Rajasthan ki Mitiya PDF - राजस्थान की मिट्टियाँ

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Rajasthan ki Mitiya - राजस्थान की मिट्टियाँ

Rajasthan ki Mitiya PDF - राजस्थान की मिट्टियाँ
Rajasthan ki Mitiya PDF - राजस्थान की मिट्टियाँ


अमेरिकी मिट्टी विशेषज्ञ डॉ. बैनेट के अनुसार भू-पृष्ट पर मिलने वाले असंगठित पदार्थों की वह ऊपरी परत जो मूल चट्टानों अथवा वनस्पति के योग से बनती है मिट्टी कहलाती हैं 
जिस विभाग में मिट्टीयों का अध्ययन किया जाता है वह पेडोलाॅजी कहलाता है
राज्य में मिट्टी परीक्षण प्रयोगशालाएं जयपुर व जोधपुर में हैं
भारत सरकार की सहायता से राजस्थान में प्रथम मिट्टी परीक्षण प्रयोगशाला की स्थापना जोधपुर में वर्ष 1958 में की गई
मृदा निर्माण के कई कारक होते हैं जो कि निम्नलिखित है

लैटेरांइट मृदा


इसमें चूने एवं मैग्नीशियम का अश कम तथा लोहे कैल्शियम और एल्यूमिनियम की अधिकता होती है 
इसका कारण उच्च तापमान, ऊचाई वाले प्रदेश, भारी वर्षा तथा उच्च आर्दता के क्षेत्रों मे मानसूनी जलवायु की विशिष्ट परिस्थितियों में तीव्र निकषालन द्वारा होता है

बालु (बलुई) मृदा

इसका निर्माण उच्च तापमान, निम्न वर्षा, निम्न आर्दता वाले क्षेत्रों में ग्रेनाइट एवं बलुआ पत्थर के क्षरण से हुआ है

लाल मृदा

इसका निर्माण उच्च तापमान, निम्न वर्षा, मध्यम आर्दता वाले क्षेत्रों में रवेदार एवं कायांतरित चट्टानों जैसे ग्रेनाइट, नीस, क्वार्टजाइट के अपक्षय के कारण हुआ है

काली मृदा (रेगूर)

यह अधिक आर्दता ग्रहण क्षमता वाले क्षेत्रो में बेशाल्ट , एवं लावा से निर्मित होती है
इसमें लौह की अधिक प्रचुरता के कारण लाल रंग होता है

जलोठ मृदा

यह अवसादी चट्टानों के अपक्षय से बनती है
इसमें ह्यूमन की मात्रा सर्वाधिक होती है
राजस्थान में निम्मलिखित प्रकार की मिट्टीयां पाई जाती है

रेतीली/बलुई/मरूस्थलीय मिट्टी

राज्य में सबसे अधिक भू-भाग पर पायी जाने वाली मिट्टी रेतीली मिट्टी है
इसका विस्तार राजस्थान के पश्चिम में अर्थात जैसलमेर, बाडमेर, जोधपुर, चूरू, सीकर, झुंझुनूं, बीकानेर आदि जिलों में पाया जाता है

भूरी रेतीली मिट्टी

रेत के छोटे-छोटे टीलों वाले भाग में पाई जाने के कारण भूरी रेतीली मिट्टी को ग्रे-पेन्टेड/धूसर मरूस्थलीय/सीरोजम मिट्टी भी कहते है 
इस मिट्टी का राज्य में प्रसार क्षेत्र अरावली का पश्चिमी भाग है, जिसमें जोधपुर, नागौर, जालौर, सीकर, चूरू, झुंझुनूं व बीकानेर जिले सम्मिलित हैं 
राजस्थान में भूरी मिट्टी का प्रसार अरावली के दोनों तरफ हैं

लवणीय मिट्टी

यह मिट्टी प्राकृत रूप से बाडमेर, पाली व जालौर में पायी जाती है, परन्तु यह रूपांतरित मिट्टी होने के कारण कोटा, भरतपुर, श्रीगंगानगर में भी पायी जाती है 
सिलिका सेण्ड मुख्य रूप से जालौर व बाड़मेर में पाई जाती है

पर्वतीय मिट्टी

यह मिट्टी अरावली पर्वतमाला की उपात्यकता में पायी जाती हैं, जिसके अंतर्गत सिरोही, उदयपुर, पाली, अजमेर, अलवर जिलों का पहाड़ी क्षेत्र में आता है । इस मिट्टी का रंग लाल-पीला-भूरा होता है ।

मिश्रित लाल व काली मिट्टी

इस मिट्टी का निर्माण मालवा के पठार की काली मिट्टी एवं दक्षिणी अरावली की लाल मिट्टी के मिश्रण से हुआ हैं जो हल्के गठन वाली तथा चूने की कम मात्रा लिए होती है ।
इस मिट्टी का प्रसार क्षेत्र डूंगरपुर, बांसवाड़ा, राजसमंद,
उदयपुर एवं चितौड़गढ़ जिले है ।
इस मिट्टी में कपास एवं मक्का की फसलें प्राप्त की जाती है ।

