Monday, 22 July 2019

मुस्लिम समाज के त्योहार | Festivals of Islam Religion by Raj GK
इस्लाम धर्म के प्रवर्तक पैगम्बर हजरत मोहम्मद थे ।

मुस्लिम समाज के त्योहार | Festivals of Islam Religion

मुस्लिम समाज के त्योहार | Festivals of Islam Religion
मुस्लिम समाज के त्योहार | Festivals of Islam Religion


मोहर्रम 


  • यह मुसलमानों के हिजरी सन् का पहला महीना है ।
  • मोहर्रम महीने की 10 तारीख़ को ताजिए निकाले जाते है। इन ताजियो को कर्बला के मैदान में दफनाया जाता है ।
  • ताजिये के दौरान ताशा वाद्ययंत्र का प्रयोग किया जाता है ।

चेहल्लुम

यह मोहर्रम के चालीस दिनों के बाद सफा मास की 20 वीं तारीख़ को मनाया जाता है ।

इद-उल-मिलादुलनबी (बारावफात) 

  • यह रबी उल अव्वल माह की 12वीं तारीख को पैगम्बर हजरत मोहम्मद के जन्म दिन की याद में मनाया जाता है ।
  • मोहम्मद साहब का जन्म 570 ईं. में मक्का (सऊदी अरब) में हुआ ।
  • हजरत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती का जन्म दिवस जमादि-उल्ल सानी माह की 8 तारीख को मनाया जाता है । 

शबेरात 

  • यह त्योहार शालान माह को 14वीं तारीख की शाम को मनाया जाता है । 
  • इस दिन हजरत मुहम्मद साहब की आकाश में ईश्वर से मुलाकात हुईं थी ।
  • अल्लाह से की गई गलतियों हेतु माफी मांगते है ।

शबे कद्र 

  • यह रमजान की 27 वीं तारीख को मनाया जाता है । 
  • इस दिन कुरान उतारा गया था ।

इद-उल-फितर (मीठी ईद) 

  • इसे ' सिवयों की ईद ' भी कहा जाता है। 'ईद' शब्द का अर्थ 'खुशी' या 'हर्ष' होता है ।
  • मुस्लिम बन्धु रमजान के पवित्र माह में 30 रोजे करने के बाद शुक्रिया के तौर पर इस त्योहार को शव्वाल माह की पहली तारीख को मनाते है । 
  • यह भाईचारे का त्योहार है ।

ईद-उल-जुहा (बकरा ईद) 

  • यह कुर्बानी का त्योहार है जो पैगम्बर हजरत इब्राहीम द्वारा अपने लडके हजरत इस्माइल की अल्लाह को कुर्बानी देने की स्मृति में मनाया जाता है ।
  • जिल्हिज की 10वीं तारीख को मनाया जाता है । इस दिन 'मुसलमान प्रतीक के रूप में बकरे की कुर्बानी देते है इदुलजुहा के माह में ही मुसलमान हज करते है ।

विभिन्न उर्स

गलियाकोट का उर्स (डूंगरपुर)

  • यह दाऊदी बोहरों का प्रमुख तीर्थ स्थान है । यहाँ फखरूद्दीन पीर की मजार है । 
  • यहा प्रतिवर्ष उर्स आयोजित किया जाता है ।

नरहड़ की दरगाह का मेला (झुंझुनूं) 

  • झुंझुनूं जिले के नरहड़ गाँव में हजरत हाजिब शक्कर बादशाह की दरगाह है जो शक्कर पीर बाबा की दरगाह के नाम से प्रसिद्ध है । 
  • यहा पर भाद्र कृष्ण जन्माष्टमी को मेला लगता है ।

तारकीन का उर्स (नागौर)

  • नागौर में सूफियों की चिश्ती शाखा के संत काजी हमीदुद्दीन नागौरी की दरगाह है । 
  • अजमेर के बाद सबसे बड़ा उर्स भरता है। 

गरीब नवाज उर्स (अजमेर) 

  • ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की मृत्यु की बरसी के रूप मे रज्जब की 1 से 6 तारीख तक ख्वाजा का उर्स मनाया जाता है ।
  • रज्जब का उर्स छ: दिनों तक चलता है । यहाँ आने वाले तीर्थ यात्रियों को जायरीन कहते है ।

Sunday, 21 July 2019

कई प्रकार के कैलेंडर | Many Types of Calendars in Hindi by Raj GK
ग्रिगेरियन कलेंडर इस कैलेण्डर का वर्ष 1 जनवरी से प्रारंभ होता है, तथा इसकी समाप्ति 31 दिसम्बर को होती है ।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस कलैण्डर को मान्यता प्राप्त है । 

कई प्रकार के कैलेंडर | Many Types of Calendars in Hindi

कई प्रकार के कैलेंडर | Many Types of Calendars in Hindi
Many Types of Calendars in Hindi

राष्ट्रीय पंचांग

  • भारत में ग्रिगेरियन कलैण्डर के साथ-साथ शक संवत् पर आधारित एकरूप राष्ट्रीय पंचांग 22 मार्च, 1957 को अपनाया गया ।
  • इस पंचांग का पहला माह चैत्र व अंतिम माह फाल्गुन होता है ।
  • इस पंचांग में सामान्य वर्ष 365 दिन का होता है ।
  • राष्ट्रीय ध्वज 22 जुलाई , 1947 को अपनाया गया ।
  • राष्ट्रीय गान 24 जनवरी, 1950 को अपनाया गया ।
  • राष्ट्रीय चिह्न 26 जनवरी, 1950 को अपनाया गया ।

शक संवत् 

  • माना जाता है कि इस संवत का प्रारंभ कुषाण शासक कनिष्क के काल में 78 ईं. (AD) हुआ ।
  • इस संवत् का प्रारंभ चैत्र शुक्ल एकम्/प्रतिपदा से होता है तथा अंत फाल्गुन अमावस्या को होता है ।
  • यह ग्रिगेरियन कलैण्डर वर्ष से 78 वर्ष पीछे रहता है ।
  • उदाहरण 2016-78 = 1938 शक संवत्।

विक्रम संवत् 

  • इस संवत् का प्रारंभ 57 ईं. पूर्व (BC) में हुआ ।
  • यह ग्रिगेरियन कलैण्डर वर्ष से 57 वर्ष आगे है ।
  • उदाहरण = 2016+57 = 2073 विक्रम संवत्

हिंदी महीनों के अनुसार अंग्रेजी महीने

  1. चैत - मार्च-अप्रैल
  2. बैशाख - अप्रेल-मईं
  3. ज्येष्ठ - मईं-जून
  4. आषाढ - जून-जुलाई
  5. श्रावण - जुलाई-अगस्त
  6. भाद्रपद - अगस्त-सितम्बर
  7. आश्विन - सितम्बर-अक्टूबर
  8. कार्तिक - अक्टूबर-नवम्बर
  9. मार्गशीर्ष - नवम्बर-दिसम्बर
  10. पौष - दिसम्बर-जनवरी
  11. माघ - जनवरी-फरवरी
  12. फाल्गुन - फरवरी मार्च

