Thursday, 7 November 2019

Rajasthan ke Pramukh Granth - राजस्थान के प्रमुख ग्रंथ PDF

राजस्थान के प्रमुख ग्रंथ

Rajasthan ke Pramukh Granth - राजस्थान के प्रमुख ग्रंथ
Rajasthan ke Pramukh Granth - राजस्थान के प्रमुख ग्रंथ

पृथ्वीराज रासौ - कवि चंद बरदाई


  • चन्द बरदाई दिल्ली के अन्तिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान का दरबारी कवि था ।
  • इस ग्रन्थ में अजमेर के अन्तिम चौहान सम्राट पृथ्वीराज चौहान तृतीय के जीवन चरित्र एवं युद्धों का वर्णन है । 
  • पृथ्वीराज रासौ पिंगल में रचित वीर रस का महाकाव्य है । 
  • पृथ्वीराज रासौ ढाईं हजार पृष्ठों का वृहद ग्रन्थ है ।
  • इसके उत्तरार्द्ध की रचना चन्दबादाई के पुत्र जल्हण/जयानक ने की थी ।

पृथ्वीराज विजय - जयनायक

  • इसमें पृथ्वीराज चौहान के वंशक्रम एवं उपलब्धियों का वर्णन है ।

पद्मावत - मलिक मोहम्मद जायसी

  • इसकी रचना लगभग 1543 ईं. में की गई 
  • पद्मावत में अलाउद्दीन खिलजी एवं रतनसिंह के माध्य हुए युध्द ( 1301 ई० ) का वर्णन है ।

विजयपाल रासौ - नल्लसिंह

  • यह ग्रन्थ पिंगल भाषा में है ।
  • इसमें विजयगढ (करौली) के यदुवंशी राजा विजयपाल की दिग्विजय का वर्णन है ।

वचनिका राठौड़ रतन सिंह महेसदासोतरी - जग्गा खिडिया

  • यह ग्रन्थ डिंगल भाषा में है ।
  • इसमें जोधपुर महाराजा जंसवत सिंह मुगल सम्राट शाहजहां के विद्रोही उत्तर औरंगजेब व मुराद की संयुक्त सेना के बीच धरमत के युद्ध का वर्णन है ।

वेलि किसन रूकमणि री - पृथ्वीराज राठौड़

  • पृथ्वीराज राठौड पीथल नाम से रचना करते थे ।
  • पृथ्वीराज राठौड़ बीकानेर रायसिंह के छोटे भाई थे ।
  • दूरसा आढा ने वेलि किसन रूकमणि री ग्रन्थ को पांचवा वेद कहा है ।

विरूद छतहरी, किरतार बावनौ कवि दूरसा आढा

  • दुरसा आढा अकबर के दरबारी कवि थे ।
  • दुरसा आढा की पीतल की मूर्ति अचलगढ के अचलेश्वर मंदिर में विद्यमान है ।
  • विरूद छतहरी में महाराणा प्रताप की शौर्य गाथा है ।
  • किरतार बावनौ में उस समय की समाजिक एवं आर्थिक स्थिति का वर्णन है ।

अजीतोदय जगजीवन भट्ट

  • अजीतोदय नामक ग्रन्थ ' संस्कृत ' भाषा में है ।
  • महाराजा जसवंत सिंह व अजीत सिंह के मुगल संबधों का वर्णन है ।

आईने अकबरी और अकबर नामा - अबुल फजल

  • अबुल फजल अकबर के नव रत्वों में से एक था ।
  • आईने अकबरी अकबर की जीवनी है ।
  • अकबर नामा में तैमूर से हुमायूं तक के वंश का इतिहास दिया हुआ है
  • अबुल फजल द्वारा लिखे राये अकबर को पत्रों के कारण वह रूक्कत ए अबुल फजल कहलाता है ।

कनक सुंदरी/केसर विलास - शिव चन्द भरतिया

  • शिव चन्द भरतिया को आधुनिक राजस्थानी उपन्यास साहित्य का प्रवर्तक माना जाता है ।
  • कनक सुन्दरी को राजस्थानी भाषा का प्रथम उपन्यास माना जाता है ।

अचलदास खीची री वचनिका - शिव दास गाडण


  • इसकी रचना डिंगल भाषा में हुई ।
  • इस ग्रन्थ में माण्डू के सुल्तान हौशंगशाह एवं गागरौन के शासक अचलदास खीची के मध्य हुए युध्द ( 1423 ) का वर्णन है ।

वंश भास्कर सूर्यमल्ल मिश्रण

  • 'वंश भास्कर' बूंदी राज्य का पद्यात्मक इतिहास है  
  • वीर रस के कवियों में सूर्य मल्ल के टक्कर का दूसरा कवि नहीं है ।
  • वंश भास्कर को पूर्ण करने का कार्य इनके दत्तक पुत्र मुरारीदान ने किया था ।
  • सूर्यंमल्ल स्वतंत्रता प्रेमी व वीर रस के प्रेमी होने के कारण वीर रसावतार कहलाये ।

'वीर विनोद - कविराज श्यामलदास दधिवाडिया

  • वीर विनोद ग्रन्थ चार खण्डों में रचित है । वीर विनोद नामक रचित ग्रन्थ को ब्रिटिश सरकार द्वारा केसर -ए-हिन्द की उपाधि प्रदान की गई ।
  • मेवाड़ के महाराणा सज्जन सिंह ने श्यामलदास को कविराज एवं 'महामहोपाध्याय' की उपाधि प्रदान की 

चेतावनी रा चुगटिया केसरीसिंह बारहठ

  • इस ग्रन्थ मे रचित दोहों के माध्यम से केसरी सिंह बारहठ ने मेवाड के स्वाभिमानी महाराज फतेहसिंह को 1903 ईं. के दिल्ली दरबार में जाने से रोका था ।

वीर सतसई - सूर्यंमल्ल मिश्रण

  • इस ग्रन्थ में सूर्यंमल्ल मिश्रण ने 1857 की घटनाओं को व्यवस्थित तरीके से प्रस्तुत किया था ।

रूकमणी हरण, नागदमण - सायांजी झूला

  • सायांजी ने डिंगल भाषा में इसकी रचना की ।
  • सायांजी ईंडर नरेश राव कल्याणमल के आश्रित कवि थे ये श्रीकृष्ण के भक्त थे ।

राव जैतसी रो छंद - बीठू सूजाजी

  • डिंगल भाषा के इस ग्रन्थ की रचना में बाबर के पुत्र कामरान व बीकानेर नरेश राव जैतसी के मध्य हुए युद्ध का वर्णन है ।

रणमल छंद - श्रीधर व्यास

  • इसमें पाटन के सूबेदार जफर खाँ व ईंडर के राठौड़ राजा रणमल के युद्ध का वर्णन है ।

शारंगधर संहिता - शारंगधर

  • यह संस्कृत भाषा का प्रसिद्ध आयुर्वेदिक ग्रन्थ है । 

बीसलदेव रासौ - नरपति नाल्ह

  • इस ग्रन्थ में अजमेर के चौहान शासक वीसलदेव (विग्रहराज चतुर्थ) एवं उनकी रानी राजमती की प्रेम गाथा का वर्णन है ।

राजस्थान के रणबांकुरे - राजेद्र सिंह राठौड़

  • इस पुस्तक में कारगिल युद्ध में वीरता का परिचय देने वाले राजस्थान के 92 शहीदों का वर्णन किया गया है ।

बिहारी सतसई - महाकवि बिहारी

  • बिहारी का जन्म मध्यप्रदेश में हुआ था । बिहारी जयपुर नरेश मिर्जाराजा जयसिंह के दरबारी कवि थे 
  • इस ग्रन्थ की रचना बिहारी ने ब्रज भाषा में की थी
  • बिहारी सतसई में कूल 713 दोहे है ।

बांकीदास री ख्यात - बांकीदास

  • बांकीदास जोधपुर के महाराजा मानसिंह के काव्य गुरू थे ।

कुवलयमाला - उद्योतनसूरी

  • उद्योतन सूरी ने इस ग्रन्थ की रचना जालौर में की थी ।

प्राचीन लिपिमाला, राजपूताने का इतिहास - गोरीशंकर ओझा

  • पं. गौरीशंकर ने हिन्दी में सर्वप्रथम भारत लिपि का शास्त्र लेखन कर अपना नाम गिनीज बुक में लिखवाया ।

 हम्मीर महाकाव्य - नयनचन्द्र सूरी

  • सूरी ने इस ग्रन्थ की रचना संस्कृत भाषा में की थी । हम्मीर महाकाव्य में रणथम्भौर के चौहान शासकों का वर्णन है ।

दयालदास री ख्यात - दयालदास सिढायच

  • इसमें बीकानेर व जोधपुर के राठौड़ के इतिहास का वर्णन है।
  • दयालदास री ख्यात दो खण्डों में विभाजित है ।

हम्मीर रासौ - शारंगधर (जोधराज)

  • इस काव्य ग्रन्थ मे रणथम्भौर शासक हम्मीर चौहान की वंशावली व अलाउद्दीन खिलजी के साथ युद्ध एवं उनकी वीरता का वर्णन है ।
  • यह संस्कृत भाषा में है ।

ढोला मारू रा दूहा कवि कल्लोल

  • कवि कल्लोल ने इसकी रचना डिंगल भाषा मे की थी । इस ग्रन्थ मे ढोला एवं मरवण के प्रेमाख्यान का वर्णन है ।

गजगुणरूपक/गुणरूपक - केशवदास गाडण

  • इसमें जोधपुर के महाराजा गजराज सिंह के राज्यवैभव एवं युद्धों का वर्णन है ।

सूरज प्रकाश - कविया करणीदान

  • ' सूरज प्रकाश ‘ में जोधपुर के राठोड वंश के प्रारम्भ से लेकर महाराजा अभयसिंह के समय की घटनाओं का वर्णन है ।

भरतेश्वर बाहुबलि घोर - वज्रसैन सूरी

  • यह घोर राजस्थानी भाषा का प्राचीनतम ग्रन्थ है । 

मुहणोत/मूता नैणसी री ख्यात/ मारवाड़ रा परगना री विगत मुहणौत नैणसी

  • मुंशी देवी प्रसाद ने मुहणौत नैणसी को जसवंतसिंह-प्रथम का दीवान बताया है ।
  • मुंशी देवी प्रसाद ने नैणसी को राजपूताने का अबुल फजल कहा 
  • मारवाड़ रा परगना री विगत को 'राजस्थान का गजेटियर कहा जाता है ।
  • नेणसी री ख्यात उत्तर-मध्य युगीन राजस्थानी भाषा में लिखी गई ख्यात है ।


राजरूपक - बीरभाण

  • यह डिंगल भाषा का ग्रन्थ है ।
  • राजरूपक में महाराणा अभयसिंह और गुजरात के सूबेदार शेर विलन्द खाँ के युद्ध का वर्णन है ।
  1. तारीख-उल-हिन्द - अलबरुनी

तारीख-ए-यामिनी - अलउतबी

  • मुहम्मद गजनबी के राजपूतों के साथ हुए संघर्षो की जानकारी प्राप्त होती है ।

तारीख-ए-अलाईं/ख़जाईंनुल-फुतुह - अमीर खुसरो

  • इस ग्रन्थ में अलाउद्दीन खिलजी एवं मेवाड के राणा रतनसिंह के युद्ध एवं सती प्रथा का वर्णन किया गया है । 

तारीख-ए-शेरशाही - अब्बास खाँ सरवानी

  • इस ग्रन्थ में सुमेल गिरी युद्ध (शेरशाह द्वितीय एवं जोधपुर के राव मालदेव के मध्य) का वर्णन किया गया है
  • अब्बास खाँ सरवानी युद्ध के समय शेरशाह की सेना में मौजूद था

