Tuesday, 14 January 2020

Indian Constitution Articles in Hindi

सारे अनुच्छेद एक साथ Indian Constitution Articles:-

 Indian Constitution Articles
 Indian Constitution Articles

*अनुच्छेद 1* :- संघ कानाम और राज्य क्षेत्र
*अनुच्छेद 2* :- नए राज्यों का प्रवेश या स्थापना
*अनुच्छेद 3* :- राज्य का निर्माण तथा सीमाओं या नामों मे परिवर्तन
*अनुच्छेद 4* :- पहली अनुसूचित व चौथी अनुसूची के संशोधन तथा दो और तीन के अधीन बनाई गई विधियां
*अच्नुछेद 5* :- संविधान के प्रारंभ पर नागरिकता
*अनुच्छेद 6* :- भारत आने वाले व्यक्तियों को नागरिकता
*अनुच्छेद 7* :-पाकिस्तान जाने वालों को नागरिकता
*अनुच्छेद 8* :- भारत के बाहर रहने वाले व्यक्तियों का नागरिकता
*अनुच्छेद 9* :- विदेशी राज्य की नागरिकता लेने पर नागरिकता का ना होना
*अनुच्छेद 10* :- नागरिकता के अधिकारों का बना रहना
*अनुच्छेद 11* :- संसद द्वारा नागरिकता के लिए कानून का विनियमन
*अनुच्छेद 12* :- राज्य की परिभाषा
*अनुच्छेद 13* :- मूल अधिकारों को असंगत या अल्पीकरण करने वाली विधियां
*अनुच्छेद 14* :- विधि के समक्ष समानता
*अनुच्छेद 15* :- धर्म जाति लिंग पर भेद का प्रतिशेध
*अनुच्छेद 16* :- लोक नियोजन में अवसर की समानता
*अनुच्छेद 17* :- अस्पृश्यता का अंत
*अनुच्छेद 18* :- उपाधीयों का अंत
*अनुच्छेद 19* :- वाक् की स्वतंत्रता
*अनुच्छेद 20* :- अपराधों के दोष सिद्धि के संबंध में संरक्षण
*अनुच्छेद 21* :-प्राण और दैहिक स्वतंत्रता
*अनुच्छेद 21 क* :- 6 से 14 वर्ष के बच्चों को शिक्षा का अधिकार
*अनुच्छेद 22* :- कुछ दशाओं में गिरफ्तारी से सरंक्षण
*अनुच्छेद 23* :- मानव के दुर्व्यापार और बाल आश्रम
*अनुच्छेद 24* :- कारखानों में बालक का नियोजन का प्रतिशत
*अनुच्छेद 25* :- धर्म का आचरण और प्रचार की स्वतंत्रता
*अनुच्छेद 26* :-धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता
*अनुच्छेद 29* :- अल्पसंख्यक वर्गों के हितों का संरक्षण
*अनुच्छेद 30* :- शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन करने का अल्पसंख्यक वर्गों का अधिकार
*अनुच्छेद 32* :- अधिकारों को प्रवर्तित कराने के लिए उपचार
*अनुच्छेद 36* :- परिभाषा
*अनुच्छेद 40* :- ग्राम पंचायतों का संगठन
*अनुच्छेद 48* :- कृषि और पशुपालन संगठन
*अनुच्छेद 48क* :- पर्यावरण वन तथा वन्य जीवों की रक्षा
*अनुच्छेद 49:-* राष्ट्रीय स्मारक स्थानों और वस्तुओं का संरक्षण
*अनुछेद. 50* :- कार्यपालिका से न्यायपालिका का प्रथक्करण
*अनुच्छेद 51* :- अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा
*अनुच्छेद 51क* :- मूल कर्तव्य
*अनुच्छेद 52* :- भारत का राष्ट्रपति
*अनुच्छेद 53* :- संघ की कार्यपालिका शक्ति
*अनुच्छेद 54* :- राष्ट्रपति का निर्वाचन
*अनुच्छेद 55* :- राष्ट्रपति के निर्वाचन की रीती
*अनुच्छेद 56* :- राष्ट्रपति की पदावधि
*अनुच्छेद 57* :- पुनर्निर्वाचन के लिए पात्रता
*अनुच्छेद 58* :- राष्ट्रपति निर्वाचित होने के लिए आहर्ताए
*अनुच्छेद 59* :- राष्ट्रपति पद के लिए शर्ते
*अनुच्छेद 60* :- राष्ट्रपति की शपथ
*अनुच्छेद 61* :- राष्ट्रपति पर महाभियोग चलाने की प्रक्रिया
*अनुच्छेद 62* :- राष्ट्रपति पद पर व्यक्ति को भरने के लिए निर्वाचन का समय और रीतियां
*अनुच्छेद 63* :- भारत का उपराष्ट्रपति
*अनुच्छेद 64* :- उपराष्ट्रपति का राज्यसभा का पदेन सभापति होना
*अनुच्छेद 65* :- राष्ट्रपति के पद की रिक्त पर उप राष्ट्रपति के कार्य
*अनुच्छेद 66* :- उप-राष्ट्रपति का निर्वाचन
*अनुच्छेद 67* :- उपराष्ट्रपति की पदावधि
*अनुच्छेद 68* :- उप राष्ट्रपति के पद की रिक्त पद भरने के लिए निर्वाचन
*अनुच्छेद69* :- उप राष्ट्रपति द्वारा शपथ
*अनुच्छेद 70* :- अन्य आकस्मिकता में राष्ट्रपति के कर्तव्यों का निर्वहन
*अनुच्छेद 71*. :- राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के निर्वाचन संबंधित विषय
*अनुच्छेद 72* :-क्षमादान की शक्ति
*अनुच्छेद 73* :- संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार
*अनुच्छेद 74* :- राष्ट्रपति को सलाह देने के लिए मंत्रिपरिषद
*अनुच्छेद 75* :- मंत्रियों के बारे में उपबंध
*अनुच्छेद 76* :- भारत का महान्यायवादी
*अनुच्छेद 77* :- भारत सरकार के कार्य का संचालन
*अनुच्छेद 78* :- राष्ट्रपति को जानकारी देने के प्रधानमंत्री के कर्तव्य
*अनुच्छेद 79* :- संसद का गठन
*अनुच्छेद 80* :- राज्य सभा की सरंचना
*अनुच्छेद 81* :- लोकसभा की संरचना
*अनुच्छेद 83* :- संसद के सदनो की अवधि
*अनुच्छेद 84* :-संसद के सदस्यों के लिए अहर्ता
*अनुच्छेद 85* :- संसद का सत्र सत्रावसान और विघटन
*अनुच्छेद 87* :- राष्ट्रपति का विशेष अभी भाषण
*अनुच्छेद 88* :- सदनों के बारे में मंत्रियों और महानयायवादी अधिकार
*अनुच्छेद 89* :-राज्यसभा का सभापति और उपसभापति
*अनुच्छेद 90* :- उपसभापति का पद रिक्त होना या पद हटाया जाना
*अनुच्छेद 91* :-सभापति के कर्तव्यों का पालन और शक्ति
*अनुच्छेद 92* :- सभापति या उपसभापति को पद से हटाने का संकल्प विचाराधीन हो तब उसका पीठासीन ना होना
*अनुच्छेद 93* :- लोकसभा का अध्यक्ष और उपाध्यक्ष
*अनुचित 94* :- अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का पद रिक्त होना
*अनुच्छेद 95* :- अध्यक्ष में कर्तव्य एवं शक्तियां
*अनुच्छेद 96* :- अध्यक्ष उपाध्यक्ष को पद से हटाने का संकल्प हो तब उसका पीठासीन ना होना
*अनुच्छेद 97* :- सभापति उपसभापति तथा अध्यक्ष,उपाध्यक्ष के वेतन और भत्ते
*अनुच्छेद 98* :- संसद का सविचालय
*अनुच्छेद 99* :- सदस्य द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान
*अनुच्छेद 100* - संसाधनों में मतदान रिक्तियां के होते हुए भी सदनों के कार्य करने की शक्ति और गणपूर्ति
*अनुच्छेद 108* :- कुछ दशाओं में दोनों सदनों की संयुक्त बैठक
*अनुत्छेद 109* :- धन विधेयक के संबंध में विशेष प्रक्रिया
*अनुच्छेद 110* :- धन विधायक की परिभाषा
*अनुच्छेद 111* :- विधेयकों पर अनुमति
*अनुच्छेद 112* :- वार्षिक वित्तीय विवरण
*अनुच्छेद 118* :- प्रक्रिया के नियम
*अनुच्छेद 120* :- संसद में प्रयोग की जाने वाली भाषा
*अनुच्छेद 123* :- संसद विश्रांति काल में राष्ट्रपति की अध्यादेश शक्ति
*अनुच्छेद 124* :- उच्चतम न्यायालय की स्थापना और गठन
*अनुच्छेद 125* :- न्यायाधीशों का वेतन
*अनुच्छेद 126* :- कार्य कार्य मुख्य न्याय मूर्ति की नियुक्ति
*अनुच्छेद 127* :- तदर्थ न्यायमूर्तियों की नियुक्ति
*अनुच्छेद 128* :- सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की उपस्थिति
*अनुच्छेद 129* :- उच्चतम न्यायालय का अभिलेख नयायालय होना
*अनुच्छेद 130* :- उच्चतम न्यायालय का स्थान
*अनुच्छेद 131* :- उच्चतम न्यायालय की आरंभिक अधिकारिता
*अनुच्छेद 137* :- निर्णय एवं आदेशों का पुनर्विलोकन
*अनुच्छेद 143* :- उच्चतम न्यायालय से परामर्श करने की राष्ट्रपति की शक्ति
*अनुच्छेद144* :-सिविल एवं न्यायिक पदाधिकारियों द्वारा उच्चतम न्यायालय की सहायता
*अनुच्छेद 148* :- भारत का नियंत्रक महालेखा परीक्षक
*अनुच्छेद 149* :- नियंत्रक महालेखा परीक्षक के कर्तव्य शक्तिया
*अनुच्छेद 150* :- संघ के राज्यों के लेखन का प्रारूप
*अनुच्छेद 153* :- राज्यों के राज्यपाल
*अनुच्छेद 154* :- राज्य की कार्यपालिका शक्ति
*अनुच्छेद 155* :- राज्यपाल की नियुक्ति
*अनुच्छेद 156* :- राज्यपाल की पदावधि
*अनुच्छेद 157* :- राज्यपाल नियुक्त होने की अर्हताएँ
*अनुच्छेद 158* :- राज्यपाल के पद के लिए शर्तें
*अनुच्छेद 159* :- राज्यपाल द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान
*अनुच्छेद 163* :- राज्यपाल को सलाह देने के लिए मंत्री परिषद
*अनुच्छेद 164* :- मंत्रियों के बारे में अन्य उपबंध
*अनुच्छेद 165* :- राज्य का महाधिवक्ता
*अनुच्छेद 166* :- राज्य सरकार का संचालन
*अनुच्छेद 167* :- राज्यपाल को जानकारी देने के संबंध में मुख्यमंत्री के कर्तव्य
*अनुच्छेद 168* :- राज्य के विधान मंडल का गठन
*अनुच्छेद 170* :- विधानसभाओं की संरचना
*अनुच्छेद 171* :- विधान परिषद की संरचना
*अनुच्छेद 172* :- राज्यों के विधानमंडल कि अवधी
*अनुच्छेद 176* :- राज्यपाल का विशेष अभिभाषण
*अनुच्छेद 177* सदनों के बारे में मंत्रियों और महाधिवक्ता के अधिकार
*अनुच्छेद 178* :- विधानसभा का अध्यक्ष और उपाध्यक्ष
*अनुच्छेद 179* :- अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का पद रिक्त होना या पद से हटाया जाना
*अनुच्छेद 180* :- अध्यक्ष के पदों के कार्य व शक्ति
*अनुच्छेद 181* :- अध्यक्ष उपाध्यक्ष को पद से हटाने का कोई संकल्प पारित होने पर उसका पिठासिन ना होना
*अनुच्छेद 182* :- विधान परिषद का सभापति और उपसभापति
*अनुच्छेद 183* :- सभापति और उपासभापति का पद रिक्त होना पद त्याग या पद से हटाया जाना
*अनुच्छेद 184* :- सभापति के पद के कर्तव्यों का पालन व शक्ति
*अनुच्छेद 185* :- संभापति उपसभापति को पद से हटाए जाने का संकल्प विचाराधीन होने पर उसका पीठासीन ना होना
*अनुच्छेद 186* :- अध्यक्ष उपाध्यक्ष सभापति और उपसभापति के वेतन और भत्ते
*अनुच्छेद 187* :- राज्य के विधान मंडल का सविचाल.
*अनुच्छेद 188* :- सदस्यों द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान
*अनुच्छेद 189* :- सदनों में मतदान रिक्तियां होते हुए भी साधनों का कार्य करने की शक्ति और गणपूर्ति
*अनुच्छेद 199* :- धन विदेश की परिभाषा
*अनुच्छेद 200* :- विधायकों पर अनुमति
*अनुच्छेद 202* :- वार्षिक वित्तीय विवरण
*अनुच्छेद 213* :- विधानमंडल में अध्यादेश सत्यापित करने के राज्यपाल की शक्ति
*अनुच्छेद 214* :- राज्यों के लिए उच्च न्यायालय
*अनुच्छेद 215* :- उच्च न्यायालयों का अभिलेख न्यायालय होना
*अनुच्छेद 216* :- उच्च न्यायालय का गठन
*अनुच्छेद 217* :- उच्च न्यायालय न्यायाधीश की नियुक्ति पद्धति शर्तें
*अनुच्छेद 221* :- न्यायाधीशों का वेतन
*अनुच्छेद 222* :- एक न्यायालय से दूसरे न्यायालय में न्यायाधीशों का अंतरण
*अनुच्छेद 223* :- कार्यकारी मुख्य न्याय मूर्ति के नियुक्ति
*अनुच्छेद 224* :- अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति
*अनुच्छेद 226* :- कुछ रिट निकालने के लिए उच्च न्यायालय की शक्ति
*अनुच्छेद 231* :- दो या अधिक राज्यों के लिए एक ही उच्च न्यायालय की स्थापना
*अनुच्छेद 233* :- जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति
*अनुच्छेद 241* :- संघ राज्य क्षेत्र के लिए उच्च-न्यायालय
*अनुच्छेद 243* :- पंचायत नगर पालिकाएं एवं सहकारी समितियां
*अनुच्छेद 244* :- अनुसूचित क्षेत्रो व जनजाति क्षेत्रों का प्रशासन
*अनुच्छेद 248* :- अवशिष्ट विधाई शक्तियां
*अनुच्छेद 252* :- दो या अधिक राज्य के लिए सहमति से विधि बनाने की संसद की शक्ति
*अनुच्छेद 254* :- संसद द्वारा बनाई गई विधियों और राज्यों के विधान मंडल द्वारा बनाए गए विधियों में असंगति
*अनुच्छेद 256* :- राज्यों की और संघ की बाध्यता
*अनुच्छेद 257* :- कुछ दशाओं में राज्यों पर संघ का नियंत्रण
*अनुच्छेद 262* :- अंतर्राज्यक नदियों या नदी दूनों के जल संबंधी विवादों का न्याय निर्णय
*अनुच्छेद 263* :- अंतर्राज्यीय विकास परिषद का गठन
*अनुच्छेद 266* :- संचित निधी
*अनुच्छेद 267* :- आकस्मिकता निधि
*अनुच्छेद 269* :- संघ द्वारा उद्ग्रहित और संग्रहित किंतु राज्यों को सौपे जाने वाले कर
*अनुच्छेद 270* :- संघ द्वारा इकट्ठे किए कर संघ और राज्यों के बीच वितरित किए जाने वाले कर
*अनुच्छेद 280* :- वित्त आयोग
*अनुच्छेद 281* :- वित्त आयोग की सिफारिशे
*अनुच्छेद 292* :- भारत सरकार द्वारा उधार लेना
*अनुच्छेद 293* :- राज्य द्वारा उधार लेना
&अनुच्छेद 300 क* :- संपत्ति का अधिकार
*अनुच्छेद 301* :- व्यापार वाणिज्य और समागम की स्वतंत्रता
*अनुच्छेद 309* :- राज्य की सेवा करने वाले व्यक्तियों की भर्ती और सेवा की शर्तों
*अनुच्छेद 310* :- संघ या राज्य की सेवा करने वाले व्यक्तियों की पदावधि
*अनुच्छेद 313* :- संक्रमण कालीन उपबंध
*अनुच्छेद 315* :- संघ राज्य के लिए लोक सेवा आयोग
*अनुच्छेद 316* :- सदस्यों की नियुक्ति एवं पदावधि
*अनुच्छेद 317* :- लोक सेवा आयोग के किसी सदस्य को हटाया जाना या निलंबित किया जाना
*अनुच्छेद 320* :- लोकसेवा आयोग के कृत्य
*अनुच्छेद 323 क* :- प्रशासनिक अधिकरण
*अनुच्छेद 323 ख* :- अन्य विषयों के लिए अधिकरण
*अनुच्छेद 324* :- निर्वाचनो के अधिक्षण निर्देशन और नियंत्रण का निर्वाचन आयोग में निहित होना
*अनुच्छेद 329* :- निर्वाचन संबंधी मामलों में न्यायालय के हस्तक्षेप का वर्णन
*अनुछेद 330* :- लोक सभा में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिये स्थानो का आरणण
*अनुच्छेद 331* :- लोक सभा में आंग्ल भारतीय समुदाय का प्रतिनिधित्व
*अनुच्छेद 332* :- राज्य के विधान सभा में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थानों का आरक्षण
*अनुच्छेद 333* :- राज्य की विधानसभा में आंग्ल भारतीय समुदाय का प्रतिनिधित्व
*अनुच्छेद 343* :- संघ की परिभाषा
*अनुच्छेद 344* :- राजभाषा के संबंध में आयोग और संसद की समिति
*अनुच्छेद 350 क* :- प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की सुविधाएं
*अनुच्छेद 351* :- हिंदी भाषा के विकास के लिए निर्देश
*अनुच्छेद 352* :- आपात की उदघोषणा का प्रभाव
*अनुछेद 356* :- राज्य में संवैधानिक तंत्र के विफल हो जाने की दशा में उपबंध
*अनुच्छेद 360* :- वित्तीय आपात के बारे में उपबंध
*अनुच्छेद 368* :- सविधान का संशोधन करने की संसद की शक्ति और उसकी प्रक्रिया
*अनुच्छेद 377* :- भारत के नियंत्रक महालेखा परीक्षक के बारे में उपबंध
*अनुच्छेद 378* :- लोक सेवा आयोग के बारे