लाल-लोमी मिट्टी

इस मिट्टी का निर्माण स्फटीकीय एवं कायांतरित चट्टानों से हुआ है ।
यह मिट्टी राजस्थान के दक्षिण भाग में पायी जाती है ।
जिसके अंतर्गत उदयपुर, चितौड़गढ़, बांसवाड़ा, डूंगापुर आदि जिले आते है
इस क्षेत्र मे कम वर्षा में भी अच्छी फसल ( मुख्यत: मक्का ) उत्पादित होती हैं ।

मध्यम काली/काली/रेगूर मिट्टी

काली मिट्टी का प्रसार कोटा, बूंदी, बारां व झालावाड ( विशेष कर हाड़ौती के पठार ) जिलों में है ।
इस मिट्टी में मुख्यतया कपास सर्वाधिक पैदा होती है
राज्य में पाई जाने वाली काली मिट्टी में नमी को रोके रखने का विशेष गुण होता है
कछारी/जलोढ मिट्टी इस मिट्टी को दोमट, कांप, ब्लैक कॉटन सायल आदि नाम से भी जाना जाता है ।
यह मिट्टी सर्वाधिक उपजाऊ मिट्टी होती है ।
यह मिट्टी राजस्थान के पूर्वी मैदान - जयपुर, अलवर, अजमेर, टोंक, कोटा, सवाई माधोपुर, धौलपुर, भरतपुर आदि जिलों में विस्तृत है ।

भूरी मिट्टी

यह मिट्टी मुख्यतया बनास बेसिन में पायी जाती है, जिसके अन्तर्गत टोंक, बूंदी, सवाई माधोपुर, भीलवाड़ा, चितौड़गढ़ आदि क्षेत्र आते है ।
यह मिट्टी जायद की फसल के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है

लाल-पीली मिट्टी

इस मिट्टी का निर्माण ग्रेनाइट, शिष्ट नीस, आदि चट्टानों के टूटने से हुआ ।
लाल-पीली मिट्टी का राज्य में प्रसार क्षेत्र सवाई माधोपुर, करौली, भीलवाड़ा, टोंक एवं अजमेर जिले है ।
रचना विधि के अनुसार मिट्टी दो प्रकार की होती है

स्थानीय मिट्टी

वह मिट्टी जो सदैव अपने मूल स्थान पर रहती है, एवं बहुत कम गति करती है । स्थानीय मिट्टी कहलाती है ।
राजस्थान के दक्षिणी भाग एवं दक्षिणी-पूर्वी भाग में पायी जाने वाली काली मिट्टी इसी मिट्टी का प्रकार हैं ।

विस्थापित मिट्टी

नदी एवं पवनों के प्रवाह से अपने मूल स्थान से हटकर अन्य स्थानों पर स्थानान्तरित हो जाने वाली मिट्टी विस्थापित मिट्टी कहलाती हैं ।
राजस्थान के पश्चिमी एवं उत्तरी पश्चिमी भाग में पायी जाने वाली रेतीली बुलई मिट्टी विस्थापित मिट्टी का अच्छा उदाहरण है ।

मिट्टी निर्माण के पाँच मुख्य कारक तत्व है

1. चट्टान 2. जलवायु 3. जैविक पदार्थ 4. स्थलाकृति 5. समय

मिट्टी मे लवणीयता या क्षारीयता की समस्या

मिट्टी में खारेपन की समस्या को ही लवणीयता या क्षारीयता की समस्या कहते है । जल में सोडियम क्लोराइड की अधिका से मिट्टी क्षारीय हो जाती है मिट्टी के ऊपर सफेद लवणीय बालू जम जाती है जिसे रेह कहते है जालौर, बाड़मेर एवम् पाली के पश्चिमी क्षेत्र मे क्षारीय मिट्टी को नेहड या नेड कहा जाता है 
  • सिंचाई के दौरान उपयोग में लिए जाने वाले जल में लवण तथा सोडियम कर्बोनेट की मात्रा अधिक होती है तो मिट्टी क्षारीय हो जाती है । 
  • इसे साधारण बोलचाल की भाषा में भूरा उसर कहते है ।
  • खारी एवं लवणीय भुमि को ऊसर भूमि कहते हैं । स्थानीय भाषा में ऊसर भूमि को रेह कहा जाता है
  • शुद्ध मिट्टी का pH मान 7 होता है
  • 7 से अधिक pH मान वाली मिट्टी को क्षारीय मिट्टी कहा जाता है ।
  • मिट्टी की क्षारीयता की समस्या को कम करने के लिए जिप्सम का प्रयोग किया जाता है ।
  • 7 से कम pH मान वाली मिट्टी को अम्लीय मिट्टी कहा जाता है ।
  • मिट्टी की अम्लीयता को कम करने के लिए चूने का प्रयोग किया जाता है ।
  • पश्चिमी राजस्थान की मिट्टी अम्लीय और क्षारीय तत्वों से संशिक्त होती है, क्योंकि मिट्टी की निचली सतह से ऊपर की और कोशिकाओं द्वारा जल रिसाव होता है ।