Rajasthan ke Pramukh Granth - राजस्थान के प्रमुख ग्रंथ

  1. तारीख ए फिरोजशाही - जियाउद्दीन बरनी
  2. तारीख ए फरिश्ता - मुहम्मद कासिम फरिश्ता
  3. तुजुक ए जहाँगीर - मुगल सम्राट जहाँगीर
  4. हुमायूँनामा - गुलबदंन बेगम
  5. सफीनत उल औलिया - दारा शिकोह
  6. ताज उल नासिर - हसन निजामी
  7. मुन्तखाब उल तारीख - अब्दुल कादिर बदायूँनी
  8. नासिर ए जहाँगीरी - कामगार हुसैन
  9. तबकात ए अकबरी - निजामुद्दीन बख्शी
  10. नासिर ए आलमगिरी - मुहम्मद साकी
  11. आलमगीर नामा - मुहम्मद काजिम
  12. रूक्कात ए आलमगिरी - सम्राट औरंगजेब
  13. इकबाल नामा - मुहम्मद खान
  14. पादशाह नामा - अब्दुल हमीद लाहौरी
  15. तवारिख ए अल्फी - मुल्ला दाउद
  16. तारीख ए मुबारकशाही - अहमद अब्दुल्ला सरहिंदी
  17. तारीख़ ए नासिरी - मिनहाजउद्दीन
  18. फुतुहा ए आलमगिरी - ईश्वर दास नागर
  19. शाहजहांनामा -  इनायत खाँ
  20. गुलिस्तां - शेख सादी
  21. कान्हड़दे प्रबंध - पद्मनाभ
  22. गंगा लहरी - पृथ्वीराज राठौड
  23. वैराग्य सागर - ऩागरीदास
  24. रूठी रानी - केसरी सिंह बारहठ
  25. राव जैतसी रो छंद - वीठू सूजा जी 
  26. हालां झाला री कुण्डलियाँ - ईसरदास बारहठ 
  27. बेलि किसण रूकमणि री - राठौड पृथ्वीराज
  28. सेनाणी व चंवरी - मेघराज मुकुल 
  29. लीलटांस - कन्हैयालाल सेठिया 
  30. सती रासौ - सूर्यमल्ल मिश्रण 
  31. खुमाण रासौ - दलपत विजय 
  32. राम रासौ - माधोदास दधवाडिया (चारण) 
  33. विजयपाल रासौ - नल्ल सिंह
  34. हूँ गोरी किव पींव री - यादवेन्द्र शर्मा चन्द्र
  35. पातल व पीथल - कन्हैयालाल सेठिया
  36. ढोला मारवण री चौपाईं - कुंशललाभ
  37. राजस्थानी कहावतां - मुरलीधर व्यास
  38. पगफैरो - मणि मधुकर
  39. बुद्धि सागर - जानकवि
  40. सूरज प्रकाश - करणीदान
  41. पाबूजी रा छंद और गोगाजी रसावला - बीठु मेहा
  42. नरसी जी रो मायरौ - रतना खाती
  43. राजिया रा सोरठा - कृपाराम 
  44. मैकली काया मुट्ठकती धरती - अन्नाराम सुदामा
  45. अमरकाव्य - अमरदान लालस
  46. प्रबन्ध चिन्तामणि - मेरूतुंग
  47. राज बल्लभ - मंडन
  48. एकलिंग महाकाव्य - महाराणा कुंभा
  49. प्रबन्ध चिन्तामणि - मेरूतंग
  50. भारतेश्वर बाहुबलि घोर - वज्रसेन सूरी
  51. भारतेश्वर बाहुबलि रास - शालिभद्र सूरी
  52. प्रबंध कोष - राजशेखर
  53. अमर काव्यम् वंशावली - रण्छोड़ भट्ट
  54. अमरासार -  पं. जीवधार
  55. राज रत्नाकर व राजविनोद - भट्ट सदाशिव
  56. पार्श्वनाथ चरित्र - श्रीधर
  57. ढोला मरवण चड़पडी - कवि हरराज
  58. रेवन्तगिरी रास - विजयसेन सूरी
  59. चर्चरी - जिनदत्त सूरी
  60. बुद्धिरासौ - जानकवि/जल्ल
  • यह पंचतन्त्र पर आधारित ग्रन्थ है ।
  1. शत्रुसाल रासौ - डूंगर जी
  2. राणा रासौ - दयाल (दयाराम)
  3. बिडद सिण्गार - करणीदान
  4. डिंगल कोष - मुरारीदान
  5. ढोला वल्स रचित - कवि भीम
  6. राज प्रकाश - किशोर दास
  7. गुण गोविंद - कल्याण दास
  8. भाषा भूषण - जसवंत सिंह
  9. विरूद छहत्तरी - दुरसा ओढा
  10. दशम भागवत रां दूहा - राठौड़ पृथ्वीराज
  11. रांव अमर सिंहजी रां दूहा -  केशवदास
  12. बीरभायण - बादर (बहादर) ढाढी
  13. मिनाथ बारहमासा - पल्हण
  14. मलय सुंदरी कथा - मांणक्य सुंदर
  15. पृथ्वीराज वाग्विलास - मांणक्य सुंदर
  16. बातां री फुलवारी - विजयदान देथा
  17. वाणी व सरवंगी - रज्जब जी
  18. सुधि सपनों के तीर - मणि मधुकर
  19. सगत रासौ -  गिरधर आसिया
  20. हरिकेलि नाटक - विग्रहराज चतुर्थ
  21. आर्ष रामायण - साहिबुद्दीन, मनोहर
  22. धरती धौराँ री - कन्हैयालाल सेठिया
  23. सबद - कन्हैयालाल सेठिया
  24. निग्रंथ - कन्हैयालाल सेठिया
  25. प्रलय प्रतीक्षा नमो नम: - हीरालाल शास्त्री
  26. प्रत्यक्ष जीवन शास्त्र - हीरालाल शास्त्री
  27. जो देश के लिए जिए - शंकर सहाय सक्सेना
  28. आलभो जड आन्धे ने - अन्नाराम सुदामा
  29. राजस्थानी शब्दकोष - सीताराम लालस
  30. टाबराँ री बातां - लक्ष्म कुमारी चूड़ावत
  31. what are Indian states - विजयसिंह पथिक 
  32. हंसावली - असाईंत
  33. अमरसार - पं. जीवाधर
  34. राग चंद्रिका - भट्ट द्वारकानाथ
  35. सुर्जन चरित्र - कवि चन्द्र शेखर
  36. जयसिंह कारिका - सवाई जयसिंह

  • यह ज्योतिष ग्रन्थ है ।
राजस्थान के प्रमुख ग्रंथ PDF

Monday, 21 October 2019

Rajasthan ke Durg PDF Download in Hindi
Rajasthan ke Durg PDF Download in Hindi - दोस्तों आज Rajgk आपके लिये Rajasthan GK in Hindi me Rajasthan ke Durg PDF share कर रहे है, जो की General Knowledge (सामान्य ज्ञान) से सम्बंधित है. इस PDF Ebook में  Rajasthan ke Durg का  सामान्य ज्ञान आपको पढने को मिलेगा.
General Knowledge (सामान्य ज्ञान) से सम्बंधित
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इस PDF Notes का Credit S. R. Khand को जाता है. जो छात्र Competitive Exam की तैयारी कर रहे है उनके लिये “ Raj gk - Rajasthan General Knowledge in Hindi” बहुत ही मददगार साबित होगा. इस पीडीऍफ़ नोट्स में आपको   Rajasthan ke Durg से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी पढने को मिलेगी. यह PDF Notes आपको RPSC, UPSC, SSC, Rajasthan Police Exam BANK, RAILWAY, IAS, PCS, NDA, CDS और विभिन्न  Competitive Exam के लिये पढना अत्यंत आवश्यक है.

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Rajasthan ke Durg PDF Details

Name of The Book : *Rajasthan ke Durg PDF in Hindi*
Document Format: PDF
Total Pages: 8
PDF Quality: Normal
PDF Size: 2 MB
Book Credit: S. R. Khand

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Sunday, 20 October 2019

Sahitya in Rajasthan - राजस्थान के साहित्य से संबंधित विविध तथ्य

Sahitya in Rajasthan - राजस्थान के साहित्य से संबंधित विविध तथ्य

Sahitya in Rajasthan - राजस्थान के साहित्य से संबंधित विविध तथ्य
Sahitya in Rajasthan - राजस्थान के साहित्य से संबंधित विविध तथ्य

वचनिका - यह एक गद्य-पद्य तुकान्त रचना होती है, इसे चम्पू काव्य भी कहते है । वचनिका मुख्यत अपभ्रंश मिश्रित राजस्थानी में लिखी हुई है । इसमें अचलदास खींची री वचनिका एवं राठौड़, रतनसिंह जी, महेश दासोत की वचनिका प्रमुख है ।

वंशावली 

  • इसमें शासकों की वंशावलियों का विस्तृत वर्णन है । जैसे राठौड़ा की वंशावली, राजपूतों की वंशावली ।

विगत 

ये इतिहास परक ग्रन्थ लेखन की शैली है ।  मारवाड़ रा परगना री विगत इसकी प्रमुख रचना है ।  

वेलि 

  • इस साहित्य में शासकों की प्रमुख घटनाओं का वर्णन होता है ।
  • पृथ्वीराज राठौड़ द्वारा लिखित वेलि किसन रुक्मणी री प्रसिद्ध वेलि ग्रन्थ है ।

वात 

  • वात का अर्ध कथा या साहित्य से है ।

रूपक 

  • यह किसी महान योद्धा का चित्रण होता है । 

रासो 

  • यह शासकों के प्रशंसा काव्य होते हैं । 
  • बीसलदेव रासौ, पृथ्वीराज रासौ मुख्य रासौ ग्रन्थ है । 

निसाणी 

  • यह किसी व्यक्ति की यादगार के रूप में होता है । 

दवावैत 

  • यह उर्दू-फारसी की शब्दावली से युक्त राजस्थान की कलात्मक लेखन शैली है । इसमें किसी की प्रशंसा दोहों के रूप की जाती है ।

ख्यात 

  • शासकों के मान मर्यादा व वंशावली का वर्णन होता है ।
  • मुहणोत नैणसी री ख्यात, दयालदास री ख्यात आदि प्रसिद्धि ख्वाते है ।

प्रकाश 

  • किसी वंश अथवा व्यक्ति विशेष की उपलब्धियों या घटना विशेष पर प्रकाश डालने वाली कृतियां प्रकाश कहलाती है ।

मरस्या 

  • यह राजा या किसी व्यक्ति विशेष को मृत्योपरांत शोक व्यक्त करने के लिए रचित काव्य शैली है ।

हाल 

  • राजस्थान गद्य साहित्य में हाल लिखने की परम्परा रही है, जिसका एतिहासिक महत्व है । महाराजा जोधा का हाल व जोधा का जन्म सम्बन्धी हाल मारवाड़ के इतिहास के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण जानकारी देते है ।

झमाल 

  • यह डिंगल का छन्द विशेष है ।

बांधनी के कागज 

अंकात्मक सांकेतिक लिपि में लिखे पात्र । 
इसमें किसी की प्रशंसा दोहों के रूप की जाती है ।

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Saturday, 19 October 2019

Rajasthan ke Mele PDF Download in Hindi
 दोस्तों आज Rajgk आपके लिये Rajasthan GK in Hindi me Rajasthan ke mele pdf share कर रहे है, जो की General Knowledge (सामान्य ज्ञान) से सम्बंधित है. इस PDF Ebook में Rajasthan ke मेलो का  सामान्य ज्ञान आपको पढने को मिलेगा.

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Rajasthan ke mele pdf Details

Name of The Book : *Rajasthan ke Mele PDF in Hindi*
Document Format: PDF
Total Pages: 25
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Friday, 18 October 2019

Rajasthan Ke Mele in Hindi Part 10

dungarpur jile ke mele

Rajasthan Ke Mele in Hindi Part 10
Rajasthan Ke Mele in Hindi Part 10

  • बैणेश्वर मेला - नवाटापुरा गांव बैणेश्वर (डूंगरपुर)
  • गलियाकोट का उर्स - गलियाकोट (डूंगरपुर) मुहर्रम से 27वें दिन तक लगातार लगता है
  • यह गलियाकोट का उर्स दाउदी बोहरा मुस्लिम सम्प्रदाय का उर्स है ।
  • दाऊदी बोहरा सम्प्रदाय के संत फखरूद्दीन की पवित्र दरगाह के कारण गलियाकोट कस्बा विश्व प्रसिद्ध है 
  • देव सोमनाथ का मेला डूंगरपुर मे लगता है
  • बोरेश्वर का मेला डूंगरपुर मे बैशाख पूर्णिमा को लगता है
  • बीजवा माता का मेला डूंगरपुर मे लगता है
  • हड़मतिया हनुमान का मेला डूंगरपुर कार्तिक पूर्णिमा को लगता है
  • नीला पानी मेला डूंगरपुर कार्तिक पूर्णिमा को लगता है

 बांसवाडा jile ke mele

  • मानगढ़ धाम मेला बांसवाडा मार्गशीर्ष पूर्णिमा को लगता है
  • त्रिपुरा सुन्दरी मेला तिलवाडा (बांसवाडा)
  • घाडी-रणछोड़ जी का मेला मौटाग्राम (बांसवाडा)
  • कल्ला जी का मेला गढाग्राम (बांसवाडा) आश्विन नवरात्रा के प्रथम रविवार को लगता है
  • घोटिया आम्बा मेला बुड़वा ग्राम (बांसवाडा) चैत्र अमावस्या को
  • चीच/छींछ माता का मेला - बांसवाडा
  •  गोपेश्वर मेला धाटोल (बांसवाडा)
  • अंदेश्वर मेला बाड़मेर

प्रतापगढ़ jile ke mele

  • गौतमेश्वर मेला आरनोद (प्रतापगढ़) वैशाख़ पूर्णिमा
  • गौतमेश्वर नामक स्थल पर गौतम ऋषि ने तपस्या की थी ।
  • आदिवासी इस मेले के अवसर पर अपने दिवंगत परिवारजनों की अस्थियों को विसर्जित करते है ।
  • सीतामाता मेला प्रतापगढ - ज्येष्ठ अमावस्या

मातृकुण्डिया का मेला 

  • राश्मी पंचायत के हरनाथपुरा गाँव वैशाख पूर्णिमा
  • यहां मेलार्थी भगवान शिव की प्रतिमा के दर्शन करने आते है । एक पुरानी धारणा के अनुसार भगवान परशुराम ने अपनी माता की हत्या के अपराध से मुक्ति हेतु मातृकुंण्डिया जलाशय में स्नान किया ।
  • इस मेले में श्रृंद्धालु अपने स्वर्गवास परिजनों की अस्थिया विसर्जित करते है ।
  • मातृकुंण्डिया नामक स्थल राशमी ग्राम के पास बहने वाली चन्द्रभागा नदी के किनारे स्थित है ।
  • इस तीर्थ को 'राजस्थान का हरिद्वार' भी कहा जाता है । यहाँ प्रसिद्ध लक्ष्मण झूला (हरिद्वार ki भांति) है

चित्तौड़गढ़ jile ke mele

  • जलझूलनी एकादशी मेला - मण्डफिया (चित्तौड़गढ़) भाद्रपद शुक्ला एकादशी
  • जौहर मेला चितौड़गढ दुर्ग (चितोड़गढ)चैत्र कृष्ण एकादशी
  • सांवलिया जी मेला - मंडफिया (चितौड़गढ) भाद्र शुक्ल एकादशी
  • राम-रावण मेला चितौड़गढ चैत्र शुक्ल दशमी
  • बड़ी सादडी मेला चितौड़गढ
  • मीरा महोत्सव - चितोड़गढ आश्विन पूर्णिमा

भीलवाडा jile ke mele

  • फूल डोल मेला - शाहपुरा (भीलवाडा) चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से पंचमी तक
  • देवनारायणजी का मेला आसीन्द (भीलवाडा)
  • धनोप माता का मेला भीलवाडा चैत्र कृष्ण एकम से दशमी तक
  • सवाई भोज मेला - आसीद ( भीलवाडा) भाद्र शुक्ल अष्टमी
  • तिलस्वा महादेव मेला - मांडलगढ़ (भीलवाडा) फाल्गुन महाशिवरात्रि के अवसर पर आयोजित किया जाता है
  • घाटे रानी का मेला भीलवाडा
  • जोगणियां माता का मेला भीलवाडा
  • सोरत मेला मेनाल (भीलवाडा) फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी

कोटा jile ke mele

  • दशहरा मेला कोटा आसोज शुक्ल पक्ष दशमी
  • माधोसिंह के समय में कोटा का दशहरा मेला लगना प्रारंभ हुआ
  • गेपरनाथ महादेव मेला - कोटा महाशिवरात्रि के अवसर पर 

