Chauhan Vansh History in Hindi - चौहान वंश

आबू पर्वत पर गुरू वशिष्ठ ने यज्ञ करवाया, जिसमें अग्निकुण्ड से प्रतिहार, परमार, चालुक्य ( सोलंकी ) तथा चौहान चार राजपूतवंशों का उदय माना जाता है ।
बिजौलिया शिलालेख ( 1170 ईं. ) सोमेश्वर से संबंधित है । इसके आधार पर डॉ. दशरथ शर्मा ( चुरू ) ने चौहानों (Chauhan Vansh) को वत्सगौत्रीय ब्राह्मण / ब्रह्मणवंशीय कहा हैं । पृथ्वी राज विजय, हम्मीर महाकाव्य व सुर्जनचरित व पृथ्वी राज चौहान तृतीय के बेदला अभिलेख के अनुसार चौहान सूर्यवंशी थे ।
डॉ. ओझा ने भी चौहानों को सूर्यवंशीय क्षत्रिय माना है । कर्नल जेम्स टाॅड, डॉ. स्मिथ ने इन्हे विदेशी माना है । सेवाडी के लेख में चौहानों को इन्द्र के वंशज माना गया है ।
हर्षनाथ अभिलेख के अनुसार चौहानों (Chauhan Vansh) की प्राचीनतम राजधानी अनंतपुर ( सीकर) थी हम्मीर महाकाव्य व चंद्रशेखर के सुर्जनचरित ग्रंथ में चौहानों की जन्मभूमि पुष्कर को बताया गया है । सुंधा माता अभिलेख में चौहानों (Chauhan Vansh) की उत्पत्ति महर्षि वशिष्ठ की आँख से बतायी गई है
Chauhan Vansh History in Hindi - चौहान वंश
Chauhan Vansh History in Hindi - चौहान वंश

चौहानवंश से संबंधित पुस्तकें

  • डॉ० दशरथ शर्मा - राजस्थान थ्रू दी एजेज, अर्ली चौहान डायनेस्टिज, सम्राट पृथ्वीराज चौहान तृतीय और उनका युग ।
  • आर वी सोमानी - चौहान एण्ड हिज टाइम
  • पृथ्वीराज रासो में chauhan vansh ka itihas दिया गया है 

Chauhan Vansh History in Hindi

Chauhan Vansh की प्रारम्भिक राजधानी अहिछत्रपुर थी तथा वासुदेव चौहान ने सांभर को व अजय राज ने अजमेंर को राजधानी बनाया । चाहमान शाकंभरी के आस-पास उदय होने वाला राजपूतवंश था । 

राजपूतों की अग्नि कुण्ड से उत्पत्ति सर्वप्रथम पृथ्वीराज रासो में प्रतिपादित की गई अजमेर के चौहानों को सपादलक्ष के चौहान / सांभर के चौहान/ शाकम्भरी के चौहान भी कहते है । अजमेर के चौहानों की कुलदेवी शाकम्भरी देवी है । 

शाकम्भरी/साम्भर के चौहान

बिजौलिया शिलालेख व राजशेखर के प्रबंधकोष में चौहानों (Chauhan Vansh) का मूल स्थान सांभर या सपालदक्ष था व संस्थापक वासुदेव चौहान था । ( पटवार2011 , ग्रेड द्वितीय गणित2010 )
551 ई. में वासुदेव चौहान ने साम्भर में Chauhan Vansh की नींव रखी वासुदेव चौहान ने सांभर झील का निर्माण करवाया । इसका पता बिजौलिया शिलालेख ( 1170 ई॰ ) से लगता है ।

अजयराज (1113-1133 ई)

डॉ॰ दशरथ शर्मा के अनुसार चौहानवंश (Chauhan Vansh) का दूसरा प्रतापी शासक अजयराज था, जिसका काल चौहानों के साम्राज्य का निर्माणकारी काल कहा जाता है ।
  • 1113 ई. में अजयराज ने अजमेर नगर बसाया तथा अजमेर को राजधानी बनाया । ( ग्रेड द्वितीय संस्कृत्त 2010 )
  • अजयराज शैव धर्म का समर्थक था ।
  • कुछ इतिहासकारों के अनुसार 7वीं शताब्दी में अजयपाल ने अजयमेरू दुर्ग नामक गढी का निर्माण करवाया ।
  • घूंघट, गूगडी, बांदरा और इमली अजमेर के तारागढ़ दुर्ग की प्राचीर की विशाल बुर्जों के नाम है
  • अजयमेरू दुर्ग में मिरान साहब की दरगाह, घोड़े की मजार, पृथ्वी राज का स्मारक, रूठी रानी उमादे की छतरी, नाना जी का झालरा दर्शनीय स्थल है ।
  • अजमेर में अजयराज ने एक टकसाल स्थापित करवाई । अजयराज ने अजय-प्रिय, द्रुम्स नाम से सिक्के भी चलाए जिन पर उसकी रानी सोमलेखा/सोमल्लदेवी का नाम है ।

अजयराज के युद्ध 

  • अजयराज ने मालवा के परमार शासक नरवर्मन व अन्हिलपाटन के चालुक्य शासक मूलराज द्वितीय को पराजित किया था ।
  • Prithviraj Vijay के अनुसार अजयराज ने मालवा के राजा नरवर्मन के सेनापति सुल्हण को पराजित कर उसे घोड़े की पीठ पर बाँधकर अजमेर ले आया
  • पृथ्वीराज विजय के अनुसार अजयराज ने तुर्क सुल्तान शहाबुद्दीन को परास्त किया था ।
  • पृथ्वीराज विजय के अनुसार अजयराज ने अजमेर नगर की स्थापना करवाई और उसे अपनी राजधानी बनाया ।
  • अजयराज ने स्वयं अपने पुत्र के पक्ष में सिंहासन त्याग कर, जीवन के अंतिम दिन पुष्कर तीर्थ में तपस्या कर व्यतीत किये ।

अर्णोराज/आनाजी (1130-1150 ई.)