हिजरी सन् 

हिजरी सन् in hindi

  • हिजरी सन्/ इस्लामिक कलैण्डर का प्रारंभ 16 जुलाई 622 ईं. को हुआ ।
  • इस दिन पैगम्बर मोहम्मद ने मका से मदीना की यात्रा प्रारम्भ की थी ।
  • हिजरी सन् चन्द्रमा पर आधारित होता है । 
  • हिजरी सन् की अवधि 360 दिन या इससे कम होती है ।
  • हिजरी सन् का प्रथम महीना मोहर्रम का तथा अंतिम महीना जिलहिज का होता है ।

मुस्लिम महीने के अनुसार अंग्रेज़ी महीने

  1. मोहर्रम - नवम्बर
  2. सफर - दिसम्बर 
  3. रबि उल्ल-अवल्ल - जनवरी 
  4. रवि उल्ल-सानी - फरवरी 
  5. जमादि उल्ल-अवल्ल - मार्च 
  6. जमादि उल्ल-सानी - अप्रेल 
  7. रज्जब - मई 
  8. सावान/शाबान - जून 
  9. रमजान - जुलाई 
  10. शव्वाल - अगस्त 
  11. जिल्कात -  सितम्बर
  12. जिलहिज - अक्टूबर 

Saturday, 20 July 2019

Rajasthan ke Pramukh Lok Nritya Part 10 by Raj GK

Rajasthan ke Pramukh Lok Nritya Part 10 by Raj GK

Rajasthan ke Pramukh Lok Nritya Part 10 by Raj GK

अग्नि नृत्य

अग्नि नृत्य
  • अग्नि नृत्य जसनाथी सिद्धों का प्रसिद्ध नृत्य है ।
  • जसनाथी सम्प्रदाय के मतानुयायी डुंगरपुर कबीले के लोग होते है । अग्नि नृत्य का उद्गम कतरियासर (बीकानेर ) में हुआ हैं । कारियासर में जसनाथ जी की जन्मस्थली है ।
  • जसनाथी सिद्धों के द्वारा रात्रि जागरण में अग्नि नृत्य किया जाता है ।
  • अग्नि नृत्य शुरू करने से पूर्व कई मण लकडियों को जला कर 7 फुट लम्बा, 6 फुट चौडा, 3 फुट ऊँचा अग्नि का ढेर तैयार किया जाता है । धूणे के चारों और पानी का छिडकाव किया जाता है । तीन शब्द जसनाथिर्यों के व चौथा शब्द नाचणियों का गाया जाता है । अग्नि नृत्य को सिद्ध कस्तम जी का कहकर प्रारम्भ किया जाता है ।
  • जसनाथी सम्प्रदाय के सिद्ध लोग जसनाथ जी के गीत गाते हुए गुरू की आज्ञा से "फतै-फतै" करते हुए अग्नि नृत्य में प्रवेश करते है । कतरियासर, मामलू, लिखमादेसर आदि अग्नि नृतकों के प्रसिद्ध गाँव है ।
  • अग्नि नृत्य को संरक्षण देने मे बीकानेर के स्वर्गीय महाराजा गंगासिह का बहुत बडा योगदान है ।
  • इसमें नृत्यकार अंगारों से मतीरा फोड़ना, हल जोतना आदि क्रियाएं सम्पन्न करता है ।
  • अग्नि नृत्य में नगाड़ा नामक वाद्य यंत्र बजाया जाता है ।
  • अग्नि नृत्य मुख्यत : पुरुष प्रधान नृत्य है ।
  • जसनाथ जी को कतरियासर की जमीन सिकन्दर लोदी ने उपहार में भेंट की ।
  • अंगारों का ढेर धूणा कहलाता है, तो नृतक नाचणियाँ कहलाते है ।

हिंडोला नृत्य

हिंडोला नृत्य

  • हिंडोला नृत्य जैसलमेर क्षेत्र में किया जात है । हिंडोला का शाब्दिक अर्थ यहाँ झूला नहीं होकर बडी विशेष से है ।
  •  इस नृत्य में पुरुष व महिलाएँ संयुक्त रूप से नृत्य करते हुए अपने पूर्वजों का आहवान करते है ।

कानूड़ा नृत्य

कानूड़ा नृत्य

  • कानूड़ा नृत्य बाडमेर जिले के चोहटन गाँव मे कृष्ण जन्माष्टमी को महिलाओं व पुरुषों (युगल जोडी में ) के द्वारा किया जाता है ।

आँगी-बाँगी गैर नृत्य

आँगी-बाँगी गैर नृत्य

  • बाडमेर जिले कै लाखेटा गाँव में 400 वर्ष पुराना आँगी-बाँगी गैर नृत्य प्रसिद्ध है, जो प्रतिवर्ष चैत्र शुक्ल तृतीया को आयोजित होता है ।

ढोल नृत्य

ढोल नृत्य

  • ढोल नृत्य जालौर का प्रमुख नृत्य है ।
  • यह नृत्य विवाह के अवसर पर किया जाता है ।
  • ढोल नृत्य केवल पुरुषों के द्वारा किया जाने वाला नृत्य है ।
  • ढोल नृत्य माली ढोली, सरगड़ा व भील जाति के लोगों द्वारा किया जाता है ।
  • इस नृत्य को पेशेवर नृत्य भी कहा जाता है ।
  • ढोल नृत्य को प्रकाश में लाने का श्रेय भूतपूर्व मुख्यमंत्री श्री जयनारायण व्यास को है ।
  • ढोल नृत्य में एक साथ 4 या 5 ढोल बजाए जाते हैं ।
  • इस नृत्य में कलाकारों के समूह का मुखिया थांकना ( थांकना का शाब्दिकअर्थ-नृतकों में जोश भरना) होता है ।
  • ढोल का मुखिया थांकना शैली में बजाना शुरू करता है । ज्योंही थाकना समाप्त होता है । नृत्यकारों के समूह में कोई मुंह में तलवार लेकर, कोई हाथ में डण्डे लेकर कोई भुजाओं में रूमाल लटका का लयबद्ध अंग संचालन करते है ।

लुंबर नृत्य



  • यह जालौर जिले का महिला प्रधान नृत्य है ।
  • महिलाएँ यह नृत्य होली के अवसर पर गोला बनाकर करती है ।
  • इस नृत्य में महिलाएँ पाँवों की प्रत्येक गति के साथ 'ताली' बजाती है ।