झालावाड jile ke mele

  • श्रीगोमती सागर पशु मेला - झालरापाटन (झालावाड) वैशाख पूर्णिमा
  • गोमती सागर मेला हाडोती अंचल का सबसे बड़ा पशू मेला है
  • यह मेला मालवी नस्ल से सम्बन्धित है ।
  • यह मेला गोमती नदी के किनारे भरता है ।
  • चन्द्रभागा पशु मेला झालरापाटन (झालावाड) कार्तिक पूर्णिमा
  • वसंत पंचमी मेला भवानीमंडी, अकलेरा (झालावाड)
  • रामनवमी मेला झालावाड
  • ब्रह्माजी मेला झालावाड
  • राडी के बालाजी का मेला झालावाड
  • मिट्ठेशाह का उर्स - गागरोन (झालावाड)

बारां jile ke mele

  • डोल मेला -2 - कृष्णगढ़ (बारां) भाद्रपद शुक्ल एकादशी
  • भाद्रपद शुक्ला एकादशी को लोक भाषा में डोल ग्यारस भी कहते हैं ।
  • सीताबाडी का मेला केलवाड़ा (बारां)
  • ब्राह्मणी माता का मेला सोरसन ग्राम (बारां) माघ शूक्ला

सप्तमी

  • ब्रह्माणी माता का मेला हाडौती कस्बे का एकमात्र गधों का मेला है ।
  • कपिल धारा का मेला - सहरिया (बारां) कार्तिक पूर्णिमा गूगोर माता का मेला - बारां
  • मऊ का वसन्त पंचमी मेला बारां
  • पिपलोद का क्रिसमस मेला अटरू ( बारां )
  • यहाँ पर क्रिसमस पर्व पर 25 दिसम्बर को मेला भरता है

 सवाई माधोपुर jile ke mele

  • गणेश जी का मेला रणथम्भौर दुर्ग (सवाई माधोपुर ) भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी
  • शिवाड का मेला - सवाईमाधोपुर  फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी
  • चौथ माता का मेला - चौथ का बरवाडा (सवाईमाधोपुर) माघ कृष्ण चतुर्थी
  • कल्याण जी महाराज का मेला - सवाईमाधोपुर
  • तेजाजी/हीराराम जी का मेला - सवाईमाधोपुर
  • चमत्कार जी का मेला शिवाड़ (सवाई माधोपुर)  अश्विन पूर्णिमा
  • रामेश्वर घाट मेला - सवाई माधोपुर  कार्तिक पूर्णिमा

 करौली jile ke mele

  • महावीर जी का मेला - श्री महावीर (करौली)

कैलादेवी का लक्खी मेला 

  • करौली  चैत्र शुक्ल एकम से दशमी
  • यह मार्च-अप्रेल में भरता है ।
  • इस दिन लांगुरिया के गीत गाये जाते हैं ।
  • कैलादेवी की आठ भुजाएं है एवं इसे सिंह पर सवारी करते हुए दर्शाया गया है ।
  • लाखों भक्त मेले में आते है अत  यह लक्खी मेला कहलाता है ।

महाशिवरात्रि पशु मेला  

  • करौली फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी
  • हरियाणवी नस्ल के लिए प्रसिद्ध है ।

 धौलपुर jile ke mele

  • बाबू महाराज का मेला - बाडी (धौलपुर)  भाद्र शुक्ल एकादशी
  • तीर्थराज का मेला - मचकुण्ड ( धौलपुर ) भाद्रपद शुक्ल षष्ठी
  • सैपऊ महादेव मेला - धौलपुर फाल्गुन व श्रावण मास की चतुर्थी 
  • मचकुण्ड का मेला- धौलपुर
  • बारह भाईयों का मेला- धौलपुर

 भरतपुर jile ke mele

  • जसवन्त प्रदर्शनी मेला - भरतपुर आश्विन शुक्ल पंचमी से पूर्णिमा
  • यह एक पशु मेला है ।
  • यह मेला हरियाणवी नस्ल के लिए प्रसिद्ध है ।
  • भोजन-थाली मेला - कामा (भरतपुर) भाद्रपद शुक्ल पंचमी
  • बसन्ती पशु मेला-रूपवास (भरतपुर) माघ अमावस्या से माघ शुक्ल अष्टमी
  • ब्रज यात्रा मेला - डीग (भरतपुर) माघ कृष्ण द्वादशी से माघ शुक्ल  पंचमी              
  • गंगा दशहरा मेला- कामां (भरतपुर) ज्येष्ठ शुक्ल सप्तमी से द्वादशी
  • गरुड़ मेला- बंसी पहाड़पुर (भरतपुर) कार्तिक शुक्ल तृतीया
  • बजरंग पशु मेला -उज्जैन ( भरतपुर) आश्विन कृष्ण द्वितीया से अष्टमी
  • हीराम बाबा का मेला - नगला जहाजपुर ( भरतपुर ) भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी व बैशाख चतुर्थी
  • देव बाबा का मेला- नगला जहाज ( भरतपुर )
  • ब्रज महोत्सव- भरतपुर

अलवर jile ke mele

  • चन्द्रप्रभुजी का मेला-  तीजारा ( अलवर)  फाल्युन शुक्ल सप्तमी व श्रावण शुक्ल दशमी
  • भर्तृहरि का मेला-  भर्तृहरि ( अलवर )  भाद्रपद शुक्ल अष्टमी  यहॉ भर्तृहरि बाबा का समाधि स्थल है ।
  • लालदास जी का मेला - अलवर
  • पाण्डुपोल हनुमान मेला- अलवर  भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी-पंचमी
  • बहरोड पशु मेला- अलवर
  • मुर्रा नस्ल कै लिए प्रसिद्ध है ।
  • धौलागढ़ देवी का मेला-  बहुतूकला ( अलवर)  वैशाख सुदी 1 से 15 तक
  • जगन्नाथ जी का मेला- रूपवास ( अलवर)  आषाढ़ सुदी 8 से 13 तक ।
  • नारायणी माता का मेला-  सरिस्का ( अलवर)  बैशाख शुक्ल एकादशी
  • बिलारी माता का मेला- अलवर
  • चूहड़ सिद्ध मेला- अलवर  महाशिवरात्रि 
  • गिरधारी मेला- बानसूर ( अलवर)  चैत्र शुक्ल द्वादशी    
  • बिलारी माता का मेला-  अलवर  चैत्र कृष्ण अष्टमी
  • मत्स्य महोत्सव - अलवर

जयपुर jile ke mele

  • बाड़ा-पदमपुरा जैन का मेला - बाडा पदमपुरा (जयपुर)  यह जैनियों का प्रसिद्ध मेला है ।
  • गधों का मेला-  लूणियावास (जयपुर)
  • तीज का मेला -  जयपुर  श्रावण शुक्ल तीज
  • पौराणिक कथाओं के अनुसार पार्वती ने भगवान शिव जैसा पति पाने के लिए वर्षों तपस्या की थी । अत: इस दिन कुवारियां पार्वती का पूजन कर शिव जैसा पति पाने की प्रार्थना करती है ।

शीतला माता का मेला

  • शीतला अष्टमी के दिन ठण्डा भोजन खाया जाता है, इसे बासीड़ा/बांस्यीड़ा कहा जाता है ।
  • शीला माता का मेला- जयपुर
  • शीतला माता का मेला- चाकसू (जयपुर)  शीतला अष्टमी (चैत्र कृष्ण8)
  • शीतला माता के मन्दिर का पुजारी कुम्हार जाति का होता है । राजस्थान में सेढ़ल माता और शीतला एक ही है
  • बाणगंगा मेला -  विराटनगर/ बैराठ (जयपुर)  वैशाख पूर्णिमा
  • ख़लकानी माता का मेला- जयपुर .
  • श्री जगदीश महाराज का मेला- गोनेर (जयपुर)
  • वर्ष  में दो बार लगता है ।
  • यह हिन्दुओं का लोक मेला है ।
  • दादू जी का मेला- नारायणा (जयपुर) फाल्गुन शुक्ल अष्टमी
  • गणगौर का मेला- जयपुर व उदयपुर श्रावण शुक्ल तृतीया
  • हाथी महोत्सव- जयपुर
  • ग्रीष्म महोत्सव- जयपुर 
  • तीज महोत्सव जयपुर
  • पतंग महोत्सव जयपुर
  • बसन्त पंचमी मेला अंकलेरा एवं भवानी मंडी (जयपुर)

सीकर jile ke mele

  • जीणमाता का मेला रेवासा (सीकर) चैत्र तथा आश्विन माह
  • जीणमाता के मन्दिर में अष्ट भुजा की मूर्ति है । जीणमाता के मन्दिर का निर्माण 1064 ई. में मोहित के हठड़ द्वारा करवाया गया ।
  • श्री खादू श्याम जी का मेला खाटूश्यामजी (सीकर) फाल्गुन शुक्ल एकादशी से द्वादशी
  • ख्वाजा नजमुद्दीनशाह का उर्स फतेहपुर (सीकर)
  • हर्षनाथ का मेला सीकर
  • शाकम्भरी माता का मेला सीकर चैत्र व आश्विन नवरात्रों को
  • मामादेव का मेला स्यालोदड़ा गाँव (सीकर)
  • बाबा झुंझार जी का मेला स्यालोदड़ा गाँव (सीकर)

झुंझुनूं jile ke mele

  • शक्कर बाबा का मेला नरहड़ (झुंझुनूं) जन्माष्टमी
  • यहा पर इन्हें वागड का धनी के उपनाम से भी जाना जाता है ।
  • हजारत हाफिज शक्कर बाबा शाह की प्राचीन दरगाह है ।
  • इस दरगाह में जाल का वृक्ष है, जिस पर जायरीन अपनी मन्नतों के डोरे टांग देते है और उनकी मन्नतें पूरी हो जाती है ।
  • रानी सती का मेला झुंझुनूं  भाद्रपद अमावस्या
  • मार्च 1988 में भारत सरकार द्वारा सती (निवारण) अधिनियम पारित कर देने के पश्चात इस मेले पर भी रोक लगा दी गई
  • लोहार्गल मेला लोहार्गल (झुंझुनूं) भाद्र कृष्ण नवमी से अमावस्या तथा चैत्र की सोमवती अमावस्य तक
  • शाकम्भरी माता का मेला- उदयपुरवाटी (झुंझुनूं)  चैत्र, आश्विन नवरात्रों में

चूरू jile ke mele

  • साहवा सिक्ख मेला- साहवा (चूरू)  कार्तिक पूर्णिमा साण्डन कालका माता का मेला- चूरू
  • सालासर हनुमान जी का मेला- सालासर (चूरू )  चैत्र पूर्णिमा  किवंदति के अनुसार सालासर के पास गाँव में हनुमान जी की मूर्ति स्वत: प्रादर्भूत हुई थी । इसे एक महात्मा ने सालासर में प्रतिष्ठित किया था।

हनुमानगढjile ke mele

  • गोगामेड़ी मेला- गोगामेड़ी (हनुमानगढ)  गोगानवमीं (भाद्रपद कृष्ण नवमी)
  • भद्रकाली का मेला- हनुमानगढ   चैत्र शुक्ल अष्टमी व नवमी
  • शिला माता का मेला- हनुमानगढ  प्रत्येक शुक्रवार ब्रहमाणी माता का मेला- पल्लू (हनुमानगढ़) चैत्र शुक्ल अष्टमी

नागौर jile ke mele

  • रामदेव पशु मेला - मानासर (नागैर)  माघ शीर्ष शुक्ल प्रतिपदा  से पूर्णिमा
  • बलदेव पशु मेला- मेड़ता सिटी (नागौर)  चैत्र शुक्ल 1 से चैत्र शुक्ल पूर्णिमा
  • वीर तेजाजी का पशु मेला परवतसर (नागौर) भाद्रपद शुक्ल पक्ष की दशमी से पूर्णिमा 
  • हमीदुद्दीन नागौरी का उर्स नागौर
  • दधिमाता मेला गोठ मांगलोद (नागोर) चैत्र व आश्विन नवरात्र में
  • चारभुजा नाथ (मीरां बाई) का मेला नागौर  श्रावण शुक्ल एकादशी से सात दिन
  • हरीराम बाबा का मेला नागौर
  • तारकीन का उर्स नागोर

जोधपुर jile ke mele

  • धींगागवर बेंतमार मेला जोधपुर बैशाख कृष्ण तृतीया
  • चामुण्डा माता का मेला जोधपुर आश्विन शुक्ल नवमी
  • वीरपुरी का मेला मण्डोर (जोधपुर) श्रावण के अंतिम सोमवार
  • खेजड़ली मेला खेजड़ली (जोधपुर) भाद्र शुक्ल पक्ष दशमी 
  • नागपंचमी मेला मण्डोर (जोधपुर) भाद्र कृष्ण पंचमी संचिया माता का मेला जोधपुर
  • घूडला मेला जोधपुर चैत्र शुक्ल तृतीया
  • 33 करोड देवी-देवताओं का मेला जोधपुर
  • पाबूजी का मेला जोधपुर आई माता का मेला जोधपुर
  • मसुरिया मेला जोधपुर
  • राता-भाकर मेला जोधपुर
  • कोलूमण्ड का मेला जोधपुर
  • मारवाड़ महोत्सव -जोधपुर

पाली jile ke mele

  • चोटिला पीर दुलेशाह का मेला केरला (पाली) कार्तिक  कृष्ण प्रतिपदा व द्वितीया
  • दीवाली के दूसरे दिन भरता है ।
  • सालेश्वर महादेव मेला गुढा प्रतापसिंह (पाली)
  • परशुराम महादेव मेला देसूरी (पाली) श्रावण शूक्ल षष्ठी व सप्तमी
  • खेतलाजी मेला पाली
  • बरकाना का मेला पाली पोष सुदी 10
  • जैन धर्मावलम्बियों का मेला है ।
  • गोरिया गणगौर मेला गोरिया (बाली तहसील) फाली वैशाख शुक्ला सप्तमी
  • सौनाण खेतला का मेला - सारंगवास (पाली) चैत्र शुक्ल प्रतिपदा
  • पश्चिमी राजस्थान के पाँच/ छःजिलो से आने वाले नर्तक दलों का प्रदर्शन इसका मुख्य आकर्षण है
  • निम्बो का नाथ मेला फालना सांडेराव (पाली) बैशाख पूर्णिमा व शिवरात्रि
  • परशुराम महादेव मेला देसूरी क्षेत्र (पाली)
  • मल्लू का मेला पाली
  • बाली का मेला पाली
  • रणकपुर का मेला पाली फाल्गुन शुक्ल चतुर्थ से पंचमी  

