वन एवं वन्य जीव - van aur vanyajiv sansadhan

वन एवं वन्य जीव - राजस्थान वन विभाग की स्थापना सन् 1950 में की गई थी। भारत की नई वन नीति, 1988 में एवं राजस्थान सरकार द्वारा 18 फरवरी, 2010 को नई राज्य वन नीति की घोषणा की गई। इसके साथ ही राजस्थान वन एवं पर्यावरण नीति घोषित करने वाला देश का पहला राज्य बना।

राजस्थान में स्वतंत्रता पूर्व सर्वप्रथम "वन संरक्षण की योजना" (पेड़ों की कटाई पर सर्वप्रथम प्रतिबन्ध) 1910 में जोधपुर रियासत में, "शिकार एक्ट" (शिकार पर सर्वप्रथम प्रतिबन्ध) 1901 में टोंक रियासत में (1986 से राज्य में शिकार पर पूर्ण प्रतिबंध है) और "वन अधिनियम" 1935 में अलवर रियासत में बनाया गया। 

वन एवं वन्य जीव

वन एवं वन्य जीव
 वन एवं वन्य जीव


राजस्थान में सर्वप्रथम स्वतंत्रता के पश्चात 1953 में "वन अधिनियम" पारित किया गया, तो नवीन 4 राजस्थान वन (संशोधन) अधिनियम, 2014 दिनांक 4 मार्च, 2014 से लागू किया गया हैं। वन और पर्यावरण से सम्बन्धित सर्वप्रथम कानून कोटा राज्य में बनाया गया। देश में राजस्थान एकमात्र ऐसा राज्य है जहाँ वन क्षेत्र में गत पाँच द्विवर्षीय सर्वेक्षणों में लगातार वृद्धि दर्ज की गई है।

भारतीय वन सर्वेक्षण विभाग, देहरादून द्वारा प्रत्येक दो वर्ष के अन्तराल पर भारतीय वनों से सम्बन्धित रिपोर्ट जारी की जाती है। जिसकी 15वीं रिपोर्ट 12 फरवरी, 2018 को जारी की गई। ध्यातव्य रहे- भारत की 'प्रथम राष्ट्रीय वन नीति, 1952' के अनुसार राज्य के कुल क्षेत्रफल के 33.33% भाग पर वन होने चाहिए। राजस्थान में 1949-50 में वन विभाग की स्थापना की गई। उस समय राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्र के 13 प्रतिशत भू-भाग पर वन थे।

प्राकृतिक वनस्पति

खेजड़ी-इसे सरकार द्वारा 31 अक्टूबर, 1983 को 'राज्य वृक्ष' घोषित किया गया। खेजड़ी वृक्ष पश्चिमी राजस्थान में सर्वाधिक पाया जाता है, जो अधिक उपयोगी होने के कारण इसे 'राजस्थान का कल्प वृक्ष / राजस्थान का गौरव / राजस्थान का कल्पतरु / थार का कल्पवृक्ष' आदि उपनामों से जाना जाता है। 

खेजड़ी को स्थानीय भाषा में जांटी, राजस्थानी भाषा में सीमलो, ग्रन्थों में शमी, वैज्ञानिक भाषा में प्रोसोपिस सिनेरेरिया, सिन्धी भाषा में-छोकड़ो, कन्नड़ भाषा में-बन्नी, बंगाली भाषा में शाईगाछ तथा तमिल भाषा में पेयमये कहते हैं, तो खेजड़ी वृक्ष की हरी पत्तियों को लूम, सूखने के बाद खोखा व फली की साँगरी कहते हैं। खेजड़ी वृक्ष की विजयदशमी/ दशहरे पर पूजा की जाती है। हाल ही में खेजड़ी वृक्ष 'सिलिसट्रेना नामक कीड़े व ग्राइकोट्रमा नामक कवक' का शिकार हो रहा हैं। खेजड़ी वृक्ष रेगिस्तान के प्रसार को रोकने के लिए उपयोगी माना जाता है। खेजड़ली दिवस 12 सितम्बर, 1978 से प्रतिवर्ष मनाया जाता है।

वैज्ञानिकों द्वारा खेजड़ी के वृक्ष की आयु 5000 वर्ष बतायी गई। है। राज्य में सर्वाधिक प्राचीन खेजड़ी के दो वृक्ष एक हजार वर्ष पुराने मांगलियावास गांव (अजमेर) में है, तो वहीं मांगलियावास गांव में हरियाली अमावस्या (श्रावण) को वृक्ष मेला लगता है। मोटो बीकानेर के शासकों द्वारा प्रतीक चिह्न के रूप में खेजड़ी के वृक्ष को अंकित करवाया। 1899 या विक्रम संवत् 1956 में पड़े छप्पनियां अकाल में खेजड़ी का वृक्ष लोगों के जीवन का सहारा बना। खेजड़ी संयुक्त अरब अमीरात (UAE) का राष्ट्रीय वृक्ष है, जहाँ इसे 'गाफ'(GHAF) कहा जाता है।

ध्यातव्य रहे - 1988 में खेजड़ी वृक्ष पर 50 पैसे का डाक टिकट जारी किया गया था, तो 1991 में खेजड़ी वृक्ष को बचाने के लिए ऑपरेशन खेजड़ा कार्यक्रम शुरू किया गया। इसी वृक्ष को बचाने के लिए मारवाड़ के शासक अभयसिंह के काल में 1730 ई. में अमृता देवी विश्नोई के नेतृत्व में 363 लोगों ने बलिदान दिया। इसी कारण इस घटना को राजस्थान का चिपको आंदोलन भी कहते है।

पलाश / ढ़ाक / खाखरा - 

‘Flame of the Forest' व ' जंगल की ज्वाला' के उपनाम से विख्यात इस वृक्ष का वैज्ञानिक नाम 'ब्यूटिया मोनोस्पर्मा' है । यह राजसमंद व हाड़ौती क्षेत्र में सर्वाधिक पाया जाता है। पलास को ढ़ाक या टेलू के नाम से भी जाना जाता है। पलास के फूल के ऊपरी भाग का रंग पीला तथा नीचे के भाग का रंग लाल होता है। पलास का पत्ता आदिवासियों द्वारा पानिया बनाने हेतु काम में लिया जाता है। पलास राज्य की मुख्य उपज नहीं है। फ्लोरा ऑफ द इंडियन डेजर्ट प्रो. एम. एम. भण्डारी द्वारा लिखित पुस्तक है।

रोहिड़ा-

इसे सरकार द्वारा 31 अक्टूबर, 1983 को 'राज्य पुष्प' घोषित किया गया। रोहिड़ा के फूल को 'मरुस्थल का सागवान/ राजस्थान का सागवान/मारवाड़ टीक/राजस्थान की मरु शोभा / वैज्ञानिक भाषा में वृक्ष-टीनोस्पोरा कार्डिफोलिया, पुष्प-टिकोमेला एंडूलेटा' आदि नामों से जाना जाता है। रोहिड़ा पश्चिमी राजस्थान में सर्वाधिक पाया जाता है, जो चैत्र माह (मार्च-अप्रैल) में खिलता है। जिसका रंग हिरमिच (पीला केसरिया+लाल+नारंगी) का होता है।

बाँस-

बाँस वास्तविक रूप से घास का ही एक प्रकार है जो 'आदिवासियों का हरा सोना' के उपनाम से विख्यात है। बांस, छप्पर, टोकरी, चारपाई आदि बनाने में काम में लिया जाता है। हरित सोना क्रांति का संबंध बांस से है। बांस मुख्य रूप से बांसवाड़ा, उदयपुर, चित्तौड़गढ़, बारां, भरतपुर व माउण्ट आबू में मिलते हैं।

महुआ-

 'आदिवासियों का कल्पवृक्ष' के नाम से विख्यात यह वृक्ष आदिवासियों की आजीविका का साधन है एवं उनसे मावड़ी नामक शराब बनायी जाती है। महुआ का वानस्पतिक नाम मछुका लोंगोफोलिया है। इसके पुष्प ग्रीष्म ऋतु में लगते हैं। महुआ वृक्ष के पुष्प सर्वाधिक प्राप्तः काल से दोपहर तक झड़ते हैं। दक्षिणी क्षेत्र में रहने वाले आदिवासी भील, मीणा, गरासियावडामोर जाति के लोग इसकी शराब घरों में बना लेते हैं, तो वहीं यह मुख्य रूप से सिरोही, उदयपुर, डूंगरपुर व बांसवाड़ा में पाया जाता है।

