Rajasthan ke Pramukh Abhilekh | राजस्थान के अभिलेख

पुरातात्विक स्रोतों में अभिलेख एक महत्वपूर्ण स्रोत माने जाते हैं  क्योकि ये तिथि युक्त एवं समसामयिक होना है जिन अभिलेखों में  शासको  की उपलब्धियों का यशोगान किया होता है उसे प्रशस्ति कहते हैं अभिलेखों के अध्ययन को एपिग्राफी कहा जाता  हैं अभिलेखों में स्तंभ लेख, शिलालेख, गुहालेख इत्यादि आते हैं

भारत में सर्वाधिक प्राचीनतम अभिलेख अशोक मौर्य के हैं शक शासक रुद्रदामन का जूनागढ़ अभिलेख भारत में संस्कृत का प्रथम अभिलेख माना जाता है राजस्थान के अभिलेखों की भाषा संस्कृत एवं राजस्थानी है इनकी शैली गद्य-पद्य है तथा लिपि महाजनी एवं हर्ष कालीन है लेकिन नागरी लिपि को विशेष रूप से प्रयोग में लिया गया है
राजस्थान में 162 शिलालेख प्राप्त हुए है इनका वर्णन ”वार्षिक रिपोर्ट राजपुताना अजमेर “ में प्रकाशित हो चुका है  राजस्थान में पुरातात्विक सर्वेक्षण का कार्य सर्वप्रथम 1871 ई. में  प्रारंभ किया गया था

Rajasthan ke Pramukh Abhilekh - राजस्थान के अभिलेख  

Rajasthan ke Pramukh Abhilekh in hindi
Rajasthan ke Pramukh Abhilekh


नगरी का लेख (200 - 150ईं पू.) - यह एक खंड लेख है जो मूल लेख का दाहिनी भाग है यह लेख डॉ ओझा को नगरी नामक स्थान पर प्राप्त हुआ था ।

घोसुन्डी शिलालेख ( द्वितीय शताब्दी ई पू ) 

  • ये लेख घोसुन्डी गाँव से जो चित्तौड़ से लगभग सात मील दूर है, प्राप्त हुआ था । यह लेख कई शिलाखण्डों में टूटा हुआ है। इसके कुछ टुकड़े ही उपलब्ध हो सके हैं। इसमें एक बड़ा खण्ड उदयपुर संग्रहालय में सुरक्षित है। 
  • घोसुंडी का शिलालेख सर्वप्रथम डॉक्टर डी आर भंडारकर द्वारा पढ़ा गया यह राजस्थान में वैष्णव या भागवत संप्रदाय से संबंधित सर्वाधिक प्राचीन अभिलेख है इस अभिलेख से ज्ञात होता है कि उस समय तक राजस्थान में भागवत धर्म लोकप्रिय हो चुका था इसमें भागवत की पूजा के निमित्त शिला प्राकार बनाए जाने का वर्णन है
  • इस लेख में संकर्षण और वासुदेव के पूजागृह के चारों ओर पत्थर की चारदीवारी बनाने और गजवंश के सर्वतात द्वारा अश्वमेघ यज्ञ करने का उल्लेख है। इस लेख का महत्त्व द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व में भागवत धर्म का प्रचार, संकर्शण तथा वासुदेव की मान्यता और अश्वमेघ यज्ञ के प्रचलन आदि में है।

नांदसा यूप स्तम्भ लेख ( 225 ईं. ) 

  • नांदसा भीलवाडा से 36 मील की दूरी पर एक गाँव है जहाँ एक तड़ाग में एक गोल स्तम्भ है । यह वर्ष के अधिकांश भाग में पानी में डूबा रहता है, केवल गर्मीयों में तडाग का पानी सूखने पर ही इसे पढा जाता है ।
बडवा स्तम्भ लेख ( 227 ईं॰ ) - इनमें त्रिरांत्र यज्ञों का उल्लेख है जिनकों बलवर्धन, सोमदेव तथा बलसिंह नामक तीन भाईयों ने सम्पादन किया था ।
बर्नाला यूप-स्तम्भ लेख ( 238 39 ईं॰ ) - इसके अनुसार कृत संवत 284 में सोहर्न-गोत्रोत्पन्न वर्धन नामक व्यक्ति ने सात यूप स्तम्भों की प्रतिष्ठा का पुण्यार्जन किया ।
बरनाला लेख जयपुर ( 278 ईं ) - इसके अन्त में विष्णु भागवान की वन्दना की गई

