्वपूर्ण साधन हैं!
  3. यह राजस्थान का एकमात्र अभिलेख हैं जो महाराणा कुंभा के लेखन पर प्रकाश डालता हैं!
  4. इस लेख में हम्मीर को विषम घाटी पंचानन कहा गया हैं!
  • यह मेवाड़ के महाराणाओं की वंशावली को विशुद्ध रूप से जानने के लिए बड़ा महत्वपूर्ण है। इसमें कुल 5 शिलालेखों का वर्णन मिलता है इस शिलालेख में 2709 श्लोक हैं। दासता, आश्रम व्यवस्था, यज्ञ, तपस्या, शिक्षा आदि अनेक विषयों का उल्लेख इस शिलालेख में मिलता है।
  • इस लेख का रचयिता डॉक्टर ओझा के अनुसार महेश होना चाहिए। क्योंकि इस लेख के कई साक्ष्य चित्तौड़ की प्रशस्ति से मिलते हैं।
घोसुन्डी की बावड़ी का लेख ( 1504 ईं. ) - इसमें कुल 25 श्लोक है । प्रस्तुत प्रशस्ति में महाराणा रायमल की रानी श्रृंगारदेवी के, जो मारवाड़ के राजा जोधा ( रावजोधा ) की पुत्री थी, द्वारा उक्त बावड़ी के बनवाये जाने का उल्लेख हैं । इस प्रशस्ति का रचयिता महेश्वर नामक कवि था ।
हीराबाडी (जोधपुर) का लेख ( 1540 ई. ) - यह लेख राव मालदेव के समय का है । ऐसी प्रसिद्धि है कि जब रावजी की सेना ने नागौर विजय के उपरान्त इधर-उधर गाँवों को लूटना आरम्भ किया, इस समय सेनापति जेता का मुकाम हीरावाडी नामक स्थान पर था । उसके प्रभाव के कारण वहाँ शान्ति बनी रही ।

बीकानेर की प्रशस्ति ( 1594 ईं. ) 

  • यह प्रशस्ति बीकानेर दुर्ग के द्वार के एक पार्श्व में लगी हुई है जो महाराजा रायसिंह के समय की है । इसकी भाषा संस्कृत है । प्रशस्ति से ज्ञात होता है कि वि.सं. 1645 फाल्गुन कृष्णा 9 (इं .सं॰ 1589 तारीख जनवरी) बृहस्पतिवार को बीकानेर के वर्तमान किले के निर्माण का कार्य आरम्भ किया और विं.सं. 1650 माघ शुक्ला 6 (ईं.सं. 1594 तारीख 17 जनवरी) बृहस्पतिवार को गढ सम्पूर्ण हुआ । यह काम मंत्री कर्मचन्द के निरीक्षण में सम्पन्न हुआ था । इसमें 60वीं पंक्ति से रायसिंह के कार्यो का उल्लेख आरम्भ होता है ।

आमेर का शिलालेख ( 1612 ईं. ) 

  • इसमें जहाँगीर के राज्य की दुहाई दी गई है जिससे आमेर और मुगल राज्य की निकटता का बोध होता है । इसमें कछवाहा वंश को 'रघुवंश तिलक ' कहकर सम्बोधित किया गया है तथा इसमे पृथ्वीराज, उसके पुत्र राजा भारमल, उसके पुत्र भगवतंदास और उसके पुत्र महाराजाधिराज मानसिंह के नाम क्रम से दिये है । इस लेख से स्पष्ट है कि मानसिंह भगवंतदास का पुत्र था ।
जगन्नाथराय प्रशस्ति ( 1652 ईं. ) - यह प्रशस्ति उदयपुर के जगन्नाथ के मंदिर के सभामण्डप में दोनों तरफ श्याम पत्थर पर उत्कीर्ण है ।

राज प्रशस्ति ( 1676 ईं॰ ) 

  • राज प्रशस्ति कुल 25 श्याम रंग के पाषाणों पर उत्कीर्ण है । ये पाषाण पट्टिकाएँ नौ चौकी की पाल में लगी हुई है । इसको महाकाव्य की संज्ञा दी गई हैं । इस प्रशस्ति का रचयिता रणछोड़ भट्ट था जो तैलंग ब्राह्मण था । इस प्रशस्ति से पता चलता है कि राजसमुद्र का निर्माण दुष्काल के समय श्रमिकों के लिए काम निकालने के लिए कराया गया था और उसे बनाने में पूरे 14 वर्ष लगे थे  प्रशस्ति के उत्कीर्णकर्ता गजधर मुकुंद, अर्जुन, सुखदेव , केशव, सुन्दर, लालो, लखो आदि थे जिन्होंने सुन्दर और शुद्ध रूप में उसे तैयार किया था ।
वैद्यनाथ मंदिर की प्रशस्ति ( 1719 ईं॰ ) - यह प्रशस्ति उदयपुर के पिछोला झील के पश्चिमी तट पर बसे हुए सिसारमा गाँव के वैद्यनाथ महादेव के मंदिर में लगी हुईं है इस प्रशस्ति का लेखक रूप भट्ट तथा लिपिकार गोवर्द्धन का पुत्र रूपजी था ।

विराट नगर अभिलेख (जयपुर)

rajasthan mein ashok ke abhilekh - अशोक के अभिलेख मौर्य सम्राट अशोक के 2 अभिलेख विराट की पहाड़ी पर मिले थे
  1. भाब्रू अभिलेख
  2. बैराठ शिलालेख
  • जयपुर में सिथत विराट नगर की बीजक पहाड़ी पर यह शिलालेख उत्कीर्ण हैं! यह शिलालेख पाली व बाह्मी लिपि में लिखा हुआ था!