ध्यातव्य रहे - राज्य में नीम सर्वाधिक दौसा, भरतपुर अलवर जिले में पाये जाते हैं तथा इसका वानस्पतिक नाम एजेडिरिकेटा इण्डिका है, तो वहीं मोपेन जिम्बाबे से लाया गया एक पौधा है। 

मशरूम - 

यह भोज के रूप में प्रयुक्त होने वाला कवक है। इसे जलखुम्भी/छत्रक के उपनाम से भी जाना जाता है।

होहोबा/ जोजोबा - 

यह एक रेगिस्तानी पौधा है, जिसे इजरायल की एजोर्य संस्था ने विकसित किया है। इसका वानस्पतिक नाम सायमण्डेसीया चायनेसीस है। राज्य में इसे सर्वप्रथम जोधपुर की काजरी संस्था के द्वारा लाया गया तथा फतेहपुर (सीकर) व दण्ढ़ (जयपुर) में लगाया गया। इसे पीला सोना भी कहते हैं और इसका प्रमुख उपयोग बायोडीजल में होता है तो रेगिस्तान के प्रसार को रोकने में प्रमुख सहायक पौधे मोपेन, बबूल व होहोबा है।

रोजियां टेबूबिया -

यह मैक्सिकन मूल का पौधा है। हरित राजस्थान योजना ( 2009 ) का प्रारम्भ रोजियां टेबूबिया पौधा लगाकर किया गया।

जैतून- -इस विदेशी पेड़ की खेती फतेहपुर कृषि फार्म में की जाती है।

जाल- 

यह जसनाथी सम्प्रदाय में पूजनीय वृक्ष है। जाल के फलों को पिल्लू, पील या राजस्थान का अंगूर के उपनाम से भी जाना जाता है।

खजूर-

खजूर के तने को नाल कहा जाता है। भारत की प्रथम खजूर पौधशाला से संबंधित स्थान कपासनी (जोधपुर) है।

खींप-

यह झाड़ीनुमा वृक्ष है जिस पर खिंपौली नामक फली लगती है। रेतीले टीबों के स्थिरीकरण हेतु कूमठा, फोग, खींप व सेवण का वृक्षारोपण किया जाता है। 

पान-

पान की खेती करौली तथा बयाना (पूर्वी राजस्थान) क्षेत्र में की जाती है। पान के खेत को बजेड़ा कहते हैं, तो वहीं पान की खेती तिमोली जाति के द्वारा की जाती है।

ध्यातव्य रहे - कंगा-शीशम की लकड़ी से बनाया जाता है। दक्षिणी राजस्थान के गरीब व आदिवासी कांग/कांगणी/कांकुन-यह बाहुल्य शुष्क क्षेत्रों की प्रमुख फसल है। कैर, सांगरी, कूमठा, गूंदा व काचरी पंचकुटा सब्जी के पास फल है।

जामुन- 

माउण्ट आबू क्षेत्र में पाये जाने वाला यह वृक्ष मधुमेह रोग के लिए अत्यधिक उपयोगी है।

ध्यातव्य रहे - माउण्ट आबू में 'डिकिल्पटेरा आबू ऐंसिस' नामक एक विशिष्ट वनस्पति पायी जाती है जो विश्व में केवल यहीं पर पायी जाती है।

सालर वृक्ष - उदयपुर में पाये जाने वाला यह वृक्ष रेग्जीन के डिब्बे पैक करने के काम आता है।

खैर वृक्ष - 

खैर वृक्ष का वानस्पतिक नाम एनेसिया केपू है, तो खैर वृक्ष द्वारा कथौड़ी जाति के लोग हांडी प्रणाली से कत्था तैयार करते हैं। 

आँवला / झाबुई की छाल - यह वृक्ष चमड़ा साफ करने के काम आता है। . 

शहतूत - 

शहतूत के पेड़ पर रेशम के कीडे पाले जाते हैं जबकि उदयपुर, कोटा, बाँसवाड़ा में अर्जुन के पेड़ पर की जाने वाली कृत्रिम रेशम की खेती को टसर पद्धति कहते हैं।

बैर-

कार्तिक माह में बैर की झाड़ियों पर बैर लगते हैं। बैर के पेड़ पर लेसिफर लक्खा नामक कीड़ा पाला जाता है जिससे लाख उत्पादित होती है।

ध्यातव्य रहे - लेसिफर लक्खा नामक कीड़ा बरगद, बैर, पीपल, बबूल, गूलर आदि वृक्षों की नर्म डालियों का रस चूसकर एक चिपचिपा पदार्थ निकालता है, जिसे लाख कहा जाता है। लाख विद्युत रोधक होता है, जिसका उपयोग ग्रामोफोन, रिकॉर्ड, खिलौने, रेडियो, टेलीविजन, ट्यूब तथा चूड़े आदि बनाने में होता है।

डाब/ दूब - 

पूजा आदि में काम आने वाली घास डाब/ दूब कहलाती है। ग्रहण के अवसर पर डाब की घास को सूतक के दुष्प्रभाव से बचाने के लिए खाद्य सामग्री के साथ घरों में रखते हैं, तो डाब से बनी रस्सियाँ मूँज कहलाती है।

तेंदू - 

तेंदू के पत्ते का प्रयोग बीड़ी उत्पादन में किया जाता है। इस पत्ते का राष्ट्रीयकरण 1974 में किया गया। तेंदू पत्ते का वानस्पतिक नाम डिसोखरोज मेलनोक्सेलोन है। मयूर छाप बीड़ी का कारखाना टोंक में स्थित है। टोंक व अलवर में सर्वाधिक । 

सेवण - 

राजस्थान की घास सेवण घास (स्थानीय भाषा में लिलोण) है जो पश्चिमी क्षेत्र में विस्तृत 'लाठी सीरीज' (मोहनगढ़ से पोकरण के मध्य 60 किमी. का क्षेत्र) में पायी जाती है। यह घास 'गोड़ावण पक्षी की शरणस्थली' कहलाती है क्योंकि गोड़ावण पक्षी इस घास में अण्डे देता है। इस घास का सर्वाधिक उपयोग भेड़ों द्वारा किया जाता है। इस घास का वैज्ञानिक नाम 'लसियुरूस सिड़ीकुस' है।

हींग - Ferula Assafoetida झाड़ी की जड़ के रस से प्राप्त की जाती है, जो प्रतापगढ़ में सर्वाधिक मिलती है।

बुर-राजस्थान में पायी जाने वाला सबसे सुगंधित घास बूर घास है जो बीकानेर के श्रीडूंगरपुर, कोलायत, देशनोक, नोखा एवं चुरू के सरदार शहर के आस-पास पायी जाती है।

ध्यातव्य रहे - बुर की एक अन्य उपजाति ओलेवरी जोधपुर के निकट ओसियां तथा लोहावट में पाई जाती है, तो बुर अन्य उपजाति सुगनी-जैसलमेर एवं उसके आस-पास के क्षेत्र में पाई जाती है।

खस - 

भरतपुर, करौली, टोंक व सवाई माधोपुर में एक विशिष्ट में प्रकार की सुगंधित घास खस पायी जाती है एवं इस घास की जड़ों से सुगन्धित तेल, शरबत, इत्र, कूलर की टाटियाँ, पंखे, कमरों को शीतल करने के परदे आदि उत्पाद तैयार किये जाते हैं। 

मोथा- 

भरतपुर में मोथा नामक घास भी पायी जाती है जिसका उपयोग पक्षियों द्वारा किया जाता है। केवलादेव (भरतपुर) में पायी जाने वाली एंचा घास ऐसी घास है जिसमें उलझकर पक्षी मर जाते हैं। केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान में पायी जाने वाली प्रमुख घास कुट्टू है, जो साइबेरियन सारस की पसंदीदा मानी जाती है।

भरुत (सेन्फ्रस) घास-

राजस्थान में यह घास बहुतायत में पायी जाती है। फसलों में होने वाले मोल्या और जोड़गांठ जैसे रोगों से होने वाले नुकसान को सेन्फ्रेस घास रोकने में सक्षम है।

गाजर घास / स्टोफेरर्स -

अमेरिका से आयातित इस घास से जयपुर जिला सर्वाधिक प्रभावित है। इस घास को चर्म रोग एवं अस्थमा का वाहक माना जाता है।

पामारोजा व रोशा घास - इस घास के तेल का उपयोग तम्बाकू को सुगन्धित बनाने में किया जाता है।

