Raj GK Rajasthan Itihas ke Pramukh Strot

नमस्कार दोस्तों Raj GK में आपका स्वागत हैं आज हम राजस्थान के इतिहास ( history of rajasthan )  के प्रमुख स्त्रोत के बारे में जानकारी हासिल करें इस पोस्ट में Step by Step राजस्थान के इतिहास के प्रमुख स्त्रोत ( Rajasthan Itihas ke Pramukh Strot ) के बारे में महत्वपूर्ण नोट्स आसान शब्दों में दिए गए हैं

राजस्थान इतिहास के प्रमुख स्त्रोत - Raj GK

Raj GK Rajasthan Itihas ke Pramukh Strot
Raj GK Rajasthan Itihas ke Pramukh Strot

बिजौलिया शिलालेख ( Raj GK )

  • 1170 ईं. का यह शिलालेख जेन श्रावक लोलक द्वारा बिजौलिया के पार्श्वनाथ मंदिर के पास एक चट्टान पर उल्कीर्ण करवाया गया ।
  • इस शिलालेख का रचयिता गुणभद्ग था ।
  • इसमें सांभर व अजमेर चौहानों को चट्टान वत्स गोत्र ब्राह्मण बताते हुए वंशावली दी गई ।

मानमोरी का शिलालेख  ( Raj GK )

  • इस शिलालेख में अमृत मंथन का उल्लेख है ।
  • यह मान सरोवर झील ( चित्तौड़गढ़ ) के तट पर एक स्तम्भ पर उत्कीर्ण था
  • कॉल जेम्स टॉड ने इंग्लैण्ड जाते समय इसे समुद्र में फेंक दिया था ।

सांमोली शिलालेख ( Raj GK )

  • यह अभिलेख 646 ईं के गुहिल शासक शिलादित्य के समय का है ।
  • सांमोली ( भोमट उदयपुर) लेख में मेवाड के गुहिल वंश के बारे में जानकारी मिलती है ।

कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति Raj GK 

  • इस प्रशस्ति मे गुहिल वंश के बप्पा रावल से लेकर कुम्भा तक की विस्तृत जीवनी का वर्णन है ।
  • यह चित्तौड़गढ़ के किले में उत्कीर्ण है ।
  • इसमें कुम्भा को विजयो तथा उसके प्रशस्तिकार महेश भट्ट का भी वर्णन है ।
  • इस प्रशस्ति को दिसम्बर 1460 में कुम्भा के समय उत्कीर्ण करवाया गया ।

 राज प्रशस्ति

  • 1676 ईं में महाराजा राजसिंह द्वारा राजसमन्द झील की नौ चौकी को माल पर 25 काले पत्थरों पर संस्कृत में उत्कीर्ण करवाईं गई ।
  • इसमें राजसिंह का विस्तार पूर्वक वर्णन अमरसिंह द्वारा मुगलों से की गई । संधि का उल्लेख तथा बप्पा रावल से लेकर राजसिंह की उपलब्धियों का वर्णन है ।
  • यह संसार का सबसे बढा  शिलालेख है ।

श्रृंगी ऋषि का लेख

  • यह लेख राणा मोकल के समय का है ।
  • एकलिंगजी से कुछ दूरी पर श्रृंगी ऋषि नामक स्थान पर स्थित है ।
  • इसमें मोकल द्वारा कुण्ड बनाने और उसके वंश का वर्णन है ।

रणकपुर प्रशस्ति

  • इसमें मेवाड के राजवंश धरणक सेठ के वंश एवं उसके शिल्पी का परिचय दिया गया है ।
  • इसमें कुम्भा की विजयी का वर्णन हैं तथा बप्पा एवं कालभोज को अलगअलग बताया गया है ।
  • इसे 1439 ईं में रणकपुर के चौमुखा मंदिर पर उत्कीर्ण करवाया गया ।

घोसुण्डी शिलालेख

  • यह शिलालेख नगर ( चित्तौड़गढ़ ) के निकट घोसुण्डी गाँव में प्राप्त हुआ ।
  • इस शिलालेख मे गज वंश के सर्वतात द्वारा अश्वमेध यज्ञ करने का वर्णन मिलता है ।

सच्चिया माता की प्रशस्ति

  • सच्चिया माता का मंदिर ओसिया (जोधपुर) में है ।
  • इस शिलालेख पर कल्हण एवं कीर्तिपाल का वर्णन है ।

डूंगरपुर की प्रशस्ति

  • उपरगाँव (डूंगरपुर) में इसे 1404 ईं में संस्कृत भाषा में उत्कीर्ण करवाया गया ।
  • इसमें वागड के राजवंशों के इतिहास का वर्णन है ।

कुंम्भलगढ़ प्रशस्ति / शिलालेख

  • 1460 ईं के मास कुम्भलगढ़ में प्राप्त हुआ ।
  • यह प्रशस्ति कुम्भ श्याम मंदिर (कुंम्भलगढ़) में लगाई हुई है ।
  • यह 5 शिलाओं में उत्कीर्ण है ।
  • कुंम्भश्याम मंदिर को अब मामदेव मंदिर के नाम से जाना जाता है ।
  • इसमें गुहिलवंश का विवरण तथा महाराणा कुम्भा को उपलब्धियों का वर्णन मिलता है ।