बड़ली गांव का शिलालेख (443 ईं.) badli ka shilalekh

  • badli ka shilalekh अजमेर जिले के बड़ली गांव में प्राप्त हुआ है, यह राजस्थान का सबसे प्राचीन शिलालेख है । अजमेर जिले के बड़ली गांव में 443 ईसवी पूर्व का शिलालेख वीर सम्वत 84 और विक्रम सम्वत 368 का है यह अशोक से भी पहले ब्राह्मी लिपि का है। स्थानीय आख्यानो के अनुसार पद्मसेन बरली का समृद्ध राजा था जिसने अजमेर की तलहटी में बीद्मावती नगरी इन्दरकोट बसाया था ।अजमेर जिले में 27 km दूर बङली गाँव  में भिलोत माता मंदिर से स्तंभ के टुकडो से प्राप्त हुआ। राजस्थान तथा ब्राह्मी लिपि का सबसे प्राचीन शिलालेख है
  • यह अभिलेख गौरीशंकर हीराचंद ओझा को भिलोत माता के मंदिर में मिला था यह राजस्थान का सबसे प्राचीन अभिलेख है जो वर्तमान में अजमेर संग्रहालय में सुरक्षित है अजमेर के साथ मद्यामिका[ चित्तोड] में जैन धर्म के प्रसार का उल्लेख।

basantgarh shilalekh

  • बसन्तगढ़ का लेख  - सिरोही जिले के बसंतगढ़ में वि॰सं॰ 682 का लेख मिला, जो राजा वर्मलात के समय का है । इस लेख से ज्ञात होता है कि उस समय में वर्मलात अर्बुद देश का स्वामी था । सामन्त प्रथा पर इस लेख से कुछ प्रकाश पड़ता है ।
सांमोली शिलालेख ( 646 ईं. ) - यह लेख सांमोली गाँव से, जो मेवाड़ के दक्षिण में भोमट तहसील में स्थित है । यह लेख मेवाड के गुहिल राजा शीलादित्य के समय का है ।
अपराजित का शिलालेख ( 661 ईं.) - यह लेख नागदे गाँव के निकटवर्ती कुंडेश्वर के मंदिर में डॉ॰ ओझा को मिला । इस लेख से गुहिल शासकों की उत्तरोत्तर विजर्यों का बोध होता है ।
शंकरघट्टा का लेख ( 713 ईं ) - इस लेख में 17 पंक्तिया हैं । इसके प्रारम्भ में शिव की वंदना की गई है । प्रस्तुत लेख का भाग, जहाँ से राजा मानभंग का वर्णन मिलता है सम्भवत यह मानभंग वही मानमोरी है जिसके शिलालेख का जिक्र कर्नल टाॅड ने किया है

मानमोरी का लेख (manmori abhilekh 713 ईं॰) 

  • Manmori abhilekh चित्तौड़ के पास मानसरोवर झील के तट पर एक स्तम्भ पर लिखा हुआ कर्नल जेम्स टॉड को मिला था । इस शिलालेख को इंग्लैण्ड ले जाते समय जेम्स टॉड ने भारी होने के कारण समुद में फेंक दिया । केवल इस लेख का अनुवाद जेम्स टॉड के पास बचा रहा । जिसको उसने अपनी पुस्तक ' द एनाल्स एण्ड एन्टिक्वीटीज आँफ राजस्थान ' में प्रकाशित किया । इसके अन्त में चार राजाओं का वर्णन मिलता है यथा महेश्वर भीम भोज और मान । इस प्रशस्ति का लेखक नागभट्ट का पुत्र पुष्य और पंक्तियों का उत्कीर्ण करुग का पोत्र शिवादित्य था । इसमे अम्रत मथन का उल्लेख मिलता हैं
  • स्थान- चितोड़गढ़, लेखक- पुष्प,  ख़ोजकर्ता – कर्नल जेम्स टोड, उत्कीर्णकर्ता- शिवादित्य
कणसवा का लेख - कोटा के निकट कणसवा गांव के शिवालय में लगा हुआ यह लेख 795 ईं. का है ।
बुचकला शिलालेख ( 815 ईं ) - इस लेख की खोज ब्रह्मभट्ट नानूराम ने बिलाडा ( जिला जोधपुर ) के निकट बुचकला के पार्वती के मंदिर वाले सभा मण्डप से की थी । यह लेख वत्सराज के पुत्र नागभट्ट प्रतिहार के समय का है ।
मंडोर का शिलालेख ( 837 ईं ) - यह लेख मूलत: मंडोर के किसी बिष्णु मंदिर में लगा था । इस लेख को और दूसरे दो घटियाला के लेखों को पढने से प्रतिहारों के सम्बन्ध में कईं नई जानकारियाँ हमें मिलती हैं । यह प्रशस्ति बाउक ने खुदवाई थी ।

