Maharana Pratap ka Itihaas - Mewar Vansh Part - 7

Maharana Pratap ka Itihaas in Hindi  - नमस्कार दोस्तों ये पोस्ट Mewar Vansh के इतिहास का Part - 7 है इस पोस्ट में आप Maharana Pratap History in Hindi, मेवाड़ के महान राजा Maharana Pratap के बारे में जानकारी प्राप्त करोगे हमारी ये पोस्ट Rajasthan GK की दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण है जो की पटवारी राजस्थान पुलिस और rpsc में पूछा जाता है

Maharana Pratap ka Itihas महाराणा प्रताप (1672-1597 ई.)


प्रताप सिंह I जिन्हें महाराणा प्रताप के नाम से जाना जाता है, मेवाड़ के 54वाँ राजा थे, जो वर्तमान राजस्थान राज्य में उत्तर-पश्चिमी भारत का एक क्षेत्र था।

जन्म: 9 मई 1540, कुम्भलगढ़ किला, किला कुम्भलगढ़
निधन: 19 जनवरी 1597, चावंड
ऊँचाई: 2.26 मीटर
पूरा नाम: महाराणा प्रताप सिंह सिसोदिया
जीवनसाथी: महारानी अजबदे पंवार (1557-1597)
बच्चे: अमर सिंह प्रथम, कुंवर दुर्जन सिंह, सहस मल

महाराणा प्रताप (1672-1597 ई.)


Maharana Pratap ka Itihaas
Maharana Pratap ka Itihaas - Mewar Vansh Part - 7


महाराणा प्रताप सिसौदिया वंश का महान राजा था महाराणा प्रताप ने मेवाड में कुल 25 वर्ष तक शासन किया । महाराणा प्रताप के पिता उदयसिंह व माता जैवन्ता बाई थी ।

इतिहास का एकमात्र राजा महाराणा प्रताप है, जिसका जन्म 1597 विक्रमी संवत्व मृत्यु 1597 में हुई ।
इनका का जन्म बादल महल ( कटारगढ ) कुम्भलगढ दुर्ग मे 9 मई 1540 ई ( ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया विक्रमी सवत् 1597 ) को हुआ महाराणा प्रताप के बचपन का नाम कीका था भीलों मे छोटे बालक को कीका कहते है

महाराणा प्रताप को कर्नल टॉड ने मेवाड़ केसरी कहा है
महाराणा प्रताप को हल्दीघाटी का शेर भी कहा जाता है
उदयसिंह ने अपनी रानी भटियाणी ( धीरजाई ) के प्रभाव में आकर जगमाल को उत्तराधिकारी बनाया ।
अखैराज सोनगरा ने जगमाल को गद्दी से हटाकर महाराणा प्रताप को शासक बनाया
इस अवसर पर पंडित कृष्णदास नामक ब्राह्मण ने 28 फरवरी, 1572 ई. को 32 वर्ष की आयु में महाराणा प्रताप की कमर में राजकीय तलवार बांधकर गोगुन्दा, उदयपुर में राजतिलक किया, लेकिन विधिवत रूप से राजतिलक राव चन्दसैन की मौजूदगी में कुंभलगढ़ के दुर्ग में हुआ ।

महाराणा उदयसिंह का पुत्र जगमाल नाराज होकर अकबर की शरण में चला गया और अकबर ने इन्हें सिरोही का कुछ भाग जागीर में दे दिया था लेकिन वहाँ के सरदारों ने इसका विरोध किया था ।

सिरोही के देवड़ा सूरताण ने 1583 ई. में दत्ताणी के युद्ध में जगमाल को पराजित किया और जगमाल इस युद्ध में मारा गया ।

1570 ई. में अकबर अजमेर दरगाह पर जियारत करने आया । तब अकबर ने अजमेर मे मैग्जीन दुर्ग  ( अकबर का किला ) बनवाया ।

राजस्थान में मुस्लिम पद्धति से बना एकमात्र किला मैग्जीन का किला है ।
मैग्जीन दुर्ग को राजस्थान का शस्त्रागार या अकबर का दौलतखाना भी कहा जाता है ।
राजस्थान आने वाला प्रथम अंग्रेज सर टॉमस रो मैग्जीन के किले में ही 1616 ई. में जहाँगीर से मिला था ।
1908 ई. में मैग्जीन के किले को राजपूताना संग्रहालय में बदल दिया गया है
अकबर द्वारा आयोजित 1570 ई. के नागौर दरबार में अधिकतर राजपूतों ने मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली लेकिन मेवाड़ के महाराणा प्रताप ने अधीनता स्वीकार नहीं की ।