TOP 30 IMPORTANT NOTE


संविधान के किस भाग में अस्थायी संक्रमणकालीन और विशेष उपबन्धों के प्रावधान हैं? –
*भाग 21*
वर्तमान में भारतीय संविधान में कुल कितनी अनुसूचियां हैं? –
*12*
संसद का निम्न सदन एवं उच्च सदन है? –
*लोकसभा एवं राज्यसभा*
बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री थे? –
*डॉ. श्रीकृष्ण सिंह*
विधानपरिषद् का सदस्य होने के लिए कम-से-कम कितनी आयु सीमा होनी चाहिए? – *30 वर्ष*
किसी राज्य विधान सभा के सदस्यों की न्यूनतम संख्या कितनी हो सकती है? – *60*
अखिल भारतीय सेवा का गठन कर सकता है? – *संसद*
मतदाताओं के पंजीयन का उत्तरदायित्व किस पर है? – *निर्वाचन आयोग*
मूल संविधान में क्षेत्रीय महत्त्व के 66 विषय राज्य सूची में थे। अब उनकी संख्या कितनी है? – *61*
संयुक्त प्रवर समिति में कितने सदस्य होते हैं? – *45*
वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश के अतिरिक्त कितने न्यायाधीश का प्रावधान किया गया है? – *30*
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय कहाँ स्थित है? – *बिलासपुर*
राज्यपाल राज्य में किसका प्रतिनिधि होता है? – *राष्ट्रपति का*
भारतीय संविधान के किन अनुच्छेदों में राज्य के नीति निर्देशक तत्त्वों का उल्लेख है? – *अनुच्छेद 36-51*
राज्य पुनर्गठन अधिनियम कब पारित किया गया? – *1956 ई.*
भारतीय नागरिकता नहीं प्राप्त की जा सकती है? –
*भारतीय बैंक में धन जमा करके*
भारतीय जनता पार्टी का चुनाव चिन्ह क्या है? – *कमल*
मौलिक कर्तव्यों की अवहेलना करने वालों को? –
*दंड देने की व्यवस्था नहीं है*
संसद के दो क्रमिक अधिवेशनों के बीच अधिकतम कितने समयान्तराल की अनुमति है? – *6 माह*
भारत के राष्ट्रपति निर्वाचित होने के पात्र बनने के लिए किसी व्यक्ति की आयु पूर्ण होनी चाहिए? – *35 वर्ष*
राष्ट्रपति पद्धति में समस्त कार्यपालिका की शक्तियाँ किसमें निहित होती हैं? – *राष्ट्रपति में*
किस संवैधानिक संशोधन द्वारा अरुणाचल प्रदेश को राज्य का दर्जा प्रदान किया गया? – *55वाँ*
गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट-1935 किस पर आधारित था? –
*साइमन कमीशन*
भारतीय संविधान सभा की स्थापना कब हुई? –
*9 दिसम्बर, 1946*
अब तक भारत के संविधान की उद्देशिका में कितनी बार संशोधन किया जा चुका है? – *एक बार*
पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन कौन करता है? – *राष्ट्रपति*
विश्व का सबसे बड़ा, लिखित एवं सर्वाधिक व्यापक संविधान किस देश का है? – *भारत*
भारत की संघीय व्यवस्था किस देश की संघीय व्यवस्था से अधिक समानता रखती है? – *कनाडा*
किस राज्य के आरक्षण विधेयक को 9वीं अनुसूची में सम्मिलित किया गया है? – *तमिलनाडु*
भारतीय लोक प्रशासन संस्थान की स्थापना कब हुई? – *मार्च 1954*
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भारतीय संविधान की विशेषताएँ