  • अर्णोराज ने अजमेर में आनासागर झील का निर्माण कराया ।
  • बिजौलिया शिलालेख के अनुसार आनासागर झील का निर्माण 1133-37 ईं. व पृथ्वीराज रासो में 1135-1137 ईं. में बताया गया है
  • आनासागर झील का निर्माण 1137 ईं. में तुर्को की सेना के संहार के बाद खून से रंगी धरती को साफ करने के लिए चंद्रा नदी के जल को रोक कर करवाया ।
  • अर्णोराज शैव धर्म का अनुयायी होते हुए भी इसने पुष्कर में विष्णु के वराह मन्दिर का निर्माण करवाया ।
  • वराह मंदिर का जीर्णोद्धार समरसिंह ने करवाया और मुगल सम्राट जहाँगीर ने वराह मंदिर की विष्णुमूर्ति को पानी पें फेंकवा दिया था
  • अर्णोराज के दरबार में देवबोथ और धर्मघोष नामक प्रसिद्ध साहित्यकार थे ।
  • चालुक्य शासक ( 1134 ईं. ) सिद्धराज जयसिंह से राज्य की सीमा को लेकर हुए विवाद के कारण युद्ध में अर्णोराज विजयी हुआ और सिद्धराज जयसिंह ने अपनी पुत्री कांचन देवी का विवाह अर्णोराज से किया ।
  • कुमारपाल चालुक्य से विवाद समाप्त करने हेतु अर्णोराज ने अपनी पुत्री जल्हण का विवाह कुमारपाल से किया ।
  • अर्णोराज के चारों पुत्रों में से विग्रहराज चतुर्थ सबसे शक्तिशाली सिद्ध हुआ, जिसने अपने अन्य भाईयों को अपदस्थ कर गद्दी प्राप्त की ।
  • अर्णोराज के बड़े पुत्र जग्गदेव ने अर्णोराज की हत्या कर दी । जो चौहानों में पितृहंता कहलाया ।

विग्रहराज चतुर्थ/बीसलदेव (1153-1163)

  • विग्रहराज चतुर्थ अपने पिता अर्णोराज के हत्यारे जग्गदेव को गद्दी से हटाकर अजमेर के चौहानों का शासक बना
  • Vigraharaj चतुर्थ का काल कला व साहित्य की दृष्टि से चौहानों का स्वर्ण काल कहलाता है ।
  • विग्रहराज चतुर्थ ने गजनी के शासक खुशरू शाह ( हम्मीर/अमीर ) को हराया और हिंदु राजाओं को गजनी शासन से मुक्ति दिलाई । विग्रहराज चतुर्थ की दिल्ली विजय की पुष्टि बिजौलिया शिलालेख से होती है
  • विग्रहराज चतुर्थ ने 1163 ईं. में दिल्ली में शिवालिक स्तंभ लेख का निर्माण करवाया । इस अभिलेख में विग्रहराज चतुर्थ को विष्णु का अवतार कहा गया है
  • Vigraharaj ( बीसलदेव ) ने अपनी महानता के अनुरूप परमभट्टारक, परमेश्वर, महाराजाधिराज जैसी उपाधियाँ धारण की ।
  • जयानक भट्ट ने विग्रहराज को 'कविबांधव' कहा है ।

अढाई दिन का झोपड़ा

अढाई दिन का झोपड़ा विग्रहराज चतुर्थ ने अजमेर में कण्ठाभरण नामक संस्कृत पाठशाला का निर्माण करवाया जिसे शिहाबुहीन मोहम्मद गौरी के गुलाम कुतुबद्दीन ऐबक ( लाखबक्श ) ने तुड़वाकर यहाँ मस्जिद का निर्माण करवाया तथा यहां फारसी अभिलेख लिखवाए राजस्थान में प्रथमत: फारसी अभिलेख यहीं मिलते है । इसे ढाई दिन का झोपड़ा कहते है ।
नोट - अबु बकर ने अढाई दिन की इस मस्जिद का डिजाईन तैयार किया था ।
  • पर्सी ब्राउन - इस मस्जिद के पास अढाई दिन का मेला/पंजाब के शाह पीर का उर्स लगने के कारण इसे अढाई दिन का झोपडा कहते है ।
  • कर्नल जेम्स टॉड ने अढाई दिन के झौपड़े के लिए कहा है कि मैंने राजस्थान में इतनी प्राचीन व सुरक्षित इमारत नहीं देखी
  • यह राजस्थान की पहली मस्जिद हैं, इसे 16 खंभों का महल भी कहते है ।
  • बीसलदेव कवियों व विद्वानों का आश्रयदाता था अत: इसे कवि बान्धव के नाम से जाना जाता है । ( रीट2016 )
  • विग्रहराज चतुर्थ ( बीसलदेव ) ने संस्कृत में हरिकेली नाटक लिखा । बीसलदेव का दरबारी कवि सोमदेव था । जिसने ललित विग्रहरांज ग्रंथ लिखा । सोमदेव ने विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव) को ' विद्वानों में सर्वप्रथम विपश्चितानामाद्य: कहा है ।
  • बीसलदेव रासौ के रचयिता नरपति नाल्ह थे ।
  • दिल्ली पर अधिकार करने वाला पहला शासक विग्रहराज चतुर्थ था ।
  • विग्रहराज चतुर्थ ने जैन विद्वान धर्मघोष सुरी के प्रभाववश अपने साम्राज्य में पशु हत्या पर रोक लगाई । विग्रहराज चतुर्थ के काल का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण निर्माण बीसलसर झील का निर्माण, जिसे बित्स्या अथवा बिसलिया कहा जाता था ।
  • किलहार्न ने विग्रहराज चतुर्थ की प्रशंसा में कहा है कि वह उन हिंदु शासकों में से एक व्यक्ति था, जो कालिदास और भवभूति की होड कर सकता था ।