अकबर द्वारा महाराणा प्रताप से संधि करने हेतु निम्न 4 संधि प्रस्तावकों को भेजा गया ।


  1. 1572 जलाल खां 
  2. जून 1573 मिर्जा राजा मानसिंह 
  3. सितम्बर 1573 भगवन्तदास 
  4. दिसम्बर 1573 टोडरमल

कुछ विद्वानों के अनुसार महाराणा प्रताप ने मानसिंह का अपमान किया था । इसलिए मानसिंह ने प्रताप के विरूद्ध अकबर को युद्ध हेतु भड़काया जिसका परिणाम हल्दीघाटी था । लेकिन अमर काव्य वंशावली में मानसिंह और महाराणा प्रताप की मुलाकात को सौहार्दपूर्ण बताया है

हल्दीघाटी का युद्ध


अकबर ने हल्दीघाटी युद्ध की व्यूह रचना मैग्जीन दुर्ग में ही रची थी 18 जून 1576 ई. (गोपीनाथ शर्मा के अनुसार 21 जून 1576 ई. ) को हल्दीघाटी का युद्ध / रक्त तलाई का युद्ध हुआ हल्दीघाटी का युद्ध मुगल सेनापति मिर्जा राजा मानसिंह व महाराणा प्रताप के बीच हुआ ।

हल्दीघाटी के युद्ध में अकबर की सेना का नेतृत्व आमेर के मिर्जा राजा मानसिंह ने किया ।
हल्दीघाटी के युद्ध में मानसिंह का मुस्लिम सहयोगी सेनापति आसफ खां था ।
मानसिंह ने मुगल सेना का नेतृत्व करते हुए मोलेला गांव ( राजसमंद ) में पडाव डाला

महाराणा प्रताप ने युद्ध की योजना ' कुम्भलगढ दुर्ग ' में बनाई तथा सेना ने लोहसिंह गांव ( राजसमंद ) में पड़ाव डाला ।

महाराणा प्रताप का शस्त्रागार मायरा की गुफा, उदयपुर में था ।
हल्दीघाटी युद्ध के समय महाराणा प्रताप ने अपना मुख्य नियंत्रण केन्द्र केलवाडा, राजसमंद को बनाया ।
हल्दीघाटी युद्ध में महाराणा प्रताप की हरावल सेना ( सेना का अग्रिम भाग ) का नेतृत्व एकमात्र मुस्लिम सेनापति हकीम खां सूरी पठान ने किया ।

हकीम खां सूरी का मकबरा खमनौर ( राजसमंद ) में बना है ।
हल्दीघाटी युद्ध में भील सेना (चंदावल सेना) का नेतृत्व पुंजा ने किया
हल्दीघाटी युद्ध को बनास का युद्ध तथा हाथियों का युद्ध भी कहा जाता है ।


थर्मोपोली

कर्नल जेम्स टॉड ने ' हल्दीघाटी को मेवाड़ की थर्मोपोली ' कहा है
थर्मोपोली नामक मूल युद्ध फारसी सेनानायक जरेक्सस व यूनानी वीर सेनानायक लियोनिडास के मध्य हुआ था । इसलिए कर्नल जेम्स टॉड ने लिखा है कि - मेवाड में ऐसा कोई स्थल नहीं जहाँ थर्मोपोली जैसी भूमि ना हो और लियोनिडास जैसा वीर नही है

हल्दीघाटी युद्ध को अबुल फजल ने खमनौर का युद्ध व बदायूनी ने गोगुन्दा का युद्ध कहा है हल्दीघाटी युद्ध में प्रसिद्ध इतिहासकार बदायूनी मौजूद था ।

हल्दीघाटी युद्ध का आँखों देखा वर्णन इतिहासकार बदायूनी ने अपने ग्रंथ मुन्तखाब-उल-तवारिख में किया है तथा युद्ध के बाद बदायूनी ने अपनी दाढी को राजपूतों के खून से रंगा ।

इस युद्ध के शुरूआत में राजपूतों ने मुगल सेना को पीछे हटा दिया था लेकिन रिजर्व सेना का सेनापति मिहत्तर खाँ ने अकबर के आने की झूठी अफवाह फेला दी, जिससे मुगल सेना में वापिस जोश आ गया और इसी जोश ने मुगल सेना को विजय दिलाई