राजसमंद jile ke mele

  • चार भुजा का मेला राजसमन्द : भाद्रपद शुक्ल एकादशी 
  • जन्माष्टमी मेला नाथद्वारा (राजसमंद) : भाद्र कृष्ण अष्टमी
  • प्रताप जयंती / हल्दीघाटी मेला हल्दीघाटी (राजसमन्द) ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया
  • देवझूलनी मेला चारभुजा ( राजसमन्द ) भाद्र शुक्ल एकादशी
  • अन्नकूट मेला महोत्सव नाथद्वारा (राजसमन्द) : कार्तिक शूक्ल एकम्

अजमेर jile ke mele

  • पुष्कर मेला पुष्कर (अजमेर)  कार्तिक शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा
  • मेरवाड़ा का सबसे बडा मेला है ।
  • राजस्थान का सबसे रंगीन मेला है ।
  • पुष्कर में दीपदान की परम्परा पुराने समय से चली आ रही है ।
  • ख्वाजा साहब का उर्स अजमेर रज्जबी मास की 1से 6 तारीख
  • मुस्लिमों का सबसे बडा मेला है ।
  • ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में भरता है ।
  • बादशाह का मेला ब्यावर (अजमेर)
  • कल्पवृक्ष मेला मांगलियावास (अजमेर) हरियाली/श्रावण अमावस्या
  • पंजाब शाह का उर्स अजमेर
  • माल्या काल्या का मेला अजमेर
  • कौड़ामार होली  अजमेर
  • तेजाजी का मेला ब्यावर, दोराई, कैवडी, टाटगढ़ (अजमेर)  भाद्र शुक्ल दशमी
  • अतेड मेला अजमेर

टोंक jile ke mele

  • माकड भी का मेला- आमेर आषाढ शुक्ल द्वितीया कल्याजी का मेला टोंक
  • डिमीपुरी का राजा मेला टोंक

दौसा jile ke mele

  • बीजासणी माता का मेला लालसोट (दौसा) चैत्र पूर्णिमा
  • श्रीरामपुरा मेला बसवा (दौसा) भाद्र कृष्ण अष्टमी मेहन्दीपूर बालाजी का मेला दौसा चैत्र पूर्णिमा
  • आभानेरी उत्सव दौसा

बुंदी jile ke mele

  • मनसा माता का मेला इन्द्रगढ़ चैत्र शुक्ल अष्टमी व आश्विन शुक्ल अष्टमी
  • दहेलबाल जी महाराज पशु ममेला बूंदी
  • नैनवा पशु मेला बूंदी 
  • आलोद तेजाजी का मेला बुंदी
  • बिजासण माता का मेला इंद्रगढ़ (बूंदी) चैत्र आश्विन नवरात्रों में बैशाख पूर्णिमा
  • कजली तीज महोत्सव बूंदी भाद्र कृष्ण तृतीया
  • कार्तिक मेला बूंदी 

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Thursday, 17 October 2019

Shivaji Maharaj history in Hindi | शिवाजी महाराज का इतिहास

Shivaji Maharaj history in Hindi | शिवाजी महाराज का इतिहास



शिवाजी भोंसले ,जिन्हें छत्रपति शिवाजी Shivaji Maharaj के नाम से जाना जाता है ,एक भारतीय योधा और मराठा वंश के सदस्य थे | शिवाजी ने आदिलशाही सल्तनत की अधीनता स्वीकार ना करते हुए उनसे कई लड़ाईयां की थी | Shivaji Maharaj शिवाजी ने गुर्रील्ला पद्दति से कई युद्ध जीते | इन्हें आद्य-राष्ट्रवादी और हिन्दूओ का नायक भी माना जाता है |1674 में Shivaji Maharaj का राज्याभिषेक हुआ और उन्हें छत्रपति का ख़िताब मिला | आइये उनकी जीवनी को विस्तार से पढ़ते है
Shivaji Maharaj history in Hindi | शिवाजी महाराज का इतिहास
Shivaji Maharaj history in Hindi | शिवाजी महाराज का इतिहास


शिवाजी महाराज का इतिहास


शिवाजी उर्फ़ छत्रपति शिवाजी महाराज – Shivaji Maharajभारतीय शासक और मराठा साम्राज्य के संस्थापक थे। शिवाजी महाराज एक बहादुर, बुद्धिमान और निडर शासक थे। धार्मिक अभ्यासों में उनकी काफी रूचि थी। रामायण और महाभारत का अभ्यास वे बड़े ध्यान से करते थे।

पूरा नाम  – शिवाजी शहाजी भोसले / Shivaji Maharaj
जन्म       – 19 फरवरी, 1630 / अप्रैल, 1627
जन्मस्थान – शिवनेरी दुर्ग (पुणे)
पिता       – शहाजी भोसले
माता       – जिजाबाई शहाजी भोसले
विवाह     – सइबाई के साथ

शाहजी भोंसले की पत्नी जीजाबाई (राजमाता जिजाऊ) की कोख से शिवाजी महाराज का जन्म 19 फरवरी, 1630 को शिवनेरी दुर्ग में हुआ था। शिवनेरी दुर्ग पूना (पुणे) से उत्तर की तरफ़ जुन्नार नगर के पास था। उनका बचपन राजा राम, संतों तथा रामायण, महाभारत की कहानियों और सत्संग में बीता। वह सभी कलाओ में माहिर थे, उन्होंने बचपन में राजनीति एवं युद्ध की शिक्षा ली थी।
उनके पिता शहाजी भोसले अप्रतिम शूरवीर थे। शिवाजी महाराज के चरित्र पर माता-पिता का बहुत प्रभाव पड़ा। बचपन से ही वे उस युग के वातावरण और घटनाओं को बहली प्रकार समझने लगे थे।
शासन वर्ग की करतूतों पर वे झल्लाते थे और बेचैन हो जाते थे। उनके बाल-ह्रदय में स्वाधीनता की लौ प्रज्ज्वलित हो गयी थी। उन्होंने कुछ मावळावो (सभि जाती के लोगो को ऐक ही (मावळा) ऊपाधी दे कर जाती भेद खत्म करके सारि प्रजा को संघटित कीया था) का संगठन किया। विदेशी शासन की बेड़ियाँ तोड़ फेंकने का उनका संकल्प प्रबलतर होता गया।
छत्रपति शिवाजी महाराज का विवाह सन 14 मई 1640 में सइबाई निम्बालकर के साथ लाल महल पुना में हुआ था।

शिवाजी महाराज शिवराज्याभिषेक – Shivaji Maharaj Rajyabhishek

सन 1674 तक शिवाजी राजे ने उन सारे प्रदेशों पर अधिकार कर लिया था जो पुरन्दर की संधि के अंतर्गत उन्हें मुगलों को देने पड़े थे। पश्चिमी महाराष्ट्र में स्वतंत्र हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के बाद शिवाजीराजे का राज्याभिषेक हुआ।
विभिन्न राज्यों के दूतों, प्रतिनिधियों के अलावा विदेशी व्यापारियों को भी इस समारोह में आमंत्रित किया गया। शिवाजी राजे ने छत्रपति की उपाधि ग्रहण की। काशी के पंडित विश्वेक्ष्वर जी भट्ट को इसमें विशेष रूप से आमंत्रित किया गया था।
पर उनके राज्याभिषेक के 12 दिन बाद ही उनकी माता का देहांत हो गया। इस कारण से दूसरी बार उनका राज्याभिषेक हुआ। इस समारोह में हिन्द स्वराजकी स्थापना का उद्घोष किया गया था। विजयनगर के पतन के बाद दक्षिण में यह पहला हिन्दू साम्राज्य था।
एक स्वतंत्र शासक की तरह उन्होंने अपने नामका सिक्का चलवाया। इसके बाद बीजापुर के सुल्तान ने कोंकण विजय के लिए अपने दो सेनाधीशों को शिवाजी के विरुध्द भेजा पर वे असफल रहे।

एक नजर मै शिवाजी महाराज का इतिहास – Shivaji Maharaj History in Hindi

1) उनका जन्म पुणे के किले में 7 अप्रैल 1627 को हुआ था। (उनकी जन्मतिथि को लेकर आज भी मतभेद चल रहे है)
2) शिवाजी महाराज ने अपना पहला आक्रमण तोरण किले पर किया, 16-17 वर्ष की आयु में ही लोगों ( मावळावो ) को संगठित करके अपने आस-पास के किलों पर हमले प्रारंभ किए और इस प्रकार एक-एक करके अनेक किले जीत लिये, जिनमें सिंहगढ़, जावली कोकण, राजगढ़, औरंगाबाद और सुरत के किले प्रसिध्द है।
शिवाजी की ताकत को बढ़ता हुआ देख बीजापुर के सुल्तान ने उनके पिता को हिरासत में ले लिए। बीजापुर के सुल्तान से अपने पिता को छुड़ाने के बाद शिवाजी राजे ने पुरंदर और जावेली के किलो पर भी जीत हासिल की। इस प्रकार अपने प्रयत्न से काफी बड़े प्रदेश पर कब्जा कर लिया।
3) शिवाजी राजे की बढती ताकत को देखते हुए मुग़ल साम्राज्य के शासक औरंगजेब ने जय सिंह और दिलीप खान को शिवाजी को रोकने के लिये भेजा। और उन्होंने शिवाजी को समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए कहा। समझौते के अनुसार उन्हें मुघल शासक को 24 किले देने थे।
इसी इरादे से औरंगजेब ने शिवाजी राजे को आमंत्रित भी किया। और बाद में शिवाजी राजे को औरंगजेब ने अपनी हिरासत में ले लिया था, कैद से आज़ाद होने के बाद, छत्रपति ने जो किले पुरंदर समझौते में खोये थे उन्हें पुनः हासिल कर लिया। और उसी समय उन्हें “छत्रपति” का शीर्षक भी दिया गया।
4) उन्होंने मराठाओ की एक विशाल सेना तैयार की थी। उन्होंने गुरिल्ला के युद्ध प्रयोग का भी प्रचलन शुरू किया। उन्होंने सशक्त नौसेना भी तैयार कर रखी थी। भारतीय नौसेना का उन्हें जनक कहा जाता है।
5) जून, 1674 में उन्हें मराठा राज्य का संस्थापक घोषीत करके सिंहासन पर बैठाया गया।
6) शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक के 12 दिन बाद उनकी माता का देहांत हो गया।
7) उनको ‘छत्रपती’ की उपाधि दी गयी। उन्होंने अपना शासन हिन्दू-पध्दती के अनुसार चलाया। शिवाजी महाराज के साहसी चरित्र और नैतिक बल के लिये उस समय के महान संत तुकाराम, समर्थ गुरुरामदास तथा उनकी माता जिजाबाई का अत्याधिक प्रभाव था।
8) एक स्वतंत्र शासक की तरह उन्होंने अपने नाम का सिक्का चलवाया।
9) मृत्यु – अप्रैल, 1680 में शिवाजी महाराज का देहांत हुवा। शिवाजी महाराज की गनिमी कावा को विलोभनियतासे और आदरसहित याद किया जाता है।
शिवाजी महाराज राजमुद्रा – Shivaji Maharaj Rajmudra
6 जून “इ.स. 1674” को शिवाजी महाराज का रायगड पर राज्याभिषेक हुवा। और तभी से “शिवराज्याभिषेक शक शुरू किया और “शिवराई” ये मुद्रा आयी।
Shivaji Maharaj Rajmudra:
छत्रपती शिवाजीराजे पुणे का काम देखने लगे, तभी उन्होंने खुदकी राजमुद्रा तयार की। और ये राजमुद्रा संस्कृत भाषा में थी।
संस्कृत: “प्रतिपच्चंद्रलेखेव वर्धिष्णुर्विश्ववंदिता शाहसुनोः शिवस्यैषा मुद्रा भद्राय राजते”

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The Cold War full information in hindi

शीत युद्ध की उत्पत्ति

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ ने एक्सिस शक्तियों के खिलाफ सहयोगियों के रूप में एक साथ लड़े। हालांकि, दोनों देशों के बीच संबंध एक तनावपूर्ण था। अमेरिकियों ने लंबे समय से सोवियत साम्यवाद से सावधान रहना था और रूसी नेता जोसेफ स्टालिन के अपने देश के खूनी प्यारे, खूनी प्यारे शासन के बारे में चिंतित थे। अपने हिस्से के लिए, सोवियत संघ ने अमेरिका के दशकों से अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के एक वैध हिस्से के साथ-साथ द्वितीय विश्व युद्ध में उनकी देरी प्रविष्टि के रूप में व्यवहार करने से इंकार कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप लाखों रूसियों की मौत हुई। युद्ध समाप्त होने के बाद, ये शिकायत आपसी अविश्वास और शत्रुता की जबरदस्त भावना में पड़ी। पूर्वी यूरोप में पोस्टवर सोवियत विस्तारवाद ने दुनिया को नियंत्रित करने के लिए रूसी योजना के कई अमेरिकियों के डर को बढ़ावा दिया। इस बीच, यूएसएसआर ने अमेरिकी अधिकारियों के बेलिकोस रेटोरिक, हथियारों के निर्माण और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के लिए हस्तक्षेपवादी दृष्टिकोण के रूप में जो कुछ भी माना, उससे नाराज हो गया। इस तरह के एक शत्रुतापूर्ण वातावरण में, शीत युद्ध के लिए कोई भी पार्टी पूरी तरह से दोषी नहीं थी; वास्तव में, कुछ इतिहासकारों का मानना ​​है कि यह अपरिहार्य था।

शीत युद्ध: सम्मिलन


द्वितीय विश्व युद्ध के अंत तक, अधिकांश अमेरिकी अधिकारी इस बात पर सहमत हुए कि सोवियत खतरे के खिलाफ सबसे अच्छा बचाव "रोकथाम" नामक एक रणनीति थी। 1946 में, अपने प्रसिद्ध "लांग टेलीग्राम" में, राजनयिक जॉर्ज केनन (1904-2005) ने इसे समझाया नीति: सोवियत संघ, उन्होंने लिखा था, "एक राजनीतिक ताकत इस विश्वास के लिए कट्टरपंथी थी कि अमेरिका के साथ कोई स्थायी मोडस विवेन्दी नहीं हो सकता है [असहमत पार्टियों के बीच समझौता]"; नतीजतन, अमेरिका की एकमात्र पसंद "दीर्घकालिक, मरीज लेकिन रूसी विशाल प्रवृत्तियों की दृढ़ और सतर्क रोकथाम थी।" राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन (1884-1972) सहमत हुए। "यह संयुक्त राज्य अमेरिका की नीति होनी चाहिए," उन्होंने 1947 में कांग्रेस के समक्ष घोषित किया, "स्वतंत्र दबावों का विरोध करने वाले लोगों का समर्थन करने के लिए ... बाहरी दबावों से ..." इस तरह के सोच से अगले चार दशकों तक अमेरिकी विदेश नीति को आकार दिया जाएगा।

क्या तुम्हें पता था?