राजस्थान की अन्य घासें - भट्ट, मुट्ट, लाँपड़ी, वोभरियो, बेकरियों, साटी, घण्ठील, डचाभ, मुरति, मण्डूसी, झींटियो, बरु, ल्हारड़ो, लहाठियो, मोतियों, कांगणी, कोदरा, चीणा, कुरा, सवान, मुंदुआ, कोरंग, कासनी, रिजगा, हिरण चब्बो।

गोखरू - इसे भाँखड़ा उकाली भी कहते हैं जिसे ऊँट बड़ी चाँव से खाते हैं।

ध्यातव्य रहे - पूर्वी राजस्थान में दो मुख्य घास पायी जाती है अंजन व चिंबल। धामण घास भी राजस्थान में पायी जाने वाले एक महत्त्वपूर्ण घास है जिसका उपयोग दुधारू पशुओं द्वारा किया जाता है। राज्य में धामण घास बांसवाड़ा, डूंगरपुर, उदयपुर, जैसलमेर आदि जिलों में प्रचुरता से उगती है। धामण/ट्राइडोक्स को मधुमेह को दूर करने हेतु बेहद प्रभावशाली बताया गया है। 

चौहानों की प्राचीन राजधानी चौहटन (बाड़मेर) का क्षेत्र शुष्क वृक्षों के लिए विख्यात है जिनमें बहुतायत मात्रा में गोंद प्राप्त होता है तथा चौहटन में लगने वाला प्रसिद्ध मेला सूईयों का मेला है, जो 'राजस्थान का अर्द्धकुंभ' कहलाता है। चौहटन क्षेत्र के प्रमुख स्थानों में गोंद उत्पादक गांव बूढ़ बावड़ी, पराड़िया, भोजारिया, खारीया, कैलनोट, देदूसर, कापराड़, नेटराड़, धारासर, सरुतला, ढोंक, कोलटा, नवालता आदि प्रमुख है। राज्य के पश्चिमवर्ती भागों से गोंद की प्राप्ति बहुतायत से होती है। इस क्षेत्र में गोंद उतारने का कार्य मेघवाल व मुसलमान जाति के लोग अधिक करते हैं ।

फोग- 

यह एक झाड़ी है। इसके फूलों से फटका साग/फोगला साग बनाया जाता है। फोग ऊँट की नाक बींदने के काम भी आता है। फोग के लिए बीकानेर के शासक रायसिंह के शब्द

'तू स्वदेशी रूखणा में परदेशी लोग,

म्हाने तो अकबर ताड़िया तू क्यों आयी फोग।'

गुग्गल - 

यह एक औषधीय पौधा है, जिसका वानस्पतिक नाम कौमीफोरा बाईटाई है।

चन्दन - 

चन्दन के वृक्ष कुम्भलगढ़, खमनौर (राजसमंद) तथा दिलवाड़ा (सिरोही) में पाये जाते हैं। चन्दन की लकड़ी पर कलाकृति चुरू में की जाती है।

राजस्थान के प्रमुख वंश एवं उनके आराध्य वृक्ष

चौहान वंश का आराध्य वृक्ष पीपल, कछवाहा वंश का वट, राठौड़ वंश का नीम, तोमर वंश का खेजड़ी, यादव वंश का कदम्ब एवं हाड़ा वंश का आराध्य वृक्ष अशोक / आसापाला है।

ध्यातव्य रहे - जैव विविधता का प्रतीक देव वन, कोटा के डाढ़ देव वन खण्ड में स्थित प्रति हेक्टेयर सर्वाधिक जैव विविधता वाला स्थान है। यहाँ राज्य का प्रथम 'सर्प उद्यान' भी है। भारतीय वन सर्वेक्षण विभाग का मुख्यालय देहरादून में स्थित है।

राजस्थान की प्रमुख औषधि वनस्पति

वनस्पति

प्राप्ति स्थल

उपयोग

चिरमी

पूर्वी राजस्थान

हृदय रोग, गर्भपात

खेर

उदयपुर, डूंगरपुर

टेक्सटाइल उद्योग

गुग्गुल

अजमेर

वसा, गठिया रक्तचाप नियंत्रण

हिंगोडा

हाड़ौती मेवाड़

खांसी, दंत रोग, गर्भनिरोधक

वज्रदन्ती

हाड़ौती मेवाड़

दंत रोग में लाभ

जंगली प्याज

जोधपुर, बाड़मेर

फेफड़ों का संक्रमण

ब्राह्मी

उदयपुर, बाँसवाड़ा 

मस्तिष्क के लिए

शंखपुष्पी

जोधपुर, बाड़मेर

याददाश्त के लिए.

सालर

जयपुर 

बिच्छू काटने पर

अर्जुन

झालावाड़

हृदय रोग

रोहिड़ा

पश्चिमी जिले

यौन रोग

काली मूसली

दक्षिण जिले

पौरुष शक्ति में वृद्धि

सफेद मूसली

दक्षिणी जिले

पौरुष शक्ति में वृद्धि

अश्वगंधा

चित्तौड़गढ़

 गर्भनिरोधक

केली

चितौड़गढ़

गर्भनिरोधक

डांडा थोर

सम्पूर्ण राज्य

गर्भनिरोधक

ग्वारपाठा

सांभर क्षेत्र

सौन्दर्य प्रसाधनों में

ध्यातव्य रहे- इनके अलावा राज्य में कुमटी, खेजड़ी, धतूरा,आसलिया, जीरा, ईसबगोल, रोहिषतृण (देशी बूर), गांगेरुकी, कर्पूरगंधा, महाबला, हरमल, इंद्रायण, लाल व सफेद आंकड़ा, भूरांगणी, ऊँटकटो, खारी, बेर, भाऊ, फोग, धव, खींप, नागबेल, कनेर, थूहर, सर्पगंधा, गोंद, बाय हाकल, काली हाकल, चित्राल, बरकड़ा, गारह गोटा, बिदार कंद, तोलिया कंद, बिल्व, गैंगची, अपामार्ग, शालपर्णी, शैफाली, नागरमोथा, घातकी पाठा, कम्पलीक, मिर्चीकंद, सूरवाल घास, खाट खदूम्बर, बटेड़ा, पलास, हस्तकर्ण, ट्रायडॉक्स आदि अनेक बहुमूल्य एवं दुर्लभ औषधियों का भी भण्डार है।

भारत वन स्थिति रिपार्ट (ISFR) 2019 में

राजस्थान की स्थिति - वन स्थिति रिपोर्ट 2019 के अनुसार राजस्थान में वर्ष 2017 की तुलना में 57.51 वर्ग किमी. की वृद्धि हुई है। इस रिपोर्ट के अनुसार राजस्थान में कुल वनावरण 16629.51 वर्ग किमी. है, जो राज्य के कुल क्षेत्रफल का 4.86 प्रतिशत है। रिपोर्ट के मुताबिक 16 जिलों के वन क्षेत्र में वृद्धि हुई है, तो 13 जिलों में वन क्षेत्र में गिरावट आयी है, जबकि 4 जिलों (करौली, चुरू, दौसा व धौलपुर) में स्थिरता देखी गई है।

राज्य में कुल वनावरण 16630 वर्ग किमी. है तथा कुल वृक्षावरण 8112 वर्ग किमी. है (2017 की तुलना में 154 वर्ग किमी. की कमी), तो वहीं राज्य में कुल वनावरण एवं वृक्षावरण 24742 वर्ग किमी. है, जो राज्य के भौगोलिक क्षेत्रफल का 7.22 प्रतिशत है।

राज्य में अत्यधिक सघन वन क्षेत्र 77.81 वर्ग किमी. है, जो राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 0.02% है तथा मध्यम घने वन 4341.90 वर्ग किमी. क्षेत्र में है, जो राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 1.27% है, तो वहीं खुले वन 12209.80 वर्ग किमी. में है, जो राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 3.57% है। झाड़ियाँ (Scrub) 4760.04 वर्ग किमी. क्षेत्र में फैली हुई है, जो राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 1.39 प्रतिशत है।