हर्षनाथ की प्रशस्ति

  • इसमें हर्षनाथ (सीकर) मंदिर का निर्माण अल्लट द्वारा करवाये जाने का उल्लेख है ।
  • यह प्रशस्ति 973 ईं की है । इसमें चौहानों का वंशक्रम दिया हुआ है ।

अपराजिता का शिलालेख

  • 661 ईं में यह नागदा गाँव के कुंडेश्वर मंदिर में मिला ।
  • इसमें गुहिल शासक अपराजिता की विजयो एवं प्रताप का वर्णन हे ।

नगरी का शिलालेख

  • यह शिलालेख डाँ. भंडारकर को नगरी में प्राप्त हुआ ।
  • इसमें नागरी लिपि में संस्कृत भाषा में 424 ईं में विष्णु पूजा का उल्लेख हैं ।

मण्डोर का शिलालेख

  • मण्डोर (जोधपुर) की बावडी पर लिखा यह शिलालेख 685 ईं के आसपास मिला ।
  • इसमें विष्णु एवं शिव की पूजा पर प्रकाश पड़ता है ।

नांदसा यूप स्तम्भ लेख

  • इस स्तम्भ लेख की स्थापना सोग ने की ।
  • 225 ई. का यह लेख भीलवाडा के निकट नांदसा स्थान पर एक सरोवर में प्राप्त गोल स्तम्भ पर उत्कीर्ण है ।

कणसवा का लेख

  • यह 738 ई. का शिलालेख कोटा के निकट मिला है ।
  • इसमें धवल नामक मौर्यवंशी राजा का उल्लेख हैं ।

चाकसू की प्रशस्ति

  • 813 ई. का यह शिलालेख चाकसू ( जयपुर ) में मिला हैं ।
  • इसमें गुहिल वंशीय राजाओं की वंशावली दी गई है ।

चित्तौड़गढ़ का शिलालेख

  • 1278 ई. के इस लेख में उस समय के गुहिल शासकों की धार्मिक सहिष्णुता की नीति की बताया गया है ।

जैन कीर्ति स्तम्भ का लेख

  • यह शिलालेख 13वीं सदी का है ।
  • चित्तौड़गढ़ के जैन कीर्ति स्तंभ में उत्कीर्ण तीन अभिलेखों का स्थापन करता जीजा था ।
  • इसमें जीजा के वंश तथा मंदिर का उल्लेख मिलता हैं ।

नाथ प्रशस्ति

  • इस प्रशस्ति में नागदा नगर एवं बप्पा, गुहिल तथा नरवाहन राजाओं का वर्णन है ।
  • 971 ई. का यह लेख लकुलिश मंदिर से प्राप्त हुआ है ।

बीकानेर दुर्ग की प्रशस्ति

  • इस प्रशस्ति का रचयिता जइता नामक जैन मुनि है ।
  • इस प्रशस्ति में चीका से लेकर राव रायसिंह तक के शासकों की उपलब्धियों एव विजयी का वर्णन है ।
  • रायसिंह के समय से यह बीकानेर के दुर्ग के मुख्य द्वार पर स्थित है ।

सिवाणा का लेख 

  • 1537 ईं में प्राप्त इस लेख में राव मालदेव (जोधपुर) की सिवाना विजय का उल्लेख है ।

किरांडू का लेख

  • किरांडू (बाडमेर) में प्राप्त इस शिलालेख में परमारों को उत्पस्ति ऋषि वशिष्ठ के आबू यज्ञ से बताईं है । 

चीरवा का शिलालेख 1273 ईं (उदयपुर)

  • यह चीरवा गाँव में एक नये मंदिर के बाहरी द्वार पर लगा हुआ है ।
  • इसमें 36 पंक्तियों में 51 श्लोक नागरी लिपि में लिखा है ।
  • इस लेख में गुहिल वंशीय बप्पा के वंशधर पदम सिंह जैत्र सिंह, तेज सिंह और समर सिंह की उपलब्धियों का उल्लेख हैं।
  • इसमें पर्वतीय भागों के गाँव बसाने तथा मंदिरों, वृक्षावल्ली और घाटियों का उल्लेख किया गया ।
  • इसमें एकलिंगजी के अधिष्ठत्ता पाशुपत योगियों के अग्रणी शिवराशि का भी वर्णन मिलता है ।
  • इस को रतन भसूरि ने चितोड़ में रहते हुए रचना की तथा पार्श्वचंद ने इसे लिखा था ।
  • कैलिसिंह ने इसे खोदा था ।
  • इस लेख का उपयोग 13र्वी सदी की राजनीतिक आर्थिक, सामाजिक तथा धार्मिक स्थिति की जानकारी के लिए किया जाता है ।
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