चोगोला नृत्य

  • चोगोला नृत्य एक क्षेत्रीय युगल नृत्य है जो डूंगरपुर जिले में होली के अवसर पर किया जाता है ।
  • इस नृत्य में स्त्री-पुरुष जलती हुई होली के चारों और गोला/घेरा बनाकर नृत्य करते है ।

पालीनोच नृत्य

  • बाँसवाड़ा का पालीनोच नृत्य केवल विवाह के अवसर पर किया जाता है ।

मोहिली नृत्य

  • मोहिली नृत्य कांठल प्रदेश के धारियाबाद गाँव (प्रतापगढ) में किया जाने वाला एक क्षेत्रीय नृत्य है ।
  • यह विशुद्ध रूप से स्त्रियों का नृत्य है, जो विवाह के अवसर पर किया जाता है ।

नाहर नृत्य

  • नाहर नृत्य भीलवाडा के माण्डलगढ में किया जाता है ।
  • यह नृत्य होली के तेहरवें दिन के बाद किया जाता है ।

सिंगवाले शेर का नृत्य

  • यह नृत्य भीलवाडा जिले के माण्डलगढ में किया जाता है ।
  • होली के अवसर पर गाँव के दो तीन व्यक्ति भूरे शरीर पर रूई लपेट कर व सींग लगाका शेर बनते है और ढोल की थाप पर नृत्य करते है ।
  • इस नृत्य का उद्भव शाहजहां के शासनकाल से माना जाता है ।

बिन्दौरी नृत्य

  • बिन्दौरी नृत्य मुख्य रूप से झालावाड जिले का है ।
  • यह नृत्य गैर शैली का नृत्य है ।
  • बिन्दोरी नृत्य होली व वीशेष रूप से विवाह के अवसर पर किया जाता है

ढोला मारू नृत्य

  • यह विशेष रूप से झालावाड क्षेत्र में किया जाने वाला ढोला मारू का नृत्य नाट्य है जो कि भवाईयों द्वारा किया जाता है ।
  • ढोला मारू भवाईयों का प्राचीन खेल है जिसमे दादरा कहवरे ढपताल का विशेष प्रयोग रहता है ।

शिकारी नृत्य

  • शिकारी नृत्य बारां जिले का प्रमुख नृत्य है
  • शिकारी नृत्य शहरिया जनजाति का प्रसिद्ध नृत्य है

लांगुरिया नृत्य

  • यह नृत्य करौली जिले का प्रमुख नृत्य है
  • लांगुरिया नृत्य धार्मिक नृत्य है ।
  • लांगुरिया नृत्य कैलादेवी के लक्खी मेले में भक्तों द्वारा किया जाता है ।
  • कैलादेवी करौली के यदुवंशी शासकों की कुल देवी है ।
  • लांगुरिया नृत्य में एक काल्पनिक पात्र होता है ।
  • इस नृत्य के वाद्य यंत्र नगाड़ा, ताशा व बीनतारा है ।

बम नृत्य

  • बम नृत्य विशेष रूप से डीग (भरतपुर) जिले में प्रसिद्ध है ।
  • यह नृत्य फाल्गुन माह में नयी फसल आने के उपलक्ष्य में किया जाता है ।
  • बम नृत्य में नगाड़ा नामक वाद्य यंत्र का प्रयोग किया जाता है । 
  • बम की धुन के साथ रसिया गाया जाने के कारण इस नृत्य को बम रसिया नृत्य भी कहते है।
  • यह नृत्य करते समय दो फुट व्यास के ढाई फुट ऊंचे नगाड़े पर खडे होकर दोनों हाथों में मोटे डण्डे (बम) लेकर बजाया जाता है । दूसरा दल वादकों का होता है । जो थाली को गिलास पर उल्टा रख कर बजाते है । तीसरा दल गायकों व नृत्यकारों का होता हैं । जो गा-गाकर नाचते है ।

चरकूला नृत्य

  • चरकूला नृत्य पूर्वी क्षेत्र विशेष रूप से भरतपुर जिले में किया जाता है
  • यह ब्रज क्षेत्र में भी प्रसिद्ध है ।
  • चरकूला नृत्य विशेष रूप से उत्तर प्रदेश का नृत्य है ।
  • चरकूला नृत्य धातु के बर्तन पर दीपक जलाकर उसको सिर पर रखके महिलाएँ करती है । नृत्य करते समय महिलाएँ हाथ में लोटा लिए होती है । आदमी इनके सामने ताली बजाते हुए नृत्य करते है । प्रारंभ में यह नृत्य कृष्ण की राधा को स्मृति में बैलगाडी के पहिए पर 108 दीपक जलाकर किया जाता था

हुरंगा नृत्य

  • भरतपुर का यह नृत्य भरतपुर जिले के आस-पास के ग्रामीण क्षेत्रों में किया जाने वाला एक स्वांग नृत्य नाटक है ।
  • जिसमें पुरुष व महिलाएँ बम ढोल की ताल पर सामूहिक रूप से नृत्य करते है ।
  • यह नृत्य होली के बाद चैत्र कृष्णा पंचमी से अष्टमी तक किया जाता है ।

खारी नृत्य

  • खारी नृत्य मुख्यत अलवर (मेवात) में लोकप्रिय है
  • यह नृत्य एक वैवाहिक नृत्य है ।
  • खारी नृत्य दूल्हन की विदाई के समय उसकी सखियों के द्वारा किया जाने वाला मनमोहक नृत्य है ।

कबूतरी नृत्य

  • चूरू का कबूतरी नृत्य है जो पेशेवर महिलाओं द्वारा किया जाता है

थाली नृत्य

  • थाली नृत्य मुख्य रूप से जोधपुर का प्रसिद्ध नृत्य है
  • यह नृत्य पाबूजी के भक्तों के द्वारा किया जाता है ।
  • थाली नृत्य के अन्तर्गत रावण हत्था वाद्य यंत्र का प्रयोग किया जाता है ।
  • इस नृत्य में नृत्यकार थाली को अंगुली पर तेज गति से घुमाते हुए नृत्य करते है।

सुगनी नृत्य

  • यह नृत्य पाली जिले के हवाली नामक स्थान पर भिगाना व गोइया आदिवासियों द्वारा श्रावण माह की बौछारों में किया जाता है ।

रण नृत्य

  • यह गौड़वाड़ (पाली) के सरंगा जाति का नृत्य है ।

डांग नृत्य

  • डांग नृत्य नाथद्वारा (राजसमन्द) का प्रसिद्ध नृत्य है
  • यह नृत्य श्रीनाथ जी के भक्तों के द्वारा होली के अवसर पर किया जाता है ।
  • डांग नृत्य एक धार्मिक नृत्य है ।
  • नाथद्वारा (राजसमन्द) में वल्लभ सम्प्रदाय की गदी स्थित है ।