सोमेश्वर चौहाल (1169-1177 ई)

  • अर्णोराज व कांचन देवी का पुत्र सोमेश्वर चौहान , पृथ्वी राज द्वितीय की निसंतान मृत्यु होने पर शाकंभरी का शासक बना । सोमेश्वर चौहान शासक बनने से पूर्व गुजरात के जयसोम व कुमारपाल का दरबारी था ।
  • 1177 ई. में सोमेश्वर चौहान ने आबू के जैतसिंह की सहायता हेतु युद्ध में भाग लिया और गुजरात के चालुक्यवंशी शासक भीम द्वितीय ने सोमेश्वर की हत्या कर दी ।
  • सोमेश्वर व पत्नी कपूंरी देवी के दो पुत्र पृथ्वीराज तृतीय व हरिराज तथा पुत्री पृथा थी ।
  • दिल्ली के राजा और पृथ्वीराज चौहान के नाना महाराजा अनंगपाल द्वितीय थे जिन्होंने पृथ्वीराज चौहान को दिल्ली का प्रशासन सोंप दिया था

पृथ्वीराज चौहान तृतीय (1177-1192 ई)

गुजरात के अन्हिल पाटन नामक स्थान पर पृथ्वीराज चौहान-तृतीय का जन्म 1166 ई. ( विक्रम संवत 1223 ) में ज्येष्ठ मास की द्वादशी को ( पृथ्वीराज विजय के अनुसार ) अजमेर के चौहान शासक सोमेश्वर की रानी कपूंरी देवी ( ग्रेड तृतीय 2013 ) की कोख से हुआ पृथ्वीराज चौहान तृतीय को भारतेश्वर, हिंदु सम्राट, सपादलक्षेश्वर, दल पंगुल, विश्वविजेता, राय पिथौरा आदि के उपनाम से जाना जाता है ।
  • पृथ्वीराज चौहान तृतीय इतिहास में 'राय पिथौरा' के नाम से प्रसिद्ध था ।
  • 11 वर्ष की आयु में 1177 ई. में पृथ्वीराज चौहान तृतीय का राज्यभिषेक अजमेर में हुआ जब पृथ्वीराज अल्पव्यस्क था तो शासन की देखभाल कदम्बवास/ कैमास ( प्रधानमंत्री ) व भुवनैकमल्ल ( सेनाध्यक्ष - कर्पूरी देवी के चाचा ) ने की ।
  • गौरी के आक्रमण के समय चालुक्यों को सहायता देने के विरुद्ध पृथ्वीराज तृतीय को परामर्श देने वाला मंत्री कदम्बवास था ।