IMPORTANTS  OF INDIAN CONSTITUENCY
● भारत का संविधान कैसा है—  *लिखित एंव विश्व का सबसे व्यापक संविधान *
● भारतीय संविधन का स्वरूप होता है—  *संरचना में संघात्मक *
● भारत में किस प्रकार का शासन व्यवस्था अपनाई गई है—
*ब्रिटिश संसदात्मक प्रणाली*
● भारतीय संविधान का अभिभावक कौन है—  *सर्वोच्च न्यायालय*
● भारत के संविधान में संघीय शब्द की जगह किन शब्दों को स्थान दिया गया है— *राज्यों का संघ *
● भारतीय संविधान में कितनी सूचियाँ हैं—  *12*
● भारतीय संविधान अपना अधिकार किससे प्राप्त करता है—
*भारतीय जनता से *
● भारत में वैद्य प्रभुसत्ता किस में निहित है—
*संविधान में *
● भारतीय संविधान की संरचना किस प्रकार की है—
*कुछ एकात्मक, कुछ कठोर *
● लिखित संविधान की अवधारणा ने कहाँ जन्म लिया— * फ्रांस *
● अध्यक्षात्मक शासन का उदय सर्वप्रथम कहाँ हुआ—
*संयुक्त राज्य अमेरिका*
● भारतीय संविधान में नागरिकों को कितने मूल अधिकार प्राप्त है—
* 6 *
● भारतीय संघीय व्यवस्था की प्रमुख विशेषता क्या है—
*संविधान की सर्वोच्चता*
● भारतीय संघवाद व्यवस्था की प्रमुख विशेषता क्या है—
*संविधान की सर्वोच्चता*
● भारतीय संघवाद को किसने सहकारी संघवाद कहा—
*जी. ऑस्टिन ने*
● भारत में प्रजातंत्र किस तथ्य पर आधरित है—  *जनता को सरकार चनने व बदलने का अधिकार है*

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*राजनीति विज्ञानं से सम्बंधित परीक्षा में पूछे गये (40) एेसे  प्रश्न-  जो  आगामी प्रतियोगिता परीक्षा जैसे*
भारतीय लोक प्रशासन संस्थान की स्थापना कब हुई? –
*मार्च 1954*
समवर्ती सूची में लिखे विषयों पर अधिनियम बनाने का अधिकार किसके पास है? –
*राज्य और संघ*
प्रथम राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा के समय देश के राष्ट्रपति कौन थे? –
*डॉ. एस. राधाकृष्णन*
42वें संशोधन द्वारा संविधान के किस अनुच्छेद में मौलिक कर्तव्यों को जोड़ा गया है? –
*अनुच्छेद-51 A*
वर्तमान में भारतीय संविधान के कुल कितने भाग है? –
*22*
संविधान लागू होने के पश्चात् निम्न में से कौन भारतीय संघ का एक आरक्षित राज्य था? –
*सिक्किम*
संविधान के किस भाग में भारत के नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लेख किया गया है? –
*भाग-3*
मौलिक अधिकार संविधान के किस भाग में वर्णित है? –
*भाग III*
राज्यसभा की बैठकों का सभापतित्व कौन करता है? –
*उपराष्ट्रपति*
कोई वित्तीय बिल प्रस्तावित हो सकता है? –
*केवल लोकसभा में*
भारत में किसकी स्वीकृति के बिना कोई भी सरकारी खर्चा नहीं किया जा सकता? –
*संसद*
मंत्रिपरिषद् में कितने स्तर के मंत्री होते हैं? –
*3*
आमतौर पर भारत के प्रधानमंत्री होते हैं? –
*लोकसभा का सदस्य*
भारत सरकार का प्रमुख विधि अधिकारी कौन है? –
*भारत के महान्यायवादी*
भारत के सर्वोच्च न्यायालय का एक न्यायाधीश कितनी उम्र तक अपने पद पर बना रह सकता है? –
*65 वर्ष*
किन राज्यों में साझा उच्च न्यायालय है? –
*महाराष्ट्र व गोवा*
राष्ट्रपति किसकी सलाह पर किसी राज्य के राज्यपाल की नियुक्ति करते है? –
*प्रधानमंत्री*
राज्य का मुख्यमंत्री किसके प्रति उत्तरदायी होता है? –
*विधान सभा*
राज्य विधानमंडल का ऊपरी सदन कौन-सा है? –
*विधान परिषद्*
उस संघ राज्य का नाम बताइए जहाँ निर्वाचित विधानसभा एवं मंत्रिपरिषद् है? –
*पुदुचेरी*
भारतीय संविधान में कितनी भाषाएँ क्षेत्रीय भाषाओं के रूप में मान्यता प्राप्त हैं? –
*22*
जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री की कार्य अवधि होती है? –
*छह वर्ष*
पंचायत समिति का गठन होता है? – *प्रखंड स्तर पर*
भारत में साम्यवाद आधारित दल है? –  *CPI*
वर्तमान समय में लोकसभा की 543 सीटों में से कितनी सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं? –
*84*
किस संवैधानिक संशोधन अधिनियम द्वारा गोवा को राज्य का दर्जा प्रदान किया गया? –
*56वाँ*
किसी क्षेत्र को अनुसूचित जाति और जनजाति क्षेत्र घोषित करने का अधिकार किसे है? –
*राष्ट्रपति*
स्थायी संसद भारत में कब तक अस्तित्व में रही है? –
*17 अप्रैल, 1952*
भारत के चौथे राष्ट्रपति थे? –
*वी. वी. गिरि*
उपराष्ट्रपति को उसके कार्यकाल की समाप्ति के पूर्व पद से हटाने का अधिकार किसको है? –
*संसद*
संसद का चुनाव लड़ने के लिए प्रत्याशी की न्यूनतम आयु कितनी होनी चाहिए? –
*25 वर्ष*
राज्यसभा द्वारा लोकसभा को धन विधेयक कितने समय में लौटा दिये जाने चाहिए? –
*14 दिन*
राजनीतिक शब्दावली में ‘शून्यकाल’ का अर्थ है? –
*प्रश्न-उत्तर सत्र*
इन्दिरा गाँधी दूसरी अवधि के लिए प्रधानमंत्री बनी? –
*1980 से 1984 तक*
मुख्य सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति कौन करता है? –
*राष्ट्रपति*
उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि करने की शक्ति किसके पास है? –
*संसद*
भारत में कुल कितने उच्च न्यायालय हैं? –
*24*
उपराज्यपाल की नियुक्ति कौन करता है? –
*राष्ट्रपति*
विधानपरिषद् के कितने सदस्य प्रत्येक दूसरे वर्ष अवकाश ग्रहण करते हैं? –
*1/3*
राजनीति और नीतियों से व्युत्पन्न शब्द ‘इन्द्रधनुषी गठबंधन’ शब्द किसने दिया? –
*पिट


Thursday, 17 October 2019

The Cold War full information in hindi

शीत युद्ध की उत्पत्ति

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ ने एक्सिस शक्तियों के खिलाफ सहयोगियों के रूप में एक साथ लड़े। हालांकि, दोनों देशों के बीच संबंध एक तनावपूर्ण था। अमेरिकियों ने लंबे समय से सोवियत साम्यवाद से सावधान रहना था और रूसी नेता जोसेफ स्टालिन के अपने देश के खूनी प्यारे, खूनी प्यारे शासन के बारे में चिंतित थे। अपने हिस्से के लिए, सोवियत संघ ने अमेरिका के दशकों से अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के एक वैध हिस्से के साथ-साथ द्वितीय विश्व युद्ध में उनकी देरी प्रविष्टि के रूप में व्यवहार करने से इंकार कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप लाखों रूसियों की मौत हुई। युद्ध समाप्त होने के बाद, ये शिकायत आपसी अविश्वास और शत्रुता की जबरदस्त भावना में पड़ी। पूर्वी यूरोप में पोस्टवर सोवियत विस्तारवाद ने दुनिया को नियंत्रित करने के लिए रूसी योजना के कई अमेरिकियों के डर को बढ़ावा दिया। इस बीच, यूएसएसआर ने अमेरिकी अधिकारियों के बेलिकोस रेटोरिक, हथियारों के निर्माण और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के लिए हस्तक्षेपवादी दृष्टिकोण के रूप में जो कुछ भी माना, उससे नाराज हो गया। इस तरह के एक शत्रुतापूर्ण वातावरण में, शीत युद्ध के लिए कोई भी पार्टी पूरी तरह से दोषी नहीं थी; वास्तव में, कुछ इतिहासकारों का मानना ​​है कि यह अपरिहार्य था।

शीत युद्ध: सम्मिलन


द्वितीय विश्व युद्ध के अंत तक, अधिकांश अमेरिकी अधिकारी इस बात पर सहमत हुए कि सोवियत खतरे के खिलाफ सबसे अच्छा बचाव "रोकथाम" नामक एक रणनीति थी। 1946 में, अपने प्रसिद्ध "लांग टेलीग्राम" में, राजनयिक जॉर्ज केनन (1904-2005) ने इसे समझाया नीति: सोवियत संघ, उन्होंने लिखा था, "एक राजनीतिक ताकत इस विश्वास के लिए कट्टरपंथी थी कि अमेरिका के साथ कोई स्थायी मोडस विवेन्दी नहीं हो सकता है [असहमत पार्टियों के बीच समझौता]"; नतीजतन, अमेरिका की एकमात्र पसंद "दीर्घकालिक, मरीज लेकिन रूसी विशाल प्रवृत्तियों की दृढ़ और सतर्क रोकथाम थी।" राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन (1884-1972) सहमत हुए। "यह संयुक्त राज्य अमेरिका की नीति होनी चाहिए," उन्होंने 1947 में कांग्रेस के समक्ष घोषित किया, "स्वतंत्र दबावों का विरोध करने वाले लोगों का समर्थन करने के लिए ... बाहरी दबावों से ..." इस तरह के सोच से अगले चार दशकों तक अमेरिकी विदेश नीति को आकार दिया जाएगा।

क्या तुम्हें पता था?

"शीत युद्ध" शब्द पहली बार 1 9 45 के निबंध में अंग्रेजी लेखक जॉर्ज ऑरवेल ने "यू एंड द परमाणु बम" कहा था।

शीत युद्ध: एटोमिक एज

रोकथाम रणनीति ने संयुक्त राज्य अमेरिका में अभूतपूर्व हथियारों के निर्माण के लिए भी तर्क प्रदान किया। 1 9 50 में, एनएससी -68 के नाम से जाने वाली एक राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की रिपोर्ट ने ट्रूमैन की सिफारिश को प्रतिबिंबित किया था कि देश कम्युनिस्ट विस्तारवाद को "शामिल" करने के लिए सैन्य बल का उपयोग करता है, ऐसा लगता है कि ऐसा लगता है। इसके अंत में, रिपोर्ट में रक्षा खर्च में चार गुना वृद्धि हुई।

विशेष रूप से, अमेरिकी अधिकारियों ने द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त होने वाले परमाणु हथियारों के विकास को प्रोत्साहित किया। इस प्रकार एक घातक "हथियार दौड़" शुरू हुई। 1949 में, सोवियत संघ ने अपने परमाणु बम का परीक्षण किया। जवाब में, राष्ट्रपति ट्रूमैन ने घोषणा की कि संयुक्त राज्य अमेरिका एक और अधिक विनाशकारी परमाणु हथियार का निर्माण करेगा: हाइड्रोजन बम, या "सुपरबॉम्ब।" स्टालिन ने पीछा किया।

नतीजतन, शीत युद्ध के हिस्से खतरनाक रूप से उच्च थे। मार्शल द्वीप समूह में एनविटोक एटोल में पहला एच-बम परीक्षण, दिखाया गया कि परमाणु युग कितना डरावना हो सकता है। इसने 25 वर्ग मीटर की एक फायरबॉल बनाई जिसने एक द्वीप का वाष्पीकरण किया, समुद्र तल में एक बड़ा छेद उड़ा दिया और मैनहट्टन के आधे हिस्से को नष्ट करने की शक्ति थी। बाद के अमेरिकी और सोवियत परीक्षणों ने वातावरण में जहरीले रेडियोधर्मी अपशिष्ट को उखाड़ फेंक दिया।