घटियाला के शिलालेख 

  • यह लेख चार -लेखों के समुदाय में घटियाला ( जोधपुर से 20 मील उत्तर-पश्चिम ) स्थित एक स्तम्भ के दो पाश्वों पर उत्कीर्ण है । घटियाला के दो लेख ( 861 ईं. )जोधपुर से 20 मील उत्तर में घटियाला गाँव है, जहाँ दो लेख उपलब्ध हुए है । इन शिलालेखों से पता चलता है कि हरिश्चन्द्र  नामक ब्राह्मण , जिसको रोहिल्लरिद्ध भी कहते थे , वेद तथा शास्त्रो का अच्छा ज्ञाता था । उसकी दो स्त्रियां थी एक ब्राह्मण वंश से तथा दूसरी क्षत्रिय कुल से ।

सरणेश्वर (सांडनाथ) प्रशस्ति (953 ईं.) 

  • यह उदयपुर के  शमशान में स्थित सारणेश्वर महादेव के मंदिर में स्थित सभामंडप मे मिली थी । इस प्रशस्ति से वराह मंदिर की व्यवस्था, स्थानीय व्यापार, कर, शासकीय पदाधिकारियों आदि के विषय में पता चलता है।  गोपीनाथ शर्मा की मान्यता है कि मूलतः यह प्रशस्ति उदयपुर के आहड़ गाँव के किसी वराह मंदिर में लगी होगी। बाद में इसे वहाँ से हटाकर वर्तमान सारणेश्वर मंदिर के निर्माण के समय में सभा मंडप के छबने के काम में ले ली हो।
ओसियां का लेख ( 956 ई॰ ) - यह लेख 22 संस्कृत पद्यो में है जिसके जगह-जगह अक्षर खण्डित हो गये है । इसमें मानसिंह भूमि का स्वामी और वत्सराज को रिपुओं का दमन करने वाला कहा गया है । जिसे सूत्रधार पदाजा द्वारा उत्कीर्ण किया गया उल्लिखित है ।
नाथ प्रशस्ति-एकलिंगजी ( 971 ईं. ) - यह एकलिंगजी के मंदिर से कुछ ऊँचे स्थान पर लकुलीश के मंदिर में लगा हुआ शिलालेख है जिसे नाथ-प्रशस्ति भी कहते है ।
हर्षनाथ के मंदिर की प्रशस्ति ( 973 ईं॰ ) - यह प्रशस्ति शेखावटी के प्रसिद्ध हर्षनाथ के मंदिर की है । यह प्रशस्ति साँभर के चौहान राजा विग्रहराज के समय की है । इससे चौहानों के वंशक्रम तथा उनकी उपलब्धियों पर प्रकाश पड़ता है ।
हरितकुपडी शिलालेख ( 996 ईं ) - यह लेख माउंट आबू जाने वाले उदयपुर-सिरोही मार्ग पर कैप्टन बस्ट को मिला था । इस प्रशस्ति के रचयिता सूर्याचार्यं है ।

चित्तौड़ का कुमारपाल का शिलालेख ( 1150 ईं. ) 

  • प्रस्तुत लेख कुमारपाल सोलंकी के समय का चित्तौड़ के समिधेश्वर के मंदिर में लगा हुआ है । चालुक्य वंश का यशोगान किया गया है । इसके अनन्तर मूलराज और सिद्धरांज का वर्णन आता है । कुमारपाल के वर्णन में इसमें शाकंभरी विजय का उल्लेख आता है । प्रशस्ति का रचयिता जयकीर्ति का शिष्य रामकीर्ति था । यह उस समय का दिगम्बर विद्वान था । 