मयूर/भैरव नृत्य

  • मयूर/भैरव नृत्य ब्यावर में बादशाह के मेले के दौरान बीरबल का पात्र निभाने वाला व्यक्ति बादशाह की सवारी के आगे करता हुआ चलता है ।

डिग्गीपुरी का राजा नृत्य

  • यह नृत्य टोंक डिग्गी, मालपुरा में भगवान कल्याणजी की सेवा अर्चना में उनके भक्तों द्वारा किया जाने वाला नृत्य है ।

पणघट नृत्य

  • इसे जेघड़ नृत्य भी कहते है । 
  • यह नृत्य राजस्थानी घेलपणिहारी ख्याल का मुख्य नृत्य है ।
  • गगरियां सिर पर रखकर युवतियाँ नृत्य करती है तो लोग मंत्र मुग्ध हो जाते है ।

सूकर नृत्य

  • यह आदिवासियों के द्वारा किये जाने वाला नृत्य है । आदिवासियों का लोक देवता सूकर है ।
  • यह नृत्य अब अपना अस्तित्व खोने के कगार पर है । 

सालेड़ा नृत्य

  • राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रो में समृद्धि के रूप में किया जाने वाला नृत्य

बिनौला नृत्य

  • विवाह से पूर्व किया जाने वाला नृत्य ।

चाक चांणी नृत्य

  • राजस्थान में यह अभिभावक दिवस पर परम्परा का प्रतीक लोक नृत्य है  इस नृत्य को चाक चांनणी नृत्य भी कहा जाता है ।
  • यह नृत्य गणेश चतुर्थी के पर्व पर पाठशालाओं के छात्रों द्वारा विचित्र वेशभूषा का प्रदर्शन करते हुए किया जाने वाला नृत्य हैं ।
  • इस नृत्य में छात्रों द्वारा गुरू को अपने-अपने घर ले जाकर दक्षिणा का दिया जाना तथा गणेश वन्दना करने की प्रमुख परम्परा है ।

बिगड़ नृत्य

  • किसानों द्वारा चौमासे में किया जाने वाला नृत्य बिगड नृत्य कहलाता है

गरबा नृत्य

  • गरबा नृत्य गुजरात का प्रसिद्ध लोक नृत्य है जो राज्य में बाँसवाड़ा और डूंगरपुर क्षेत्र में नवरात्रों में विशेष रूप से किया जाता है ।

धाड़ नृत्य

  • यह नृत्य केवल महिलाओ द्वारा वर्षा के देवता इंद्र को प्रसन्न करने हेतु किया जाता है ।

खोंडिया नृत्य टूटीयाँ नृत्य

  • यह गृहस्थी का नृत्य है जिसका आयोजन संपूर्ण राज्य में विवाह के अवसर पर वर की बारात वथु पक्ष के घर पर जाती है तो वर पक्ष की महिलाओं द्वारा वर के घर पर आनंद व उल्लास व शगुन के रूप में नृत्य किया जाता है ।

घूमर घूमरा नृत्य

  • घूमर-घूमरा नृत्य राजस्थान का एकमात्र शोक सूचक नृत्य है । जो केवल वागड क्षेत्र के कुछ ब्राह्मण समुदाय में किया जाता है ।

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Thursday, 18 July 2019

शेखावाटी के नृत्य Rajasthan ke Lok Nritya Part  9 by Raj GK

शेखावाटी के नृत्य 

शेखावाटी के नृत्य Rajasthan ke Lok Nritya
शेखावाटी के नृत्य Rajasthan ke Lok Nritya 

गीदड़ नृत्य 

  • गीदड़ नृत्य केवल पुरुषों के द्वारा किया जाता है ।
  • यह नृत्य होली के त्यौहार पर डाँडा रोपण से लेकर होली दहन तक किया जाता है ।
  • गीदड़ नृत्य में सर्वप्रथम गोलाकार मंडप के बीच में नगाड़ची नगाड़ा बजाता है । इसके साथ ही नृत्य शुरू होकर रात भर चलता है ।
  • गीदड़ नृत्य मे कुछ पुरुष स्त्रियों का स्वांग रचते है, जिन्हें गणगौर कहा जाता है ।
  • यह नृत्य सुजानगढ़, चुरू रामगढ, लक्ष्मणगढ़ व सीकर आदि क्षेत्रों में किया जाता है ।
  • प्रहलाद की स्थापना (डांडा रोपना) के बाद यह नृत्य शुरू हो जाता है । 

चंग नृत्य


  • चंग नृत्य शेखावटी क्षेत्र में होली के दिनों में केवल पुरुषों के द्वारा किया जाता है ।
  • प्रत्येक पुरुष के पास एक चंग होता है जिसे वे स्वयं बजाते हुए वृत्ताकार नृत्य करते है । 
  • चंग नृत्य विशेष रूप में शेखावटी-ढूढाड़ क्षेत्र में किया जाता है।

ढ़प नृत्य

  • बसंत पंचमी पर शेखावटी क्षेत्र में यह ढ़प-मंजीरे बजाते हुए किया जाने वाला नृत्य है ।

कच्छी घोडी

  • कच्छी घोडी में पेटर्न बनाने की कला अदृभुत होती है ।
  • इस नृत्य में चार-चार व्यक्ति आमने-सामने खडी पंक्तियां में पीछे हटने, आगे बढने की क्रियाएं दभूत गति से करते हैं । इस प्रकार ये एक पंक्ति में आ जाते है । इस पंक्ति में बार-बार बनने व बिगडते से ठीक वैसा ही पैटर्न बनता है जैसे की पंखुड़ियाँ खुलकर फूल बनाती है व वापस फूल से कली का बनना । कच्छी घोडी नृत्य मे घोडा बांस की ख़पच्चियों से बनाया जाता है । जिसे ढककर नृत्य कार पाँच सात की संख्या में नाचते रहते है । ये तलवारों से युद्ध करते हुए भी नाचते है । कच्छी घोडी नृत्य में कुल आठ व्यक्ति भाग लेते है । 
  • कच्छी घोडी नृत्य में प्रमुख वाद्य ढोल, नगाड़ा, बांकिया, थाली तथा झांझ का प्रयोग किया जाता है ।
  • इस नृत्य में लसर्कारेया, बींद, रसाला व रमगारिया गीत गाए जाते है ।
  • कच्छी घोडी नृत्य को सरगड़े कुम्हार , ढोली व भाँभी जातियाँ करने में प्रवीण है ।
  • इस नृत्य को मुख्य रूप से बावरी जाति द्वारा किया जाता है ।
  • यह नृत्य शेखावटी क्षेत्रों तथा कुचामन, परबतसर व डीडवाना आदि क्षेत्रों में किया जाता है । 
  • कच्छी घोडी का अर्थ है काठ की घोडी ।