भारत वन स्थिति रिपोर्ट (ISFR)- 2019 के अनुसार

  1. प्रदेश का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल - 3,42,239 वर्ग किमी.
  2. प्रदेश का कुल वन क्षेत्र - 32,737 वर्ग किमी.
  3. राज्य के भौगोलिक क्षेत्र में वन क्षेत्र का प्रतिशत - 9.57%
  4. राष्ट्र के भौगोलिक क्षेत्र में वन क्षेत्र का प्रतिशत - 0.99%
  5. आरक्षित वन क्षेत्र - 12,475 वर्ग किमी./38.11%
  6. रक्षित वन क्षेत्र - 18,217 वर्ग किमी./55.64%
  7. अवर्गीकृत वन क्षेत्र - 2,045 वर्ग किमी./6.25%
  8. सर्वाधिक वन क्षेत्र वाला जिला - उदयपुर (2757 वर्ग किमी.23.51%)
  9. न्यूनतम वन क्षेत्र वाला जिला - चुरू( 82 वर्ग किमी./0.59% )
  10. प्रदेश का कुल वनावरण - 16,630 वर्ग किमी.(राज्य के भौगोलिक क्षेत्रफल का 4.86%)
  11. वृक्षावरण - 8,112 वर्ग किमी. (154 वर्ग किमी. वर्ष 2017 की तुलना में )
  12. वन एवं वृक्षावरण - 24,742 वर्ग किमी. (राज्य के भौगोलिक क्षेत्रफल का 7.22% )

ध्यातव्य रहे- वर्ष 2017 (16572 वर्ग किमी.) की तुलना में राजस्थान में वन क्षेत्र वर्ष 2019 की रिपोर्ट के अनुसार कुल वन क्षेत्र में (16630 वर्ग किमी.) 57.51 वर्ग किमी. की वृद्धि हुई हैं।

वन रिपोर्ट 2019 के अनुसार राजस्थान में अभिलेखित वन 32737 वर्ग किमी. है, जो कि इसके कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 9.57 प्रतिशत है, तो वहीं अभिलेखित वन क्षेत्र के अनुसार राजस्थान का देश में 15वां स्थान है। अभिलेखित वन तीन भागों में वर्गीकृत किये जाते हैं

1. आरक्षित

ऐसे वन जिन पर पूरा नियंत्रण सरकार का होता है। एवं इसमें लकड़ी काटने व चराई पर पूर्ण प्रतिबन्ध होता है इसमें प्रवेश निषेध है। यह वन पारिस्थितिकी संतुलन (जलवायु की दृष्टि से) हेतु अति आवश्यक है। यह राज्य में 12475 वर्ग किमी ( 38.11%) भाग पर फैला है। सर्वाधिक आरक्षित वन-उदयपुर जिले में है।

2. रक्षित / संरक्षित वन

ऐसे वन जिन पर पूरा नियंत्रण सरकार ( का होता है, लेकिन वहाँ वन विभाग की अनुमति से चराई व फै लकड़ी काटने हेतु ठेके दिये जाते हैं। यह वन राज्य में सर्वाधिक है। से जो 18,217 वर्ग किमी. (55.64%) है। सर्वाधिक संरक्षित वन बारां जिले में है।

3. अवर्गीकृत वन-

ऐसे वन जो वन विभाग के अधीन होते हैं, जि लेकिन इन वनों से लकड़ी काटने एवं पशु चराने की पूर्ण स्वतंत्रता होती है। यह वन गाँव व सड़कों के किनारों पर लगे होते हैं। जहाँ इनकी कटाई व चराई पर प्रतिबन्ध नहीं होता। यह वन राज्य में सबसे व कम क्षेत्रफल में फैलें हैं। राज्य में 2045 वर्ग किमी. (6.25%) भाग क पर फैले हैं। सर्वाधिक अवर्गीकृत वन-बीकानेर जिले में है।

राज्य के कुल वन क्षेत्र में सर्वाधिक वन क्षेत्र वाले जिले-उदयपुर 2757 वर्ग किमी.), अलवर (1197 वर्ग किमी.) व प्रतापगढ़ (1038 वर्ग किमी.) ।

जिलों के भौगोलिक क्षेत्रफल के प्रतिशत के अनुसार सर्वाधिक वन क्षेत्र वाले जिले- उदयपुर (23.51%), प्रतापगढ़ (23.33%) व सिरोही (17.76%) I राज्य के कुल वन क्षेत्र में न्यूनतम वन क्षेत्र वाले जिले-चुरू (82) वर्ग किमी.), हनुमानगढ़ (90 वर्ग किमी.) व जोधपुर (108 वर्ग किमी.) । 

जिलों के भौगोलिक क्षेत्रफल के प्रतिशत के अनुसार न्यूनतम वन क्षेत्र वाले जिले- जोधपुर (0.47%), चुरू (0.59%) व नागौर (0.83%) 1 राज्य में सर्वाधिक झाड़ी क्षेत्र वाले जिले-पाली (324 वर्ग किमी.), जयपुर (285 वर्ग किमी.) व करौली (273 वर्ग किमी.), तो वहीं राज्य में न्यूनतम झाड़ी क्षेत्र वाले जिले- हनुमानगढ़ (1 वर्ग किमी.), गंगानगर (13 वर्ग किमी.) व चुरू (22 वर्ग किमी.) ।

वनावरण क्षेत्र में सर्वाधिक वृद्धि वाले जिले (वन स्थिति रिपोर्ट 2017 की तुलना में ) - बाड़मेर (16.79 वर्ग किमी.), जैसलमेर (12.77 वर्ग किमी.) व डूंगरपुर (11.30 वर्ग किमी.), तो वहीं वनावरण क्षेत्र में सर्वाधिक कमी वाले जिले (वन स्थिति रिपोर्ट 2017 की तुलना में ) उदयपुर (6.46 वर्ग किमी.), प्रतापगढ़ (6.09 वर्ग किमी.) व झालावाड़ (3.42 वर्ग किमी.) ।

राजस्थान में वनों के वृक्षों (वनस्पति) के आधार पर हम वनों को पाँच भागों में बाँट सकते हैं।

(i) शुष्क सागवान वन (सागवान वन ) 

यह वन राज्य में 2247.87 वर्ग किमी. भाग पर फैले हैं, जो राजस्थान के कुल वन का लगभग 6.86% है। यहाँ 75 से 110 सेमी. वर्षा (सागवान वन के लिए जरुरी) होती है। ये वन राजस्थान के दक्षिणी भाग डूंगरपुर, बांसवाड़ा (सर्वाधिक) प्रतापगढ़, दक्षिणी उदयपुर, आबू पर्वत, बांरा, कोटा, झालावाड़ में पाये जाते हैं। सागवान के वृक्ष 'फर्नीचर' एवं 'भवन निर्माण' में उपयोगी है। 

(ii) उष्ण कटिबन्धीय शुष्क धोंक (पतझड़ी मिश्रित) वन(धोकड़ा के वन) 

यह वन राज्य में 19027.75 वर्ग किमी. भाग पर फैले हैं, जो राजस्थान के कुल वन का लगभग 58.11% है। यहाँ 30 से 60 सेमी. वर्षा होती है। यह वन राजस्थान के दक्षिणी एवं दक्षिणी पूर्वी अरावली पर्वत के मध्य ऊँचाई वाले ढालो पर पाये जाते हैं। इस वन का मुख्य वृक्ष धोकड़ा है, जिसकी सर्वाधिक सघनता 'करौली जिले में है। धोकड़ा के वृक्षों का उपयोग 'जलावन लकड़ी' तथा 'कोयला निर्माण' में होता है।

(iii) उत्तरी उष्ण कटिबन्धीय शुष्क पतझड़ी मिश्रित वन-

यह वन राज्य में 9292.86 वर्ग किमी. भाग पर फैले हैं, जो राजस्थान के कुल वन का लगभग 28.38% है। यहाँ 50 से 80 सेमी. तक वर्षा होती है। यहाँ मुख्यतया सालर, बाँस, पलाश, खस, खैर, महुवा आदि वृक्ष पाए जाते हैं।

ध्यातव्य रहे - सालर के वन-सालर का वृक्ष 'पैकिंग सामग्री' तथा 'गोंद के निर्माण' में उपयोगी है। इन वनों की सर्वाधिक सघनता 'उदयपुर जिले' में है। अरावली पहाड़ियों में सालर वृक्ष 450 मी. से अधिक ऊँचाई पर मिलते हैं।