बिजौलिया का लेख ( 1170 ईं॰ ) bijoliya abhilekh

  • बिजोलिया के पाश्वर्नाथ जैन मंदिर के पास एक चट्टान पर उत्कीर्ण  1170 ई. के इस शिलालेख को जैन श्रावक लोलाक द्वारा मंदिर के निर्माण की स्मृति में बनवाया गया था  इसका प्रशस्ति कार गुण भद्र था यह लेख बिजौलिया के पार्श्वनाथ मंदिर की उत्तरी दीवार के पास एक चट्टान पर उत्कीर्ण है । यह लेख मूलत: दिगम्बर लेख है । जिसको दिगम्बर जैन श्रावक लोलाक ने पार्श्वनाथ के मंदिर और कुण्ड के निर्माण की स्मृति में लगाया जाता था । इसमें साँभर और अजमेर के चौहान वंश की सूची तथा उनकी उपलब्धियों की अच्छी जानकारी मिलती है । इन शासकों को वत्सगोत्र के ब्राह्मण कहा गया है ।

एकलिंगजी में एक स्मारक शिलालेख ( 1213 ईं. ) 

  • यह लेख एकलिंगजी के मंदिर के चौक में नंदी के निकट वाली एक स्मारक शिला पर उत्कीर्ण है जिसमें जैत्र सिंह को महाराजाधिराज कहा है उसका समय संवत् 1270 दिया हुआ है ।
लूणवसही ( आबू-देलवाड़ा ) की प्रशस्ति ( 1230 ईं. ) - यह प्रशस्ति पोरवाड़ जातीय शाह वस्तुपाल तेजपाल द्वारा बनवाये हुए आबू के देलवाड़ा गांव के लूणवशाही के मंदिर की संवत् 1287 फाल्गुन कृष्णा 3 रविवार की है । इसकी भाषा संस्कृत है और इसे गद्य में लिखा गया है । इसमें आबू के परमार शासकों तथा वस्तुपाल तेजपाल के वंश का वर्णन है ।
नेमिनाथ ( आबू ) के मंदिर की प्रशस्ति ( 1230 ईं॰ ) - यह प्रशस्ति वि.सं. 1287 श्रावण कृष्णा 3 रविवार की है जिसमें 74 श्लोक हैं । इसको तेजपाल के द्वारा बनवाये गये आबू पर देलवाडा गाँव के नेमिनाथ के मंदिर में लगाई गई थी ।
चितौड़ का लेखा (1266 ईं. ) - यह लेख चित्तौड़ से प्राप्त हुआ है जो तेजसिंह के समय का है । इस लेख में सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इसके द्वारा हमें तेजसिंह के महामात्य समुद्धर की सूचना मिलती हैं ।
गंभीरी नदी के पुल का लेख ( 1267 ईं. ) - चित्तौड़ के निकट वाली गंभीरी नदी का पुल ऐसा मालूम होता है कि चित्तौड़ के आस-पास के कई भवनों और मंदिरों के अवशेषों से, जो तुर्की आक्रमण के कारण नष्ट हो गये थे । खिज्र खाँ ने बनवाया था ।
बीठू का लेख ( 1273 ईं. ) - पाली से चौदह मील उत्तर-पश्चिम में बीठू गाँव के पास वि.सं. 1330 (ई.सं. 1273, ता. 9 अक्टूबर) सोमवार का लेख प्राप्त हुआ है, इससे प्रमाणित होता है कि सीहा सैतकुँवर का पुत्र था और वह उक्त तिथि को देवलोक सिधारा ।

चीरवा का शिलालेख ( 1273 ईं. )  