"शीत युद्ध" शब्द पहली बार 1 9 45 के निबंध में अंग्रेजी लेखक जॉर्ज ऑरवेल ने "यू एंड द परमाणु बम" कहा था।

शीत युद्ध: एटोमिक एज

रोकथाम रणनीति ने संयुक्त राज्य अमेरिका में अभूतपूर्व हथियारों के निर्माण के लिए भी तर्क प्रदान किया। 1 9 50 में, एनएससी -68 के नाम से जाने वाली एक राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की रिपोर्ट ने ट्रूमैन की सिफारिश को प्रतिबिंबित किया था कि देश कम्युनिस्ट विस्तारवाद को "शामिल" करने के लिए सैन्य बल का उपयोग करता है, ऐसा लगता है कि ऐसा लगता है। इसके अंत में, रिपोर्ट में रक्षा खर्च में चार गुना वृद्धि हुई।

विशेष रूप से, अमेरिकी अधिकारियों ने द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त होने वाले परमाणु हथियारों के विकास को प्रोत्साहित किया। इस प्रकार एक घातक "हथियार दौड़" शुरू हुई। 1949 में, सोवियत संघ ने अपने परमाणु बम का परीक्षण किया। जवाब में, राष्ट्रपति ट्रूमैन ने घोषणा की कि संयुक्त राज्य अमेरिका एक और अधिक विनाशकारी परमाणु हथियार का निर्माण करेगा: हाइड्रोजन बम, या "सुपरबॉम्ब।" स्टालिन ने पीछा किया।

नतीजतन, शीत युद्ध के हिस्से खतरनाक रूप से उच्च थे। मार्शल द्वीप समूह में एनविटोक एटोल में पहला एच-बम परीक्षण, दिखाया गया कि परमाणु युग कितना डरावना हो सकता है। इसने 25 वर्ग मीटर की एक फायरबॉल बनाई जिसने एक द्वीप का वाष्पीकरण किया, समुद्र तल में एक बड़ा छेद उड़ा दिया और मैनहट्टन के आधे हिस्से को नष्ट करने की शक्ति थी। बाद के अमेरिकी और सोवियत परीक्षणों ने वातावरण में जहरीले रेडियोधर्मी अपशिष्ट को उखाड़ फेंक दिया।

परमाणु विनाश के मौजूदा खतरे का अमेरिकी घरेलू जीवन पर भी बहुत बड़ा असर पड़ा। लोगों ने अपने पिछवाड़े में बम आश्रयों का निर्माण किया। उन्होंने स्कूलों और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर हमले के अभ्यास का अभ्यास किया। 1950 और 1960 के दशक में लोकप्रिय फिल्मों का एक महामारी देखा गया जो परमाणु विनाश और उत्परिवर्ती प्राणियों के चित्रण के साथ फिल्मों को डराता था। इन और अन्य तरीकों से, शीत युद्ध अमेरिकियों के रोजमर्रा की जिंदगी में निरंतर उपस्थिति थी।

ठंडा युद्ध स्पेस करने के लिए विस्तारित करता है

शीत युद्ध प्रतियोगिता के लिए अंतरिक्ष अन्वेषण ने एक और नाटकीय क्षेत्र के रूप में कार्य किया। 4 अक्टूबर, 1957 को, एक सोवियत आर -7 इंटरकांटिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल ने स्पुतनिक ("यात्री" के लिए रूसी) लॉन्च किया, जो दुनिया का पहला कृत्रिम उपग्रह है और पृथ्वी की कक्षा में पहली मानव निर्मित वस्तु है। अधिकांश अमेरिकियों के लिए स्पुतनिक का लॉन्च एक आश्चर्यजनक और सुखद नहीं था। संयुक्त राज्य अमेरिका में, अंतरिक्ष को अगली सीमांत के रूप में देखा गया था, जो कि खोज की भव्य अमेरिकी परंपरा का तार्किक विस्तार था, और सोवियत संघ को बहुत अधिक जमीन नहीं खोना महत्वपूर्ण था। इसके अलावा, आर -7 मिसाइल की जबरदस्त शक्ति का यह प्रदर्शन-सोवियत सैन्य गतिविधियों के बारे में विशेष रूप से जरूरी अमेरिकी वायु अंतरिक्ष-निर्मित एकत्रित खुफिया जानकारी पर परमाणु हथियार देने में सक्षम है।

1958 में, यू.एस. ने रॉकेट वैज्ञानिक वर्नर वॉन ब्रौन की दिशा में अमेरिकी सेना द्वारा डिजाइन किया गया अपना उपग्रह, एक्सप्लोरर I लॉन्च किया, और स्पेस रेस के रूप में जाना जाने वाला क्या चल रहा था। उसी वर्ष, राष्ट्रपति ड्वाइट आइज़ेनहोवर ने राष्ट्रीय एयरोनॉटिक्स और स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (नासा), अंतरिक्ष अन्वेषण के लिए समर्पित एक संघीय एजेंसी, साथ ही साथ अंतरिक्ष की सैन्य क्षमता का फायदा उठाने के लिए कई कार्यक्रम तैयार करने के सार्वजनिक आदेश पर हस्ताक्षर किए। फिर भी, सोवियत एक कदम आगे थे, जिसने अप्रैल 1961 में अंतरिक्ष में पहला व्यक्ति लॉन्च किया था।

मई, एलन शेपर्ड अंतरिक्ष में पहले अमेरिकी व्यक्ति बनने के बाद, राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी (1917-1963) ने बोल्ड सार्वजनिक दावा किया कि अमेरिका एक दशक के अंत तक चंद्रमा पर एक आदमी को उतरा देगा। 20 जुलाई, 1969 को उनकी भविष्यवाणी सच हो गई, जब नासा के अपोलो 11 मिशन के नील आर्मस्ट्रांग, चंद्रमा पर भोजन सेट करने वाले पहले व्यक्ति बने, जो प्रभावी रूप से अमेरिकियों के लिए अंतरिक्ष रेस जीत रहे थे। अमेरिकी अंतरिक्ष यात्रियों को अंतिम अमेरिकी नायकों के रूप में देखा जाने लगा, और पृथ्वी से बंधे पुरुषों और महिलाओं को उनके माध्यम से vicariously रहने का आनंद लेना प्रतीत होता था। सोवियत संघ, बदले में, अमेरिका को पार करने और कम्युनिस्ट प्रणाली की शक्ति साबित करने के अपने बड़े, निरंतर प्रयासों के साथ, अंतिम खलनायक के रूप में चित्रित किए गए थे।

Wednesday, 16 October 2019

Liberty vs Equality Hindi Notes
लिबर्टी और समानता एक दूसरे से बारीकी से संबंधित हैं। समानता की अनुपस्थिति में स्वतंत्रता का कोई मूल्य नहीं है। वे अलग-अलग कोणों से देखे गए समान स्थितियां हैं। वे एक ही सिक्के के दोनों पक्ष हैं। यद्यपि स्वतंत्रता और समानता के बीच घनिष्ठ संबंध है, फिर भी कुछ राजनीतिक विचारक हैं जिन्हें स्वतंत्रता और समानता के बीच कोई संबंध नहीं मिलता है। उदाहरण के लिए, लॉर्ड एक्टन और डी टॉकविले जो स्वतंत्रता के उत्साही समर्थक थे, को दो स्थितियों के बीच कोई संबंध नहीं मिला।

लिबर्टी और समानता के बीच संबंध

Liberty vs Equality Hindi Notes
Liberty vs Equality Hindi Notes

उनके लिए स्वतंत्रता और समानता एक दूसरे के प्रति विरोधी और विरोधी थे। लॉर्ड एक्टन ने कहा कि "समानता के जुनून ने स्वतंत्रता की आशा व्यर्थ की है"। ऐसे राजनीतिक विचारक यह मानते हैं कि स्वतंत्रता कहां है, वहां कोई समानता नहीं है और इसके विपरीत। ये राजनीतिक विचारक इस राय के हैं कि लोगों को प्रकृति द्वारा असमानता प्रदान की गई थी। हमें प्रकृति में असमानता भी मिलती है।

कुछ हिस्सों में नदियां होती हैं जबकि अन्य में पहाड़ होते हैं और अभी भी अन्य हिस्सों में मैदान और खेत होते हैं। उनकी क्षमता और क्षमता में कोई भी दो व्यक्ति समान नहीं हैं। और इसलिए समाज में समानता नहीं हो सकती है।

लॉर्ड एक्टन और डी टॉकविले के विचार आधुनिक राजनीतिक विचारकों द्वारा स्वीकार नहीं किए जाते हैं। प्रोफेसर एच जे लास्की ने इस संबंध में बहुत ही उचित टिप्पणी की है: "टॉकविले और लॉर्ड एक्टन, स्वतंत्रता और समानता के रूप में स्वतंत्रता के लिए इतने उत्साहित लोगों को, विरोधी चीजें हैं। यह एक कठोर निष्कर्ष है। लेकिन यह दोनों पुरुषों के मामले में, समानता के बारे में गलतफहमी पर निर्भर करता है "।

इन दिनों, आमतौर पर यह माना जाता है कि स्वतंत्रता और समानता एक साथ जाना चाहिए। अगर किसी व्यक्ति को जो भी पसंद है उसे करने के लिए अनियंत्रित स्वतंत्रता दी जाती है, तो वह दूसरों को नुकसान पहुंचाएगा। अगर व्यक्तियों को अनियंत्रित स्वतंत्रता दी जाती है तो समाज में अराजकता होगी।

उन्नीसवीं शताब्दी में, व्यक्तियों ने गलत तरीके से 'लिबर्टी' शब्द का व्याख्या किया। उन्होंने आर्थिक समानता के लिए कोई महत्व नहीं लगाया और सरकार द्वारा अपनाई जाने वाली लाईसेज़ फेयर पर तनाव डाला। एडम स्मिथ इस विचार के उत्साही वकील थे।

व्यक्तियों ने कहा कि पूंजीपतियों और श्रमिकों के बीच एक स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा होनी चाहिए। वे नहीं चाहते थे कि सरकार आर्थिक मामलों में हस्तक्षेप करे। मांग और आपूर्ति का फॉर्मूला अपनाया जाना चाहिए।

इस सूत्र द्वारा सभी आर्थिक कठिनाइयों को हटा दिया जाएगा। यदि वहां वस्तुओं की अधिक मात्रा और श्रम की आसान उपलब्धता होगी, तो कीमतें नीचे आ जाएंगी। यदि कमी है, तो कीमतें उच्च और उच्च हो जाएंगी। यह सूत्र इंग्लैंड और यूरोप के कई अन्य देशों में लागू किया गया था और इसके परिणामस्वरूप खतरनाक परिणाम सामने आए।

सरकार ने पूंजीपतियों पर अपना नियंत्रण खो दिया। पूंजीपतियों ने पूरी तरह से अवसर का शोषण किया। उन्होंने श्रम का पूरा फायदा उठाया। इसके परिणामस्वरूप, अमीर अमीर हो गए और गरीब गरीब बन गए। श्रम वर्ग दुखद रूप से पीड़ित था।

इसके परिणामस्वरूप, व्यक्तिवाद के खिलाफ एक तीव्र प्रतिक्रिया हुई। इस प्रतिक्रिया ने समाजवाद की शुरुआत की। समाजवाद ने व्यक्तिगतता के सिद्धांतों की निंदा की और अस्वीकार कर दिया। आर्थिक समानता की अनुपस्थिति में लिबर्टी का कोई महत्व नहीं है। प्रोफेसर लास्की ने बहुत अच्छी तरह से टिप्पणी की है, "यहां पर अमीर और गरीब, शिक्षित और अशिक्षित हैं, हम हमेशा मास्टर और नौकर का रिश्ता पाते हैं"।

C.E.M. जोड ने यह भी कहा है, "स्वतंत्रता का सिद्धांत," जिसकी राजनीति में महत्व का अनुमान नहीं लगाया जा सकता है, अर्थशास्त्र के क्षेत्र में लागू होने पर विनाशकारी तरीके से काम करता है। " हॉब्स ने यह भी कहा है, "भूखे आदमी के लिए स्वतंत्रता क्या है? वह स्वतंत्रता नहीं खा सकता है या पी सकता है "।

इस प्रकार, यह स्पष्ट है कि राजनीतिक आजादी के अस्तित्व के लिए आर्थिक समानता आवश्यक है। अन्यथा यह पूंजीवादी लोकतंत्र होगा जिसमें मजदूरों को वोट देने का अधिकार होगा लेकिन वे अपने उद्देश्यों को पूरा करने में सक्षम नहीं होंगे। इसलिए, शब्द की असली भावना में लिबर्टी केवल सोशलिस्ट लोकतंत्र में ही संभव है जिसमें समानता और स्वतंत्रता एक साथ जाती है।

इसी तरह, यह भी सच है कि राजनीतिक स्वतंत्रता की अनुपस्थिति में समानता स्थापित नहीं की जा सकती है। श्री एल्टन ट्रू-ब्लड ने इस संबंध में बहुत ही उचित टिप्पणी की है। "विरोधाभास यह है कि समानता और स्वतंत्रता, जो संघर्ष और तनाव में विचारों से शुरू हुई, एक-दूसरे के लिए आवश्यक विश्लेषण खोलें। सच्चाई यह है कि स्वतंत्रता के संदर्भ में समानता के अर्थ का उचित बयान देना असंभव है। पुरुष केवल तभी होते हैं क्योंकि सभी पुरुष आंतरिक रूप से मुक्त होते हैं, क्योंकि सभी सृष्टि में कुछ भी मुफ्त नहीं है "।

बार्कर कहते हैं, "समानता, अपने सभी रूपों में, हमेशा रहना चाहिए," क्षमता के मुक्त विकास के लिए विषय और वाद्ययंत्र, लेकिन यदि इसे समानता की लंबाई तक दबाया जाए और यदि क्षमता के मुक्त विकास को विफल करने के लिए समानता बनाई जाए, विषय मास्टर बन जाता है और दुनिया सबसे ऊपर की ओर बढ़ी है "।