(iv) उष्ण कटिबंधीय काँटेदार वन-

यह वन राज्य में 2041.52 वर्ग किमी. भाग पर फैले हैं, जो राजस्थान के कुल वन का लगभग 6.26% है। जहाँ वर्षा 30 सेमी. से भी कम होती है वहाँ पाये जाते हैं। यहाँ की वनस्पति को 'मरुद्भिद' कहते हैं। पश्चिम के रेतीले मैदान में पाये जाने वाले इन वनों में सर्वाधिक संख्या 'खेजड़ी के वृक्ष' की है, जिसे थार का 'कल्पवृक्ष' तथा 'राज्य वृक्ष' तथा 'गौरव वृक्ष' भी कहते हैं, तो स्थानीय भाषा में इसे जांटी भी कहते हैं, इसका में वैज्ञानिक नाम प्रोसेपिस सिनेरेरिया है, तो वहीं इसे अधिक जल की आवश्कता नहीं होती तथा यह छायादार वृक्ष है जिसकी छाया में बच्चे खेलना पसन्द करते हैं [CTET-2014]। इस क्षेत्र में मिलने वाले 'रोहिड़ा' को 'राजस्थान का सागवान' तथा यह 'राजकीय पुष्प' भी है। इसका वैज्ञानिक नाम टिकोमेला अण्डूलेटा है। इस क्षेत्र में वन बीड़ एवं ओरण के रूप में मिलते हैं। राज्य का सबसे बड़ा ओरण देशनोक बीकानेर में है। मरूस्थलीय वन क्षेत्र में बबूल के वृक्षों की प्रधानता रहती है, तो वहीं बबूल के वृक्ष से चारकोल बनाया जाता है।

(v) उपोष्ण कटिबन्धीय सदाबहार वन (अर्द्ध उष्ण कटिबंधीय 1 सदाबहार के वन) - 

यह वन राज्य में 126.64 वर्ग किमी. भाग पर फैले हैं, जो राजस्थान के कुल वन का लगभग 0.39% है। यहाँ 125 150 सेमी. या इससे अधिक वर्षा होती है। यह वन राजस्थान के केवल माउन्ट आबू पर्वत सिरोही के चारों और लगभग 32 किमी. में फैला है, जहाँ मिलने वाली 830 प्रकार की वानस्पतिक प्रजातियों में से 'डिक्लिप्टेरा आबू एनसिस' वह है जो सम्पूर्ण विश्व में केवल इसी क्षेत्र में मिलती हैं।

ये भी जानें :

राजस्थान में घास के मैदान या चारागाहों को बीड़ कहा जाता है। 

बर, सेवण, धामण (मधुमेह रोग में उपयोगी), मुरात, करड़, अंजल घास के प्रकार हैं, जो सर्वाधिक जैसलमेर जिले में पाई जाती है। राजस्थान के सवाईमाधोपुर, टोंक तथा भरतपुर जिले में खस नामक घास पाई जाती है, जिसकी जड़ों से इत्र बनाया जाता है। कमरों को खुशबूदार एवं ठण्डा करने के लिए भी खस घास का उपयोग करते है। ध्यान रहे विश्व की सबसे लम्बी घास बाँस है।

अर्जुन वृक्ष परोक्ष रूप से टसर रेशम के उत्पादन से जुड़ा है, तो टसर (कृत्रिम रेशम) विकास कार्यक्रम 1986 में कोटा, उदयपुर तथा बाँसवाड़ा जिले से प्रारम्भ हुआ। ध्यान रहे-रेशम का उत्पादन | सेरीकल्चर योजना के तहत किया जा रहा है।

महुआ वृक्ष भील जनजाति के सामाजिक रिवाजों व अर्थव्यवस्था के लिए सर्वाधिक पसंद पारिस्थितिकी (इकोलॉजिकल) एवं परम्पराओं वाला वृक्ष है, इसी कारण इसे आदिवासियों का कल्पवृक्ष कहते हैं। आदिवासी महुवा | वृक्ष से शराब बनाते हैं। महुआ के फूल ग्रीष्म ऋतु में | प्रातः काल से दोपहर तक आते हैं, तो सागवान के फूल वर्षा ऋतु में आते हैं।

अगरबत्ती व स्टीक बनाने में मुख्यतः बाँस (आदिवासियों का हरा सोना) की लकड़ी का प्रयोग किया जाता है, तो कत्था बनाने के लिए खैर वृक्ष को लकड़ी की छाल का उपयोग किया जाता है। ध्यान रहे राजस्थान की कथौड़ी जनजाति खैर वृक्ष के तनों से हांड़ी प्रणाली के द्वारा कत्था तैयार करती है, तो वहीं राज्य के उदयपुर, चित्तौड़गढ़ व झालावाड़ जिलों में कत्थे का उत्पादन मुख्य तौर पर किया जाता है।

भारत की सबसे काली लकड़ी 'टीमरु / तेंदू' की होती है। तेंदू (टिमरु) वृक्ष के पत्तों से बीड़ी बनाई जाती है जो राजस्थान में सर्वाधिक बाँसवाड़ा जिले में पाए जाते हैं, तो तेंदू/टिमरु के फल को'वागड़ का चीकू' कहते हैं। तेंदू पत्ता व्यापार का 1974 में राष्ट्रीयकरण किया गया। सर्वाधिक तेंदू पत्ते मध्यप्रदेश में होते हैं। 

आदिवासी क्षेत्रों में पानिया बनाने हेतु मुख्यतः पलाश का पत्ता उपयोग में लिया जाता है। फूलों से लदे हुए पलाश के वृक्ष को हम 'जंगल की ज्वाला / Flame of the Forest' के नाम से जानते हैं। 

नीम के वृक्ष पर पुष्प मई-जून माह में खिलते है, तो वहीं पेट दर्द में उपयोगी औषधि अमलताश है।

कदम्ब के वृक्ष से गोंद प्राप्त किया जाता है और राजस्थान में गोंद के लिए प्रसिद्ध स्थान चौहटन (बाड़मेर) है। 

आँवले वृक्ष की छाल चमड़ा साफ करने के काम आती है।

पान के खेत को 'बजेड़ा' कहते हैं। 

सबसे कम वन क्षेत्र चुरु जिले में है, तो राजस्थान के दक्षिणी एवं दक्षिणी पूर्वी भाग में सर्वाधिक वन संकेन्द्रित है।

खेजड़ी के पेड़ों को काटने से बचाने के लिए 1730 ई. में 363 लोगों (विश्नोइयों) ने अमृता देवी के नेतृत्व में खेजड़ली (जोधपुर) में अपने प्राण दिए इसी कारण राजस्थान में वन विकास हेतु 'अमृता देवी स्मृति पुरस्कार' [HTET-2019] दिया जाता है एवं यहाँ प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल दशमी को विश्व का एकमात्र वृक्ष मेला भरता है।

देव वनों के प्रथम समूह में जनजाति बाहुल्य क्षेत्र के देवरे शामिल किये जाते है तो वहीं इसके तीसरे समूह में एकल वृक्ष देवरों का समावेश किया जाता है। 

राजस्थान में प्रतिवर्ष 12 सितम्बर को खेजड़ली ग्राम (जोधपुर) में वृक्ष महोत्सव मनाया जाता है, तो वहीं रोतू राजस्थान के नागौर जिले में स्थित आरक्षित वन्य क्षेत्र है।

अरावली वन रोपण परियोजना (AAP) राजस्थान के 10 जिलों में जापान की मदद से 1992 से 2000 तक चलाई। गई, जिसका मुख्य उद्देश्य अरावली क्षेत्र में पारिस्थितिक संतुलन | बनाये रखने के लिए वनारोपण करना था।

केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (CAZRI-Central Aried Zone Research Institute ) का गठन 1959 ई. में किया गया था, इसके पाँच उपकेन्द्र बीकानेर, जैसलमेर, पाली, भुज तथा लेह में स्थित है। यह भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् की संस्था है, जो शुष्क क्षेत्र से संबंधित सम्पूर्ण अनुसंधान करता है। शुष्क वन संस्थान (आफरी) जोधपुर में स्थित है।

5वीं पंचवर्षीय योजना में सामाजिक वानिकी का प्रार्दुभाव हुआ तथा छठी पंचवर्षीय योजना के तहत सामाजिक वानिकी कार्यक्रम को वन विकास को मुख्य अंग बनाया गया। राजस्थान में वृक्ष संरक्षण को प्रोत्साहन देने के लिए 7वीं पंचवर्षीय योजना में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने राज्य के हूँगरपुर जिले से रूख भायला कार्यक्रम प्रारम्भ किया। रूख भायला का सामान्य अर्थ वृक्ष मित्र है।

राजस्थान के इतिहास में पट्टारेख का अभिप्राय: है- आकलित राजस्व है, तो वहीं स्मृति वन झालाना, जयपुर में विकसित किया गया है।

राजस्थान सरकार ने वर्ष 2010 में राजस्थान जैविक विविधता नियमों को बनाया तथा राजस्थान राज्य जैव विविधता बोर्ड की स्थापना की।

इमारती लकड़ी के लिए प्रसिद्ध सागवान के वन बाँसवाड़ा | जिले में सर्वाधिक पाये जाते हैं, तो राजस्थान के दक्षिणी क्षेत्र में सागवान के वन पाये जाते हैं। राजस्थान की मोठा पादप प्रजाति 'जलवास' बाँस का वर्ग है। 