  • यह शिलालेख चीरवा गाँव के , उदयपुर से 8 मील उत्तर में एक नये मंदिर के बाहरी द्वारा पर लगा हुआ है । जिसमें 51 श्लोक है । इसमें गुहिलवंशीय बापा के वंशधर पद्यसिंह, जैत्रसिह, तेजसिंह और समरसिंह की उपलब्धियाँ का वर्णन है । 
  • भुवनसिंहसूरि के शिष्य रत्नप्रभसूरी ने चित्तौड़ में रहते हुए चीरवा शिलालेख की रचना की और उनके मुख्य शिष्य पार्श्वचन्द ने, जो बड़े विद्वान थे, उसको सुन्दर लिपि में लिखा । पद्यसिंह के पुत्र केलिसिंह ने उसे खोदा और शिल्पी देल्हण ने उसे दीवार में लगाने आदि कार्य का सम्पादन किया ।
रसिया की छतरी का शिलालेख (1274 ईं.) - यह लेख 61 श्लोको में चित्तौड़गढ मे स्थित रसिया की छतरी में लगा हुआ मिला है । यह लेख वेद शर्मा द्वारा रचा गया है । इसके उत्कीर्णकर्ता सज्जन है ।
अचलेश्वर लेख ( 1285 ईं. ) - यह लेख अचलेश्वर (आबू) के मंदिर के पास वाले मठ के एक चौपाल की दीवार में लगाया गया था । इसमें बापा से लेकर समरसिंह के काल की वंशावली दी गई है । इस प्रशस्ति का रचयिता प्रियपटु का पुत्र वेद शर्मा नागर था इसका लेखक शुभचन्द और उत्कीर्णकर्ता कर्मसिंह सूत्रधार था ।
चित्तौड़ के जैन कीर्तिस्तम्भ के तीन लेख ( 13 वीं सदी ) - चित्तौड़ का जैन कीर्तिस्तम्भ 13 वीं सदी में जीजाक के द्वारा बनवाया गया था ।
माचेडी की बावली का लेख ( 1382 ईं.) - माचेडी ( अलवर) की बावली वाले शिलालेख में बड़ गुजर शब्द का प्रयोग पहली बार प्रयुक्त हुआ है । इस बावड़ी का निर्माण खंडेलवाल महाजन कुटुम्ब ने करवाया था ।
समाधीश्वर मंदिर का शिलालेख ( 1428 ईं॰ ) - यह लेख चित्तौड़ के समाधीश्वर मंदिर के सभामण्डप की पूर्वी दीवार में संगमूसा पत्थर पर 53 पंक्तियों में उत्कीर्ण है ।
श्रृंगी ऋषि शिलालेख ( 1428 ईं ) - प्रस्तुत लेख एकलिंगजी से अनुमानत: 6 मील दक्षिण-पूर्व में श्रृंगी ऋषि नामक स्थान पर तिबारे में लगा हुआ है ।

राणकपुर प्रशस्ति ( 1439 ईं ) 

  • प्रस्तुत प्रशस्ति राणकपुर के चौमुखा मंदिर के बाएँ स्तम्भ में लगे हुए । इस प्रशस्ति का ऐतिहासिक महत्त्व है । इसके द्वारा हमें मेवाड के राजवंश का धरणा श्रेष्ठि वंश का तथा उसके शिल्पी का परिचय मिलता है । इसका प्रशस्तिकार देपाक था इसमें बप्पा एवं कालभोज को अलग-अलग व्यक्ति बताया है इसमें महाराणा कुंभा की वीजीयो एवं उपाधियों का वर्णन है इसमें गुहीलो को बप्पा रावल का पुत्र बताया है
कोडमदे-सर का लेख ( 1459 ईं॰ ) - यह लेख कोडमदेसर ( जोधपुर ) नामी तालाब के तट पर स्थापित कीर्तिस्तम्भ पर अंकित है ।

कीर्तिस्तम्भ प्रशस्ति ( 1460 ईं. ) 

  • इसका प्रशस्ति कार महेश भट्ट था प्रस्तुत प्रशस्ति चित्तौड़ के कीर्तिस्तम्भ की कई शिलाओं का सामूहिक नाम है । अब केवल दो ही शिलाएँ अवशेष है । इसमें बपा तथा हम्मीर का वर्णन मिलता है । यह राणा कुंभा की प्रशस्ति है इसमें बप्पा से लेकर राणा कुंभा तक की वंशावली का वर्णन हैb इसमें कुंभा की उपलब्धियों एवं उसके द्वारा रचित ग्रंथों का वर्णन मिलता है प्रशस्ति में चंडी शतक, गीत गोविंद की टीका संगीत राज आदि ग्रंथों का उल्लेख हुआ है
  • इस प्रशस्ति में कुंभा को महाराजाधिराज अभिनव, भरताचार्य, हिंदुस्तान सुरतान, राय रायन, राणो, रासो छाप, गुरु दान गुरु, राजगुरु और सेल गुरु उपाधियों से पुकारा गया है कुंभा ने मालवा और गुजरात की सेना को हराने के बाद इस विजय के उपलक्ष में चित्तौड़ ने विजय स्तंभ का निर्माण करवाया विजय स्तंभ की पांचवी मंजिल पर उत्कीर्ण है
  • उत्कीर्णकर्त्ता- जेता, पौमा, नापा, पूँजा, जइता।
  • महाराणा कुंभा की उपलब्धियां तथा युद्धों का वर्णन।।
  • 179वें श्लोक में गुजरात में मालवा की सम्मिलित सेना को पराजित करने का साक्ष्य।