महाराणा प्रताप की सेना में रामप्रसाद, गजप्रसाद, गजमुक्ता व लूणा हाथी थे ।

हल्दीघाटी युद्ध में महाराणा प्रताप के प्रिय हाथी का नाम रामप्रसाद था जिसे अकबर ने बाद में पीर प्रसाद नाम दिया था ।

हल्दीघाटी युद्ध में मिर्जा राजा मानसिंह का हाथी मर्दाना था ।

अकबर के हाथी का नाम हवाई था ।

झाला बीदा या झाला मन्न ने महाराणा प्रताप का राज्य चिन्ह लेकर स्वयं लडना शुरू किया तथा हल्दीघाटी युद्ध में अपना बलिदान देकर प्रताप को युद्ध के मैदान से निकाला ।

हल्दीघाटी युद्ध के बाद प्रताप की सेना कोल्यारी गांव ( उदयपुर ) रूकी व कोल्यारी गांव के निकट ही कमलनाथ पर्वत के पास आवरगढ में अपनी अस्थायी राजधानी स्थापित की

हल्दीघाटी युद्ध के पश्चात कोल्यारी गांव, उदयपुर में महाराणा प्रताप व इनके घायल सैनिकों का उपचार किया गया ।

डॉ. गोपीनाथ शर्मा के अनुसार हल्दीघाटी का युद्ध अनिर्णायक युद्ध था । लेकिन राजप्रशस्ति व राजविलास के अनुसार हल्दीघाटी युद्ध में महाराणा प्रताप विजयी हुआ ।

हल्दीघाटी स्थान को स्वतंत्रता प्रेमियों का तीर्थस्थल कहा जाता है । हल्दीघाटी स्थान गोगुन्दा व खमनौर की पहाड़ियों के बीच बनास नदी के किनारे राजसमन्द जिले में स्थित है ।

डॉ.ए.एल श्रीवास्तव ने हल्दीघाटी को बादशाहबाग नाम दिया ।
राजसमंद में प्रत्येक वर्ष हल्दीघाटी महोत्सव मनाया जाता हैं । 
हल्दीघाटी के मैदान को वर्तमान में सस्वाधीनता प्रेमियों के लिए तीर्थ स्थल कहा जाता है ।
चेतक की समाधि बलिचा गाँव (उदयपुर) में बनी है ।
चेतक की समाधि को चबूतरा कहा जाता है ।

अकबर ने हल्दीघाटी युद्ध के बाद चितौड़ व उदयपुर पर अधिकार का लिया तथा अकबर ने उदयपुर का नाम मुहम्मदाबाद कर दिया ।

रणछोड़ भट्ट के ग्रंथ अमर काव्य वंशावली के अनुसार महाराणा प्रताप की युद्ध से बच निकलने के बाद उनके भाई शक्तिसिह से भेंट हुई ।

शक्तिसिंह के द्वारा महाराणा प्रताप को घोड़ा देकर सहायता की गयी थी ।

डॉ. गोपीनाथ शर्मा के अनुसार शक्ति सिंह की मृत्यु अकबर के विरूद्ध चितौड़ के घेरे में 1568 ई. मे ही हो गई थी

भामाशाह


पाली के भामाशाह व ताराचंद ने प्रताप को 20000 स्वर्ण मुद्राएं देकर आर्थिक सहायता दी ।
भामाशाह को मेवाड का दानवीर कहा जाता है । 
कर्नल टॉड ने भामाशाह को मेवाड का कर्ण कहा है ।

मेवाड़ फाउंडेशन का भामाशाह पुरस्कार दानदाताओं को दिया जाता है तथा साम्प्रदायिक सद्भावना के लिए हकीम खां सूरी सम्मान दिया जाता है । 

हल्दीघाटी युद्ध के बाद महाराणा प्रताप ने कुंभलगढ़ दुर्ग को राजधानी बनाया तथा 1578 ई. को महाराणा प्रताप के कुम्भलगढ़ दुर्ग को केन्द्र बनाकर मुगलों का विरोध किया ।

महाराणा प्रताप का दूसरा व औपचारिक राज्यभिषेक 1578 ई. में कुम्भलगढ़ दुर्ग में हुआ इस समय मारवाड़ का राजा चन्द्रसैन वहाँ मौजूद था ।

कुंभलगढ़ का युद्ध (3 अप्रैल, 1578 ईं. )


अकबऱ ने अपने सेनापति शाहबाज खां के नेतृत्व में कुम्भलगढ़ पर आक्रमण के लिए मुगल सेना भेजी दोनों पक्षों की सेनाओं के मध्य भीषण युद्ध हुआ और युद्ध मे सफलता की कोई आशा ना दिखाई देने पर महाराणा प्रताप अपने विश्वस्त यौद्धा राव भाण सोनगरा को दुर्ग सौंपकर खुद सुरक्षित स्थान पर चला गया था