लहुर-लहूर नृत्य

  • यह नृत्य मुख्यत: शेखावटी क्षेत्रों में मस्ती के माहौल में उमीगों के साथ प्रसिद्ध अभिनेता तथा अभिनेत्रियों द्वारा अभिनय नृत्य किया जाता है ।
  • लहूर शब्द को राजधानी भाषा में मीठी खुजली कहा जाता है । इस नृत्य में मूल कथानक नहीं होता है ।

जिंदाद नृत्य 

  • यह नृत्य शेखावाटी क्षेत्र में स्त्री-पुरुषों द्वारा किया जाता है । 
  • इस नृत्य में मुख्य वाद्य यंत्र ढोलकी होता है ।
Rajasthan ke Lok Nritya Part 8 | मेवाड के नृत्य

मेवाड के नृत्य

Rajasthan ke Lok Nritya Part 8 | मेवाड के नृत्य
Rajasthan ke Lok Nritya Part 8 | मेवाड के नृत्य

भवाई नृत्य

  • भवाई नृत्य उदयपुर संभाग में बसने वाली भवाई जाति का एक प्रमुख नृत्य है ।
  • यह पेशेवर लोकनृत्यों में बहुत लोकप्रिय नृत्य है ।
  • भवाई नृत्य को करने वाली भवाईं जाति की स्थापना के बारे में ऐसी मान्यता है कि 400 वर्ष पूर्व (नागोजी जाट) ने इसकी स्थापना की । 
  • भवाई नृत्य: तेज लय में विविध रंगों की पगडियो को हवा में फैला कर अपंनी उँगलियों से नृत्य करते हुए कमल का फूल बना लेना, सिर पर सात-आठ मटके रखकर नृत्य करना, जमीन पर रखे रूमाल को मुँह से उठाना, गिलास पर नाचना, थाली के किनारों पर तेज नृत्य करना, तेज तलवार की धार पर नृत्य करना, कांच के टुकडों पर नृत्य करना आदि इनकी प्रमुख विशेषता है ।
  • यह नृत्य स्त्री-पुरुष दोनों मिलकर करते है ।
  • भवाईं नृत्य में कई प्रकार के प्रसंग होते है बोरा बोरी, सूरदास, लोडी बडी, डोकरी , शंकरिया, बीका जी, बाघा जी  ढोलामारू ।
  • भवाईं नृत्य के प्रमुख कलाकार रूपसिंह शेखावत, अस्मिता काला, दयाराम, तारा शर्मा आदि है । 
  • यह लोक नाट्य एक व्यावसायिक लोक नाट्य है जिसमें पात्र रंगमंच पर आकर अपना परिचय नहीं देते 
  • भवाई नृत्य में शास्त्रीय कला की झलक मिलती है ।
  • यह नृत्य राजस्थान के अलावा गुजरात में तुरी जाति के लोगों द्वारा तथा मध्यप्रदेश में डाकलिये व पाट भवाईं जाति के लोगों द्वारा भी किया जाता है ।
  • भवाई शैली का शांता गाँधी द्वारा लिखे गए नाटक जस्मा ओडन (आम आदमी के संघर्ष की कथा) को भारत के बाहर विदेशों (लंदन/इंग्लैण्ड व जर्मनी) में भी मंचित किया जा चुका है ।
  • भवाईं नृत्य मूलत: मटका नृत्य था, किन्तु भवाई जाति के व्यक्तियों द्वारा किया जाने के कारण इसका नाम भवाई नृत्य पडा ।
  • अस्मिता काला (जयपुर की बाल कलाकार जिसने 111 घडे सिर पर रखकर नृत्य करके लिम्का बुक आँफ रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज कराया । ) पुष्पा व्यास (जोधपुर प्रथम भवाई महिला नृतक) आदि है ।
  • भीलवाडा के निहाल अजमेरा ने अपनी पोती वीणा को भवाई नृत्य में प्रवीण करते हुए 63 मंगल कलश का नृत्य करवाया, जिसे ज्ञानदीप नृत्य नाम दिया ।

रण नृत्य

  • रण नृत्य वीर रस का पुरुष प्रधान नृत्य है
  • इसे सरगड़े जाति के पुरुष करते है ।
  • रण नृत्य में दो पुरुष हाथों में तलवार आदि शस्त्र लेकर युद्ध कौशल का प्रदर्शन करते हुए इस नृत्य को करते है ।
  • यह नृत्य मेवाड क्षेत्र में विशेष रूप से प्रसिद्ध है ।
  • रण नृत्य गोडवाड के सरंगो द्वारा भी किया जाता है ।

हरणों नृत्य

  • यह नृत्य मेवाड क्षेत्र में दीपावली के अवसर पर बालकों द्वारा किया जाता है ।
  •  इस नृत्य को लोवडी भी कहा जाता है ।

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Wednesday, 17 July 2019

Rajasthan ke Lok Nritya Part 7 | मारवाड़ क्षेत्र के नृत्य

मारवाड़ क्षेत्र के नृत्य

Lok Nritya मारवाड़ क्षेत्र के नृत्य
Rajasthan ke Lok Nritya Part 7 | मारवाड़ क्षेत्र के नृत्य

घुडला नृत्य

  • घुडला नृत्य विशेष रूप से जोधपुर जिले में किया जाता है । 
  • यह नृत्य युवतियों के द्वारा किया जाता है । 
  • घुड़ला नृत्य में स्त्रियाँ सुंदर श्रृंगार करके गोलाकार पथ पर नृत्य करती है । 
  • घुड़ला नृत्य करते समय महिलाओँ के सिर पर छिद्रित मटके रखे होते है । जिनमें जलता हुआ दीपक रखा जाता है । इस मटके को ही घुड़ला कहते हैं ।
  • इसमें चाल मंद व मादक होती है व घुड़ले को नाजुकता से संभाला जाता है, जो दर्शनीय है । 
  • घुड़ला नृत्य से एक कथा जुडी हुईं है एक बार मारवाड़ के पीपाड़ा नामक स्थान पर स्त्रियाँ तालाब पर गोरी पूजन कर रही थी तभी अजमेर का सूबेदार मल्लू खाँ 140 कन्याओं का हरण करके ले जाता है । जोधपुर नरेश सातल देव ने इनका पीछा किया । इनका भयंकर युद्ध हुआ, जिसमे मल्लू खाँ के सेनापति घुडले का सिर छिद्रित कर सातल देव द्वारा लाया गया तब से यह नृत्य किया जाता है ।
  • शीतला अष्टमी (चैत्र कृष्णम-8) पर घुडले का त्यौहार मनाया जाता है ।
  • घुड़ला नृत्य को सर्वप्रथम मारवाड़ में घुड़ले खाँ की बेटी गिंदोली ने गणगौर उत्सव के समय शुरू किया था । 
  • यह नृत्य दिन में नहीं अपितु रात्रि में किया जाता है ।