भारत में सागवान के उत्पादन का निरन्तर ह्रास हो रहा है, राजस्थान में सागवान के वृक्षारोपण हेतु अधिक उपयुक्त जिले बाँसवाड़ा, डूंगरपुर व उदयपुर हैं, तो वहीं राजस्थान में कोणघारी वन, अल्पाइन वन, सदाबहार वन, उष्ण कटिबंधीय तर पतझड़ी वनस्पति नहीं पाई जाती।

राजस्थान में वन्यजीव संरक्षण

वनोन्मूलन करना वन्य जीव व जैव विविधता संरक्षण में बाधक है। राजस्थान में 16 वन्यजीव मण्डल, 5-जन्तुआलय, 7-मृगवन, 3- टाइगर रिजर्व (रणथम्भौर, सरिस्का एवं मुकुन्दरा हिल्स), 3 राष्ट्रीय उद्यान (रणथम्भौर, केवलादेव, मुकुन्दरा हिल्स), 14-कंजर्वेशन रिजर्व, 2-रामसर स्थल (घना पक्षी विहार व साँभर झील) 2 प्रस्तावित राष्ट्रीय उद्यान, 27 वन्यजीव अभयारण्य, 33- आखेट निषिद्ध क्षेत्र (धार्मिक स्थलों से जुड़ा पारम्परिक आखेट एवं वन कटाई निषिद्ध क्षेत्र 'औरण' कहलाता है) स्थित हैं। वन्यजीवों के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय उद्यानों एवं अभ्यरण्यों की स्थापना, वन्यजीवों के शिकार पर रोक लगाना व वनारोपण करना है।

चिड़ियाघर (जन्तुआलय)-5

  1. जयपुर चिड़ियाघर-यह राजस्थान व देश का सबसे प्राचीन  जन्तुआलय है। इसकी स्थापना 1876 में जयपुर के रामनिवास बाग में की गई यहाँ पर घड़ियालों एवं मगरमच्छों का प्रजनन केन्द्र है तथा यहाँ हाल ही में बाघों का प्रजनन भी किया गया है। 
  2. जोधपुर चिड़ियाघर-1936 में स्थापित, यहाँ गोड़ावण पक्षी का कृत्रिम प्रजनन केन्द्र है।
  3. बीकानेर चिड़ियाघर-1922 में बीकानेर के सार्वजनिक उद्यान में स्थापित किया गया, वर्तमान में यह बन्द है।
  4. उदयपुर चिड़ियाघर - 1878 ई. में उदयपुर के गुलाब बाग में स्थापित किया गया। हाल ही में यहाँ एक पक्षीशाला (एवरी) भी विकसित की गई है। 
  5. कोटा चिड़ियाघर-1954 में स्थापित यह राज्य का सबसे नवीन जन्तुआलय है।

ध्यातव्य रहे - देश का पहला जन्तुआलय मद्रास में स्थापित किया गया तो इन जन्तुआलयों का प्रबंधन केन्द्रीय चिड़याघर प्राधिकरण, भारत सरकार की मार्गदर्शिका के अनुसार किया जा रहा हैं तो राज्य में डेजर्ट जू-बीछवाल (बीकानेर) में है।

मृगवन-7

प्रदेश में उपयुक्त स्थलों पर मृगों (चीतल, चिंकारा आदि) को एक सीमाबद्ध प्राकृतिक क्षेत्र में रखा गया हैं, इन्हें ही मृगवन कहते हैं।

  1. माचिया सफारी मृगवन (जोधपुर)- 1985 में जोधपुर से 5 किमी. दूर कायलाना झील के निकट स्थापित किया गया है। इस पार्क में ऐतिहासिक माचिया दुर्ग स्थित है। यहाँ राज्य व देश का प्रथम 'राष्ट्रीय मरु वानस्पतिक उद्यान" बनाया गया है। जिसमें मरु प्रदेश की प्राकृतिक वनस्पतियों को संरक्षित किया जायेगा।
  2. अमृता देवी कृष्ण मृगवन (जोधपुर) -जोधपुर के खेजड़ली गाँव में अमृता देवी के नाम पर स्थापित किया गया। 
  3. अशोक विहार मृगवन (जयपुर) - जयपुर में सचिवालय व विधानसभा भवन के पास स्थित है।
  4. संजय उद्यान मृगवन (जयपुर) राष्ट्रीय राजमार्ग-8 पर जयपुर के शाहपुरा के निकट स्थित है। 
  5. सज्जनगढ़ मृग वन (उदयपुर) उदयपुर में सज्जनगढ़ दुर्ग की तलहटी में 1.5 वर्ग किमी. में फैला हुआ वन जिसकी स्थापना 1984 में की गई। 
  6. चित्तौड़गढ़ मृग वन (चित्तौड़गढ़) -चित्तौड़गढ़ के दक्षिणी छोर की दीवारों के सहारे 1969 ई. में स्थापित किया गया।
  7.  पुष्कर मृगवन (अजमेर) यह मृगवन 1985 में स्थापित किया गया।

बाघ परियोजना-3

(i) रणथम्भौर वन्य जीव अभ्यारण्य (सवाईमाधोपुर)
(ii) सरिस्का वन्य जीव अभ्यारण्य (अलवर) 
(ii) दर्रा वन्य जीव अभ्यारण्य (कोटा व झालावाड़)

जैव संवर्धन क्षेत्र (जैविक उद्यान) -5

  1. सज्जनगढ़ जैविक उद्यान (उदयपुर)-12 अप्रैल, 2015)
  2. माचिया बायोलॉजिकल पार्क (जोधपुर) 20 जनवरी, 2016 
  3. नाहरगढ़ जैविक उद्यान (जयपुर) 4 जून, 2016
  4. अभेड़ा जैविक उद्यान (कोटा)
  5. मरूधरा बायोलोजिकल पार्क (बीकानेर)

ध्यातव्य रहे- मारवाड़ का प्रथम जैविक उद्यान 'माचिया बायोलॉजिकल पार्क', जोधपुर है तो राजस्थान का पहले बायोलॉजिकल पार्क 'सज्जनगढ़ बायोलॉजिकल पार्क' है। जिसका लोकार्पण 12 अप्रैल, 2015 को किया गया। धार्मिक स्थलों से जुड़ा पारम्परिक आखेट एवं वन कटाई निषिद्ध क्षेत्र ओरण कहलाता है। सबसे बड़ा आखेट निषिद्ध क्षेत्र (7091.04) वर्ग किमी.) संवत्सर कोटसर (चुरू) में स्थित है, तो सबसे छोटा (1 वर्ग किमी.) कनकसागर- - बूँदी में स्थित है।

सर्प उद्यान-1 (कोटा)

राज्य का एकमात्र सर्प उद्यान 'कोटा' में है, जबकि प्रस्तावित सर्प उद्यान 'भरतपुर' में है। ध्यान रहे-उत्तर भारत का सबसे बड़ा सर्प उद्यान कोटा में है, तो भारत का सबसे बड़ा सर्प उद्यान मैसूर में है।

राष्ट्रीय उद्यान -3

भारत का पहला राष्ट्रीय उद्यान जिम कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान, उत्तराखण्ड में (वर्तमान- हैली नेशनल पार्क) सन् 1935 में स्थापित किया गया।

1. रणथम्भौर ( सवाई माधोपुर )

यह देश का सबसे छोटा बाघ अभयारण्य है, जिसे "भारतीय बाघों का घर" कहते हैं। राज्य में सर्वप्रथम बाघ परियोजना यहीं से शुरू की गई। इसे 1955 में वन्य जीव अभयारण्य, अप्रैल, 1974 में 'टाइगर रिजर्व प्रोजेक्ट" (देश में 1973 में शुरू हुआ) में शामिल किया गया तथा 1 नवम्बर, में 1980 में राज्य का प्रथम राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया।

 28 जून, 2008 को देश में प्रथम बाघ विस्थापन (Tiger Transfer) की घटना यहीं घटित हुई (बाघ सुल्तान व बाघिन बबली को यहाँ से हैलीकॉप्टर की सहायता से सरिस्का अभयारण्य में छोड़ा गया) यहाँ पर 1960 में एजिलाबेथ, 1985 में राजीव गांधी, 2000 में बिल क्लिंटन तथा 2005 में मनमोहन सिंह घूमने आ चुके हैं। हाल ही में इसके प्रबन्धन हेतु पृथक "रणथम्भौर बोर्ड" का गठन किया गया है। 

