Rawal Ratan Singh History in Hindi | Mewar Vansh Part-2

Rawal Ratan Singh History - नमस्कार दोस्तों आप इस पोस्ट में मेवड़ वंश के राजा Rawal Ratan Singh के बारे में जानकारी प्राप्त करेंगे 

Rawal Ratan Singh History in Hindi | Mewar Vansh Part-2

Rawal Ratan Singh History in Hindi | Mewar Vansh Part-2
Rawal Ratan Singh History in Hindi | Mewar Vansh Part-2

Mewar Vansh के राजा Rawal Ratan Singh महारानी पद्मिनी के गौरव और साहस के बारे में आप लोगों ने काफी कुछ सुना होगा. उन्होंने जिस बहादुरी के साथ अपने स्वाभिमान की रक्षा की उसको शायद ही शब्दों में बयान किया जा सके. आज हम आपको रावल रतन सिंह के जीवन का परिचय देने जा रहे है और ये बताने जा रहे हैं कि किस तरह उन्होंने अपनी आखिरी सांस तक दुश्मनों का डट कर सामना किया.

रावलरत्न सिंह (1301-1308)

Rawal Ratan Singh मेवाड के गुहिल या रावल वंश का अंतिम राजा था ।
सिंहल द्वीप ( श्रीलंका) ( पटवार 2०11 ) के राजा गंधर्व सैन की पुत्री पद्मिनी का विवाह चितौड़ के राजा रावल रत्नसिंह से हुआ । 
जिसका उल्लेख 16वीं शताब्दी के लेखक मलिक मुहम्मद जायसी ने किया है ।
जिस समय चितौड़ पर रावलरत्न सिंह का शासन था उस समय अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली का शासक था और वह साम्राज्यवादी था ।
कुछ इतिहासकार रावलरत्न सिंह की पत्नी पद्मिनी की सुंदरता को चितौड़ पर होने वाले अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण का कारण मानते है ।
28 जनवरी 1303 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने चितौड़ पर आक्रमण किया व 26 अगस्त 1303 ई. को चित्तौड़गढ़ जीता । ( ग्रेड तृतीय-2013 ) इस युद्ध में रावल रत्न सिंह व उसके दो सैनिक गौरा व बादल मारे गए तथा पद्मिनी ने जौहर किया । इसे चितौड़ का पहला साका कहते है ।
गौरा पद्मिनी का चाचा था व बादल चचेरा भाई था । ( आरएएस 1991 )
रानी पद्मिनी के तोते का नाम हीरामन तोता था । हीरामन तोते को टुहिया तोता, हिन्दुओं का आकाशलोचन के उपनाम से भी जाना जाता था ।
शेरशाह सूरी के दरबारी कवि मलिक मोहम्मद जायसी ने 1540 ई. में पद्मावत ग्रंथ क्री रचना अवधी भाषा में की । जिसमें उक्त साके का वर्णन किया । ( टीआरए 1998 )
अलाउद्दीन खिलजी ने चितौड़ को 8 माह तक घेरे रखा । मजनिक पत्थर फेंकने के उपकरण थे । जिसकी सहायता से चित्तौड़गढ़ पर पत्थर फेंके गए ।
चितौड के पहले साके में इतिहासकार अमीर खुसरो मौजूद था ( ग्राम ' सेवक-2011 ) जिसने इस खाके का वर्णन अपनी रचना खजाइनुल फुतुह या तारीख-ए-अलाई में किया है ।
राघव चेतन नामक संगीतकार ने रानी पद्मिनी पर हमला करने के लिए अलाउद्दीन खिलजी को भड़काने के लिए उत्प्रेरक की भूमिका निभाई । ( नगरपालिका ईओ. -2०16 )
चितौड़गढ़ दुर्ग जीतने के बाद अलाउद्दीन खिलजी ने इस दुर्ग का नाम खिज्राबाद रखा । ( ग्रेड द्वितीय गणित-2010 ) चितौड़ का यह नाम धाई बा पीर की दरगाह के अभिलेख में मिलता हैं । जो कि चित्तौड़ की तलहटी में लगा है ।

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