आरएच टॉवनी ने सही टिप्पणी की है, "समानता का एक बड़ा उपाय, अब तक स्वतंत्रता के लिए आक्रामक होने से, इसके लिए आवश्यक है"। पोलार्ड भी लिखते हैं, "स्वतंत्रता की समस्या का केवल एक ही समाधान है। यह समानता में निहित है "। इस प्रकार, लिबर्टी और समानता एक-दूसरे के पूरक हैं। वे एक-दूसरे का विरोध नहीं कर रहे हैं। वे एक साथ जाते हैं।

लिबर्टी और समानता "को याद करके सुलझाया जाना चाहिए कि दोनों (स्वतंत्रता और समानता) व्यापक संभव पैमाने पर व्यक्तिगत व्यक्तित्व की संभावनाओं को साकार करने के अंत तक अधीनस्थ साधन हैं। एक समृद्ध विविधता के विकास के लिए स्वतंत्रता के एक बड़े स्तर की आवश्यकता होती है और सामाजिक और आर्थिक समानता के मृत स्तर को लागू करने के सभी प्रयासों को रोकता है "।

"दोनों के बीच घनिष्ठ संबंध है" क्योंकि सभी व्यक्तिगत स्वतंत्रता सभी पुरुषों की मूल समानता से संबंधित हैं और क्योंकि ऐतिहासिक रूप से स्वतंत्रता की आकांक्षा अभ्यास और विशेषाधिकार या असमानता के विनाश में हो गई है। "

दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। हर्बर्ट ए डीन कहते हैं, "इस प्रकार लिबर्टी समानता का तात्पर्य है," स्वतंत्रता और समानता संघर्ष में नहीं है और न ही अलग है, लेकिन एक ही आदर्श के विभिन्न तथ्य हैं ... वास्तव में जब वे समान हैं, तो कोई समस्या नहीं हो सकती है कि वे कितनी हद तक संबंधित हैं या संबंधित हो सकते हैं; राजनीतिक दर्शन में बारहमासी समस्या के लिए कभी भी सबसे संतोषजनक समाधान नहीं होने पर यह निश्चित रूप से निकटतम है।
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मानव अधिकारों की अवधारणा

मानव अधिकारों की संयुक्त राष्ट्र घोषणा 1948 जबकि मानव परिवार के सभी सदस्यों के अंतर्निहित गरिमा और समान और अयोग्य अधिकारों की मान्यता दुनिया में स्वतंत्रता, न्याय और शांति की नींव है,
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जबकि मानवाधिकारों के प्रति उपेक्षा और अवमानना ​​के परिणामस्वरूप बर्बर कृत्य हुए हैं, जिन्होंने मानव जाति के विवेक को अपमानित किया है, और ऐसी दुनिया का आगमन जिसमें मनुष्य भाषण और विश्वास की आजादी का आनंद ले सके और भय और इच्छा से स्वतंत्रता को सर्वोच्च आकांक्षा के रूप में घोषित किया गया है आम लोगों के, जबकि यह जरूरी है, अगर मनुष्य को अत्याचार और दमन के खिलाफ विद्रोह करने के लिए अंतिम उपाय के रूप में सहारा लेने के लिए मजबूर नहीं किया जाता है, तो मानवाधिकार कानून के शासन द्वारा संरक्षित किया जाना चाहिए,

जबकि राष्ट्रों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों के विकास को बढ़ावा देना आवश्यक है,

जबकि संयुक्त राष्ट्र के लोगों ने चार्टर में मानव अधिकार की गरिमा और मूल्य और पुरुषों और महिलाओं के समान अधिकारों में मौलिक मानवाधिकारों में अपने विश्वास की पुष्टि की और सामाजिक प्रगति और जीवन के बेहतर मानकों को बढ़ावा देने के लिए दृढ़ संकल्प किया है बड़ी स्वतंत्रता,

जबकि सदस्य देशों ने संयुक्त राष्ट्र के साथ सहयोग में, मानव अधिकारों और मौलिक स्वतंत्रताओं के सार्वभौमिक सम्मान के प्रचार के लिए खुद को वचनबद्ध करने के लिए वचनबद्ध किया है "

उपरोक्त संयुक्त राष्ट्र सार्वभौमिक घोषणाओं के प्रस्ताव से उपरोक्त निकास है, 10 दिसंबर 1 9 48 को आम सभा में सहमति हुई। घोषणापत्र ने अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून की नींव रखी और पूरे समय, मार्गदर्शक बन गया उन लोगों के लिए प्रकाश जो दुनिया भर में मानवाधिकारों के लिए मजबूती और सम्मान को बढ़ावा देते हैं।

सदियों से, सभी राज्यों के नेताओं और राजनेता, यहां तक ​​कि जो लोग मानवाधिकारों का सम्मान नहीं करते हैं, उन्होंने घोषणा भी उद्धृत की है और दुनिया भर में मानवाधिकार मानदंडों के वर्तमान व्यापक उल्लंघनों के बावजूद अपने मूल्यों को पहचाना है। दुनिया भर में राष्ट्रीय संविधानों के लेख घोषणा की तरह दिखते हैं, अक्सर इसमें निहित अधिकारों में से कई को शामिल करते हैं। इस प्रकार, घोषणापत्र के पास आज के समाजों और राज्यों पर उल्लेखनीय प्रभाव पड़ा है।

मानवाधिकार अंतरराष्ट्रीय कानून और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के केंद्र में हैं। वे सभी संस्कृतियों के लिए सामान्य मूल्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं, और दुनिया भर के देशों द्वारा सम्मानित किया जाना चाहिए। मानवाधिकार असुरक्षित मौलिक अधिकार हैं जिनके लिए एक व्यक्ति स्वाभाविक रूप से हकदार है क्योंकि वह एक इंसान है। समानता और गैर-भेदभाव का सिद्धांत, जैसा घोषणा के अनुच्छेद 2 में निर्धारित है, मानवाधिकार संरक्षण प्रणाली का आधार है, जो हर मानव अधिकार साधन में स्थापित है, जो इसे निर्धारित करता है;

"हर कोई इस घोषणा में उल्लिखित सभी अधिकारों और स्वतंत्रताओं के हकदार है, बिना किसी प्रकार के भेद, जैसे कि जाति, रंग, लिंग, भाषा, धर्म, राजनीतिक या अन्य राय, राष्ट्रीय या सामाजिक मूल, संपत्ति, जन्म या अन्य स्थिति । इसके अलावा, देश या क्षेत्र के राजनीतिक, न्यायक्षेत्र या अंतर्राष्ट्रीय स्थिति के आधार पर कोई भेद नहीं किया जाएगा, जिसमें कोई व्यक्ति स्वतंत्र है, चाहे वह स्वतंत्र, भरोसा, गैर-स्वयं-शासित या संप्रभुता की किसी भी अन्य सीमा के तहत हो। "

Political Theory Meaning and Its Utility in Hindi

इस खंड में मानव अधिकारों की अवधारणा को इसकी उत्पत्ति से आज व्यापक व्याख्या के बारे में चर्चा की जाएगी। सबसे पहले, मानवाधिकार कानून के सिद्धांतों के आवेदन सहित मानव अधिकारों की अवधारणा के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय कानून के सामान्य तत्व भी पेश किए गए हैं। तीन प्रमुख आयामों पर जोर दिया जाता है: मानकों (मानवाधिकार मानदंड अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहमत ग्रंथों में परिभाषित); पर्यवेक्षण (मानवाधिकार मानकों के अनुपालन की निगरानी करने के लिए तंत्र); और जिस तरीके से मानवाधिकारों के प्रति सम्मान किया जाता है।

Tuesday, 15 October 2019

Political Theory Meaning and Its Utility in Hindi

राजनीतिक सिद्धांत की अवधारणा:

राजनीतिक सिद्धांत उन राजनीतिक मामलों को शामिल करते हुए निर्दिष्ट रिश्तों का एक सेट है जो राजनीतिक घटनाओं और व्यवहारों का वर्णन, व्याख्या, और भविष्यवाणी करने के लिए पूछताछ को व्यवस्थित और व्यवस्थित करते हैं। राजनीतिक सिद्धांत को राजनीतिक विज्ञान के आधार और शाखा के रूप में माना जाता है जो न केवल राजनीतिक विज्ञान में, बल्कि मानव ज्ञान और अनुभव की पूरी श्रृंखला में अन्य विशेषज्ञों द्वारा एकत्र किए गए आंकड़ों से निकाले जाने वाले सामान्यीकरण, सम्मेलनों या निष्कर्षों पर पहुंचने का प्रयास करता है । प्राचीन ग्रीस से वर्तमान तक, राजनीतिक सिद्धांत के इतिहास ने राजनीति विज्ञान के मौलिक और बारहमासी विचारों का सामना किया है। राजनीतिक सिद्धांत राजनीतिक घटनाओं, प्रक्रियाओं और संस्थानों और वास्तविक राजनीतिक व्यवहार पर दार्शनिक या नैतिक मानदंड के अधीन है। सबसे प्रभावशाली राजनीतिक सिद्धांतों का वर्णन तीनों लक्ष्यों जैसे कि वर्णन, व्याख्या, और भविष्यवाणी करना है। सिद्धांत राजनीतिक विज्ञान के कई विद्वानों और घाटियों के विचारों और शोध के परिणाम हैं। इस विषय पर विचारक विभिन्न राजनीतिक अवधारणाओं की परिभाषा तैयार करते हैं और सिद्धांत स्थापित करते हैं (डी के सरमा, 2007)।
Political Theory Meaning and Its Utility in Hindi
Political Theory Meaning and Its Utility in Hindi


जर्मिनो ने वर्णन किया कि 'राजनीतिक सिद्धांत उस बौद्धिक परंपरा को नामित करने में नियोजित करने का सबसे उपयुक्त शब्द है जो तत्काल व्यावहारिक चिंताओं के क्षेत्र को पार करने की संभावना और एक महत्वपूर्ण परिप्रेक्ष्य से मनुष्य के सामाजिक अस्तित्व को देखने की संभावना को प्रमाणित करता है।' सबाइन के मुताबिक, 'राजनीतिक सिद्धांत, काफी सरल है, मनुष्य अपने समूह के जीवन और संगठन की समस्याओं को समझने और हल करने का प्रयास करता है। यह राजनीतिक समस्याओं की अनुशासित जांच न केवल यह दिखाने के लिए कि राजनीतिक अभ्यास क्या है, बल्कि यह दिखाने के लिए कि इसका क्या अर्थ है। यह दिखाने में कि एक अभ्यास का अर्थ क्या है, या इसका क्या अर्थ होना चाहिए, राजनीतिक सिद्धांत यह बदल सकता है कि यह क्या है। '

कई प्रतिष्ठित सिद्धांतकारों ने राजनीतिक सिद्धांत की प्रकृति की व्याख्या की।

डेविड हेल्ड ने वर्णित किया कि "राजनीतिक सिद्धांत राजनीतिक जीवन के बारे में अवधारणाओं और सामान्यताओं का एक नेटवर्क है जो प्रकृति, उद्देश्य और सरकार, राज्य और समाज की प्रमुख विशेषताओं और मनुष्यों की राजनीतिक क्षमताओं के बारे में बयान शामिल है।" डब्ल्यूसी कोकर ने राजनीतिक सिद्धांत को समझाया "जब राजनीतिक सरकार और उसके रूपों और गतिविधियों का अध्ययन नहीं किया जाता है, तथ्यों के रूप में वर्णित और तुलनात्मक रूप से उनके तत्काल और अस्थायी प्रभावों के संदर्भ में निर्णय लिया जाता है, लेकिन तथ्यों को समझने और निरंतर के संबंध में मूल्यांकन के रूप में पुरुषों की जरूरतों, इच्छाओं और राय, तो हमारे पास राजनीतिक सिद्धांत है। " एंड्रयू हैकर के मुताबिक, "राजनीतिक सिद्धांत एक तरफ अच्छे राज्य और अच्छे समाज के सिद्धांतों के लिए एक अनिच्छुक खोज का संयोजन है, और दूसरे पर राजनीतिक और सामाजिक हकीकत के ज्ञान के लिए एक अनिच्छुक खोज है।" जॉर्ज कैटलिन ने कहा कि " राजनीतिक सिद्धांत में राजनीतिक विज्ञान और राजनीतिक दर्शन शामिल है। जबकि विज्ञान पूरे सामाजिक क्षेत्र की सभी प्रक्रियाओं पर कई रूपों में नियंत्रण की घटना को संदर्भित करता है। यह अंत या अंतिम मूल्य से संबंधित है, जब मनुष्य पूछता है कि राष्ट्रीय अच्छा क्या है "या "अच्छा समाज क्या है।" जॉन प्लांटाज़ ने कार्यात्मक शर्तों में राजनीतिक सिद्धांत को चित्रित किया और कहा कि "राजनीतिक सिद्धांत का कार्य राजनीति की शब्दावली के विश्लेषण और स्पष्टीकरण और आलोचनाओं की महत्वपूर्ण परीक्षा, सत्यापन और औचित्य के लिए प्रतिबंधित किया गया है। राजनीतिक तर्क में नियोजित। " एक अन्य सिद्धांतकार, नॉर्मन बैरी ने परिभाषित किया कि "राजनीतिक सिद्धांत एक विद्युत विषय है जो विभिन्न विषयों पर आकर्षित करता है। ज्ञान या विश्लेषण की विधि का कोई भी शरीर नहीं है जिसे विशेष रूप से राजनीतिक सिद्धांत से संबंधित वर्गीकृत किया जा सकता है। "

राजनीतिक सिद्धांत के दृष्टिकोण:

राजनीतिक विज्ञान का अध्ययन और राजनीतिक सत्य की खोज की प्रक्रिया में कुछ प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए। इन प्रक्रियाओं को दृष्टिकोण, विधियों, तकनीकों और रणनीतियों के रूप में परिभाषित किया जाता है। राजनीतिक विज्ञान का अध्ययन करने के दृष्टिकोण पारंपरिक और आधुनिक दृष्टिकोण (डी के सरमा, 2007) के रूप में समूहीकृत हैं।

पारंपरिक दृष्टिकोण:

पारंपरिक दृष्टिकोण मूल्य आधारित हैं। इन दृष्टिकोणों ने मूल्यों पर अधिक महत्व दिया है। इस दृष्टिकोण के वकील मानते हैं कि राजनीति विज्ञान का अध्ययन पूरी तरह वैज्ञानिक नहीं हो सकता है और नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि सामाजिक विज्ञान जैसे तथ्यों के मूल्य एक दूसरे के साथ निकटता से संबंधित हैं। राजनीति में, तथ्यों पर जोर नहीं देना चाहिए बल्कि राजनीतिक घटना की नैतिक गुणवत्ता पर होना चाहिए। दार्शनिक, संस्थागत, कानूनी, और ऐतिहासिक दृष्टिकोण (डी के सरमा, 2007) जैसे पारंपरिक दृष्टिकोणों की बड़ी संख्या है।

पारंपरिक दृष्टिकोण की विशेषताएं:

पारंपरिक दृष्टिकोण बड़े पैमाने पर मानक हैं और राजनीति के मूल्यों पर जोर देते हैं।
विभिन्न राजनीतिक संरचनाओं के अध्ययन पर जोर दिया जाता है।
पारंपरिक दृष्टिकोण ने सिद्धांत और अनुसंधान से संबंधित बहुत कम प्रयास किए।
इन दृष्टिकोणों का मानना ​​है कि चूंकि तथ्यों और मूल्यों को बारीकी से जुड़े हुए हैं, राजनीति विज्ञान में अध्ययन कभी वैज्ञानिक नहीं हो सकते हैं।

विभिन्न प्रकार के पारंपरिक दृष्टिकोण:

1. दार्शनिक दृष्टिकोण: इस दृष्टिकोण को राजनीति विज्ञान के क्षेत्र में सबसे पुराना दृष्टिकोण माना जाता है। इस दृष्टिकोण का विकास प्लेटो और अरिस्टोटल जैसे ग्रीक दार्शनिकों के समय पर वापस देखा जा सकता है। लियो स्ट्रॉस दार्शनिक दृष्टिकोण के मुख्य समर्थक में से एक था। उन्होंने माना कि "दर्शन ज्ञान और राजनीतिक दर्शन की तलाश है, राजनीतिक चीजों की प्रकृति और सही या अच्छे राजनीतिक आदेश के बारे में जानना वास्तव में प्रयास है।" वर्नोन वान डाइक ने देखा कि दार्शनिक विश्लेषण एक विचार को स्पष्ट करने का प्रयास है इस विषय की प्रकृति और इसके बारे में सिरों और साधनों का अर्थ है। मौजूदा दृष्टिकोण, कानून और नीतियों के महत्वपूर्ण मूल्यांकन के उद्देश्य से, इस दृष्टिकोण का उद्देश्य सही और गलत के मानक को विकसित करना है।

यह दृष्टिकोण सैद्धांतिक सिद्धांत पर आधारित है कि मूल्यों को राजनीति के अध्ययन से अलग नहीं किया जा सकता है। इसलिए, इसकी मुख्य चिंता किसी भी राजनीतिक समाज में अच्छा या बुरा क्या है इसका न्याय करना है। यह मुख्य रूप से राजनीति का नैतिक और मानक अध्ययन है, और इस प्रकार आदर्शवादी है। यह राज्य, नागरिकता, अधिकार और कर्तव्यों आदि की प्रकृति और कार्यों की समस्याओं को संबोधित करता है। इस दृष्टिकोण के समर्थकों का मानना ​​है कि राजनीतिक दर्शन राजनीतिक मान्यताओं से दृढ़ता से जुड़ा हुआ है। इसलिए, वे राय मानते हैं कि एक राजनीतिक वैज्ञानिक के पास अच्छे जीवन और अच्छे समाज का ज्ञान होना चाहिए। राजनीतिक दर्शन एक अच्छा राजनीतिक आदेश स्थापित करने में सहायता करता है (गौबा, 200 9)।

यह दृष्टिकोण सैद्धांतिक सिद्धांत पर आधारित है कि मूल्यों को राजनीति के अध्ययन से अलग नहीं किया जा सकता है। इसलिए, इसकी मुख्य चिंता किसी भी राजनीतिक समाज में अच्छा या बुरा क्या है इसका न्याय करना है। यह मुख्य रूप से राजनीति का नैतिक और मानक अध्ययन है, और इस प्रकार आदर्शवादी है। यह राज्य, नागरिकता, अधिकार और कर्तव्यों आदि की प्रकृति और कार्यों की समस्याओं को संबोधित करता है। इस दृष्टिकोण के समर्थकों का मानना ​​है कि राजनीतिक दर्शन राजनीतिक मान्यताओं से दृढ़ता से जुड़ा हुआ है। इसलिए, वे राय मानते हैं कि एक राजनीतिक वैज्ञानिक के पास अच्छे जीवन और अच्छे समाज का ज्ञान होना चाहिए। राजनीतिक दर्शन एक अच्छा राजनीतिक आदेश स्थापित करने में सहायता करता है (गौबा, 200 9)।

ऐतिहासिक दृष्टिकोण: इस राजनीतिक दृष्टिकोण को विकसित करने वाले सिद्धांतकारों ने ऐतिहासिक कारकों जैसे उम्र, स्थान और जिस स्थिति में इसे विकसित किया है, पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। यह दृष्टिकोण इतिहास से संबंधित है और यह किसी भी स्थिति का विश्लेषण करने के लिए हर राजनीतिक वास्तविकता के इतिहास के अध्ययन पर जोर देता है। माचियावेली, सबाइन और डनिंग जैसे राजनीतिक विचारकों ने माना कि राजनीति और इतिहास निकट से संबंधित हैं और राजनीति के अध्ययन में हमेशा ऐतिहासिक दृष्टिकोण होना चाहिए। सबाइन ने कहा कि राजनीति विज्ञान में उन सभी विषयों को शामिल करना चाहिए जिन पर प्लेटो के समय से विभिन्न राजनीतिक विचारकों के लेखन में चर्चा की गई है। यह दृष्टिकोण दृढ़ता से इस धारणा को बरकरार रखता है कि हर राजनीतिक विचारक की सोच या सिद्धांत आसपास के पर्यावरण द्वारा गठित किया जाता है। इसके अलावा, इतिहास अतीत के विवरण प्रदान करता है साथ ही साथ यह वर्तमान घटनाओं के साथ भी जुड़ा हुआ है। इतिहास हर राजनीतिक घटना का कालक्रम क्रम देता है और इस तरह घटनाओं के भविष्य के आकलन में भी मदद करता है। इसलिए, पिछले राजनीतिक घटनाओं, संस्थानों और राजनीतिक माहौल का अध्ययन किए बिना वर्तमान राजनीतिक घटनाओं का विश्लेषण करना गलत होगा। लेकिन ऐतिहासिक दृष्टिकोण के आलोचकों ने नामित किया कि समकालीन विचारों और अवधारणाओं के संदर्भ में पिछले युग के विचार को समझना संभव नहीं है।

संस्थागत दृष्टिकोण: यह राजनीतिक विज्ञान का अध्ययन करने में पारंपरिक और महत्वपूर्ण दृष्टिकोण है। यह दृष्टिकोण मुख्य रूप से सरकार और राजनीति की औपचारिक विशेषताओं से संबंधित है, राजनीतिक संस्थानों और संरचनाओं के अध्ययन को बढ़ाता है। इसलिए, संस्थागत दृष्टिकोण विधायिका, कार्यकारी, न्यायपालिका, राजनीतिक दलों और ब्याज समूहों जैसे औपचारिक संरचनाओं के अध्ययन से संबंधित है। इस दृष्टिकोण के समर्थकों में प्राचीन और आधुनिक राजनीतिक दार्शनिक दोनों शामिल हैं। प्राचीन विचारकों में, अरिस्टोटल की इस दृष्टिकोण को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका थी, जबकि आधुनिक विचारकों में जेम्स ब्रिस, बेंटले, वाल्टर बेजोश, हेरोल्ड लास्की ने इस दृष्टिकोण को विकसित करने में योगदान दिया।

कानूनी दृष्टिकोण: यह दृष्टिकोण चिंतित है कि राज्य कानूनों के गठन और प्रवर्तन के लिए मौलिक संगठन है। इसलिए, यह दृष्टिकोण कानूनी प्रक्रिया, कानूनी निकाय या संस्थानों, न्याय और न्यायपालिका की आजादी से संबंधित है। इस दृष्टिकोण के समर्थक सिसीरो, जीन बोडिन, थॉमस हॉब्स, जेरेमी बेंटहम, जॉन ऑस्टिन, डाइस और सर हेनरी मेन हैं।

राजनीतिक विज्ञान के अध्ययन के लिए विभिन्न पारंपरिक दृष्टिकोण मानक मानने के लिए अस्वीकृत कर दिए गए हैं। इन दृष्टिकोणों को भी सिद्धांतित किया गया था क्योंकि उनकी चिंता इस बात से परे थी कि क्यों और क्यों राजनीतिक घटनाएं होती हैं कि क्या होना चाहिए। बाद की अवधि में, आधुनिक दृष्टिकोणों ने राजनीति विज्ञान के अध्ययन को और अधिक वैज्ञानिक बनाने का प्रयास किया है, इसलिए, व्यावहारिकता पर जोर देते हैं।

आधुनिक दृष्टिकोण:

पारंपरिक दृष्टिकोण की मदद से राजनीति का अध्ययन करने के बाद, बाद के चरण के राजनीतिक विचारकों ने एक नए परिप्रेक्ष्य से राजनीति का अध्ययन करने की आवश्यकता महसूस की। इस प्रकार, पारंपरिक दृष्टिकोण की कमियों को कम करने के लिए, नए राजनीतिक विचारकों द्वारा विभिन्न नए दृष्टिकोणों की वकालत की गई है। इन नए दृष्टिकोणों को राजनीति विज्ञान के अध्ययन के लिए "आधुनिक दृष्टिकोण" के रूप में जाना जाता है। आधुनिक दृष्टिकोण तथ्य आधारित दृष्टिकोण हैं। वे राजनीतिक घटनाओं के तथ्यात्मक अध्ययन पर जोर देते हैं और वैज्ञानिक और निश्चित निष्कर्ष पर पहुंचने की कोशिश करते हैं। आधुनिक दृष्टिकोण का उद्देश्य अनुभववाद के साथ मानकवाद को प्रतिस्थापित करना है। इसलिए आधुनिक दृष्टिकोण प्रासंगिक डेटा की अनुभवजन्य जांच द्वारा चिह्नित किए जाते हैं।

आधुनिक दृष्टिकोण की विशेषताएं:

ये दृष्टिकोण अनुभवजन्य डेटा से निष्कर्ष निकालने का प्रयास करते हैं।
ये दृष्टिकोण राजनीतिक संरचनाओं और इसके ऐतिहासिक विश्लेषण के अध्ययन से परे जाते हैं।
आधुनिक दृष्टिकोण अंतर अनुशासनिक अध्ययन में विश्वास करते हैं।
वे अध्ययन के वैज्ञानिक तरीकों पर जोर देते हैं और राजनीति विज्ञान में वैज्ञानिक निष्कर्ष निकालने का प्रयास करते हैं।
आधुनिक दृष्टिकोण में सामाजिक दृष्टिकोण, मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण, आर्थिक दृष्टिकोण, मात्रात्मक दृष्टिकोण, सिमुलेशन दृष्टिकोण, सिस्टम दृष्टिकोण, व्यवहार दृष्टिकोण और मार्क्सियन दृष्टिकोण (डी के सरमा, 2007) शामिल हैं।

व्यवहार दृष्टिकोण:

आधुनिक अनुभवजन्य दृष्टिकोण में, राजनीतिक विज्ञान का अध्ययन करने के लिए व्यवहार दृष्टिकोण, उल्लेखनीय जगह पकड़ लिया। इस दृष्टिकोण के सबसे प्रतिष्ठित घाटे डेविड एटसन, रॉबर्ट, ए। दहल, ई। एम। किर्कपैट्रिक और हेनज़ युलाऊ हैं। व्यवहारिक दृष्टिकोण राजनीतिक सिद्धांत है जो आम आदमी के व्यवहार को ध्यान में रखते हुए ध्यान देने का परिणाम है। सिद्धांतवादी, किर्कपैट्रिक ने कहा कि पारंपरिक दृष्टिकोण ने अनुसंधान की मूल इकाई के रूप में संस्थान को स्वीकार किया लेकिन व्यवहारिक दृष्टिकोण राजनीतिक स्थिति में व्यक्ति के व्यवहार को आधार (के। सरमा, 2007) के रूप में मानते हैं।

व्यवहारवाद की मुख्य विशेषताएं:

डेविड ईस्टन ने व्यवहारवाद की कुछ प्रमुख विशेषताओं को इंगित किया है जिन्हें इसकी बौद्धिक नींव माना जाता है। य़े हैं:

नियमितता: इस दृष्टिकोण का मानना ​​है कि राजनीतिक व्यवहार में कुछ समानताएं हैं जिन्हें राजनीतिक घटनाओं को समझाने और भविष्यवाणी करने के लिए सामान्यीकरण या सिद्धांतों में व्यक्त किया जा सकता है। किसी विशेष स्थिति में व्यक्तियों का राजनीतिक व्यवहार कम या समान हो सकता है। व्यवहार की इस तरह की नियमितता शोधकर्ता को राजनीतिक स्थिति का विश्लेषण करने के साथ-साथ भविष्य की राजनीतिक घटनाओं की भविष्यवाणी करने में मदद कर सकती है। ऐसी नियमितताओं का अध्ययन राजनीतिक विज्ञान को कुछ अनुमानित मूल्य के साथ अधिक वैज्ञानिक बनाता है।

सत्यापन: व्यवहारविदों को सबकुछ स्वीकार नहीं करना चाहिए। इसलिए, वे परीक्षण पर जोर देते हैं और सब कुछ सत्यापित करते हैं। उनके अनुसार, सत्यापित नहीं किया जा सकता वैज्ञानिक नहीं है।

तकनीक: व्यवहारविद उन शोध औजारों और विधियों के उपयोग पर जोर देते हैं जो वैध, भरोसेमंद और तुलनात्मक डेटा उत्पन्न करते हैं। एक शोधकर्ता को नमूना सर्वेक्षण, गणितीय मॉडल, सिमुलेशन इत्यादि जैसे परिष्कृत उपकरणों का उपयोग करना चाहिए।