राव भाण सोनगरा अपने साथी सींधल सूजा के साथ मुगल सेना का वीरता से सामना करते हुए वीरगति को प्रात हो गये थे ।
महाराणा प्रताप ने छाछन की पहाडियों( उदयपुर ) में रहकर समय बिताया ।

महाराणा प्रताप की पत्नि अजब दे पंवार जगंलों में प्रताप के साथ रही तथा अमरसिंह प्रथम अजब दे पंवार का ही पुत्र था ।

अकबर ने हल्दीघाटी युद्ध के बाद महाराणा प्रताप के विरूद्ध तीन बार शहबाज खां को चौथी बार अब्दुल रहीम खानेखाना को तथा अन्तिम पांचवी जार जगन्नाथ कच्छवाह को प्रताप के विरुद्ध आक्रमण हेतु भेजा

 दिवेर युद्ध


मेवाड़, में दिवेर ( राजसमंद ), देसुरी ( राजसमंद ), देवल ( डूंगरपुर) व देबारी (उदयपुर) चार प्रमुख ठिकाने थे । सबसे महत्वपूर्ण ठिकाना दिवेर ठिकाना था । जहाँ अकबर ने सुल्तान खां को मुखितयार नियुक्त किया था ।
महाराणा प्रताप ने अक्टूबर 1582 ई. में मुगलों का विरोध शुरू किया

दिवेर के युद्ध ( 1582 ई. )को महाराणा प्रताप की विजयों का श्री गणेश कहा जाता है । दिवेर युद्ध में सुल्तान खाँ मारा गया ।

दिवेर युद्ध में महाराणा प्रताप ने 'गुरिल्ला ( छापामार ) युद्ध पद्धति' का प्रयोग करते हुए विजय प्रात की  दिवेर के युद्ध में महाराणा प्रताप ने मुगलगढ़ ( विभित्र मुगल ठिकाने ) पर आक्रमण किया और उन सभी 36 मुगलों की चौकियों को जीत लिया ।

जिसके परिणामस्वरूप मेवाड़ की 36 मुगल चौकियाँ मुगलों द्वारा बंद का दी गई ।


मैराथन


मैराथन का युद्ध फारसी सेनानायक हिप्पियस एवं एथेंस के सेनानायक मिल्टिएडस के मध्य यूनान की भूमि पर हुआ था

इस युद्ध में एथेंस अपना सम्मान बचा पाया था । इसलिए कर्नल जेम्स टॉड ने ' दिवेर के युद्ध ' को ' मेवाड़ का मैराथन ' कहा हैं ।

1584 ई. मे अकबर ने महाराणा प्रताप के विरुद्ध  जगन्नाथ कछवाहा को भेजकर अंतिम अभियान किया 
लेकिन मांडलगढ़ ( भीलवाडा ) में जगन्नाथ कछवाहा की मृत्यु हो जाती है ।

इसके बाद 1584 से 1597 ई. तक अंतिम 13 वर्षो में महाराणा प्रताप व अकबर के बीच कोई युद्ध नहीं हुआ । इतिहासकार इसे अघोषित संधि कहते है ।

जगन्नाथ कछवाहा की ' 32 खम्भों की छतरी  ' मांडलगढ़ भीलवाड़ा में बनी हुई है ।
1585 ई. में प्रताप ने अपनी आपातकालीन व अंतिम राजधानी चावण्ड (उदयपुर) को बनाया ।

दिवेर विजय व चावण्ड को राजधानी बनाने के बाद महाराणा प्रताप ने चितौड़ व मांडलगढ़ को छोड़कर पूरे मेवाड पर अधिकार कर लिया ।

धोलिया गाँव, उदयपुर में संकट के समय महाराणा का परिवार निवास करता था ।

चावण्ड चित्रशैली


चावण्ड चित्रकला शैली का विकास महाराणा प्रताप के समय हुआ । 
इस शैली का 1605 ई. में अमरसिंह प्रथम के समय का रागमाला पर नसीरूद्दीन चित्रकार द्वारा बनाया गया चित्र महत्वपूर्ण है ।
चावण्ड में चामुंडा देवी का मन्दिर महाराणा प्रताप द्वारा बनाया गया ।
कन्हैया लाल सेठिया द्वारा रचित 'पीथल और पाथल' से