इस अभयारण्य में दुर्लभ काला गरुड़ व रेटेड तीतर पाए जाते हैं, तो यह जोगी महल एवं धार्मिक स्थल त्रिनेत्र गणेश मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। राजस्थान में बाघ परियोजना का जन्मदाता / राजस्थान का टाइगर मैन 'कैलाश साँखला' (जोधपुर निवासी) है। प्रस्तावित राजीव गाँधी जीवमण्डल रिजर्व का उद्देश्य 'वन्य जीव अभयारण्यों को रणथम्भौर राष्ट्रीय उद्यान से जोड़ना' है। रणथम्भौर टाइगर रिजर्व के बफर क्षेत्र आमली वनखंड में एक टाइगर सफारी पार्क की स्थापना की गई, तो इण्डिया ईको डवलपमेंट कार्यक्रम रणथम्भौर राष्ट्रीय उद्यान में क्रियान्वित किया गया।

2. केवलादेव (घना) पक्षी विहार, भरतपुर- 

यह अभयारण्य भारत के प्रमुख पर्यटक परिपथ"सुनहरा त्रिकोण" (दिल्ली, आगरा, जयपुर) एवं राष्ट्रीय राजमार्ग-11 पर "राजस्थान के पूर्वी सिंहद्वार" भरतपुर में गंभीर व बाण गंगा नदियों के संगम पर स्थित है। इसका निर्माण किशन सिंह ने स्विट्जरलैण्ड की झीलों के आधार पर करवाया। इसे 1956 में पक्षी अभयारण्य, 26 अगस्त, 1981 में राष्ट्रीय उद्यान (राजस्थान का दूसरा व सबसे छोटा-28.73 वर्ग किमी. राष्ट्रीय उद्यान) तथा 1985 में यूनेस्को द्वारा विश्व प्राकृतिक धरोहर की सूची में शामिल किया। इसके मध्य में शिव (केवलादेव) का मन्दिर है इसलिए इसका नाम केवलादेव अभयारण्य पड़ा। 

राजस्थान में पक्षी प्रजातियों की सर्वाधिक विविधता केवलादेव अभ्यारण्य में पायी जाती है। यह अभयारण्य एशिया की सबसे बड़ी पक्षियों की प्रजनन स्थली है अतः इसे "पक्षियों का स्वर्ग" (पक्षी अभयारण्य) कहते हैं। यहाँ 'एन्चा घास' में फँसकर सर्वाधिक पक्षी मरते हैं। यहाँ पर साइबेरियन सारस व लाल गर्दन वाले दुर्लभ तोते पाये जाते हैं। "साइबेरियन क्रेन" शीत ऋतु में घना पक्षी राष्ट्रीय उद्यान में आते है। यहाँ राज्य की प्रथम वन्य जीव प्रयोगशाला स्थापित की गई है। यह विश्व के 10 शीर्ष अभयारण्यों में शामिल है। राज्य में गांगेय मैदान केवलादेव में ही स्थित है, इस उद्यान का सम्पूर्ण क्षेत्र मैदानी है।

3. दर्रा ( मुकन्दरा हिल्स) कोटा-

झालावाड़- यह कोटा झालावाड़ में स्थित है। जिसका 2003 में दर्रा अभयारण्य से नाम बदलकर "राजीव गाँधी नेशनल पार्क " रखा तथा 2006 में वसुंधरा सरकार ने इसका "मुकन्दरा हिल्स पार्क" नाम रखकर राष्ट्रीय उद्यान का स्तर प्रदान करने का प्रस्ताव पारित किया परन्तु इस प्रस्ताव को केन्द्र ने मंजूरी नहीं दी। 

इस अभयारण्य में गागरोनी/ हीरामन तोते हिन्दुओं का आकाश लोचन (मनुष्य की आवाज में बोलने वाला), अबली मीणी का महल (राजस्थान का दूसरा) ताजमहल), गुप्तकालीन हूणों का शिव मन्दिर स्थित है। इसमें सर्वाधिक घड़ियाल व सारस पाये जाते हैं। यह राज्य का तीसरा राष्ट्रीय उद्यान 9 जनवरी, 2012 को तथा 10 अप्रैल, 2013 तीसरा टाइगर प्रोजेक्ट अभयारण्य घोषित किया गया, जिसमें कोटा, बूँदी, झालावाड़ और चित्तौड़गढ़ का कुल 759.99 वर्ग किमी. क्षेत्र शामिल है।

प्रस्तावित राष्ट्रीय उद्यान-2

1. सरिस्का (अलवर) - यह अलवर (राजस्थान) में स्थित है। राज्य में दूसरी बाघ परियोजना 1978 में यहाँ शुरू हुई। यहाँ पर सर्वाधिक लंगूर, बन्दर, हरे कबूतर पाये जाते हैं, तो यहाँ मयूरों का घनत्व सर्वाधिक है। इसमें पाण्डुपोल हनुमानजी, नीलकण्ठ महादेव, भर्तृहरि, तालवृक्ष, राजोरगढ़ नामक स्थान पर शिव व नौगजा (शांति नाथ जैन मंदिर) आदि दर्शनीय स्थल है। यह अभयारण्य 2005 में बाघ शिकार प्रकरण हेतु चर्चित रहा। इसके बाद यहा बाघ परियोजना कार्यान्वित की गई। स्व. प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने राजस्थान के सरिस्का में कैबिनेट मीटिंग ली थी।

2. राष्ट्रीय मरू उद्यान, जैसलमेर (1900km, 1981 में स्थापित), बाड़मेर (1262 km)- 

यह जैसलमेर व बाड़मेर जिलों में फैला हुआ। राजस्थान में क्षेत्रफल (3162.50 किमी.) की दृष्टि से सबसे बड़ा अभयारण्य है। यह "नाममात्र का राष्ट्रीय उद्यान" है, वास्तव में इसे अभी तक राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा नहीं दिया गया है इसमें "ऑकल वुड़ फॉसिल्स पार्क" (जीवाश्म उद्यान / मरुस्थल पार्क) स्थित है, जिसमें राज्य पक्षी 'गोडावण' (माल मोरडी / ग्रेट इंडियन बस्टर्ड / कैरियोटिस नाइग्रीसेप / सोहन चिड़िया / गुधनमेर), पीवणा (विषैला सर्प), चिंकारा (राज्यपशु), सेवण घास बहुतायत मिलते हैं। गोड़ावण को राज्य पक्षी का दर्जा 21 मई, 1982 को दिया गया था। (Imp.: शाहगढ़ बल्ख (जैसलमेर) में अफ्रीकी चीतों को बढ़ाया जाएगा।)

ध्यातव्य रहे - राजस्थान देश का पहला राज्य है जहाँ 'प्रोजेक्ट) बस्टर्ड' लाँच किया गया। गोडावन पक्षी के संरक्षण के लिए 50 जून, 2013 को राष्ट्रीय मरू उद्यान जैसलमेर में 'प्रोजेक्ट ग्रेट इंडियन बस्टर्ड' लाँच किया गया तो लुप्त होने की कगार पर खड़े गोडावन पक्षी के प्रजनन के लिए केन्द्र सरकार जैसलमेर में उप केन्द्र खोलेगी, जिसका मुख्य केन्द्र गुजरात के माण्डवी में होगा। नोट- यह दोनों प्रस्तावित राष्ट्रीय उद्यान वर्तमान में वन्यजीव अभयारण्यों में गिने जाते हैं।

राज्य के वन्य जीव अभयारण्य

1. राष्ट्रीय चम्बल घड़ियाल वन्य जीव अभयारण्य (कोटा 1979 में स्थापित)-इसे घड़ियालों की प्रजाति को संरक्षित करने के लिए 'घड़ियालों का संसार' के नाम से जाना जाता है। यह राज्य का एकमात्र जलीय अभयारण्य है, जो अन्तर्राज्यीय अभयारण्य (राजस्थान, मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश में फैला हुआ) है। यह करौली, धौलपुर, सवाई माधोपुर की सीमा पर व कोटा में फैला हुआ है। जहाँ शिशुमार (चपल गंगाई डॉल्फिन), ऊबिलाव एवं गांगेय सूंस जैसे स्तनधारी जीव पाए जाते हैं।

2. भैंसरोड़गढ़ वन्य जीव अभयारण्य (चित्तौड़गढ़ ) -

 यह रावतभाटा (चित्तौड़गढ़) में राणाप्रताप सागर बाँध पर स्थित है। इसमें चम्बल व बामनी नदियों का संगम होता है।