पृथ्वीराज चौहान तृतीय के युद्ध 

  • 1178 ई. में सर्वप्रथम अपने चचेरे भाई नागार्जुन के विद्रोह का दमन किया । कैमास की सहायता से पृथ्वीराज तृतीय ने गुढापुरा / गुरूग्राम ( गुडगाँव ) के युद्ध मे पराजित किया ।
  • 1178 ई. में पृथ्वीराज तृतीय ने शासन सत्ता अपने हाथ में ली
  • 1182 ई. में सतलज प्रदेश से आने वाली भण्डानक जाति, जो अलवर, भरतपुर व मथुरा क्षेत्र में अपना प्रभाव जमाना चाहती थी, का दमन किया ।
1182 ई. में बुन्देलखण्ड/जेजाकभूक्ति/महोबा के चंदेल राजा परमार्दीदेव (ग्रेड द्वितीय 2013) व उसके सेनापति आल्हा व ऊदल को तुमुल के युद्ध में हराकर राजधानी महोबा पर विजय प्राप्त की । महोबा विजय के बाद पृथ्वीराज ने अपने विश्वसनीय सामंत पन्जुनराय को महोबा का अधिकारी नियुक्त किया था
  • 1184 ई. में नागौर के युद्ध में गुजरात के चालुक्यवंशी शासक भीमदेव द्वितीय की सैना के साथ लम्बे समय तक जारी संघर्ष को समाप्त कर संधि की
  • पृथ्वीराज चौहान तृतीय ने टोंक जिले में बीसलपुर बाँध के किनारे महादेव का मंदिर बनवाया ।
  • Prithviraj Chauhan IIIने दिल्ली में लालकोट शहर में रायपिथौरागढ़ का निर्माण करवाया ।
  • पृथ्वीराज चौहान तृतीय ने विद्वानों को प्रोत्साहित करने के लिए अजमेर मे कला साहित्य विभाग की स्थापना की इसके प्रथम अध्यक्ष (अधिकारी) पद्मनाभ थे ।
  • Prithviraj Chauhan III के दरबार में उस समय के श्रेष्ठ विद्वानों ने आश्रय पाया, जिनमें वागीश्वर, विद्यापति गौड़, जर्नादन, विश्वरूप, पृथ्वी भट्ट, चंदबरदाई, जयानक प्रसिद्ध है
  • कश्मीरी विद्वान जयानक ने पुष्कर झील के किनारे बैठकर पृथ्वीराज विजय नामक ग्रंथ की रचना की जिसमें तराईन के युद्धों का वर्णन नहीं मिलता ।
  • जयानक-बीसलदेव, सोमेश्वर व पृथ्वीराज चौहान तृतीय के दरबार में रहा ।
  • Prithviraj Chauhan III का प्रथम शिलालेख बड़ल्या / बेदला का शिलालेख है । पृथ्वीराज चौहान तृतीय का अंतिम शिलालेख आवंल्दाका शिलालेख है ।
  • कन्नौज के गहड़वाल वंश के राजा जयचंद को हराया तथा उसकी पुत्री संयोगिता से गंधर्व विवाह किया ।
  • यह घटना चौहानों व गहड़वालों में शत्रुता का तात्कालीन कारण थी ।
  • इस घटना को पृथ्वीराज रासौ, सुर्जनचरित्र, आईन-ए-अकबरी व वैद्य व डॉ. दशाथ शर्मा सत्य मानते है ।
  • इस घटना को डॉ त्रिपाठी व डॉ. गौरी शंकर हीराचंद ओझा निराधार मानते है
  • Prithviraj रासौ , चंदबरदाई द्वारा रचित महाकाव्य, जिसका अंतिम भाग इसके पुत्र जल्हण ने पूर्ण किया  इसकी सबसे प्राचीन प्रति बीकानेर के राजकीय पुस्तकालय में मिली है ।
  • पृथ्वीराज रासौ की भाषा पिंगल है, जो राजस्थान की ब्रजभाषा का पर्याय है ।
  • पृथ्वीराज रासौ को हिंदी का प्रथम ' महाकाव्य होने का सम्मान प्रात है । इसमें 10000 से अधिक छंद है और तात्कालीन प्रचलित 6 भाषाओं का प्रयोग किया गया है । ढाई हजार पृष्ठों के इस ग्रंथ मे 69 समय/सर्ग/अध्याय है ।
  • चंदबरदाई की बेटी का नाम राजबाई था। 
  • पृथ्वी राज चौहान तृतीय द्वारा मोहम्मद गोरी को अलग-अलग ग्रंथों में कई बार पराजित किया हुआ बताया जाता है । 
जैसे - नयन चंद्र सूरी के हम्मीर महाकाव्य में सात बार मोहम्मद गोरी को पृथ्वीराज चौहान द्वारा पराजित करना बताया गया है और चंद शेखर के सुर्जन चरित में 21 बार, मेरूतुंग की प्रबंध चिंतामणि में 23 बार, पृथ्वीराज प्रबन्ध में आठ बार संघर्ष का जिक्र किया, परंतु निर्णायक युद्ध दो ( तराईन ) ही हुए है ।
  • पृथ्वीराज रासो के अनुसार चौहान और तुर्को के मध्य 21 बार मुठभेड़ हुई ।
  • कवि चन्दबरदाई ने 36 राजपूत राजवंशों की सूची दी है

तराईन के युद्धों के प्रारंभिक स्रोत 

  • चंद्रबरदाई - पृथ्वीराज रासौ, 
  • हसन निजामी- ताज-उल-मासिर, 
  • मिनहाज-उस-सिराज - तबकात-ए-नासिरी
  • गौरी के आक्रमण के समय चालुक्यों को सहायता देने के विरुद्ध पृथ्वीराज तृतीय को परामर्श देने वाला मंत्री कदम्बवास था

तराईन का प्रथम युद्ध (1191 ई.)

तराईन का प्रथम युद्ध ( 1191 ईं.) पृथ्वीराज चौहान तृतीय तथा मोहम्मद गौरी की सेना के मध्य हुआ । यहाँ पर मुहम्मद गौरी अपनी सेना के साथ सरहिन्द को लेने के बाद पहुँचा था ।
  • पृथ्वीराज ने तबरहिन्द/सरहिन्द (बठिंडा) दुर्ग काजी जियाउद्दीन से छीन लिया और काजी को बन्दी बनाकर अजमेर लाया गया जहाँ पर उसे धन लेकर गजनी लौटा दिया गया ।
  • इस युद्ध में पृथ्वीराज चौहान का सेनापति खाण्डेराव था ।

तराईन का द्वितीय युद्ध (1192 ई.)

तराईन के प्रथम युद्ध में शाहबुद्दीन मुहम्मद गोरी के हारने पर गज़नी जाका पुन : अपनी संगठन शक्ति को मजबूत किया तथा तुर्क, ताजिक और अफगानों को सेना में सम्मिलित करके 120000 सैनिकों की सेना का गठन किया । लाहौर तथा मुल्तान के मार्ग से पुन: तराईन के मैदान आ पहुँचा ।
  • हसन निजामी के अनुसार सुल्तान जब लाहौर पहुँचा तो उसने एक दूत किवान-उल-मुल्क को पृथ्वीराज के पास भेजा कि पृथ्वीराज उसकी अधीनता स्वीकार कर लें । प्रत्युतर में पृथ्वीराज ने उसे गज़नी लौटने की सलाह दी ।
  • पृथ्वीराज का सेनापति खाण्डेराव तराईन के द्वितीय युद्ध में मारा गया ।
  • Prithviraj Chauhan III के मंत्री सोमेश्वर प्रतापसिंह, जो मोहम्मद गौरी से जा मिले जो पृथ्वीराज की पराजय का कारण बने ।
  • पृथ्वीराज चौहान ने अपने शासनकाल में तोमरों से लड़ाई नहीं की ।
  • तराईन का दूसरा युद्ध भारतीय इतिहास में युग परिवर्तनकारी घटना थी यह भारत में इस्लामिक राजतंत्र की स्थापना के लिए उत्तरदायी युद्ध माना जाता है ।
  • तराईन का द्वितीय युद्ध भारतीय इतिहास में एक निर्णायक युद्ध सिद्ध हुआ क्योंकि इस युद्ध के बाद उत्तर भारत में राजपूतकाल का अंत व दिल्ली में सल्तनतकाल का उदय हुआ ।
  • पृथ्वीराज रासो के अनुसार पृथ्वीराज को बन्दी बनाकर गजनी ले जाया गया जहां पर उसे नेत्रहीन कर दिया गया इस अवसर पर पृथ्वीराज का मित्र चंद्रबरदाई ने पृथ्वीराज को लक्ष्य प्राप्त करने मे कविता के माध्यम से लक्ष्य का बोध कराया