परमाणु विनाश के मौजूदा खतरे का अमेरिकी घरेलू जीवन पर भी बहुत बड़ा असर पड़ा। लोगों ने अपने पिछवाड़े में बम आश्रयों का निर्माण किया। उन्होंने स्कूलों और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर हमले के अभ्यास का अभ्यास किया। 1950 और 1960 के दशक में लोकप्रिय फिल्मों का एक महामारी देखा गया जो परमाणु विनाश और उत्परिवर्ती प्राणियों के चित्रण के साथ फिल्मों को डराता था। इन और अन्य तरीकों से, शीत युद्ध अमेरिकियों के रोजमर्रा की जिंदगी में निरंतर उपस्थिति थी।

ठंडा युद्ध स्पेस करने के लिए विस्तारित करता है

शीत युद्ध प्रतियोगिता के लिए अंतरिक्ष अन्वेषण ने एक और नाटकीय क्षेत्र के रूप में कार्य किया। 4 अक्टूबर, 1957 को, एक सोवियत आर -7 इंटरकांटिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल ने स्पुतनिक ("यात्री" के लिए रूसी) लॉन्च किया, जो दुनिया का पहला कृत्रिम उपग्रह है और पृथ्वी की कक्षा में पहली मानव निर्मित वस्तु है। अधिकांश अमेरिकियों के लिए स्पुतनिक का लॉन्च एक आश्चर्यजनक और सुखद नहीं था। संयुक्त राज्य अमेरिका में, अंतरिक्ष को अगली सीमांत के रूप में देखा गया था, जो कि खोज की भव्य अमेरिकी परंपरा का तार्किक विस्तार था, और सोवियत संघ को बहुत अधिक जमीन नहीं खोना महत्वपूर्ण था। इसके अलावा, आर -7 मिसाइल की जबरदस्त शक्ति का यह प्रदर्शन-सोवियत सैन्य गतिविधियों के बारे में विशेष रूप से जरूरी अमेरिकी वायु अंतरिक्ष-निर्मित एकत्रित खुफिया जानकारी पर परमाणु हथियार देने में सक्षम है।

1958 में, यू.एस. ने रॉकेट वैज्ञानिक वर्नर वॉन ब्रौन की दिशा में अमेरिकी सेना द्वारा डिजाइन किया गया अपना उपग्रह, एक्सप्लोरर I लॉन्च किया, और स्पेस रेस के रूप में जाना जाने वाला क्या चल रहा था। उसी वर्ष, राष्ट्रपति ड्वाइट आइज़ेनहोवर ने राष्ट्रीय एयरोनॉटिक्स और स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (नासा), अंतरिक्ष अन्वेषण के लिए समर्पित एक संघीय एजेंसी, साथ ही साथ अंतरिक्ष की सैन्य क्षमता का फायदा उठाने के लिए कई कार्यक्रम तैयार करने के सार्वजनिक आदेश पर हस्ताक्षर किए। फिर भी, सोवियत एक कदम आगे थे, जिसने अप्रैल 1961 में अंतरिक्ष में पहला व्यक्ति लॉन्च किया था।

मई, एलन शेपर्ड अंतरिक्ष में पहले अमेरिकी व्यक्ति बनने के बाद, राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी (1917-1963) ने बोल्ड सार्वजनिक दावा किया कि अमेरिका एक दशक के अंत तक चंद्रमा पर एक आदमी को उतरा देगा। 20 जुलाई, 1969 को उनकी भविष्यवाणी सच हो गई, जब नासा के अपोलो 11 मिशन के नील आर्मस्ट्रांग, चंद्रमा पर भोजन सेट करने वाले पहले व्यक्ति बने, जो प्रभावी रूप से अमेरिकियों के लिए अंतरिक्ष रेस जीत रहे थे। अमेरिकी अंतरिक्ष यात्रियों को अंतिम अमेरिकी नायकों के रूप में देखा जाने लगा, और पृथ्वी से बंधे पुरुषों और महिलाओं को उनके माध्यम से vicariously रहने का आनंद लेना प्रतीत होता था। सोवियत संघ, बदले में, अमेरिका को पार करने और कम्युनिस्ट प्रणाली की शक्ति साबित करने के अपने बड़े, निरंतर प्रयासों के साथ, अंतिम खलनायक के रूप में चित्रित किए गए थे।

Wednesday, 16 October 2019

Liberty vs Equality Hindi Notes
लिबर्टी और समानता एक दूसरे से बारीकी से संबंधित हैं। समानता की अनुपस्थिति में स्वतंत्रता का कोई मूल्य नहीं है। वे अलग-अलग कोणों से देखे गए समान स्थितियां हैं। वे एक ही सिक्के के दोनों पक्ष हैं। यद्यपि स्वतंत्रता और समानता के बीच घनिष्ठ संबंध है, फिर भी कुछ राजनीतिक विचारक हैं जिन्हें स्वतंत्रता और समानता के बीच कोई संबंध नहीं मिलता है। उदाहरण के लिए, लॉर्ड एक्टन और डी टॉकविले जो स्वतंत्रता के उत्साही समर्थक थे, को दो स्थितियों के बीच कोई संबंध नहीं मिला।

लिबर्टी और समानता के बीच संबंध

Liberty vs Equality Hindi Notes
Liberty vs Equality Hindi Notes

उनके लिए स्वतंत्रता और समानता एक दूसरे के प्रति विरोधी और विरोधी थे। लॉर्ड एक्टन ने कहा कि "समानता के जुनून ने स्वतंत्रता की आशा व्यर्थ की है"। ऐसे राजनीतिक विचारक यह मानते हैं कि स्वतंत्रता कहां है, वहां कोई समानता नहीं है और इसके विपरीत। ये राजनीतिक विचारक इस राय के हैं कि लोगों को प्रकृति द्वारा असमानता प्रदान की गई थी। हमें प्रकृति में असमानता भी मिलती है।

कुछ हिस्सों में नदियां होती हैं जबकि अन्य में पहाड़ होते हैं और अभी भी अन्य हिस्सों में मैदान और खेत होते हैं। उनकी क्षमता और क्षमता में कोई भी दो व्यक्ति समान नहीं हैं। और इसलिए समाज में समानता नहीं हो सकती है।

लॉर्ड एक्टन और डी टॉकविले के विचार आधुनिक राजनीतिक विचारकों द्वारा स्वीकार नहीं किए जाते हैं। प्रोफेसर एच जे लास्की ने इस संबंध में बहुत ही उचित टिप्पणी की है: "टॉकविले और लॉर्ड एक्टन, स्वतंत्रता और समानता के रूप में स्वतंत्रता के लिए इतने उत्साहित लोगों को, विरोधी चीजें हैं। यह एक कठोर निष्कर्ष है। लेकिन यह दोनों पुरुषों के मामले में, समानता के बारे में गलतफहमी पर निर्भर करता है "।

इन दिनों, आमतौर पर यह माना जाता है कि स्वतंत्रता और समानता एक साथ जाना चाहिए। अगर किसी व्यक्ति को जो भी पसंद है उसे करने के लिए अनियंत्रित स्वतंत्रता दी जाती है, तो वह दूसरों को नुकसान पहुंचाएगा। अगर व्यक्तियों को अनियंत्रित स्वतंत्रता दी जाती है तो समाज में अराजकता होगी।

उन्नीसवीं शताब्दी में, व्यक्तियों ने गलत तरीके से 'लिबर्टी' शब्द का व्याख्या किया। उन्होंने आर्थिक समानता के लिए कोई महत्व नहीं लगाया और सरकार द्वारा अपनाई जाने वाली लाईसेज़ फेयर पर तनाव डाला। एडम स्मिथ इस विचार के उत्साही वकील थे।

व्यक्तियों ने कहा कि पूंजीपतियों और श्रमिकों के बीच एक स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा होनी चाहिए। वे नहीं चाहते थे कि सरकार आर्थिक मामलों में हस्तक्षेप करे। मांग और आपूर्ति का फॉर्मूला अपनाया जाना चाहिए।

इस सूत्र द्वारा सभी आर्थिक कठिनाइयों को हटा दिया जाएगा। यदि वहां वस्तुओं की अधिक मात्रा और श्रम की आसान उपलब्धता होगी, तो कीमतें नीचे आ जाएंगी। यदि कमी है, तो कीमतें उच्च और उच्च हो जाएंगी। यह सूत्र इंग्लैंड और यूरोप के कई अन्य देशों में लागू किया गया था और इसके परिणामस्वरूप खतरनाक परिणाम सामने आए।

सरकार ने पूंजीपतियों पर अपना नियंत्रण खो दिया। पूंजीपतियों ने पूरी तरह से अवसर का शोषण किया। उन्होंने श्रम का पूरा फायदा उठाया। इसके परिणामस्वरूप, अमीर अमीर हो गए और गरीब गरीब बन गए। श्रम वर्ग दुखद रूप से पीड़ित था।

इसके परिणामस्वरूप, व्यक्तिवाद के खिलाफ एक तीव्र प्रतिक्रिया हुई। इस प्रतिक्रिया ने समाजवाद की शुरुआत की। समाजवाद ने व्यक्तिगतता के सिद्धांतों की निंदा की और अस्वीकार कर दिया। आर्थिक समानता की अनुपस्थिति में लिबर्टी का कोई महत्व नहीं है। प्रोफेसर लास्की ने बहुत अच्छी तरह से टिप्पणी की है, "यहां पर अमीर और गरीब, शिक्षित और अशिक्षित हैं, हम हमेशा मास्टर और नौकर का रिश्ता पाते हैं"।

C.E.M. जोड ने यह भी कहा है, "स्वतंत्रता का सिद्धांत," जिसकी राजनीति में महत्व का अनुमान नहीं लगाया जा सकता है, अर्थशास्त्र के क्षेत्र में लागू होने पर विनाशकारी तरीके से काम करता है। " हॉब्स ने यह भी कहा है, "भूखे आदमी के लिए स्वतंत्रता क्या है? वह स्वतंत्रता नहीं खा सकता है या पी सकता है "।

इस प्रकार, यह स्पष्ट है कि राजनीतिक आजादी के अस्तित्व के लिए आर्थिक समानता आवश्यक है। अन्यथा यह पूंजीवादी लोकतंत्र होगा जिसमें मजदूरों को वोट देने का अधिकार होगा लेकिन वे अपने उद्देश्यों को पूरा करने में सक्षम नहीं होंगे। इसलिए, शब्द की असली भावना में लिबर्टी केवल सोशलिस्ट लोकतंत्र में ही संभव है जिसमें समानता और स्वतंत्रता एक साथ जाती है।

इसी तरह, यह भी सच है कि राजनीतिक स्वतंत्रता की अनुपस्थिति में समानता स्थापित नहीं की जा सकती है। श्री एल्टन ट्रू-ब्लड ने इस संबंध में बहुत ही उचित टिप्पणी की है। "विरोधाभास यह है कि समानता और स्वतंत्रता, जो संघर्ष और तनाव में विचारों से शुरू हुई, एक-दूसरे के लिए आवश्यक विश्लेषण खोलें। सच्चाई यह है कि स्वतंत्रता के संदर्भ में समानता के अर्थ का उचित बयान देना असंभव है। पुरुष केवल तभी होते हैं क्योंकि सभी पुरुष आंतरिक रूप से मुक्त होते हैं, क्योंकि सभी सृष्टि में कुछ भी मुफ्त नहीं है "।

बार्कर कहते हैं, "समानता, अपने सभी रूपों में, हमेशा रहना चाहिए," क्षमता के मुक्त विकास के लिए विषय और वाद्ययंत्र, लेकिन यदि इसे समानता की लंबाई तक दबाया जाए और यदि क्षमता के मुक्त विकास को विफल करने के लिए समानता बनाई जाए, विषय मास्टर बन जाता है और दुनिया सबसे ऊपर की ओर बढ़ी है "।