bhabru shilalekh ki khoj

  •  इस शिलालेख को कालांतर में 1840 ई. में बिर्टिश सेनादिकारी कैप्टन बर्ट दारा कटवा कर कलकत्ता के सग्रहालय में रखवा दिया गया इस अभिलेख में सम्राट अशोक द्वारा बौद्ध धर्म एवं संघ में आस्था प्रकट की गई है इस अभिलेख से अशोक के बुद्ध धर्म का अनुयायी होना सिद्ध होता है इसे मौर्य सम्राट अशोक ने स्वयं उत्कीर्ण करवाया था! चीनी यात्री हेनसांग ने भी इस स्थाल का वर्णन किया है

फारसी शिलालेख 

  • भारत में मुस्लिम राज्य की स्थापना के पश्चात् फारसी भाषा के लेख भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होते हैं। ये लेख मस्जिदों, दरगाहों, कब्रों, सरायों, तालाबों के घाटों, पत्थर आदि पर उत्कीर्ण करके लगाए गए थे। राजस्थान के मध्यकालीन इतिहास के निर्माण में इन लेखों से महत्त्वपूर्ण सहायता मिलती है। इनके माध्यम से हम राजपूत शासकों और दिल्ली के सुलतान तथा मुगल शासकों के मध्य लड़े गए युद्धों, राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों पर समय-समय पर होने वाले मुस्लिम आक्रमण, राजनीतिक संबंधों आदि का मूल्यांकन कर सकते हैं।
  • इस प्रकार के लेख सांभर, नागौर, मेड़ता, जालौर, सांचोर, जयपुर, अलवर, टोंक, कोटा आदि क्षेत्रों में अधिक पाए गए हैं। फारसी भाषा में लिखा सबसे पुराना लेख अजमेर के ढ़ाई दिन के झोंपड़े के गुम्बज की दीवार के पीछे लगा हुआ मिला है। यह लेख 1200 ई. का है और इसमें उन व्यक्तियों के नामों का उल्लेख है जिनके निर्देशन में संस्कृत पाठशाला तोड़कर मस्जिद का निर्माण करवाया गया।
  • चित्तौड़ की गैबी पीर की दरगाह से 1325 ई. का फारसी लेख मिला है जिससे ज्ञात होता है कि अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ का नाम खिज्राबाद कर दिया था।
  • जालौर और नागौर से जो फारसी लेख में मिले हैं, उनसे इस क्षेत्र पर लम्बे समय तक मुस्लिम प्रभुत्व की जानकारी मिलती है।
  • पुष्कर के जहाँगीर महल के लेख (1615 ई.) से राणा अमरसिंह पर जहाँगीर की विजय की जानकारी मिलती है। इस घटना की पुष्टि 1637 ई. के शाहजहानी मस्जिद, अजमेर के लेख से भी होती है।
नोट-अजमेर शिलालेख राजस्थान में फ़ारसी भाषा का सबसे प्राचीन अभिलेख हैं

Rajasthan Abhilekh Important Facts in Hindi

  • राणा कुंभा की पुत्री रमाबाई को जावर के शिलालेख में वागीश्वरी कहा गया है, क्योंकि रमाबाई एक विदुषी महिला थी, यह शिलालेख उदयपुर के समीप जावर नामक स्थान से मिला है , जावर का प्राचीन नाम जोगिनी पटनम था 
  • सिरोही के बसंतगढ़ शिलालेख में सर्वप्रथम राजस्थान को राजस्थानी आदित्य के नाम से उल्लेखित किया गया है
  • कर्णसंवा के शिलालेख से एक मौर्य वंश के शासक राजा धवल का उल्लेख मिलता है, इस शिलालेख के अलावा अन्य किसी भी शिलालेख में यह जानकारी नहीं मिलती है, यह शिलालेख कोटा के पास कारणवश कर्ण संवा नामक गांव से मिला था 
  • उदयपुर के एकलिंगजी मंदिर से प्राप्त नाथ प्रशस्ति  में पशुपति संप्रदाय की जानकारी मिलती है, पशुपति संप्रदाय के संस्थापक लकुलीश थे ।
  • बैराठ (जयपुर )से प्राप्त भाब्रू के शिलालेख में मौर्य शासक सम्राट अशोक की जानकारी मिलती है, इसमें अशोक को बौद्ध होना बताया गया है.।
  • अचलेश्वर का लेख व तेज मंदिर लेख से राजपूतों को चन्द्रमावंसी बताया गया है, अचलेश्वर शिलालेख में बप्पा रावल से समर सिंह के इतिहास की जानकारी मिलती है
  • चीरवा का लेख चिरवा घाटी के समीप चीरवा गांव से प्राप्त हुआ है, वर्तमान में उदयपुर में स्थित है, बप्पा रावल से समर सिंह तक का वर्णन  ग्रामीण व्यवस्था एवं सती प्रथा का वर्णन
  • खजूरी गांव के अभिलेख में बूंदी का नाम वृंदावंती मिलता
  •  है बूंदी के हाडा शासकों की जानकारी
  • बरनाला का अभिलेख जयपुर से प्राप्त हुआ 227 ई भाषा संस्कृत में वर्तमान में आमेर के संग्रहालय में संग्रहित है
  • घटियाला के शिलालेख जोधपुर के समीप गडियाला गांव से मिलता है; प्रतिहार राजा कुक्कुट राजा को न्यायप्रियता वीरता राजनीतिक स्थिति का वर्णन इस शिलालेख में भवन बाजार का सुव्यवस्थित निर्माण एवं सिक्कों की जानकारी
  • इस लेख में नागभट्ट शासक को एक प्रतापी शासक बताया गया है गुर्जर प्रतिहारों की उपलब्धियों का वर्णन

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