चंदबरदाई की उक्ति

चार बाँस, चोब्बीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण ।
तां ऊपर सुल्तान है, मत चुको चौहान । ।  

  • पृथ्वीराज के बाण से मुहम्मद गौरी की मृत्यु हो गई तथा पृथ्वीराज और चन्दबरदाई ने आत्महत्या कर ली । हम्मीर महाकाव्य के अनुसार पृथ्वीराज को कैद करवाकर अन्त में मरवा दिया ।
  • तराईन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वी राज चौहान का साथ मेवाड़ के समर सिंह व दिल्ली के गवर्नर गोबिंद राय ने दिया ।
  • पृथ्वीराज को दल पुंगल विश्वविजेता की उपाधि प्रात थी । पृथ्वीराज तृतीय को रायपिथौरा ( युद्ध में पीठ न दिखाने वाला ) के नाम से जाना जाता है ।
  • पृथ्वीराज चौहान की छतरी काबुल (गजनी) में बनी हुई है, जबकि पृथ्वीराज का स्मारक अजमेर के तारागढ़ दुर्ग में स्थित है । पृथ्वीराज के दरबारी कवि जयानक ने पृथ्वीराज विजय की रचना की । इस ग्रंथ में तराईन के युद्धों का उल्लेख नहीं है ।
  • Prithviraj Chauhan III चौहान वंश का अंतिम प्रतापी राजा था । तराईन के द्वितीय युद्ध के बाद पृथ्वीराज चौहान तृतीय का पुत्र गोविन्द देव चौहान ने रणथम्भौर में चौहान वंश की नींव रखी ।
  • 1192 ई. में फारस (ईरान) से ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती ( भारत में चिश्ती सिलसिले के संस्थापक/गरीब नवाज ) मोहम्मद गौरी के साथ पृथ्वीराज चौहान तृतीय के काल में अजमेर आए ( ग्रेड तृतीय 2013 ) तथा अजमेर को अपनी कर्मस्थली बनाया । अजमेर में इनकी दरगाह बनी है । दरगाह हेतु जमीन महाराजा जगत सिंह जयपुर ने दी ।
  • पृथ्वीराज तृतीय ने अपनी दिग्विजय अभियान के अन्तर्गत महोबा, गुजरात तथा कन्नौज राज्यों के साथ युद्ध किया था

रणथम्भौर के चौहान

रणथम्भौर के चौहान वंश का संस्थापक गोविन्दराज था ( 1194 ईं. ) , जो पृथ्वीराज तृतीय का पुत्र था गोविन्दराज को रणथम्भौर के Chauhan Vansh का संस्थापक कहते है । ( कॉलेज व्याख्यता , इतिहास-2016 , पुलिस2003 ) गोविन्दराज ने दिल्ली सल्तनत की अधीनता स्वीकार ली थी ।

हम्मीरदेव

  • डाॅ. गोपीनाथ शर्मा के अनुसार सभी पुत्रों में सबसे योग्य पुत्र हम्मीरदेव था शायद इसी कारण जैत्रसिंह ने अपने जीवनकाल में ही 1282 ई. में हम्मीरदेव का राज्यरोहण करवा दिया था ।
  • हम्मीर देव के दरबार में बीजादित्य नामक कवि रहता था ।

जलालुद्दीन खिलजी का आक्रमण 

  • जलालुद्दीन खिलजी, खिलजीवंश का प्रथम शासक जिसने रणथम्भौर पर आक्रमण किया । ( ग्रेड द्वितीय2015 ) जलालुद्दीन ने सबसे पहले झाइन दुर्ग पर 1291 ई. में आक्रमण किया और वहाँ के आस-पास के भागों को लूटना शुरू कर दिया ।
  • झाइन विजय के बाद जलालुद्दीन खिलजी 1291 ई. में रणथम्भौर दुर्ग की ओर बढा जिसका पता हम्मीरदेव को चल गया । हम्मीर देव ने अपने सेनापति गुरदास सैनी के नेतृत्व में सेना भेजी लेकिन गुरदास सैनी मारा गया ।
जलालुद्दीन ने जब रणथम्भौर पर 1292 ई. दुबारा आक्रमण किया, तो इस सुदृढ़ दुर्ग को जीतना मुश्किल लगा तो आठ माह से रणथम्भौर पर लगा घेरा हटा लिया और वापिस लौटने लगा तो इस समय जलालुद्दीन के सेनापति अहमद चप वे खिलजी से वापिस लौटने का कारण पूछा जिसके जबाब में जलालुद्दीन खिलजी ने अपनी कायरता छिपाने के लिए कहा था कि मैं ऐसे 10 किलों को मुसलमान के सिर के एक बाल के बराबर भी नहीं समझता ।
  • सन् 1296 ई. में जलालुद्दीन की हत्या करके उसका दामाद /भतीजा अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली सल्तनत का सुल्तान बना ।