आरएच टॉवनी ने सही टिप्पणी की है, "समानता का एक बड़ा उपाय, अब तक स्वतंत्रता के लिए आक्रामक होने से, इसके लिए आवश्यक है"। पोलार्ड भी लिखते हैं, "स्वतंत्रता की समस्या का केवल एक ही समाधान है। यह समानता में निहित है "। इस प्रकार, लिबर्टी और समानता एक-दूसरे के पूरक हैं। वे एक-दूसरे का विरोध नहीं कर रहे हैं। वे एक साथ जाते हैं।

लिबर्टी और समानता "को याद करके सुलझाया जाना चाहिए कि दोनों (स्वतंत्रता और समानता) व्यापक संभव पैमाने पर व्यक्तिगत व्यक्तित्व की संभावनाओं को साकार करने के अंत तक अधीनस्थ साधन हैं। एक समृद्ध विविधता के विकास के लिए स्वतंत्रता के एक बड़े स्तर की आवश्यकता होती है और सामाजिक और आर्थिक समानता के मृत स्तर को लागू करने के सभी प्रयासों को रोकता है "।

"दोनों के बीच घनिष्ठ संबंध है" क्योंकि सभी व्यक्तिगत स्वतंत्रता सभी पुरुषों की मूल समानता से संबंधित हैं और क्योंकि ऐतिहासिक रूप से स्वतंत्रता की आकांक्षा अभ्यास और विशेषाधिकार या असमानता के विनाश में हो गई है। "

दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। हर्बर्ट ए डीन कहते हैं, "इस प्रकार लिबर्टी समानता का तात्पर्य है," स्वतंत्रता और समानता संघर्ष में नहीं है और न ही अलग है, लेकिन एक ही आदर्श के विभिन्न तथ्य हैं ... वास्तव में जब वे समान हैं, तो कोई समस्या नहीं हो सकती है कि वे कितनी हद तक संबंधित हैं या संबंधित हो सकते हैं; राजनीतिक दर्शन में बारहमासी समस्या के लिए कभी भी सबसे संतोषजनक समाधान नहीं होने पर यह निश्चित रूप से निकटतम है।
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मानव अधिकारों की अवधारणा

मानव अधिकारों की संयुक्त राष्ट्र घोषणा 1948 जबकि मानव परिवार के सभी सदस्यों के अंतर्निहित गरिमा और समान और अयोग्य अधिकारों की मान्यता दुनिया में स्वतंत्रता, न्याय और शांति की नींव है,
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जबकि मानवाधिकारों के प्रति उपेक्षा और अवमानना ​​के परिणामस्वरूप बर्बर कृत्य हुए हैं, जिन्होंने मानव जाति के विवेक को अपमानित किया है, और ऐसी दुनिया का आगमन जिसमें मनुष्य भाषण और विश्वास की आजादी का आनंद ले सके और भय और इच्छा से स्वतंत्रता को सर्वोच्च आकांक्षा के रूप में घोषित किया गया है आम लोगों के, जबकि यह जरूरी है, अगर मनुष्य को अत्याचार और दमन के खिलाफ विद्रोह करने के लिए अंतिम उपाय के रूप में सहारा लेने के लिए मजबूर नहीं किया जाता है, तो मानवाधिकार कानून के शासन द्वारा संरक्षित किया जाना चाहिए,

जबकि राष्ट्रों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों के विकास को बढ़ावा देना आवश्यक है,

जबकि संयुक्त राष्ट्र के लोगों ने चार्टर में मानव अधिकार की गरिमा और मूल्य और पुरुषों और महिलाओं के समान अधिकारों में मौलिक मानवाधिकारों में अपने विश्वास की पुष्टि की और सामाजिक प्रगति और जीवन के बेहतर मानकों को बढ़ावा देने के लिए दृढ़ संकल्प किया है बड़ी स्वतंत्रता,

जबकि सदस्य देशों ने संयुक्त राष्ट्र के साथ सहयोग में, मानव अधिकारों और मौलिक स्वतंत्रताओं के सार्वभौमिक सम्मान के प्रचार के लिए खुद को वचनबद्ध करने के लिए वचनबद्ध किया है "

उपरोक्त संयुक्त राष्ट्र सार्वभौमिक घोषणाओं के प्रस्ताव से उपरोक्त निकास है, 10 दिसंबर 1 9 48 को आम सभा में सहमति हुई। घोषणापत्र ने अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून की नींव रखी और पूरे समय, मार्गदर्शक बन गया उन लोगों के लिए प्रकाश जो दुनिया भर में मानवाधिकारों के लिए मजबूती और सम्मान को बढ़ावा देते हैं।

सदियों से, सभी राज्यों के नेताओं और राजनेता, यहां तक ​​कि जो लोग मानवाधिकारों का सम्मान नहीं करते हैं, उन्होंने घोषणा भी उद्धृत की है और दुनिया भर में मानवाधिकार मानदंडों के वर्तमान व्यापक उल्लंघनों के बावजूद अपने मूल्यों को पहचाना है। दुनिया भर में राष्ट्रीय संविधानों के लेख घोषणा की तरह दिखते हैं, अक्सर इसमें निहित अधिकारों में से कई को शामिल करते हैं। इस प्रकार, घोषणापत्र के पास आज के समाजों और राज्यों पर उल्लेखनीय प्रभाव पड़ा है।

मानवाधिकार अंतरराष्ट्रीय कानून और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के केंद्र में हैं। वे सभी संस्कृतियों के लिए सामान्य मूल्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं, और दुनिया भर के देशों द्वारा सम्मानित किया जाना चाहिए। मानवाधिकार असुरक्षित मौलिक अधिकार हैं जिनके लिए एक व्यक्ति स्वाभाविक रूप से हकदार है क्योंकि वह एक इंसान है। समानता और गैर-भेदभाव का सिद्धांत, जैसा घोषणा के अनुच्छेद 2 में निर्धारित है, मानवाधिकार संरक्षण प्रणाली का आधार है, जो हर मानव अधिकार साधन में स्थापित है, जो इसे निर्धारित करता है;

"हर कोई इस घोषणा में उल्लिखित सभी अधिकारों और स्वतंत्रताओं के हकदार है, बिना किसी प्रकार के भेद, जैसे कि जाति, रंग, लिंग, भाषा, धर्म, राजनीतिक या अन्य राय, राष्ट्रीय या सामाजिक मूल, संपत्ति, जन्म या अन्य स्थिति । इसके अलावा, देश या क्षेत्र के राजनीतिक, न्यायक्षेत्र या अंतर्राष्ट्रीय स्थिति के आधार पर कोई भेद नहीं किया जाएगा, जिसमें कोई व्यक्ति स्वतंत्र है, चाहे वह स्वतंत्र, भरोसा, गैर-स्वयं-शासित या संप्रभुता की किसी भी अन्य सीमा के तहत हो। "

Political Theory Meaning and Its Utility in Hindi

इस खंड में मानव अधिकारों की अवधारणा को इसकी उत्पत्ति से आज व्यापक व्याख्या के बारे में चर्चा की जाएगी। सबसे पहले, मानवाधिकार कानून के सिद्धांतों के आवेदन सहित मानव अधिकारों की अवधारणा के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय कानून के सामान्य तत्व भी पेश किए गए हैं। तीन प्रमुख आयामों पर जोर दिया जाता है: मानकों (मानवाधिकार मानदंड अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहमत ग्रंथों में परिभाषित); पर्यवेक्षण (मानवाधिकार मानकों के अनुपालन की निगरानी करने के लिए तंत्र); और जिस तरीके से मानवाधिकारों के प्रति सम्मान किया जाता है।

Tuesday, 15 October 2019

Political Theory Meaning and Its Utility in Hindi

राजनीतिक सिद्धांत की अवधारणा:

राजनीतिक सिद्धांत उन राजनीतिक मामलों को शामिल करते हुए निर्दिष्ट रिश्तों का एक सेट है जो राजनीतिक घटनाओं और व्यवहारों का वर्णन, व्याख्या, और भविष्यवाणी करने के लिए पूछताछ को व्यवस्थित और व्यवस्थित करते हैं। राजनीतिक सिद्धांत को राजनीतिक विज्ञान के आधार और शाखा के रूप में माना जाता है जो न केवल राजनीतिक विज्ञान में, बल्कि मानव ज्ञान और अनुभव की पूरी श्रृंखला में अन्य विशेषज्ञों द्वारा एकत्र किए गए आंकड़ों से निकाले जाने वाले सामान्यीकरण, सम्मेलनों या निष्कर्षों पर पहुंचने का प्रयास करता है । प्राचीन ग्रीस से वर्तमान तक, राजनीतिक सिद्धांत के इतिहास ने राजनीति विज्ञान के मौलिक और बारहमासी विचारों का सामना किया है। राजनीतिक सिद्धांत राजनीतिक घटनाओं, प्रक्रियाओं और संस्थानों और वास्तविक राजनीतिक व्यवहार पर दार्शनिक या नैतिक मानदंड के अधीन है। सबसे प्रभावशाली राजनीतिक सिद्धांतों का वर्णन तीनों लक्ष्यों जैसे कि वर्णन, व्याख्या, और भविष्यवाणी करना है। सिद्धांत राजनीतिक विज्ञान के कई विद्वानों और घाटियों के विचारों और शोध के परिणाम हैं। इस विषय पर विचारक विभिन्न राजनीतिक अवधारणाओं की परिभाषा तैयार करते हैं और सिद्धांत स्थापित करते हैं (डी के सरमा, 2007)।
Political Theory Meaning and Its Utility in Hindi
Political Theory Meaning and Its Utility in Hindi


जर्मिनो ने वर्णन किया कि 'राजनीतिक सिद्धांत उस बौद्धिक परंपरा को नामित करने में नियोजित करने का सबसे उपयुक्त शब्द है जो तत्काल व्यावहारिक चिंताओं के क्षेत्र को पार करने की संभावना और एक महत्वपूर्ण परिप्रेक्ष्य से मनुष्य के सामाजिक अस्तित्व को देखने की संभावना को प्रमाणित करता है।' सबाइन के मुताबिक, 'राजनीतिक सिद्धांत, काफी सरल है, मनुष्य अपने समूह के जीवन और संगठन की समस्याओं को समझने और हल करने का प्रयास करता है। यह राजनीतिक समस्याओं की अनुशासित जांच न केवल यह दिखाने के लिए कि राजनीतिक अभ्यास क्या है, बल्कि यह दिखाने के लिए कि इसका क्या अर्थ है। यह दिखाने में कि एक अभ्यास का अर्थ क्या है, या इसका क्या अर्थ होना चाहिए, राजनीतिक सिद्धांत यह बदल सकता है कि यह क्या है। '