सेम समस्या से प्रभावित क्षेत्र

1. इंदिरा गांधी नहर सिंचाई क्षेत्र - राजस्थान में हनुमानगढ जिले का बडोप्पल, भगवानदास, देईदास (नोहर एवं रावतसर के बीच का क्षेत्र) सेम प्रभावित क्षेत्र है ।
2. चंबल सिंचाई क्षेत्र

सेम की समस्या को दूर करने के उपाय

इंदिरा गांधी नहर सिंचाई क्षेत्र मे सेम की समस्या को दूर करने के लिए इण्डोडच जल निकासी परियोजना हालैंड ( नीदरलैंड ) के सहयोग से 2003 से चल रही है ।
इस योजना के तहत् यूकोलिप्टिस नामक पेड दलदल को रोकने के लिए लगाए जा रहे है ।

चम्बल सिंचाई क्षेत्र में सैम की समस्या को दूर करने के लिए कनाडा के सहयोग से राजाद परियोजना चलाई जा रही हैं ।
सेम पारिस्थितिकी मे परिवर्तन से संबंधित है


मिट्टी अपरदन के प्रकार 


मिट्टी का कटाव (मृदा अपरदन) मुख्य रूप से तीन प्रकार से होता है

जल अपरदन/लम्बवत्/अवनलिका अपरदन

जल का तीव्र प्रहार मिट्टी को एक स्थान से गहराई से काट कर दूसरे स्थान पर बहा के ले जाता है, यही जल अपरदन कहलाता है ।
जिसे लम्बवत् या अवनलिका अपरदन कहते हैं ।
राजस्थान में सर्वाधिक अवनलिका अपरदन चंबल नदी से दक्षिणी पूर्वी राजस्थान में होता है ।

वायु अपरदन/क्षैतिज/परत अपरदन

थार के रेगिस्तान व पश्चिमी राजस्थान में वायु के द्वारा मिट्टी का कटाव होता है ।
सर्वाधिक-जेसलमेर में जून माह मे जबकि न्यूनतम धौलपुर में परत अपरदन होता है ।
राजस्थान मे मिट्टी के अपरदन को रोकने के लिए सबसे महत्वपूर्ण वृक्ष इजराइली वृक्ष बबूल-खेजडी है

चादरी अपरदन

पर्वतीय प्रदेशों में वर्षा के पानी के तेज बहाव से मिट्टी का कटाव ऊपर से नीचे की और होता है उसे चादरी अपरदन  कहते है
राजस्थान में सर्वाधिक चादरी अपरदन सिरोही एवं राजसमंद जिलों में होता है । 

मृदा वैज्ञानिकों ने मृदा की उत्पत्ति रासायनिक संरचना एवं अन्य गुणों के आधार पर विश्वव्यापी मृदा वर्गीकरण प्रस्तुत किया है, जिसके आधार पर राजस्थान में निम्न प्रकार की मृदाएं मिलती है

1 एरिडी सोइल्स 2 एण्टी सोइल्स 3 अल्फी सोइल्स 4 इनसेप्टी सोइल्स 5 वर्टी सोइल्स

एरिडी सोइल्स

यह शुष्क जलवायु का मृदा समूह है ।
इसके उप-विभागों में केम्बो आरथिड्स, केल्सी आरथिड्स, सेलोरथिड्स और पेलि आरथिड्स राजस्थान में पाये जाते है ।
पश्चिमी राजस्थान में यह मृदा प्रधानता है ।

एण्टी सोइल्स

इसके टोरी सामेन्ट्स और डस्ट-फ्लूबेन्टस उपवर्ग राजस्थान मे है इसका रंग हल्का पीला एवं भूरा होता है ।
यह भी पश्चिमी राजस्थान के अनेक भागों में विस्तारित है ।

इनसेप्टी सोइल्स

यह अर्द्ध शुष्क से आर्द्र जलवायु वाले प्रदेशों में मिलती है राजस्थान में सिरोही, पाली, राजसमंद, उदयपुर, भीलवाडा, चितौड़गढ़ में प्रधानता तथा जयपुर, सवाई माधोपुर, झालावाड में कहीं-कहीं मिलती है ।

वर्टी सोइल्स

यह झालावाड, बारां, कोटा, बूंदी में प्रधानता तथा सवाई माधोपुर, भरतपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा में सीमित रूप में मिलती है ।

अल्फी सोइल्स

यह जयपुर, दौसा, अलवर, भरतपुर, सवाई माधोपुर, टोंक, भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़, बांसवाड़ा, राजसमंद, उदयपुर, डूंगरपुर, बूंदी, कोटा, बारां, झालावाड जिलों तक है ।


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Rajasthan ki Mitiya PDF File Details


Name of The Book : *Rajasthan ki Mitiya PDF in Hindi*
Document Format: PDF
Total Pages: 6
PDF Quality: Normal
PDF Size: 1 MB
Book Credit: S. R. Khand

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