अलाउद्दीन खिलजी का आक्रमण 

  • सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने 1299 ई. में गुजरात अभियान (सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण) के दौरान सेनापति उलुग खां व नुसरत खां ( ग्रेड द्वितीय हिंदी2010 ) के नेतृत्व में (साथ में नवीन मुसलमान मोहम्मद शाह व केहब्रू भी थे ) धन लूटा था । 
  • गुजरात अभियान से लौटते समय सेनापति उलुग खां व नुसरत खां के साथ नवीन मुसलमान मोहम्मद शाह वकेहब्रू के बीच लुटे हुए माल के बंटवारे को लेकर विवाद हो गया और मोहम्मद शाह व केहब्रू ने खिलजी सेना से भागकर रणथम्भौर के हम्मीर के यहाँ शरण ली ।
  • अलाउद्दीन खिलजी ने हम्मीर से अपने विश्वासघाती सैनिक मोहम्मदशाह व केहब्रू को वापिस सौंपने का आदेश दिया, परंतु हम्मीर द्वारा शरणागत को धोखा देना राजपूतों के संकल्प में नहीं था । यही युद्ध का कारण बना ।
  • हम्मीरदेव ने यह हठ कर ली कि मुझे मुहम्मदशाह को वापिस नहीं लौटाना है, हम्मीर अपने हठ के लिए प्रसिद्ध था ।

अलाउद्दीन खिलजी के रणथम्भौर के अभियान के निम्न कारण माने जाते है

  1. अलाउद्दीन की विस्तारवादी नीति ।
  2.  हम्मीर द्वारा मोहम्मद शाह व केहब्रू को शरण देना ।
1299 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने उलुग खां व नुसरत खां तथा अल्प खाँ को रणथम्भौर दुर्ग पर आक्रमण करने के लिए भेजा था
इस युद्ध के दौरान भीमसिंह मारा गया तथा रणथम्भौर दुर्ग से बारूद का गोला गिरने के कारण मुस्लिम सेनापति नुसरत खां मारा गया तथा उलुग खां को सेनापति नियुक्त किया गया युद्ध के अगले चरण में उलुग खां का साथ देने दिल्ली सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी स्वयं आ पहुंचा और हम्मीर को संधि का समाचार पहुँचाया, जिसमें शाही शिविर में हम्मीर द्वारा अपने मंत्री/ सेनापति रणमल व रतिपाल को भिजवाया गया ।
  • रणमल व रतिपाल अलाउद्दीन खिलजी से मिलकर रणथम्भौर का गुप्त मार्ग बता देते है और खिलजी सेना दुर्ग में प्रवेश कर जाती है ।
  • हम्मीर दुर्ग के दरवाजे खोलकर खिलजी सैना से लोहा लेते हुए मारा जाता है ।
  • हम्मीर ने अपने जीवन में कुल 17 युद्ध किये, जिनमें से 16 युद्ध जीते थे ।
  • 11 जुलाई , 1301 ई. ( पुलिस2001 ) में रणथम्भौर में शाका हुआ , इस शाके को राजस्थान का प्रथम शाका कहा जाता है । जो हम्मीर चौहान की पत्नी रंगदेवी व पुत्री पदमला ने किया ।
  • 1301 ई. के रणथम्भौर साके के समय अलाउद्दीन खिलजी का सैनिक कवि व इतिहासकार अमीर खुसरो भी मौजूद था ।
  • अमीर खुसरो ने रणथम्भौर दुर्ग जीतने के बाद कहा कि 'आज कुफ्र का गढ़ इस्लाम का सदन (घर) हो गया'
  • 1301 ई. का युद्ध हम्मीर द्वारा हारे जाने का कारण उसके सैनिक रणमल व रतिपाल का विश्वासघात था ।
  • रणथम्भौर के चौहान वंश का प्रथम व अन्तिम प्रतापी राजा हम्मीर चौहान था ।
  • हम्मीरदेव ने अपने पिता की याद में रणथम्भौर दुर्ग में 32 खंभों की छत्तरी बनवाई, जिसे न्याय की छत्तरी भी कहते है ।
  • चौहानवंश की यह शाखा हम्मीर देव की मृत्यु के बाद समाप्त हो गई ।
  • नयनचंद्र सूरी द्वारा रचित हम्मीर महाकाव्य से, चंदशेखर द्वारा रचित - हम्मीर हठ से, जोधराज/शारंगधर द्वारा रचित हम्मीर रासौ से, अमीर खुसरो-खजाइन उल फूतूह तथा बरनी की रचनाओं से हम्मीर की जानकारी मिलती है ।

जालौर के सोनगरा चौहान

जालौर के सोनगरा चौहानवंश (Chauhan Vansh) का संस्थापक कीर्तिपाल चौहान था । कीर्तिपाल नाडोल की चौहान शाखा के अल्हण का पुत्र था ।
  • कीर्तिपाल का समकालीन मेवाड़ का शासक सामंत सिंह था ।
  • कीर्तिपाल ने 1181 ई ॰ में जालौर पर अधिकार कर चौहान शाखा की नींव रखी । अत: यहाँ के शासक जालौर की चौहान शाखा के रूप में प्रसिद्ध हुए ।
  • यहाँ का सुदृढ दुर्ग सुवर्णगिरी नाम से जाना जाता है । पहले यहाँ परमार वंश का शासन था ।
  • कीर्तिपाल चौहान ने सोनगढ़ पहाडी पर सुवर्णगिरी दुर्ग का निर्माण करवाया । जालौर का किला सुकडी नदी के किनारे बना है ।