कई प्रतिष्ठित सिद्धांतकारों ने राजनीतिक सिद्धांत की प्रकृति की व्याख्या की।

डेविड हेल्ड ने वर्णित किया कि "राजनीतिक सिद्धांत राजनीतिक जीवन के बारे में अवधारणाओं और सामान्यताओं का एक नेटवर्क है जो प्रकृति, उद्देश्य और सरकार, राज्य और समाज की प्रमुख विशेषताओं और मनुष्यों की राजनीतिक क्षमताओं के बारे में बयान शामिल है।" डब्ल्यूसी कोकर ने राजनीतिक सिद्धांत को समझाया "जब राजनीतिक सरकार और उसके रूपों और गतिविधियों का अध्ययन नहीं किया जाता है, तथ्यों के रूप में वर्णित और तुलनात्मक रूप से उनके तत्काल और अस्थायी प्रभावों के संदर्भ में निर्णय लिया जाता है, लेकिन तथ्यों को समझने और निरंतर के संबंध में मूल्यांकन के रूप में पुरुषों की जरूरतों, इच्छाओं और राय, तो हमारे पास राजनीतिक सिद्धांत है। " एंड्रयू हैकर के मुताबिक, "राजनीतिक सिद्धांत एक तरफ अच्छे राज्य और अच्छे समाज के सिद्धांतों के लिए एक अनिच्छुक खोज का संयोजन है, और दूसरे पर राजनीतिक और सामाजिक हकीकत के ज्ञान के लिए एक अनिच्छुक खोज है।" जॉर्ज कैटलिन ने कहा कि " राजनीतिक सिद्धांत में राजनीतिक विज्ञान और राजनीतिक दर्शन शामिल है। जबकि विज्ञान पूरे सामाजिक क्षेत्र की सभी प्रक्रियाओं पर कई रूपों में नियंत्रण की घटना को संदर्भित करता है। यह अंत या अंतिम मूल्य से संबंधित है, जब मनुष्य पूछता है कि राष्ट्रीय अच्छा क्या है "या "अच्छा समाज क्या है।" जॉन प्लांटाज़ ने कार्यात्मक शर्तों में राजनीतिक सिद्धांत को चित्रित किया और कहा कि "राजनीतिक सिद्धांत का कार्य राजनीति की शब्दावली के विश्लेषण और स्पष्टीकरण और आलोचनाओं की महत्वपूर्ण परीक्षा, सत्यापन और औचित्य के लिए प्रतिबंधित किया गया है। राजनीतिक तर्क में नियोजित। " एक अन्य सिद्धांतकार, नॉर्मन बैरी ने परिभाषित किया कि "राजनीतिक सिद्धांत एक विद्युत विषय है जो विभिन्न विषयों पर आकर्षित करता है। ज्ञान या विश्लेषण की विधि का कोई भी शरीर नहीं है जिसे विशेष रूप से राजनीतिक सिद्धांत से संबंधित वर्गीकृत किया जा सकता है। "

राजनीतिक सिद्धांत के दृष्टिकोण:

राजनीतिक विज्ञान का अध्ययन और राजनीतिक सत्य की खोज की प्रक्रिया में कुछ प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए। इन प्रक्रियाओं को दृष्टिकोण, विधियों, तकनीकों और रणनीतियों के रूप में परिभाषित किया जाता है। राजनीतिक विज्ञान का अध्ययन करने के दृष्टिकोण पारंपरिक और आधुनिक दृष्टिकोण (डी के सरमा, 2007) के रूप में समूहीकृत हैं।

पारंपरिक दृष्टिकोण:

पारंपरिक दृष्टिकोण मूल्य आधारित हैं। इन दृष्टिकोणों ने मूल्यों पर अधिक महत्व दिया है। इस दृष्टिकोण के वकील मानते हैं कि राजनीति विज्ञान का अध्ययन पूरी तरह वैज्ञानिक नहीं हो सकता है और नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि सामाजिक विज्ञान जैसे तथ्यों के मूल्य एक दूसरे के साथ निकटता से संबंधित हैं। राजनीति में, तथ्यों पर जोर नहीं देना चाहिए बल्कि राजनीतिक घटना की नैतिक गुणवत्ता पर होना चाहिए। दार्शनिक, संस्थागत, कानूनी, और ऐतिहासिक दृष्टिकोण (डी के सरमा, 2007) जैसे पारंपरिक दृष्टिकोणों की बड़ी संख्या है।

पारंपरिक दृष्टिकोण की विशेषताएं:

पारंपरिक दृष्टिकोण बड़े पैमाने पर मानक हैं और राजनीति के मूल्यों पर जोर देते हैं।
विभिन्न राजनीतिक संरचनाओं के अध्ययन पर जोर दिया जाता है।
पारंपरिक दृष्टिकोण ने सिद्धांत और अनुसंधान से संबंधित बहुत कम प्रयास किए।
इन दृष्टिकोणों का मानना ​​है कि चूंकि तथ्यों और मूल्यों को बारीकी से जुड़े हुए हैं, राजनीति विज्ञान में अध्ययन कभी वैज्ञानिक नहीं हो सकते हैं।

विभिन्न प्रकार के पारंपरिक दृष्टिकोण:

1. दार्शनिक दृष्टिकोण: इस दृष्टिकोण को राजनीति विज्ञान के क्षेत्र में सबसे पुराना दृष्टिकोण माना जाता है। इस दृष्टिकोण का विकास प्लेटो और अरिस्टोटल जैसे ग्रीक दार्शनिकों के समय पर वापस देखा जा सकता है। लियो स्ट्रॉस दार्शनिक दृष्टिकोण के मुख्य समर्थक में से एक था। उन्होंने माना कि "दर्शन ज्ञान और राजनीतिक दर्शन की तलाश है, राजनीतिक चीजों की प्रकृति और सही या अच्छे राजनीतिक आदेश के बारे में जानना वास्तव में प्रयास है।" वर्नोन वान डाइक ने देखा कि दार्शनिक विश्लेषण एक विचार को स्पष्ट करने का प्रयास है इस विषय की प्रकृति और इसके बारे में सिरों और साधनों का अर्थ है। मौजूदा दृष्टिकोण, कानून और नीतियों के महत्वपूर्ण मूल्यांकन के उद्देश्य से, इस दृष्टिकोण का उद्देश्य सही और गलत के मानक को विकसित करना है।

यह दृष्टिकोण सैद्धांतिक सिद्धांत पर आधारित है कि मूल्यों को राजनीति के अध्ययन से अलग नहीं किया जा सकता है। इसलिए, इसकी मुख्य चिंता किसी भी राजनीतिक समाज में अच्छा या बुरा क्या है इसका न्याय करना है। यह मुख्य रूप से राजनीति का नैतिक और मानक अध्ययन है, और इस प्रकार आदर्शवादी है। यह राज्य, नागरिकता, अधिकार और कर्तव्यों आदि की प्रकृति और कार्यों की समस्याओं को संबोधित करता है। इस दृष्टिकोण के समर्थकों का मानना ​​है कि राजनीतिक दर्शन राजनीतिक मान्यताओं से दृढ़ता से जुड़ा हुआ है। इसलिए, वे राय मानते हैं कि एक राजनीतिक वैज्ञानिक के पास अच्छे जीवन और अच्छे समाज का ज्ञान होना चाहिए। राजनीतिक दर्शन एक अच्छा राजनीतिक आदेश स्थापित करने में सहायता करता है (गौबा, 200 9)।

यह दृष्टिकोण सैद्धांतिक सिद्धांत पर आधारित है कि मूल्यों को राजनीति के अध्ययन से अलग नहीं किया जा सकता है। इसलिए, इसकी मुख्य चिंता किसी भी राजनीतिक समाज में अच्छा या बुरा क्या है इसका न्याय करना है। यह मुख्य रूप से राजनीति का नैतिक और मानक अध्ययन है, और इस प्रकार आदर्शवादी है। यह राज्य, नागरिकता, अधिकार और कर्तव्यों आदि की प्रकृति और कार्यों की समस्याओं को संबोधित करता है। इस दृष्टिकोण के समर्थकों का मानना ​​है कि राजनीतिक दर्शन राजनीतिक मान्यताओं से दृढ़ता से जुड़ा हुआ है। इसलिए, वे राय मानते हैं कि एक राजनीतिक वैज्ञानिक के पास अच्छे जीवन और अच्छे समाज का ज्ञान होना चाहिए। राजनीतिक दर्शन एक अच्छा राजनीतिक आदेश स्थापित करने में सहायता करता है (गौबा, 200 9)।

ऐतिहासिक दृष्टिकोण: इस राजनीतिक दृष्टिकोण को विकसित करने वाले सिद्धांतकारों ने ऐतिहासिक कारकों जैसे उम्र, स्थान और जिस स्थिति में इसे विकसित किया है, पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। यह दृष्टिकोण इतिहास से संबंधित है और यह किसी भी स्थिति का विश्लेषण करने के लिए हर राजनीतिक वास्तविकता के इतिहास के अध्ययन पर जोर देता है। माचियावेली, सबाइन और डनिंग जैसे राजनीतिक विचारकों ने माना कि राजनीति और इतिहास निकट से संबंधित हैं और राजनीति के अध्ययन में हमेशा ऐतिहासिक दृष्टिकोण होना चाहिए। सबाइन ने कहा कि राजनीति विज्ञान में उन सभी विषयों को शामिल करना चाहिए जिन पर प्लेटो के समय से विभिन्न राजनीतिक विचारकों के लेखन में चर्चा की गई है। यह दृष्टिकोण दृढ़ता से इस धारणा को बरकरार रखता है कि हर राजनीतिक विचारक की सोच या सिद्धांत आसपास के पर्यावरण द्वारा गठित किया जाता है। इसके अलावा, इतिहास अतीत के विवरण प्रदान करता है साथ ही साथ यह वर्तमान घटनाओं के साथ भी जुड़ा हुआ है। इतिहास हर राजनीतिक घटना का कालक्रम क्रम देता है और इस तरह घटनाओं के भविष्य के आकलन में भी मदद करता है। इसलिए, पिछले राजनीतिक घटनाओं, संस्थानों और राजनीतिक माहौल का अध्ययन किए बिना वर्तमान राजनीतिक घटनाओं का विश्लेषण करना गलत होगा। लेकिन ऐतिहासिक दृष्टिकोण के आलोचकों ने नामित किया कि समकालीन विचारों और अवधारणाओं के संदर्भ में पिछले युग के विचार को समझना संभव नहीं है।

संस्थागत दृष्टिकोण: यह राजनीतिक विज्ञान का अध्ययन करने में पारंपरिक और महत्वपूर्ण दृष्टिकोण है। यह दृष्टिकोण मुख्य रूप से सरकार और राजनीति की औपचारिक विशेषताओं से संबंधित है, राजनीतिक संस्थानों और संरचनाओं के अध्ययन को बढ़ाता है। इसलिए, संस्थागत दृष्टिकोण विधायिका, कार्यकारी, न्यायपालिका, राजनीतिक दलों और ब्याज समूहों जैसे औपचारिक संरचनाओं के अध्ययन से संबंधित है। इस दृष्टिकोण के समर्थकों में प्राचीन और आधुनिक राजनीतिक दार्शनिक दोनों शामिल हैं। प्राचीन विचारकों में, अरिस्टोटल की इस दृष्टिकोण को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका थी, जबकि आधुनिक विचारकों में जेम्स ब्रिस, बेंटले, वाल्टर बेजोश, हेरोल्ड लास्की ने इस दृष्टिकोण को विकसित करने में योगदान दिया।

कानूनी दृष्टिकोण: यह दृष्टिकोण चिंतित है कि राज्य कानूनों के गठन और प्रवर्तन के लिए मौलिक संगठन है। इसलिए, यह दृष्टिकोण कानूनी प्रक्रिया, कानूनी निकाय या संस्थानों, न्याय और न्यायपालिका की आजादी से संबंधित है। इस दृष्टिकोण के समर्थक सिसीरो, जीन बोडिन, थॉमस हॉब्स, जेरेमी बेंटहम, जॉन ऑस्टिन, डाइस और सर हेनरी मेन हैं।

राजनीतिक विज्ञान के अध्ययन के लिए विभिन्न पारंपरिक दृष्टिकोण मानक मानने के लिए अस्वीकृत कर दिए गए हैं। इन दृष्टिकोणों को भी सिद्धांतित किया गया था क्योंकि उनकी चिंता इस बात से परे थी कि क्यों और क्यों राजनीतिक घटनाएं होती हैं कि क्या होना चाहिए। बाद की अवधि में, आधुनिक दृष्टिकोणों ने राजनीति विज्ञान के अध्ययन को और अधिक वैज्ञानिक बनाने का प्रयास किया है, इसलिए, व्यावहारिकता पर जोर देते हैं।