डांडिया नृत्य

  • डांडिया नृत्य मारवाड़ क्षेत्र का लोकप्रिय नृत्य है । 
  • यह मूलत गुजरात का नृत्य है ।
  • डांडिया नृत्य पुरुषों के द्वारा किया जाता है ।
  • यह नृत्य होली के बाद शुरू होता है
  • डांडिया नृत्य में चौक के बीच 21 हनाई वादक, नगाडी व शहनाई वादक बैठते है । बीस-पच्चीस पुरुषों की टोली हाथों में डांडिया टकराते हुए वृत में आगे बढते हैं ।
  • डांडिया नृत्य में किये जाने वाले विभिन्न स्वांग करते है ।
  • डांडिया नृत्य में धमाल, नृत्य प्रधान गीत है । इन गीतों में बड़ली के भैरुजी का गुणगान करते है ।

झाँझी नृत्य

  • यह नृत्य मारवाड़ क्षेत्र में महिलाओँ के द्वारा किया जाता है ।
  • झाँझी नृत्य के अन्तर्गत छोटे मटकों मे छिद्र करके महिलाएं समूह में उनको धारण करके यह नृत्य करती है । 

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Sunday, 14 July 2019

Rajasthan ke Lok Nritya Part 6 | राजस्थान के लोक नृत्य

नट जाति के नृत्य

Rajasthan ke Lok Nritya Part 6 | राजस्थान के लोक नृत्य
Rajasthan ke Lok Nritya Part 6 | राजस्थान के लोक नृत्य

कठपुतली नृत्य 

  • यह नृत्य नट जाति के लोग करते है ।
  • कठपुतली नचाने वाला नट अपने हाथ में डोरियों का गुच्छा थाम कर नृत्य संचालन करता है ।

'मोर/शारीरिक नृत्य

  • यह नृत्य नट जाति के द्वारा किया जाता है । 
  • इस नृत्य में नट अपनी शारीरिक कौशल का प्रदर्शन करते है ।

मेवों के नृत्य 

रणबाजा नृत्य  

  • मेव जाति में प्रचलित एक विशेष नृत्य है । 
  • रणबाजा नृत्य में स्त्री-पुरुष दोनों भाग लेते है । 

रतबई नृत्य 

  • यह अलवर क्षेत्र की मेव महिलाओं द्वारा किया जाने वाला नृत्य है 
  • इस नृत्य में महिलाएँ सिर पर इंडोणी व सिरकी (खारी)रखकर नृत्य करती है ।
  • रतबई नृत्य में पुरुष (अलागोजा दमामी (टामक) वाद्य यंत्र बजाते है तथा स्त्रियाँ हरी चूडियों को खनखनाती है ।

कामड जाति के नृत्य 

तेरहताली नृत्य


  • तेरहताली नृत्य बाबा रामदेव के भोपे (कामड़ जाति के) जो बाबा की अराधना में रात को लीलाएँ,ब्यावले तथा यशोगाथाएं गाते है । तेरहताली नृत्य में कामड़ स्त्री नौ मंजीरे अपने दाएँ पाँव पर, दो मंजीरे दोनों हाथ की (एक-एक) कोहनी पर बाँधती है । दो मंजीरे दोनों हाथों में एक-एक रखती हैं इस प्रकार तेरहमंजीरों के साथ इस नृत्य को किया जाता है ।
  • इस नृत्य में पुरुष (मंजीरा तानपुरा व चौतारा) बजाते है । तेरहताली नृत्य के प्रमुख कलाकार माँगी बाई, मोहनी, नारायणी, लक्ष्मणदास कापड आदि है ।
  • तेरहताली नृत्य पोकरण, डीडवाना, डूंगरपुर आदि स्थानों पर किया जाता है
  • इन्होनें 1954 ईं. मे जवाहरलाल नेहरू के समक्ष गाडिया लौहार सम्मेलन में तेरहताली नृत्य प्रस्तुत किया ।

हरीजन जाति के नृत्य

बोहरा बोहरी नृत्य 

  • यह नृत्य होली के अवसर पर हरिजन जाति में किया जाता है ।  
  • इस नृत्य में दो पात्र बोहरा (बोरा) एवं बोहरी (बोरी) होते है । 

घुमन्तु जाति के नृत्य 

बालदिया नृत्य


  • बालदिया एक घुमन्तु जाति है जो गेरू को खोदकर बेचने का व्यापार करती है
  • यह नृत्य गेरू को खोदकर बेचने के व्यापार को चित्रित करती है ।

माली समाज का नृत्य 

चरवा नृत्य 

  • माली समाज की स्त्रियों के द्वारा किसी स्त्री  के संतान होने पर कांसे के घडे में दीपक रखकर उसे सिर पर धारण कर चरवा नृत्य किया जाता है ।
  • सामान्यत  काँसे के घडे चरवा के कारण ही इसका यह नाम पडा 

मछली नृत्य 

  • बणजारा जाति के लोगों द्वारा किया जाने वाला नृत्य ।
  • मछली नृत्य पूर्णिमा की चांदनी रात को बनजारों के खेमों में किया जाने वाला नृत्य नाटक है ।

कुम्हार जाति के नृत्य 

चाक नृत्य


  • चाक नृत्य विवाह के समय कुम्हार के घर चाक (घडे) लेने जाते समय महिलाएं करती है ।

भांड जाति के नृत्य 

नकल नृत्य 

  • भांड जाति के लोग नकल नृत्य करते है । 

गोगा नृत्य


  • गोगा नृत्य गोगा नवमीं (भाद्रकृष्ण नवमी) पर किया जाता है ।
  • इस नृत्य में चमार लोग जो गोगा जी के भक्त होते हैं वे एक जुलूस निकालकर उसमें नृत्य करते है । इसके नृत्य बडे उत्तेजक होते है ।
  • गोगा नृत्य में गोगा भक्त अपनी पीठपर सांकल से मारते है । सिर पर भी उसे चक्कर खाते हुए मारते है इस नृत्य में इनकी मीठ जख्मी हो जाती है ।
  • गोगा नृत्य मे ढोल-डैरू नामक वाद्य यंत्र का प्रयोग किया जाता है

भोपों के नृत्य  

  • राजस्थान में गोगाजी पाबूजी, देवी जी हड़भूजी भैरू जी आदि के भोपे-भोपिन इनकी फड के सामने इनकी गाथा का वर्णन करते हुए नृत्य करते है । 