जालौर के चौहानों की जानकारी का प्रमुख स्त्रोत है  

  1. पद्मनाभ द्वारा रचित 'कान्हड़दे-प्रबन्ध'
  2. मुहणौत नैणसी की 'नेणसी री ख्याल'
  3. फरिश्ता की 'तारीख-ए-फरिश्ता‘ तथा अमीर खुसरों की खजाइन-उल-फुतुह तथा मकराना का शिलालेख ।
  4. मुहणौत नैणसी ने कीर्तिपाल को कीतू एक महान राजपूत कहकर पुकारा है ।

समरसिंह (1182 ई.-1205 ई. तक)

  • कीर्तिपाल की मृत्यु के पश्चात समरसिंह जालौर का शासक बना । इस समय दिल्ली में मोहम्मद गौरी का नियंत्रण था ।

उदय सिंह (1205-1257 ई. तक)

  • उदय सिंह समरसिंह का पुत्र था । सुंधा शिलालेख से ज्ञात होता है कि उदयसिंह ने अपने राज्य का काफी विस्तार किया ।
  • ताजुलमासिर के अनुसार 1228 ई. में इल्तुतमिश ने जालौर पर आक्रमण किया परन्तु उसे जीत नहीं सका 
  • 1254 ई. में दिल्ली सल्तनत के शासक नासिरूद्दीन महमुद ने भी जालौर पर आक्रमण किया किन्तु सफल नहीं हुआ ।

चाचिंगदेव (1257 ई. से 1282 ई. तक)

चाचिंगदेव के समकालीन दिल्ली सल्तनत के सुल्तान नासिरूद्दीन महमुद तथा बलबन थे । इसी समय दिल्ली पर मंगोल आक्रमण बढ़ गये थे, इसलिए ये शासक जालौर की ओर ध्यान नहीं दे सके इसलिए चाचिंगदेव का समय शांति से गुजर गया ।

सामंत सिंह (1282 ई. से 1296 ई. तक)

सामन्तसिंह ने बाघेला राजा सारंगदेव की सहायता से जलालुद्दीन खिलजी की सैना का मुकाबला 1291 ई. में किया तथा सुल्तान की सेना को लौटने को बाध्य कर दिया । उसके बाद सामन्तसिंह ने सत्ता अपने युवा पुत्र कान्हड़दे को 1296 ई. में सौंप दी ।

कान्हड़दे चौहान

  • 1296 ई. में जालौर का शासक कान्हड़दे चौहान बना, जो कि सामंत सिंह का पुत्र था ।
  • जिस समय कान्हड़दे जालौर का शासक बना उस समय दिल्ली पर अलाउद्दीन खिलजी का शासन था , जो कि एक साम्राज्यवादी प्रवृत्ति का शासक था तथा उसने सिकंदर-ए-सानी की उपाधि धारण की थी

कान्हड़दे के बारे में जानकारी के स्त्रोत निम्नलिखित है 

  1. पद्मनाभ कान्हड़दे-प्रबन्ध व वीरमदे सोनगरा री बात, 
  2. नैणसी - नैणसी री ख्यात, 
  3. फ़रिशता - तारीख-ए-फरिशता, 
  4. मकराना शिलालेख, 
  5. अमीर खुसरो-खजाइन-उल-फुतुह, 
  6. जालौर प्रशस्ति 
कान्हड़दे प्रबंध के अनुसार - कान्हड़दे ने अलाऊहीन को गुजरात अभियान के समय रास्ता नहीं दिया इसलिए उस पर खिलजी आक्रमण हुआ
फरिशता के अनुसार - अलाऊद्दीन ने कान्हड़दे को दिल्ली  बुलाकर अपमानित किया ।
नैणसी के अनुसार - कान्हड़दे के बेटे वीरम के साथ अलाउद्दीन की  बेटी फिरोजा का प्रेम प्रसंग था, इस कारण दोनों में संघर्ष हुआ ।
  • सिवाणादुर्ग, जोधपुर से 54 मील दूरी पर पश्चिम में स्थित है । जालौर इसके दक्षिण में स्थित है । हालांकि सिवाणा का दुर्ग चारों और से थार के रेगिस्तान से घिरा हुआ है । सिवाणा दुर्ग का निर्माता पंवार नरेश वीर नारायण था ।

सिवाणा दुर्ग पर अलाउद्दीन का आक्रमण

सिवाणा दुर्ग पर अलाउद्दीन के आक्रमण के समय परमार राजा शीतलदेव का संरक्षण था जो कान्हड़दे का भतीजा भी था ।
अलाउद्दीन की सेना ने 2 जुलाई, 1308 ई. को कमालुद्दीन के नेतृत्व में दुर्ग को चारों ओर से घेर लिया और शीतलदेव के मंत्री भावले को लालच देकर अपनी ओर मिला लिया ।
  • शीतलदेव चौहान युद्ध करता हुआ वीरगति को प्राप्त हुआ व मैणादे के नेतृत्व में महिलाओं ने अपने सतीत्व की रक्षा हेतु जौहर किया ।
  • सिवाणा का दुर्ग सुल्तान द्वारा 10 नवम्बर, 1308 ई. को विजित कर लिया और उसका नाम खैराबाद रखा तथा किले का प्रबंध कमालुद्दीन गुर्ग को देकर अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली लौट आया ।