आधुनिक दृष्टिकोण:

पारंपरिक दृष्टिकोण की मदद से राजनीति का अध्ययन करने के बाद, बाद के चरण के राजनीतिक विचारकों ने एक नए परिप्रेक्ष्य से राजनीति का अध्ययन करने की आवश्यकता महसूस की। इस प्रकार, पारंपरिक दृष्टिकोण की कमियों को कम करने के लिए, नए राजनीतिक विचारकों द्वारा विभिन्न नए दृष्टिकोणों की वकालत की गई है। इन नए दृष्टिकोणों को राजनीति विज्ञान के अध्ययन के लिए "आधुनिक दृष्टिकोण" के रूप में जाना जाता है। आधुनिक दृष्टिकोण तथ्य आधारित दृष्टिकोण हैं। वे राजनीतिक घटनाओं के तथ्यात्मक अध्ययन पर जोर देते हैं और वैज्ञानिक और निश्चित निष्कर्ष पर पहुंचने की कोशिश करते हैं। आधुनिक दृष्टिकोण का उद्देश्य अनुभववाद के साथ मानकवाद को प्रतिस्थापित करना है। इसलिए आधुनिक दृष्टिकोण प्रासंगिक डेटा की अनुभवजन्य जांच द्वारा चिह्नित किए जाते हैं।

आधुनिक दृष्टिकोण की विशेषताएं:

ये दृष्टिकोण अनुभवजन्य डेटा से निष्कर्ष निकालने का प्रयास करते हैं।
ये दृष्टिकोण राजनीतिक संरचनाओं और इसके ऐतिहासिक विश्लेषण के अध्ययन से परे जाते हैं।
आधुनिक दृष्टिकोण अंतर अनुशासनिक अध्ययन में विश्वास करते हैं।
वे अध्ययन के वैज्ञानिक तरीकों पर जोर देते हैं और राजनीति विज्ञान में वैज्ञानिक निष्कर्ष निकालने का प्रयास करते हैं।
आधुनिक दृष्टिकोण में सामाजिक दृष्टिकोण, मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण, आर्थिक दृष्टिकोण, मात्रात्मक दृष्टिकोण, सिमुलेशन दृष्टिकोण, सिस्टम दृष्टिकोण, व्यवहार दृष्टिकोण और मार्क्सियन दृष्टिकोण (डी के सरमा, 2007) शामिल हैं।

व्यवहार दृष्टिकोण:

आधुनिक अनुभवजन्य दृष्टिकोण में, राजनीतिक विज्ञान का अध्ययन करने के लिए व्यवहार दृष्टिकोण, उल्लेखनीय जगह पकड़ लिया। इस दृष्टिकोण के सबसे प्रतिष्ठित घाटे डेविड एटसन, रॉबर्ट, ए। दहल, ई। एम। किर्कपैट्रिक और हेनज़ युलाऊ हैं। व्यवहारिक दृष्टिकोण राजनीतिक सिद्धांत है जो आम आदमी के व्यवहार को ध्यान में रखते हुए ध्यान देने का परिणाम है। सिद्धांतवादी, किर्कपैट्रिक ने कहा कि पारंपरिक दृष्टिकोण ने अनुसंधान की मूल इकाई के रूप में संस्थान को स्वीकार किया लेकिन व्यवहारिक दृष्टिकोण राजनीतिक स्थिति में व्यक्ति के व्यवहार को आधार (के। सरमा, 2007) के रूप में मानते हैं।

व्यवहारवाद की मुख्य विशेषताएं:

डेविड ईस्टन ने व्यवहारवाद की कुछ प्रमुख विशेषताओं को इंगित किया है जिन्हें इसकी बौद्धिक नींव माना जाता है। य़े हैं:

नियमितता: इस दृष्टिकोण का मानना ​​है कि राजनीतिक व्यवहार में कुछ समानताएं हैं जिन्हें राजनीतिक घटनाओं को समझाने और भविष्यवाणी करने के लिए सामान्यीकरण या सिद्धांतों में व्यक्त किया जा सकता है। किसी विशेष स्थिति में व्यक्तियों का राजनीतिक व्यवहार कम या समान हो सकता है। व्यवहार की इस तरह की नियमितता शोधकर्ता को राजनीतिक स्थिति का विश्लेषण करने के साथ-साथ भविष्य की राजनीतिक घटनाओं की भविष्यवाणी करने में मदद कर सकती है। ऐसी नियमितताओं का अध्ययन राजनीतिक विज्ञान को कुछ अनुमानित मूल्य के साथ अधिक वैज्ञानिक बनाता है।

सत्यापन: व्यवहारविदों को सबकुछ स्वीकार नहीं करना चाहिए। इसलिए, वे परीक्षण पर जोर देते हैं और सब कुछ सत्यापित करते हैं। उनके अनुसार, सत्यापित नहीं किया जा सकता वैज्ञानिक नहीं है।

तकनीक: व्यवहारविद उन शोध औजारों और विधियों के उपयोग पर जोर देते हैं जो वैध, भरोसेमंद और तुलनात्मक डेटा उत्पन्न करते हैं। एक शोधकर्ता को नमूना सर्वेक्षण, गणितीय मॉडल, सिमुलेशन इत्यादि जैसे परिष्कृत उपकरणों का उपयोग करना चाहिए।

मात्रा: डेटा एकत्र करने के बाद, शोधकर्ता को उन आंकड़ों को मापना और मापना चाहिए।

मूल्य: व्यवहारविदों ने मूल्यों से तथ्यों को अलग करने पर भारी जोर दिया है। उनका मानना ​​है कि उद्देश्यपूर्ण शोध करने के लिए किसी को मूल्य मुक्त होना चाहिए। इसका मतलब है कि शोधकर्ता के पास कोई पूर्व-अनुमानित धारणा या पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण नहीं होना चाहिए।

व्यवस्थितकरण: व्यवहारविदों के अनुसार, राजनीति विज्ञान में शोध व्यवस्थित होना चाहिए। सिद्धांत और अनुसंधान एक साथ जाना चाहिए।

शुद्ध विज्ञान: व्यवहारवाद की एक और विशेषता राजनीति विज्ञान को "शुद्ध विज्ञान" बनाने का लक्ष्य रही है। यह मानता है कि राजनीति विज्ञान का अध्ययन साक्ष्य द्वारा सत्यापित किया जाना चाहिए।

एकीकरण: व्यवहारविदों के अनुसार, राजनीति विज्ञान को इतिहास, समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र आदि जैसे विभिन्न अन्य सामाजिक विज्ञान से अलग नहीं किया जाना चाहिए। इस दृष्टिकोण का मानना ​​है कि समाज में विभिन्न अन्य कारकों द्वारा राजनीतिक घटनाओं को आकार दिया जाता है और इसलिए, अलग होना गलत होगा अन्य विषयों से राजनीति विज्ञान।

यह सिद्धांतविदों द्वारा मान्यता प्राप्त है कि व्यवहारवाद के विकास के साथ, राजनीति विज्ञान के क्षेत्र में एक नई सोच और अध्ययन की नई तकनीक विकसित की गई।

व्यवहारिक दृष्टिकोण के लाभ इस प्रकार हैं:

यह दृष्टिकोण राजनीतिक विज्ञान को और अधिक वैज्ञानिक बनाता है और इसे व्यक्तियों के दिन के जीवन के करीब लाता है।
व्यवहारविज्ञान ने पहले राजनीतिक विज्ञान के क्षेत्र में मानव व्यवहार को समझाया है और इस प्रकार अध्ययन को समाज के लिए अधिक प्रासंगिक बनाता है।
यह दृष्टिकोण भावी राजनीतिक घटनाओं की भविष्यवाणी करने में मदद करता है।
व्यवहारिक दृष्टिकोण को विभिन्न राजनीतिक विचारकों द्वारा समर्थित किया गया है क्योंकि यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण और राजनीतिक घटनाओं की अनुमानित प्रकृति है।
योग्यता के बावजूद, वैज्ञानिक दृष्टिकोण के लिए अपने आकर्षण के लिए व्यवहारिक दृष्टिकोण की भी आलोचना की गई है। इस दृष्टिकोण के खिलाफ मुख्य आलोचनाओं का उल्लेख नीचे दिया गया है:
विषय वस्तु को अनदेखा करने और प्रथाओं पर निर्भरता के लिए यह असंतोषजनक रहा है।
इस दृष्टिकोण के समर्थक गलत थे जब उन्होंने कहा कि मनुष्य समान परिस्थितियों में समान तरीकों से व्यवहार करते हैं।
यह दृष्टिकोण मानव व्यवहार पर केंद्रित है लेकिन मानव व्यवहार का अध्ययन करना और एक निश्चित परिणाम प्राप्त करना एक कठिन काम है।
अधिकांश राजनीतिक घटनाएं अनिश्चित हैं। इसलिए राजनीति विज्ञान के अध्ययन में वैज्ञानिक तरीकों का उपयोग करना हमेशा मुश्किल होता है।
इसके अलावा, विद्वानों द्वारा विश्वास किए जाने वाले विद्वान हमेशा मनुष्य के रूप में तटस्थ नहीं होते हैं।
पोस्ट व्यवहार दृष्टिकोण:
1 9 60 के दशक के मध्य में, व्यवहारवाद ने राजनीतिक विज्ञान की पद्धति में एक प्रमुख स्थिति प्राप्त की। प्रासंगिकता और कार्रवाई पोस्ट व्यवहार के मुख्य नारे थे। आधुनिक सामाजिक विज्ञान में, व्यवहारवाद दृष्टिकोण ने समाज की मौजूदा समस्याओं के समाधान को हल करने में चिंता को दिखाया है। इस तरह, यह बड़े पैमाने पर अपने दायरे (गौबा, 200 9) के भीतर पोस्ट व्यवहारिक अभिविन्यास को अवशोषित कर रहा है।

राजनीतिक व्यवस्था पर्यावरण के भीतर काम करती है। पर्यावरण समाज के विभिन्न हिस्सों से मांग बनाता है जैसे कुछ समूहों के लिए रोजगार के मामले में आरक्षण की मांग, बेहतर काम करने की स्थितियों या न्यूनतम मजदूरी की मांग, बेहतर परिवहन सुविधाओं की मांग, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं की मांग। विभिन्न मांगों के समर्थन के विभिन्न स्तर हैं। ईस्टन ने कहा कि 'मांग' और 'समर्थन' स्थापित 'इनपुट'। राजनीतिक व्यवस्था पर्यावरण से इनपुट इनपुट प्राप्त करती है। विभिन्न कारकों को ध्यान में रखते हुए, सरकार इन मांगों में से कुछ पर कार्रवाई करने का फैसला करती है जबकि अन्य पर कार्य नहीं किया जाता है। रूपांतरण प्रक्रिया के माध्यम से, निर्णय निर्माताओं द्वारा नीतियों, निर्णयों, नियमों, विनियमों और कानूनों के रूप में इनपुट को 'आउटपुट' में परिवर्तित कर दिया जाता है। 'आउटपुट' 'फीडबैक' तंत्र के माध्यम से पर्यावरण में वापस आ जाता है, जिससे ताजा मांगें बढ़ती हैं। नतीजतन, यह एक चक्रीय प्रक्रिया है।