अरे घास री रोटी ही ,जद बन बिलावडो ले भाग्यो,
नान्हों सो अमरयो चीख पड़यो, राणा रो सोयो दुख जाग्यो 


महाराणा प्रताप और इनका परिवार हल्दीघाटी के युद्ध के बाद जंगलों मे निवास करते थे, एक दिन महाराणा प्रताप ने अपने पुत्र अमरसिंह को घास की रोटी खाने के लिए दी लेकिन एक जंगली बिल्ला इस रोटी को लेकर भाग गया, अमरसिंह भूख के कारण जोर-जोर से रोने लगा, यह महाराणा से देखा नहीं गया । इस क्षण महाराणा ने सोचा था कि मुझे अकबर की अधीनता स्वीकार कर लेनी चाहिए लेकिन पीथल ने आकर महाराणा के स्वाभिमान को जगाया था ।

सुजानगढ़ ( चुरू ) में कवि कन्हैया लाल सेठीया ने अपनी रचना पाथल और पीथल ( राजस्थानी भाषा ) मे' पाथल शब्द का प्रयोग महाराणा प्रताप के लिए तथा पीथल शब्द का प्रयोग पृथ्वीराज राठौड (बीकानेर के कल्याणमल का पुत्र) के लिया किया गया है ।

कन्हैया लाल सेठीया की अन्य रचनाएं धरती धोरां री, लीलटास, बनफूल है ।
महाराणा प्रताप की 8 खम्भों की छतरी बांडोली (उदयपुर) में बनी हैं ।
महाराणा प्रताप का स्मारक मोती मगरी ( उदयपुर) व दिवेर ( राजसमंद ) में बना है ।

अकबर द्वारा महाराणा प्रताप के खिलाफ भेजे गए प्रमुख सैनिक अभियान

वर्ष             नेतृत्वकर्ता
  1. 1576 मानसिंह ( मुख्य नेतृत्वकर्ता)
  2. सितम्बर1576 भगवन्तदास, मानसिंह व कुतुबद्दीन खाँ
  3. 1576 स्वयं अकबर

हल्दीघाटी के युद्ध के बाद अकबर द्वारा महाराणा प्रताप के खिलाफ भेजे गए प्रमुख सैनिक अभियाना


वर्ष                नेतृत्वकर्ता
  1. 1577 शाहबाज खाँ
  2. 1578 शाहबाज खाँ
  3. 1579 शाहबाज खाँ
  4. 1580 अब्दुल रहीम खानेखाना
  5. 1584 जगन्नाथ कछवाहा

पं. सदाशिव द्वारा रचित ग्रंथ " राज रत्नाकर' में हल्दीघाटी के युद्ध का कारण मानसिंह व महाराणा प्रताप के मध्य में हुए मतभेद को माना है ।

चावण्ड चित्रशैली का जन्म महाराणा प्रताप के शासन काल में हुआ था, जबकि इस चित्रशैली का 'स्वर्णकाल' महाराणा प्रताप के पुत्र अमरसिंह का शासनकाल था ।

महाराणा प्रताप खेल रत्न पुरस्कार


राजस्थान में खेल के क्षेत्र में दिया जाने वाला सर्वोच्च सम्मान महाराणा प्रताप खेल रत्न पुरस्कार/राजस्थान खेल रत्न पुरस्कार है । पहला राजस्थान खेल रत्न पुरस्कार तीरंदाज लिम्ब राम को दिया गया है

महाराणा प्रताप के काल में इनके दरबारी लेखक चक्रपाणि मिश्र द्वारा विश्व वल्लभ, राजतिलक पद्धति व मुहूर्त मार्तण्ड की रचना की गई ।

महाराणा प्रताप की राज्यभिषेक से मृत्यु तक राजधानियाँ निम्नलिखित प्रकार से है -

 गोगुन्दा( प्रथम ) > कुंभलगढ़ > आवरगढ ( अस्थायी ) > कुंभलगढ़  > दिवेर > चावण्ड ( अंतिम )

महाराणा प्रताप की मृत्यु


19जनंवरी 1597 ईं. को 57 वर्ष की आयु में चावण्ड ( उदयपुर ) में धनुष पर प्रत्यंचा चढाते समय महाराणा प्रताप की मृत्यु हुई

सिसौदिया वंश में महाराणा प्रताप को युवराज का खिताब दिया गया और मेवाड़ का 54वाँ शासक नियुक्त किया गया

फतेहसागर झील के किनारे महाराणा प्रताप का स्मारक (मोतीमगरी उदयपुर) स्थित है

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