कुम्भलगढ़ की प्रशस्ति ( 1460 ईं. ) 

  • यह प्रशस्ति कुंभलगढ़ से लाकर उदयपुर संग्रहालय में सुरक्षित रखी हुई है । इसमें मेदपाट तथा चितौड़ का वर्णन दिया गया है जिससे हमें उस समय की मेवाड की भौगोलिक, सामाजिक, धार्मिक ओंर सांस्कृतिक स्थिति का पता चलता है ।
यह शिलालेख कुम्भलगढ़ दुर्ग में सिथत कुंभश्याम के मंदिर ( इसे वर्तमान में मामदेव का मन्दिर कहते हैं) में मिला है, इसकी निम्न विशेषतायें हैं-
  1. इसमे गुहिल वंश का वर्णन हैं!
  2. यह मेवाड़ के महाराणाओं की वंशावली रूप से जानने का महत्वपूर्ण साधन हैं!
  3. यह राजस्थान का एकमात्र अभिलेख हैं जो महाराणा कुंभा के लेखन पर प्रकाश डालता हैं!
  4. इस लेख में हम्मीर को विषम घाटी पंचानन कहा गया हैं!
  • यह मेवाड़ के महाराणाओं की वंशावली को विशुद्ध रूप से जानने के लिए बड़ा महत्वपूर्ण है। इसमें कुल 5 शिलालेखों का वर्णन मिलता है इस शिलालेख में 2709 श्लोक हैं। दासता, आश्रम व्यवस्था, यज्ञ, तपस्या, शिक्षा आदि अनेक विषयों का उल्लेख इस शिलालेख में मिलता है।
  • इस लेख का रचयिता डॉक्टर ओझा के अनुसार महेश होना चाहिए। क्योंकि इस लेख के कई साक्ष्य चित्तौड़ की प्रशस्ति से मिलते हैं।
घोसुन्डी की बावड़ी का लेख ( 1504 ईं. ) - इसमें कुल 25 श्लोक है । प्रस्तुत प्रशस्ति में महाराणा रायमल की रानी श्रृंगारदेवी के, जो मारवाड़ के राजा जोधा ( रावजोधा ) की पुत्री थी, द्वारा उक्त बावड़ी के बनवाये जाने का उल्लेख हैं । इस प्रशस्ति का रचयिता महेश्वर नामक कवि था ।
हीराबाडी (जोधपुर) का लेख ( 1540 ई. ) - यह लेख राव मालदेव के समय का है । ऐसी प्रसिद्धि है कि जब रावजी की सेना ने नागौर विजय के उपरान्त इधर-उधर गाँवों को लूटना आरम्भ किया, इस समय सेनापति जेता का मुकाम हीरावाडी नामक स्थान पर था । उसके प्रभाव के कारण वहाँ शान्ति बनी रही ।

बीकानेर की प्रशस्ति ( 1594 ईं. ) 

  • यह प्रशस्ति बीकानेर दुर्ग के द्वार के एक पार्श्व में लगी हुई है जो महाराजा रायसिंह के समय की है । इसकी भाषा संस्कृत है । प्रशस्ति से ज्ञात होता है कि वि.सं. 1645 फाल्गुन कृष्णा 9 (इं .सं॰ 1589 तारीख जनवरी) बृहस्पतिवार को बीकानेर के वर्तमान किले के निर्माण का कार्य आरम्भ किया और विं.सं. 1650 माघ शुक्ला 6 (ईं.सं. 1594 तारीख 17 जनवरी) बृहस्पतिवार को गढ सम्पूर्ण हुआ । यह काम मंत्री कर्मचन्द के निरीक्षण में सम्पन्न हुआ था । इसमें 60वीं पंक्ति से रायसिंह के कार्यो का उल्लेख आरम्भ होता है ।