मात्रा: डेटा एकत्र करने के बाद, शोधकर्ता को उन आंकड़ों को मापना और मापना चाहिए।

मूल्य: व्यवहारविदों ने मूल्यों से तथ्यों को अलग करने पर भारी जोर दिया है। उनका मानना ​​है कि उद्देश्यपूर्ण शोध करने के लिए किसी को मूल्य मुक्त होना चाहिए। इसका मतलब है कि शोधकर्ता के पास कोई पूर्व-अनुमानित धारणा या पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण नहीं होना चाहिए।

व्यवस्थितकरण: व्यवहारविदों के अनुसार, राजनीति विज्ञान में शोध व्यवस्थित होना चाहिए। सिद्धांत और अनुसंधान एक साथ जाना चाहिए।

शुद्ध विज्ञान: व्यवहारवाद की एक और विशेषता राजनीति विज्ञान को "शुद्ध विज्ञान" बनाने का लक्ष्य रही है। यह मानता है कि राजनीति विज्ञान का अध्ययन साक्ष्य द्वारा सत्यापित किया जाना चाहिए।

एकीकरण: व्यवहारविदों के अनुसार, राजनीति विज्ञान को इतिहास, समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र आदि जैसे विभिन्न अन्य सामाजिक विज्ञान से अलग नहीं किया जाना चाहिए। इस दृष्टिकोण का मानना ​​है कि समाज में विभिन्न अन्य कारकों द्वारा राजनीतिक घटनाओं को आकार दिया जाता है और इसलिए, अलग होना गलत होगा अन्य विषयों से राजनीति विज्ञान।

यह सिद्धांतविदों द्वारा मान्यता प्राप्त है कि व्यवहारवाद के विकास के साथ, राजनीति विज्ञान के क्षेत्र में एक नई सोच और अध्ययन की नई तकनीक विकसित की गई।

व्यवहारिक दृष्टिकोण के लाभ इस प्रकार हैं:

यह दृष्टिकोण राजनीतिक विज्ञान को और अधिक वैज्ञानिक बनाता है और इसे व्यक्तियों के दिन के जीवन के करीब लाता है।
व्यवहारविज्ञान ने पहले राजनीतिक विज्ञान के क्षेत्र में मानव व्यवहार को समझाया है और इस प्रकार अध्ययन को समाज के लिए अधिक प्रासंगिक बनाता है।
यह दृष्टिकोण भावी राजनीतिक घटनाओं की भविष्यवाणी करने में मदद करता है।
व्यवहारिक दृष्टिकोण को विभिन्न राजनीतिक विचारकों द्वारा समर्थित किया गया है क्योंकि यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण और राजनीतिक घटनाओं की अनुमानित प्रकृति है।
योग्यता के बावजूद, वैज्ञानिक दृष्टिकोण के लिए अपने आकर्षण के लिए व्यवहारिक दृष्टिकोण की भी आलोचना की गई है। इस दृष्टिकोण के खिलाफ मुख्य आलोचनाओं का उल्लेख नीचे दिया गया है:
विषय वस्तु को अनदेखा करने और प्रथाओं पर निर्भरता के लिए यह असंतोषजनक रहा है।
इस दृष्टिकोण के समर्थक गलत थे जब उन्होंने कहा कि मनुष्य समान परिस्थितियों में समान तरीकों से व्यवहार करते हैं।
यह दृष्टिकोण मानव व्यवहार पर केंद्रित है लेकिन मानव व्यवहार का अध्ययन करना और एक निश्चित परिणाम प्राप्त करना एक कठिन काम है।
अधिकांश राजनीतिक घटनाएं अनिश्चित हैं। इसलिए राजनीति विज्ञान के अध्ययन में वैज्ञानिक तरीकों का उपयोग करना हमेशा मुश्किल होता है।
इसके अलावा, विद्वानों द्वारा विश्वास किए जाने वाले विद्वान हमेशा मनुष्य के रूप में तटस्थ नहीं होते हैं।
पोस्ट व्यवहार दृष्टिकोण:
1 9 60 के दशक के मध्य में, व्यवहारवाद ने राजनीतिक विज्ञान की पद्धति में एक प्रमुख स्थिति प्राप्त की। प्रासंगिकता और कार्रवाई पोस्ट व्यवहार के मुख्य नारे थे। आधुनिक सामाजिक विज्ञान में, व्यवहारवाद दृष्टिकोण ने समाज की मौजूदा समस्याओं के समाधान को हल करने में चिंता को दिखाया है। इस तरह, यह बड़े पैमाने पर अपने दायरे (गौबा, 200 9) के भीतर पोस्ट व्यवहारिक अभिविन्यास को अवशोषित कर रहा है।

राजनीतिक व्यवस्था पर्यावरण के भीतर काम करती है। पर्यावरण समाज के विभिन्न हिस्सों से मांग बनाता है जैसे कुछ समूहों के लिए रोजगार के मामले में आरक्षण की मांग, बेहतर काम करने की स्थितियों या न्यूनतम मजदूरी की मांग, बेहतर परिवहन सुविधाओं की मांग, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं की मांग। विभिन्न मांगों के समर्थन के विभिन्न स्तर हैं। ईस्टन ने कहा कि 'मांग' और 'समर्थन' स्थापित 'इनपुट'। राजनीतिक व्यवस्था पर्यावरण से इनपुट इनपुट प्राप्त करती है। विभिन्न कारकों को ध्यान में रखते हुए, सरकार इन मांगों में से कुछ पर कार्रवाई करने का फैसला करती है जबकि अन्य पर कार्य नहीं किया जाता है। रूपांतरण प्रक्रिया के माध्यम से, निर्णय निर्माताओं द्वारा नीतियों, निर्णयों, नियमों, विनियमों और कानूनों के रूप में इनपुट को 'आउटपुट' में परिवर्तित कर दिया जाता है। 'आउटपुट' 'फीडबैक' तंत्र के माध्यम से पर्यावरण में वापस आ जाता है, जिससे ताजा मांगें बढ़ती हैं। नतीजतन, यह एक चक्रीय प्रक्रिया है।

संरचनात्मक कार्यात्मक दृष्टिकोण: इस दृष्टिकोण के अनुसार, समाज को एक अंतर से संबंधित प्रणाली के रूप में माना जाता है जहां सिस्टम के प्रत्येक भाग में एक निश्चित और असमान भूमिका होती है। संरचनात्मक-कार्यात्मक दृष्टिकोण को सिस्टम विश्लेषण की वृद्धि के रूप में माना जा सकता है। ये दृष्टिकोण संरचनाओं और कार्यों को बढ़ाते हैं। गेब्रियल बादाम इस दृष्टिकोण का अनुयायी है। उन्होंने राजनीतिक प्रणालियों को एक विशेष प्रणाली के रूप में समझाया जो कि कुछ कार्यों में प्रदर्शन करने वाले सभी समाजों में मौजूद है। उनके सिद्धांत से पता चला कि राजनीतिक व्यवस्था की मुख्य विशेषताएं व्यापकता, अंतर-निर्भरता और सीमाओं के अस्तित्व हैं। ईस्टन की तरह, बादाम ने यह भी माना कि सभी राजनीतिक प्रणालियां इनपुट और आउटपुट फ़ंक्शंस करती हैं। राजनीतिक प्रणालियों के इनपुट फ़ंक्शन राजनीतिक सामाजिककरण और भर्ती, रुचि-अभिव्यक्ति, रुचि-आक्रामकता और राजनीतिक संचार हैं। बादाम ने नीति बनाने और कार्यान्वयन से संबंधित सरकारी आउटपुट कार्यों के तीन गुना वर्गीकरण किए। ये आउटपुट फ़ंक्शंस नियम बनाने, नियम आवेदन और नियम निर्णय हैं। इस प्रकार, बादाम ने पुष्टि की कि एक स्थिर और कुशल राजनीतिक व्यवस्था आउटपुट में इनपुट को परिवर्तित करती है।

संचार सिद्धांत दृष्टिकोण: यह दृष्टिकोण उस प्रक्रिया की पड़ताल करता है जिसके द्वारा सिस्टम का एक सेगमेंट संदेश या जानकारी भेजकर किसी अन्य को प्रभावित करता है। रॉबर्ट वीनर ने इस दृष्टिकोण को विकसित किया था। बाद में कार्ल Deutsch ने इसे विकसित किया और इसे राजनीति विज्ञान में लागू किया। Deutsch ने कहा कि राजनीतिक व्यवस्था संचार चैनलों का एक नेटवर्क है और यह स्वयं नियामक है। इसके अतिरिक्त, उन्होंने जोर दिया कि सरकार विभिन्न संचार चैनलों के प्रशासन के लिए ज़िम्मेदार है। यह दृष्टिकोण सरकार को निर्णय लेने प्रणाली के रूप में मानता है। Deutsch ने बताया कि संचार सिद्धांत में विश्लेषण के चार कारक हैं जिनमें लीड, अंतराल, लाभ और भार शामिल है।


निर्णय लेने का दृष्टिकोण:

यह राजनीतिक दृष्टिकोण निर्णय निर्माताओं की विशेषताओं के साथ-साथ व्यक्तियों के निर्णय निर्माताओं पर प्रभाव के प्रकार की खोज करता है। रिचर्ड सिंडर और चार्ल्स लिंडब्लॉम जैसे कई विद्वानों ने इस दृष्टिकोण को विकसित किया है। कुछ अभिनेताओं द्वारा लिया गया एक राजनीतिक निर्णय एक बड़े समाज को प्रभावित करता है और ऐसा निर्णय आम तौर पर एक विशिष्ट स्थिति द्वारा आकार दिया जाता है। इसलिए, यह निर्णय निर्माताओं के मनोवैज्ञानिक और सामाजिक पहलुओं को भी ध्यान में रखता है।

व्यापक रूप से, राजनीतिक विज्ञान के कई दृष्टिकोण समय-समय पर वकालत की गई हैं, और इन्हें व्यापक रूप से दो श्रेणियों में बांटा गया है जिसमें अनुभवजन्य-विश्लेषणात्मक या वैज्ञानिक-व्यवहार दृष्टिकोण और कानूनी-ऐतिहासिक या मानक-दार्शनिक दृष्टिकोण शामिल हैं।

अनुभवजन्य सिद्धांत:

सरल रूप में, अनुभवजन्य राजनीतिक सिद्धांत अवलोकन के माध्यम से 'क्या है' बताता है। इस दृष्टिकोण में, विद्वान एक परिकल्पना उत्पन्न करना चाहते हैं, जो कुछ घटनाओं के लिए एक प्रस्तावित स्पष्टीकरण है जिसे अनुभवी परीक्षण किया जा सकता है। एक परिकल्पना तैयार करने के बाद, एक अध्ययन परिकल्पना का परीक्षण करने के लिए डिज़ाइन किया जाएगा।

सामान्य सिद्धांत:

सामान्य राजनीतिक सिद्धांत न्याय, समानता और अधिकार जैसे अवधारणाओं से संबंधित है। ऐतिहासिक राजनीतिक सिद्धांत में अतीत से राजनीतिक दार्शनिक शामिल हैं (जैसे थुसीसाइड्स और प्लेटो) वर्तमान में (जैसे वेंडी ब्राउन और सेला बेनहाबीब), और इस बात पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं कि विशेष दार्शनिकों ने राजनीतिक समस्याओं को कैसे लगाया जो आज प्रासंगिक हैं। जबकि परंपरा पारंपरिक रूप से पश्चिमी परंपराओं पर रही है, यह इस क्षेत्र में बदलना शुरू हो रहा है।

व्यापक रूप से बोलते हुए, अनुभवजन्य दृष्टिकोण तथ्यों को खोजने और वर्णन करने का प्रयास करता है जबकि मानक दृष्टिकोण मूल्य निर्धारित करने और निर्धारित करने की मांग करता है

राजनीतिक सिद्धांत के अनुभवजन्य और मानक दृष्टिकोण के बीच अंतर

यह सैद्धांतिक साहित्य में प्रदर्शित किया गया है कि राजनीतिक विज्ञान के लिए पारंपरिक अनुभवजन्य दृष्टिकोण यह है कि यह एक "सकारात्मक" विज्ञान बनाता है। जो भी होना चाहिए, उसका अध्ययन राजनीतिक विज्ञान के लिए एक निश्चित सम्मान देता है जो राय-लेखन या राजनीतिक सिद्धांतकारों से जुड़ा हुआ नहीं है। जबकि प्लेटो और अरिस्टोटल ने एक अच्छी राजनीति की विशेषताओं को पहचानने की कोशिश की, अधिकांश आधुनिक राजनीतिक वैज्ञानिक अपनी भलाई या बुरेपन के बारे में नैतिक निर्णय छोड़कर, राजनीति, उनके कारणों और प्रभावों की विशेषताओं की पहचान करना चाहते हैं।

संक्षेप में, राजनीतिक सिद्धांत राजनीतिक विज्ञान के अनुशासन के भीतर एक अलग क्षेत्र है। राजनीतिक सिद्धांत राजनीतिक व्यवस्था के बारे में एक रूपरेखा है। यह 'राजनीतिक' शब्द के बारे में प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व है। यह राजनीतिक गतिविधि की प्रक्रियाओं और परिणामों के औपचारिक, तार्किक और व्यवस्थित विश्लेषण है। यह विश्लेषणात्मक, एक्सपोजिटरी और वर्णनात्मक है। यह 'राजनीतिक' के रूप में वर्णित करने के लिए आदेश, सुसंगतता और अर्थ देना चाहता है। राजनीतिक सिद्धांतवादी राजनीति की प्रकृति के बारे में अनुभवजन्य दावों के बजाय सैद्धांतिक दावों पर अधिक ध्यान केंद्रित करते हैं। ऐसे कई दृष्टिकोण हैं जो राजनीतिक व्यवस्था को बताते हैं जिसमें आधुनिक और पारंपरिक दृष्टिकोण शामिल हैं। व्यवहार दृष्टिकोण में, वैज्ञानिक विधि पर जोर दिया जाता है क्योंकि राजनीतिक स्थिति में कई कलाकारों के व्यवहार वैज्ञानिक अध्ययन में सक्षम हैं। सामान्य दृष्टिकोण दार्शनिक विधि से जुड़ा हुआ है क्योंकि मानदंडों और मूल्यों को दार्शनिक रूप से निर्धारित किया जा सकता है। राजनीतिक दृष्टिकोण का एक और वर्गीकरण राजनीतिक घटनाओं के अनुभवजन्य विश्लेषण है।