वीर तेजा नृत्य


  • वीर तेजा नृत्य तेजा जी की अराधना में कच्छी घोडी पर सवार होकर तलवार से युद्ध कौशल प्रदर्शन करते हुए गले में सर्प डालकर-छतरी व भाला हाथ में लेकर तेजा जी की कथा के साथ पुरुषों द्वारा किया जाने वाला नृत्य है ।
  • तेजाजी के नृत्य के अंत में तेजा भगत नाग को अपनी जीभ पर कटवाते है ।
  • तेजाजी के नृत्य में अलगोजा-ढोलक-मंजीरा नामक वाद्य यंत्रों का प्रयोग किया जाता है

साँसियों के नृत्य 

  • इनके नृत्य अटपटे तथा कामुकतापूर्ण होते है । लेकिन इनका अंग संचालन उत्तम होता है ये नृत्य उल्लास एवं मनोरंजन की दृष्टि से उत्तम होते हैं ।

मीणों के नृत्य

  • मीणा जाति के नृत्यों में वाद्य यंत्र बडे आकार का नगाडा होता है । मीणा जाति के प्रमुख नृत्य रसिया लागुरिया नृत्य है ।

गाडिया लुहारों का नृत्य


  • इनके नृत्यों में सामूहिक संरचना न होकर गीत के साथ स्वच्छंद रूप से नृत्य किया जाता है ।

Thursday, 11 July 2019

Rajasthan ke Lok Nritya - Part 5

कालबेलियों के नृत्य  

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Rajasthan ke Lok Nritya

इंडोणी नृत्य

  • इंडोणी नृत्य स्त्री-पुरुष दोनों मिलकर करते है ।
  • यह नृत्य गोलाकार पथ पर पुंगी, खंजरी वाद्य यंत्र के साथ किया जाता है ।
  • इंडोणी घडे व सिर के बीच रखी जाने वाली एक गोलाकार वस्तु होती है ।
  • इंडोणी नृत्य में औरतो की पोशाकें बडी कलात्मक होती हैं तथा इनके वदन पर मणियों की सजावट रहती है ।

पणिहारी नृत्य

  • पणिहारी नृत्य पणिहारी गीत पर आधारित एक युगल नृत्य है ।
  • इस नृत्य के प्रमुख वाद्य ढोलक, बाँसुरी है ।
  • इसमें पनिहारिन स्त्रियाँ अपने सिर पर 5-7 मटके रखकर नृत्य करती है ।

शंकरिया नृत्य

  • यह प्रेम कथा पर आधारित स्त्री-पुरुषों का नृत्य है ।
  • इस नृत्य में अंग संचालन बहुत सुन्दर होता है ।
  • इस नृत्य की प्रमुख नृत्यांगना कंचन, सपेरा, गुलाबो, कमली एवं राजकी है ।

बांगडिया नृत्य

  • कालबेलिया महिलाओ द्वारा यह नृत्य भीख माँगते समय किया जाता है ।
  • बागडिया नृत्य में मुख्य वाद्य यंत्र चंग होता है ।
  • गुलाबों कालबेलिया नृत्य की अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कलाकार है ।

सहरिया जाति के नृत्य

झेला नृत्य

  • झेला नृत्य शाहबाद (बाराँ) की सहरिया जनजाति की स्त्री व पुरुषों (युगल जोडी) द्वारा सम्मिलित रूप से खेतों पर फसल की पकाई के समय किया जाता है ।

लहंगी नृत्य

  • सहरिया जनजाति के द्वारा किया जाने वाला नृत्य ।

सांग नृत्य

  • सहरिया जनजाति का सांग नृत्य एक युगल नृत्य है, जिसमें स्त्री-पुरुष दोनों सम्मिलित रूप से नृत्य करते है ।


बिछवा नृत्य

  • बिछवा नृत्य सहरिया जनजाति की केवल स्त्रियों का नृत्य हैं, जो महिलाओ द्वारा समूह में किया जाता है ।

इंद्रपरी नृत्य

  • इंद्रपरी नृत्य सहरिया जनजाति का नृत्य है जिसमें रागिनी गीत गाया जाता है । 
  • इस नृत्य का आयोजन विवाह के अवसर पर किया जाता है ।

शिकारी नृत्य

  • इस नृत्य में पुरुष शिकार काने का नाटक करते हैं तथा शिकार हो जाने पर शिकार के चारों और नृत्य करते हैं अत: यह नृत्य नाटिका है ।

बणजारा जाति के नृत्य 

मछली नृत्य  

  • मछली नृत्य एक नृत्य नाटक एवं धार्मिक नृत्य है जो हर्षोल्लास से शुरू होता है, लेकिन दुःख के साथ समाप्त होता है । 
  • यह नृत्य बाडमेर का प्रसिद्ध है, क्योंकि सर्वाधिक बणजारा जाति बाडमेर में रहती है ।

कंजर जाति के नृत्य

चकरी मृत्य

  • कंजर युवतियों द्वारा किया जाने वाला चक्राकार नृत्य है ।
  • इस नृत्य में प्रमुख वाद्य ढ़प (ढोलका) , मंजीरा, नगाड़ा है । चकरी नृत्य हडौती अंचल का प्रसिद्ध नृत्य है ।
  • चकरी नृत्य में महिलाएं अपने प्रियतम से श्रृंगार की वस्तु लाने के लिए कहती है ।
  • चकरी नृत्य की प्रमुख कलाकार शांति, फुलवा तथा फिलमा बाई है । 
  • इस नृत्य में मुख्यत: अविवाहित युवतियाँ ही भाग लेती है ।

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Tuesday, 9 July 2019

Rajasthan ke Lok Nritya - Part 4 | कथौडी जाति or गुर्जरों के नृत्य

कथौडी जाति के नृत्य


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मावलिया नृत्य

  • मावलिया नृत्य नवरात्रा मे नौ दिनो तक 10-12 पुरुषो द्वारा किया जाता है ।
  • यह नृत्य ढोलक, बाँसुरी की लय पर देवी-देवताओं के गीत गाते हुए किया जाता है।
  • कथौडी जाति के लोग इसमें समूह बनाकर 'गोल-गोल नृत्य करते है ।

होलो नृत्य

  • यह नृत्य होली के अवसर पर महिलाओं द्वारा किया जाने वाला प्रमुख नृत्य है ।
  • होली के अवसर पर यह नृत्य लगातार 7 दिनों तक चलता है । 
  • होली नृत्य में पुरुष ढोलक पावरी बाँसुरी आदि बजाते है । होली नृत्य में महिलाएं नृत्य के दौरान एक दूसरे के कंधे पर चढ़कर पिरामिड भी बनाती है ।
  • कचौडी जनजाति मूलत: महाराष्ट्र से आकर राजस्थान में उदयपुर की झाडोल व कोटड़ा तहसीलों में बसी हुई है ।
  • यह जाति कैर वृक्ष से कत्था तैयार करती है, इसलिए इस जाति का नाम कैथोडी है ।