आमेर का शिलालेख ( 1612 ईं. ) 

  • इसमें जहाँगीर के राज्य की दुहाई दी गई है जिससे आमेर और मुगल राज्य की निकटता का बोध होता है । इसमें कछवाहा वंश को 'रघुवंश तिलक ' कहकर सम्बोधित किया गया है तथा इसमे पृथ्वीराज, उसके पुत्र राजा भारमल, उसके पुत्र भगवतंदास और उसके पुत्र महाराजाधिराज मानसिंह के नाम क्रम से दिये है । इस लेख से स्पष्ट है कि मानसिंह भगवंतदास का पुत्र था ।
जगन्नाथराय प्रशस्ति ( 1652 ईं. ) - यह प्रशस्ति उदयपुर के जगन्नाथ के मंदिर के सभामण्डप में दोनों तरफ श्याम पत्थर पर उत्कीर्ण है ।

राज प्रशस्ति ( 1676 ईं॰ ) 

  • राज प्रशस्ति कुल 25 श्याम रंग के पाषाणों पर उत्कीर्ण है । ये पाषाण पट्टिकाएँ नौ चौकी की पाल में लगी हुई है । इसको महाकाव्य की संज्ञा दी गई हैं । इस प्रशस्ति का रचयिता रणछोड़ भट्ट था जो तैलंग ब्राह्मण था । इस प्रशस्ति से पता चलता है कि राजसमुद्र का निर्माण दुष्काल के समय श्रमिकों के लिए काम निकालने के लिए कराया गया था और उसे बनाने में पूरे 14 वर्ष लगे थे  प्रशस्ति के उत्कीर्णकर्ता गजधर मुकुंद, अर्जुन, सुखदेव , केशव, सुन्दर, लालो, लखो आदि थे जिन्होंने सुन्दर और शुद्ध रूप में उसे तैयार किया था ।
वैद्यनाथ मंदिर की प्रशस्ति ( 1719 ईं॰ ) - यह प्रशस्ति उदयपुर के पिछोला झील के पश्चिमी तट पर बसे हुए सिसारमा गाँव के वैद्यनाथ महादेव के मंदिर में लगी हुईं है इस प्रशस्ति का लेखक रूप भट्ट तथा लिपिकार गोवर्द्धन का पुत्र रूपजी था ।

विराट नगर अभिलेख (जयपुर)

rajasthan mein ashok ke abhilekh - अशोक के अभिलेख मौर्य सम्राट अशोक के 2 अभिलेख विराट की पहाड़ी पर मिले थे
  1. भाब्रू अभिलेख
  2. बैराठ शिलालेख
  • जयपुर में सिथत विराट नगर की बीजक पहाड़ी पर यह शिलालेख उत्कीर्ण हैं! यह शिलालेख पाली व बाह्मी लिपि में लिखा हुआ था!

bhabru shilalekh ki khoj

  •  इस शिलालेख को कालांतर में 1840 ई. में बिर्टिश सेनादिकारी कैप्टन बर्ट दारा कटवा कर कलकत्ता के सग्रहालय में रखवा दिया गया इस अभिलेख में सम्राट अशोक द्वारा बौद्ध धर्म एवं संघ में आस्था प्रकट की गई है इस अभिलेख से अशोक के बुद्ध धर्म का अनुयायी होना सिद्ध होता है इसे मौर्य सम्राट अशोक ने स्वयं उत्कीर्ण करवाया था! चीनी यात्री हेनसांग ने भी इस स्थाल का वर्णन किया है

