Tuesday, 9 July 2019

Rajasthan ke Lok Nritya - Part 4 | कथौडी जाति or गुर्जरों के नृत्य

कथौडी जाति के नृत्य


rajasthani folk dance information in hindi

मावलिया नृत्य

  • मावलिया नृत्य नवरात्रा मे नौ दिनो तक 10-12 पुरुषो द्वारा किया जाता है ।
  • यह नृत्य ढोलक, बाँसुरी की लय पर देवी-देवताओं के गीत गाते हुए किया जाता है।
  • कथौडी जाति के लोग इसमें समूह बनाकर 'गोल-गोल नृत्य करते है ।

होलो नृत्य

  • यह नृत्य होली के अवसर पर महिलाओं द्वारा किया जाने वाला प्रमुख नृत्य है ।
  • होली के अवसर पर यह नृत्य लगातार 7 दिनों तक चलता है । 
  • होली नृत्य में पुरुष ढोलक पावरी बाँसुरी आदि बजाते है । होली नृत्य में महिलाएं नृत्य के दौरान एक दूसरे के कंधे पर चढ़कर पिरामिड भी बनाती है ।
  • कचौडी जनजाति मूलत: महाराष्ट्र से आकर राजस्थान में उदयपुर की झाडोल व कोटड़ा तहसीलों में बसी हुई है ।
  • यह जाति कैर वृक्ष से कत्था तैयार करती है, इसलिए इस जाति का नाम कैथोडी है ।

गुर्जरों के नृत्य 

चरी नृत्य


  • चरी नृत्य गुर्जर जाति का प्रसिद्ध नृत्य है । 
  • इस नृत्य में स्त्रियाँ सिर पर कलश व उसमें काकड़े (कपास) के बीज में तेल डालकर आग लगाती है। इस कलश से आग की लपटें निकलने लगती है ।
  • स्त्रियाँ लपट निकलते कलश को सिर पर रखकर हाथ की कलाइयों को घूम-घूम कर नृत्य करती है । 
  • चरी नृत्य मे ढोलक, ढोल बाँकिया आदि वाद्य यंत्रों का प्रयोग किया जाता है।
  • चरी नृत्य मुख्य रूप से किशनगढ (अजमेर) का है ।
  • यह नृत्य गणगौर, जन्म, विवाह आदि अवसरों पर किया जाता है ।
  • चरी नृत्य अब व्यावसायिक रूप ग्रहण कर चुका है ।
  • किशनगढ़ की फलकूबाई चरी नृत्य की लोकप्रिय कलाकार है । वर्तमान में श्री मोहन सिंह गौड़ व कुमारी सुनीता रावत इसके प्रमुख कलाकार है ।
  • चरी नृत्य अतिथि सत्कार के लिए भी किया जाता है ।
  • यह नृत्य मांगलिक अवसरों पर किया जाता है, जिसें गुर्जर जाति पवित्र मानती है ।
  • चरी नृत्य में स्त्रियाँ सात चरियां (पीतल के घडे) रखकर नृत्य करती है ।

झूमर नृत्य 

  • गुर्जर और अहीर जाति में यह नृत्य आज भी जीवित है ।
  • झूमर नृत्य पुरुषों का वीर रस प्रधान नृत्य है ।
  • यह नृत्य धार्मिक मेलों आदि के अवसरों पर किया जाता है ।
  • यह नृत्य कोटा-बूंदी में मुख्य रूप से स्त्रियों द्वारा सामाजिक पर्वो व त्यौहारों पर किया जाता है ।
  • इसमें झूमरा नामक वाद्य यंत्र का प्रयोग होने के कारण इसे झूमर नृत्य कहा जाता है ।

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