गुर्जरों के नृत्य 

चरी नृत्य


  • चरी नृत्य गुर्जर जाति का प्रसिद्ध नृत्य है । 
  • इस नृत्य में स्त्रियाँ सिर पर कलश व उसमें काकड़े (कपास) के बीज में तेल डालकर आग लगाती है। इस कलश से आग की लपटें निकलने लगती है ।
  • स्त्रियाँ लपट निकलते कलश को सिर पर रखकर हाथ की कलाइयों को घूम-घूम कर नृत्य करती है । 
  • चरी नृत्य मे ढोलक, ढोल बाँकिया आदि वाद्य यंत्रों का प्रयोग किया जाता है।
  • चरी नृत्य मुख्य रूप से किशनगढ (अजमेर) का है ।
  • यह नृत्य गणगौर, जन्म, विवाह आदि अवसरों पर किया जाता है ।
  • चरी नृत्य अब व्यावसायिक रूप ग्रहण कर चुका है ।
  • किशनगढ़ की फलकूबाई चरी नृत्य की लोकप्रिय कलाकार है । वर्तमान में श्री मोहन सिंह गौड़ व कुमारी सुनीता रावत इसके प्रमुख कलाकार है ।
  • चरी नृत्य अतिथि सत्कार के लिए भी किया जाता है ।
  • यह नृत्य मांगलिक अवसरों पर किया जाता है, जिसें गुर्जर जाति पवित्र मानती है ।
  • चरी नृत्य में स्त्रियाँ सात चरियां (पीतल के घडे) रखकर नृत्य करती है ।

झूमर नृत्य 

  • गुर्जर और अहीर जाति में यह नृत्य आज भी जीवित है ।
  • झूमर नृत्य पुरुषों का वीर रस प्रधान नृत्य है ।
  • यह नृत्य धार्मिक मेलों आदि के अवसरों पर किया जाता है ।
  • यह नृत्य कोटा-बूंदी में मुख्य रूप से स्त्रियों द्वारा सामाजिक पर्वो व त्यौहारों पर किया जाता है ।
  • इसमें झूमरा नामक वाद्य यंत्र का प्रयोग होने के कारण इसे झूमर नृत्य कहा जाता है ।

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Sunday, 7 July 2019

Rajasthan ke Lok Nritya - Part 3 | गरासिया जाति के नृत्य

गरासिया जाति के नृत्य

गरासिया जाति के नृत्य

मोरिया नृत्य

  • विवाह के अवसर पर गणपति स्थापना के पश्चात रात्रि को किया जाने चाला नृत्य है ।
  • मोरिया नृत्य पुरुषों द्वारा किया जाता है ।

मांदल नृत्य

  • यह गरासिया महिलाओ द्वारा किया जाने वाला वृत्ताकार नृत्य हैं 
  • इस नृत्य में मांदल वाद्य यंत्र का प्रयोग किया जाता है ।

वालर नृत्य

  • वालर नृत्य स्त्री-पुरुष द्वारा किया जाने वाला प्रसिद्ध नृत्य है । 
  • इस नृत्य को बिना वाद्य यंत्र के धीमी गति से किया जाता है ।
  • वालर नृत्य में दो अर्द्धवृत बनते है, बाहर के अर्द्धवृत में पुरुष तथ अन्दर के अर्द्धवृत में महिलाएं होती है ।
  • वालर नृत्य का प्रारम्भ एक पुरुष हाथ में छाता या तलवार लेकर करता है। 
  • इस नृत्य में पुरुष-स्त्रियाँ गीत के साथ नृत्य प्रारम्भ करते हैं । पुरुषों के गीत की पंक्ति की समाप्ति से एक पंक्ति पहले स्त्रियाँ गीत उटा लेती है । 
  • वालर नृत्य विशेष कर सिरोही क्षेत्र में किया जाता है ।
  • इस नृत्य में नर्तक व नर्तकी अपने आगे वाले नर्तक व नर्तकी के कंधे पर अपना दायाँ हाथ रखते है । 
  • वालर नृत्य को गरासिया घूमर भी कहते है । 
  • पडियाँ कौढी काल जैसे गीतों के साथ यह नृत्य सम्पन होता है । 
  • यह नृत्य विवाह के अलावा हौली व गणगौर पर भी किया जाता है ।

लूर नृत्य

  • लूरु नृत्य गरासिया महिलाओ द्वारा मुख्यत: मेले व शादी के अवसर पर किया जाता है ।
  • गरासिया स्त्रियों में इस नृत्य को मुख्यत लूर गोत्र की स्त्रियों द्वारा किया जाता है ।
  • लूर नृत्य में एक दल (वर पक्ष) दूसरा दल (वधू पक्ष) से रिश्ते की माँग करता हुआ नृत्य करता है ।
  • यह नृत्य घूमर नृत्य का ही एक रूप है ।

कूद नृत्य

  • गरासिया स्त्रियो-पुरुषो द्वारा सम्मिलित रूप में किया जाता है ।
  • कूद नृत्य बिना वाद्य के किया जाता है ।
  • कूद नृत्य करते समय तालियों का प्रयोग किया जाता है ।

गौर नृत्य

  • गौर नृत्य गणगौर के अवसर पर गरासिया स्त्री-पुरुष द्वारा किया जाने वाला आनुष्ठानिक नृत्य है ।
  • यह नृत्य गणगौर के अवसर पर शिव-पार्वती (गण-गौर यानि शिव पार्वती) को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है ।

जवारा नृत्य

  • होली दहन से पूर्व स्त्री पुरुषों द्वारा किया जाने वाला सामूहिक नृत्य है ।
  • यह नृत्य गोल घेरा बनाकर ढोल के गहरे घोष के साथ किया जाता है ।
  • इस नृत्य में स्त्रियाँ हाथ में जवारों की बालियाँ लिए नृत्य करती है । 

रायण नृत्य

  • इसमें नर्तक केवल पुरुष होते है जो महिलाओं के वेश धारण कर नृत्य करते है ।

गर्वा नृत्य

  • गर्वा नृत्य गरासिया जाति की स्त्रियों के द्वारा किया जाता है
  • गर्व नृत्य मुख्य रूप से उदयपुर-सिरोही में किया जाता है गर्वा नृत्य गरासियों का अत्यन्त मोहक नृत्य है ।

बेरीहाल नृत्य 

  • उदयपुर के खैरचाड़ा के पास भाण्दा गाँव में रंग पंचमी को विशाल आदिवासी मेले का मुख्य आकर्षण बेरीहाल नृत्य है ।

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