संरचनात्मक कार्यात्मक दृष्टिकोण: इस दृष्टिकोण के अनुसार, समाज को एक अंतर से संबंधित प्रणाली के रूप में माना जाता है जहां सिस्टम के प्रत्येक भाग में एक निश्चित और असमान भूमिका होती है। संरचनात्मक-कार्यात्मक दृष्टिकोण को सिस्टम विश्लेषण की वृद्धि के रूप में माना जा सकता है। ये दृष्टिकोण संरचनाओं और कार्यों को बढ़ाते हैं। गेब्रियल बादाम इस दृष्टिकोण का अनुयायी है। उन्होंने राजनीतिक प्रणालियों को एक विशेष प्रणाली के रूप में समझाया जो कि कुछ कार्यों में प्रदर्शन करने वाले सभी समाजों में मौजूद है। उनके सिद्धांत से पता चला कि राजनीतिक व्यवस्था की मुख्य विशेषताएं व्यापकता, अंतर-निर्भरता और सीमाओं के अस्तित्व हैं। ईस्टन की तरह, बादाम ने यह भी माना कि सभी राजनीतिक प्रणालियां इनपुट और आउटपुट फ़ंक्शंस करती हैं। राजनीतिक प्रणालियों के इनपुट फ़ंक्शन राजनीतिक सामाजिककरण और भर्ती, रुचि-अभिव्यक्ति, रुचि-आक्रामकता और राजनीतिक संचार हैं। बादाम ने नीति बनाने और कार्यान्वयन से संबंधित सरकारी आउटपुट कार्यों के तीन गुना वर्गीकरण किए। ये आउटपुट फ़ंक्शंस नियम बनाने, नियम आवेदन और नियम निर्णय हैं। इस प्रकार, बादाम ने पुष्टि की कि एक स्थिर और कुशल राजनीतिक व्यवस्था आउटपुट में इनपुट को परिवर्तित करती है।

संचार सिद्धांत दृष्टिकोण: यह दृष्टिकोण उस प्रक्रिया की पड़ताल करता है जिसके द्वारा सिस्टम का एक सेगमेंट संदेश या जानकारी भेजकर किसी अन्य को प्रभावित करता है। रॉबर्ट वीनर ने इस दृष्टिकोण को विकसित किया था। बाद में कार्ल Deutsch ने इसे विकसित किया और इसे राजनीति विज्ञान में लागू किया। Deutsch ने कहा कि राजनीतिक व्यवस्था संचार चैनलों का एक नेटवर्क है और यह स्वयं नियामक है। इसके अतिरिक्त, उन्होंने जोर दिया कि सरकार विभिन्न संचार चैनलों के प्रशासन के लिए ज़िम्मेदार है। यह दृष्टिकोण सरकार को निर्णय लेने प्रणाली के रूप में मानता है। Deutsch ने बताया कि संचार सिद्धांत में विश्लेषण के चार कारक हैं जिनमें लीड, अंतराल, लाभ और भार शामिल है।


निर्णय लेने का दृष्टिकोण:

यह राजनीतिक दृष्टिकोण निर्णय निर्माताओं की विशेषताओं के साथ-साथ व्यक्तियों के निर्णय निर्माताओं पर प्रभाव के प्रकार की खोज करता है। रिचर्ड सिंडर और चार्ल्स लिंडब्लॉम जैसे कई विद्वानों ने इस दृष्टिकोण को विकसित किया है। कुछ अभिनेताओं द्वारा लिया गया एक राजनीतिक निर्णय एक बड़े समाज को प्रभावित करता है और ऐसा निर्णय आम तौर पर एक विशिष्ट स्थिति द्वारा आकार दिया जाता है। इसलिए, यह निर्णय निर्माताओं के मनोवैज्ञानिक और सामाजिक पहलुओं को भी ध्यान में रखता है।

व्यापक रूप से, राजनीतिक विज्ञान के कई दृष्टिकोण समय-समय पर वकालत की गई हैं, और इन्हें व्यापक रूप से दो श्रेणियों में बांटा गया है जिसमें अनुभवजन्य-विश्लेषणात्मक या वैज्ञानिक-व्यवहार दृष्टिकोण और कानूनी-ऐतिहासिक या मानक-दार्शनिक दृष्टिकोण शामिल हैं।

अनुभवजन्य सिद्धांत:

सरल रूप में, अनुभवजन्य राजनीतिक सिद्धांत अवलोकन के माध्यम से 'क्या है' बताता है। इस दृष्टिकोण में, विद्वान एक परिकल्पना उत्पन्न करना चाहते हैं, जो कुछ घटनाओं के लिए एक प्रस्तावित स्पष्टीकरण है जिसे अनुभवी परीक्षण किया जा सकता है। एक परिकल्पना तैयार करने के बाद, एक अध्ययन परिकल्पना का परीक्षण करने के लिए डिज़ाइन किया जाएगा।

सामान्य सिद्धांत:

सामान्य राजनीतिक सिद्धांत न्याय, समानता और अधिकार जैसे अवधारणाओं से संबंधित है। ऐतिहासिक राजनीतिक सिद्धांत में अतीत से राजनीतिक दार्शनिक शामिल हैं (जैसे थुसीसाइड्स और प्लेटो) वर्तमान में (जैसे वेंडी ब्राउन और सेला बेनहाबीब), और इस बात पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं कि विशेष दार्शनिकों ने राजनीतिक समस्याओं को कैसे लगाया जो आज प्रासंगिक हैं। जबकि परंपरा पारंपरिक रूप से पश्चिमी परंपराओं पर रही है, यह इस क्षेत्र में बदलना शुरू हो रहा है।

व्यापक रूप से बोलते हुए, अनुभवजन्य दृष्टिकोण तथ्यों को खोजने और वर्णन करने का प्रयास करता है जबकि मानक दृष्टिकोण मूल्य निर्धारित करने और निर्धारित करने की मांग करता है

राजनीतिक सिद्धांत के अनुभवजन्य और मानक दृष्टिकोण के बीच अंतर

यह सैद्धांतिक साहित्य में प्रदर्शित किया गया है कि राजनीतिक विज्ञान के लिए पारंपरिक अनुभवजन्य दृष्टिकोण यह है कि यह एक "सकारात्मक" विज्ञान बनाता है। जो भी होना चाहिए, उसका अध्ययन राजनीतिक विज्ञान के लिए एक निश्चित सम्मान देता है जो राय-लेखन या राजनीतिक सिद्धांतकारों से जुड़ा हुआ नहीं है। जबकि प्लेटो और अरिस्टोटल ने एक अच्छी राजनीति की विशेषताओं को पहचानने की कोशिश की, अधिकांश आधुनिक राजनीतिक वैज्ञानिक अपनी भलाई या बुरेपन के बारे में नैतिक निर्णय छोड़कर, राजनीति, उनके कारणों और प्रभावों की विशेषताओं की पहचान करना चाहते हैं।

संक्षेप में, राजनीतिक सिद्धांत राजनीतिक विज्ञान के अनुशासन के भीतर एक अलग क्षेत्र है। राजनीतिक सिद्धांत राजनीतिक व्यवस्था के बारे में एक रूपरेखा है। यह 'राजनीतिक' शब्द के बारे में प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व है। यह राजनीतिक गतिविधि की प्रक्रियाओं और परिणामों के औपचारिक, तार्किक और व्यवस्थित विश्लेषण है। यह विश्लेषणात्मक, एक्सपोजिटरी और वर्णनात्मक है। यह 'राजनीतिक' के रूप में वर्णित करने के लिए आदेश, सुसंगतता और अर्थ देना चाहता है। राजनीतिक सिद्धांतवादी राजनीति की प्रकृति के बारे में अनुभवजन्य दावों के बजाय सैद्धांतिक दावों पर अधिक ध्यान केंद्रित करते हैं। ऐसे कई दृष्टिकोण हैं जो राजनीतिक व्यवस्था को बताते हैं जिसमें आधुनिक और पारंपरिक दृष्टिकोण शामिल हैं। व्यवहार दृष्टिकोण में, वैज्ञानिक विधि पर जोर दिया जाता है क्योंकि राजनीतिक स्थिति में कई कलाकारों के व्यवहार वैज्ञानिक अध्ययन में सक्षम हैं। सामान्य दृष्टिकोण दार्शनिक विधि से जुड़ा हुआ है क्योंकि मानदंडों और मूल्यों को दार्शनिक रूप से निर्धारित किया जा सकता है। राजनीतिक दृष्टिकोण का एक और वर्गीकरण राजनीतिक घटनाओं के अनुभवजन्य विश्लेषण है।

Wednesday, 9 October 2019

संविधान की 12 अनुसूचियां  | Bhartiya Samvidhan ki Anusuchi pdf


Schedule of Indian Constitution in hindi
Schedule of Indian Constitution in hindi
                       

अनुसूची प्रथम


इस अनुसूची में संघ में राज्यों का उल्लेख किया गया है

अनुसूची II


इस अनुसूची में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यपाल लोकसभा, विधानसभा, सर्वोच्च न्यायालय के उच्च न्यायालय के वेतन की जानकारी दी गई है

अनुसूचित तृतीय

इसअनुसूची में व्यवस्थापिका के सदस्य, मंत्री, अध्यक्ष, उपराष्ट्रपति न्यायाधीशों के लिए शपथ के लिए जान वाली प्रतिज्ञा का प्रारूप दिया गया है

अनुसूची चतुर्थ

इस अनुसूची में राज्यसभा की सीटों के लिए राज्य एवं केंद्र शासित प्रदेशों में स्थानों के आवंटन का उल्लेख किया गया है

अनुसूची पंचम

इस अनुसूची में अनुसूचित क्षेत्रों में अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन की जानकारी है

अनुसूची छठी

इस अनुसूची में असम मेघालय त्रिपुरा मिजोरम में जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन की जानकारी है

अनुसूची सप्तमी

इस अनुसूची में संघ सूची राज्य सूची समवर्ती सूची इन तीनों सूचियों का उल्लेख किया गया है
संघ सूची में कानून केंद्र सरकार द्वारा बनाई गई है जिसमें 97 विषय है
राज्य सूची में कानून राज्य सरकार बनाती है जिसमें 66 विषय हैं
समवर्ती सूची में केंद्र व राज्य दोनों सरकारों द्वारा मिलकर कानून बनाया जाता है
इस अनुसूची में 47 विषय हैं

अनुसूची 8 वी

इस अनुसूची में भारत की 22 भाषाओं का उल्लेख किया गया है

अनुसूची नवमी

इस अनुसूची को प्रथम संविधान संशोधन 1951 के तहत जोड़ा गया था इस में संपत्ति अधिग्रहण या भूमि अधिग्रहण संबंधी निर्णय का उल्लेख किया गया है
इस अनुसूची में विवरण विषय या प्रबंध को न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है, लेकिन यदि इस अनुसूची में विवरण जारी करके मूल अधिकारों का हनन होता है तो यह न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।

दसवीं अनुसूची

इस अनुसूची को 52 वें संविधान संशोधन 1985 के तहत जोड़ा गया था
इस में समूह परिवर्तन विरोधी गतिविधियों का उल्लेख किया गया है

अनुसूची 11 वी

इस अनुसूची को 73 वें संविधान संशोधन 1993 के तहत जोड़ा गया और ग्रामीण व स्थानीय निकायों पंचायतों को संवैधानिक मान्यता प्रदान की गई उन्हें कार्य करने के लिए 29 विषय प्रदान किए गए।

अनुसूची बारहवीं

इस अनुसूची को 74 वें संविधान संशोधन 1993 के तहत जोड़ा गया और शहरी स्थानीय संस्थाओं नगरपालिकाओं को संवैधानिक मान्यता प्रदान करते हुए ये कार्य करने के लिए 18 विषय प्रदान किए गए।

संविधान की 12 अनुसूचियां pdf 


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