अलाउद्दीन खिलजी का जालौर दुर्ग पर आक्रमण

  • 1310-11 ई. सुवर्ण गिरी ( जालौर ) का शाका हुआ । अलाउद्दीन खिलजी ने जालौर दुर्ग पर आक्रमण किया । यहाँ कान्हड़दे व उसका पुत्र वीरमदेव चौहान मारे गए तथा दुर्ग जीतने के बाद अलाउद्दीन खिलजी ने जालौर दुर्ग का नाम जलालाबाद रखा ।
  • फरिस्ता के अनुसार अलाउद्दीन खिलजी का जालौर पर द्वितीय आक्रमण 1311 ई. में हुआ ।
  • सिवाणा व जालौर दुर्ग पर अलाउद्दीन का आक्रमण करना साम्राज्य विस्तार नीति सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण दुर्ग व गुजरात व मालवा जाने का मार्ग होना था ।
  • जालौर दुर्ग के विषय में कहा जाता है कि आज तक इस दुर्ग में इसके द्वार से प्रवेश करके इसे किसी ने नहीं जीता ।
  • हसन निजामी ने जालौर दुर्ग के विषय में कहा है कि ' यह ऐसा किला है जिसका दरवाजा कोई आक्रमणकारी नहीं खोल सका 
  • जालौर के सोनगरा चौहानों की कुलदेवी आशापुरी माता (महोदरी माता) है ।
  • कान्हड़दे के दरबारी कवि पद्मनाभ ने कान्हड़दे-प्रबन्ध और बीरमदे सोनगरा री बात की रचना की ।

नाडौल के चौहान (Chauhan Vansh)

  • नाडौल के चौहान वंश का संस्थापक लक्ष्मण देव चौहान था । लक्ष्मण के बाद शोभित, बलराज, महेन्द, अहिल, बालाप्रसाद, पृथ्वीराज आदि शासक हुए ।
  • अहिल ने गुजरात के भीमदेव की सेना को हराया था तथा 1205 ई. में महमूद गजनी की सेना से युद्ध किया ।
  • नाडौल केChauhan Vansh का प्रथम प्रतापी राजा कीर्तिपाल चौहान था कीर्तिपाल चौहान ने सोनगढ पहाडी ( जालौर ) पर सुवर्ण गिरी का दुर्ग बनवाया तथा जालौर में सोनगरा चौहान वंश (Chauhan Vansh) की नींव रखी इस प्रकार नाडौल शाखा जालोर शाखा में विलय हुई ।
  • 1205 ई के लगभग नाडौल शाखा के चौहान जालौर के चौहान मे विलीन हो गए
  • लक्ष्मण ने नाडौल के दुर्ग को बनवाया तथा केल्हण ने सोमेश्वर के लिए सुवर्ण तोरण का निर्माण करवाया

सिरोही के चौहान

  • सिरोही के चौहान, देवड़ा शाखा के चौहान वंशीय राजपूत थे । सम्भवतः इनका आदि पुरुष लुम्बा जालौर की देवड़ा शाखा (Chauhan Vansh) का था । लुम्बा ने 1311 ई. के लगभग आबू और चन्द्रावती को परमारों से छीनकर अपनी स्वतन्त्र सत्ता स्थापित की । 
  • इसने 1320 ई. में अचलेश्नर मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया ।
  • शिभान के लड़के सहसमल ने 1425 ई. में शिवपुरी से 2 मील आगे सिरोही नगर बसाया ।
  • अखेराज चौहान ने खानवा के युद्ध में राणा सांगा की मदद की ।
  • इन्होनें जोधपुर में लोहियाणा का किला बनवाया ।
  • सुरताण देवड़ा ने अकबर की अधीनता स्वीकार की ।
  • वेरिसाल के समय दुर्गादास राठौड़ ने अजीतसिंह को कालंदी ग्राम ( सिरोही ) में शरण दी ।
  • शिवसिंह ने 11 सितम्बर, 1823 ईं. को अंग्रेजों के साथ सहायक संधि की ।
  • अंग्रेजों के साथ सहायक संधि करने वाला अंतिम शासक शिवसिंह था ।

हाड़ौती के चौहान (Chauhan Vansh)

  • देवाहाड़ा ( 1241 ईं० ) में बूंदा मीणा को हराकर हाडा चौहानवंश (Chauhan Vansh) की स्थापना की ।
  • देवासिंह बूंदी का संस्थापक था । जबकि बूंदी का नाम बूंदा मीणा के नाम पर पड़ा जेत्रसिंह ने 1274 ई. मे कोटा के कोटिया भील को हराकर कोटा को अपनी राजधानी बनाया ।

रामसिंह

  • रामसिंह का दरबारी कवि सूर्यमल्ल मिश्रण ( बूंदी ) था, जिन्हे राजस्थान का राज्यकवि कहा जाता है ।
  • सूर्यमल्ल की प्रमुख रचनाएं सतीरासौ, वंशभास्कर, वीर सतसई है ।

कोटा के चौहान

  • जेत्रसिंह ने 1274 ई. में कोटा को राजधानी बनाया । 1631 ईं. में शाहजहाँ ने कोटा तथा बूंदी को अलग-अलग किया तथा कोटा का शासक माधोसिंह को बनाया ।

मुकुन्दसिंह (1648-1658 ई.)

  • मुकुन्दसिंह ने अपनी दासी अबलामीणी के नाम पर अबलामीणी महल ( कोटा ) बनवाया अबलामीणी महल जिसे हाड़ौती का ताजमहल/राजस्थान का
  • दूसरा ताजमहल कहा जाता है मुकुन्दसिंह के नाम पर कोटा तथा झालावाड में मुकुन्दवाडा की पहाडियों का नाम रखा हुआ है ।
  • मुकुन्दसिंह ने धरमत के युद्ध मे दाराशिकोह की मदद की थी तथा मारा गया

जालिमसिंह

  • 1817 ई. में इसने ईस्ट इंडिया कम्पनी के साथ व्यापक/सुव्यवस्थित सहायक संधि की ।
  • जालिमसिंह ने झालावाड़ में जालिमशाही सिक्के चलवाये ।
  • जालिम शाही हवेली झालरापाटन ( झालावाड ) में स्थित है ।
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