फारसी शिलालेख 

  • भारत में मुस्लिम राज्य की स्थापना के पश्चात् फारसी भाषा के लेख भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होते हैं। ये लेख मस्जिदों, दरगाहों, कब्रों, सरायों, तालाबों के घाटों, पत्थर आदि पर उत्कीर्ण करके लगाए गए थे। राजस्थान के मध्यकालीन इतिहास के निर्माण में इन लेखों से महत्त्वपूर्ण सहायता मिलती है। इनके माध्यम से हम राजपूत शासकों और दिल्ली के सुलतान तथा मुगल शासकों के मध्य लड़े गए युद्धों, राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों पर समय-समय पर होने वाले मुस्लिम आक्रमण, राजनीतिक संबंधों आदि का मूल्यांकन कर सकते हैं।
  • इस प्रकार के लेख सांभर, नागौर, मेड़ता, जालौर, सांचोर, जयपुर, अलवर, टोंक, कोटा आदि क्षेत्रों में अधिक पाए गए हैं। फारसी भाषा में लिखा सबसे पुराना लेख अजमेर के ढ़ाई दिन के झोंपड़े के गुम्बज की दीवार के पीछे लगा हुआ मिला है। यह लेख 1200 ई. का है और इसमें उन व्यक्तियों के नामों का उल्लेख है जिनके निर्देशन में संस्कृत पाठशाला तोड़कर मस्जिद का निर्माण करवाया गया।
  • चित्तौड़ की गैबी पीर की दरगाह से 1325 ई. का फारसी लेख मिला है जिससे ज्ञात होता है कि अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ का नाम खिज्राबाद कर दिया था।
  • जालौर और नागौर से जो फारसी लेख में मिले हैं, उनसे इस क्षेत्र पर लम्बे समय तक मुस्लिम प्रभुत्व की जानकारी मिलती है।
  • पुष्कर के जहाँगीर महल के लेख (1615 ई.) से राणा अमरसिंह पर जहाँगीर की विजय की जानकारी मिलती है। इस घटना की पुष्टि 1637 ई. के शाहजहानी मस्जिद, अजमेर के लेख से भी होती है।
नोट-अजमेर शिलालेख राजस्थान में फ़ारसी भाषा का सबसे प्राचीन अभिलेख हैं

Rajasthan Abhilekh Important Facts in Hindi

  • राणा कुंभा की पुत्री रमाबाई को जावर के शिलालेख में वागीश्वरी कहा गया है, क्योंकि रमाबाई एक विदुषी महिला थी, यह शिलालेख उदयपुर के समीप जावर नामक स्थान से मिला है , जावर का प्राचीन नाम जोगिनी पटनम था 
  • सिरोही के बसंतगढ़ शिलालेख में सर्वप्रथम राजस्थान को राजस्थानी आदित्य के नाम से उल्लेखित किया गया है
  • कर्णसंवा के शिलालेख से एक मौर्य वंश के शासक राजा धवल का उल्लेख मिलता है, इस शिलालेख के अलावा अन्य किसी भी शिलालेख में यह जानकारी नहीं मिलती है, यह शिलालेख कोटा के पास कारणवश कर्ण संवा नामक गांव से मिला था 
  • उदयपुर के एकलिंगजी मंदिर से प्राप्त नाथ प्रशस्ति  में पशुपति संप्रदाय की जानकारी मिलती है, पशुपति संप्रदाय के संस्थापक लकुलीश थे ।
  • बैराठ (जयपुर )से प्राप्त भाब्रू के शिलालेख में मौर्य शासक सम्राट अशोक की जानकारी मिलती है, इसमें अशोक को बौद्ध होना बताया गया है.।
  • अचलेश्वर का लेख व तेज मंदिर लेख से राजपूतों को चन्द्रमावंसी बताया गया है, अचलेश्वर शिलालेख में बप्पा रावल से समर सिंह के इतिहास की जानकारी मिलती है
  • चीरवा का लेख चिरवा घाटी के समीप चीरवा गांव से प्राप्त हुआ है, वर्तमान में उदयपुर में स्थित है, बप्पा रावल से समर सिंह तक का वर्णन  ग्रामीण व्यवस्था एवं सती प्रथा का वर्णन
  • खजूरी गांव के अभिलेख में बूंदी का नाम वृंदावंती मिलता
  •  है बूंदी के हाडा शासकों की जानकारी
  • बरनाला का अभिलेख जयपुर से प्राप्त हुआ 227 ई भाषा संस्कृत में वर्तमान में आमेर के संग्रहालय में संग्रहित है
  • घटियाला के शिलालेख जोधपुर के समीप गडियाला गांव से मिलता है; प्रतिहार राजा कुक्कुट राजा को न्यायप्रियता वीरता राजनीतिक स्थिति का वर्णन इस शिलालेख में भवन बाजार का सुव्यवस्थित निर्माण एवं सिक्कों की जानकारी
  • इस लेख में नागभट्ट शासक को एक प्रतापी शासक बताया गया है गुर्जर प्रतिहारों की उपलब्धियों का वर्णन

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