3. सीता माता वन्य जीव अभयारण्य (प्रतापगढ़ व चित्तौड़गढ़) -

सर्वाधिक जैव विविधता वाले इस अभयारण्य को चीतल / चौसिंगे (यह एन्टीलोप प्रजाति का दुर्लभ जीव है, स्थानीय भाषा में भेंडल कहते हैं।) की शरण स्थली / मातृभूमि व उड़न गिलहरियों का स्वर्ग के नाम से जाना जाता है। यहाँ सर्वाधिक सागवान के वन (एकमात्र इसी अभयारण्य में), उड़न गिलहरी (साधारणतया महुआ के पेड़ पर रहती है तथा इसे देखने का अच्छा समय सूर्य के छिपने के बाद है। स्थानीय नाम आशोवा है।), वन औषधियाँ (हिमालय के बाद सर्वाधिक), पेंगोलिन (स्थानीय भाषा में आड़ाहुला) मिलते हैं। इसमें सीता माता मन्दिर, लव-कुश नामक दो जल स्त्रोत है। यहाँ से करमोई "कर्म मोचिनी" व जाखम नदी का उद्गम होता है। यह अभयारण्य अरावली व विन्ध्याचल पर्वतमाला तथा मालवा के पठार के संगम स्थल पर है।

4. माउण्ट आबू वन्य जीव अभयारण्य (सिरोही) 

यह राज्य का एकमात्र पहाड़ी पर स्थित अभयारण्य है। जो जंगली मुर्गों, भालुओं, यूब्लेफरिस (सबसे सुंदर छिपकली) एवं डिकिल पटेरा आबू एन्सिस घास (विश्व में एकमात्र यहीं पायी जाती है) हेतु प्रसिद्ध है। केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने 'माउण्ट आबू को इको सेंसेटिव जोन (जून 2009) घोषित किया है। (Imp.:' 'ग्रीन मुनिया' नामक चिड़िया आबू पर्वत पर मिलती है)

5. सज्जनगढ़ वन्य जीव अभयारण्य (उदयपुर) यह नीलगाय व लोमड़ी हेतु प्रसिद्ध है।

6. कुम्भलगढ़ वन्य जीव अभयारण्य (राजसमंद, पाली, उदयपुर) 

यह अभयारण्य उदयपुर, राजसमन्द और पाली में फैला हुआ है, जिसे " भेड़ियों की प्रजनन स्थली" कहते हैं। यह राज्य का एकमात्र अभयारण्य है जहाँ से प्रदेश की दो अलग अलग दिशाओं में बहने वाली बनास व साबरमती नदियों का उद्गम होता है। ये नदियाँ अपना जल देश के दो अलग-अलग सागरों में गिराती है। यह जंगली धूसर मुर्गे, चन्दन के वृक्ष, कुम्भलगढ़ दुर्ग, रणकपुर महादेव का मन्दिर हेतु प्रसिद्ध है। 

7. ताल छापर वन्य जीव अभयारण्य (ख) 

इसका प्राचीन नाम दोणपुर (वर्तमान सुजानगढ़) था। यह अभयारण्य काले हिरण व करजाँ पक्षी (स्थानीय नाम खीचन) की शरण स्थली है। वर्षा ऋतु में यहाँ नरम पास "माँथिया" व "मोत्रिया साइप्रस रोटेण्डस" उगती है।

8. कैला देवी वन्य जीव अभयारण्य (करौली व सवाईमाधोपुर ) - 

यह अभयारण्य श्रीकड़ा के वनों के लिए प्रसिद्ध है। इस क्षेत्र को रणथम्भौर टाईगर रिजर्व का भाग बनाया गया है। 9. केसरबाग अभयारण्य (धौलपुर)- इस अभयारण्य में मिलिक्ट्री स्कूल चलता है।


10. रामसागर वन्य जीव अभयारण्य (बाड़ी-धौलपुर)
11. वन विहार अभयारण्य (धौलपुर)
12. बंध बारेठा वन्य जीव अभयारण्य (भरतपुर) - इसे''परिन्दों का घर" कहते हैं, जो जरखों के लिए प्रसिद्ध है।

13. बस्सी वन्य जीव अभयारण्य (चित्तौड़गढ़) -

यह अभयारण्य जंगली बाघों के विचरण हेतु विश्व प्रसिद्ध है। इसमें से ओरई व ब्राह्मणी / वामनी नदी का उद्गम होता है।

14. नाहरगढ़ वन्य जीव अभयारण्य (जयपुर) - 

इसमें भारत का दूसरा "बायोलोजिकल पार्क" व देश का तीसरा "बियर रेस्क्यू सेन्टर" स्थित है। राजस्थान का प्रथम “जैविक पार्क/जूलॉजीकल पार्क" है, जिसका उद्घाटन मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे ने 4 जून, 2016 को किया।

15. जमुवा रामगढ़ वन्य जीव अभयारण्य (जयपुर)
 

16. जयसमन्द वन्य जीव अभयारण्य (उदयपुर) - 

इसको "जलचरों की बस्ती" के उपनाम से जाना जाता है। इसकी स्थापना वर्ष 1957 में की गई थी। इसमें सर्वाधिक बघेरे, बहोरा पक्षी की आश्रय स्थली, छः होदिया व रूठी रानी का महल है।

17. फुलवारी की नाल वन्य जीव अभयारण्य (उदयपुर) 

इसमें देश का प्रथम "ह्यूमन एनाटॉमी पार्क" स्थित है। यही से " मान्सी वाकल नदी का उदगम व सोम नदी प्रवाहित होती है, तो वहीं उड़न गिलहरी के लिए भी प्रसिद्ध है।

 18. शेरगढ़ वन्य जीव अभयारण्य ( बाराँ) - 

इसे सर्पों की शरण स्थली कहते हैं, जहाँ से परवन नदी गुजरती है।  

19. जवाहर सागर वन्यजीव अभयारण्य (कोटा व बूंदी) - 

यह एक जलीय अभयारण्य है, जो उत्तरी भारत का प्रथम सर्प उद्यान है (दूसरा सर्प उद्यान व विष एकत्रित करने की प्रयोगशाला भरतपुर में हैं) इसमें सर्वाधिक मगरमच्छ पाये जाते हैं। (Imp.: मगरमच्छों को नंगे हाथों में पकड़ने में सिद्ध हस्त रामचरण मीणा को 'देशी स्टीव इरविन' के नाम से जाना जाता है।)

20. रामगढ़ विषधारी वन्य जीव अभयारण्य (बूंदी ) 

सांपों हेतु प्रसिद्ध है, इसे 'रणथम्भौर के बाघों का जच्चा घर' कहते हैं। 

21. सवाई मानसिंह वन्यजीव अभयारण्य (सवाई माधोपुर) 
22. सवाई माधोपुर वन्यजीव अभयारण्य (सवाई माधोपुर)

23. रावली टॉडगढ़ वन्य जीव अभयारण्य-

यह अजमेर, पाली व राजसमन्द में फैला हुआ है, जिसका नाम इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड के नाम पर पड़ा।

24. सरिस्का (अ) वन्य जीव अभयारण्य-

अलवर में स्थित यह अभयारण्य राज्य का सबसे छोटा (3.01 वर्ग किमी.) अभयारण्य है।

बीसलपुर वन्य जीव अभयारण्य यह टोंक की टोडारायसिंह तहसील के राजमहल गाँव में है। राजस्थान का नवीनतम अभयारण्य है। जिसे वसुन्धरा सरकार ने 2006 में अभयारण्य घोषित किया।

कन्जर्वेशन रिजर्व : 14 स्थल

  1. बीसलपुर कन्जर्वेशन रिजर्व, (टॉक) 
  2. जोडबीड़ गढवाला कन्जर्वेशन रिजर्व, (बीकानेर), 
  3. सुन्धामाता कन्जर्वेशन रिजर्व, (जालौर, सिरोही- सबसे बड़ा) 
  4. गुढ़ा विश्नोईयान कन्जर्वेशन रिजर्व, (जोधपुर) सबसे छोटा) 
  5. शाकम्भरी कन्जर्वेशन रिजर्व, (सीकर, झुंझुनूं) 
  6. गोगेलाव कन्जर्वेशन रिजर्व, (नागौर)
  7. बीड़ झुन्झुनूँ कन्जर्वेशन रिजर्व, (झुंझुनूं) 
  8. रोटू कन्जर्वेशन रिजर्व (नागौर) 
  9. उम्मेदगंज पक्षी विहार कन्जर्वेशन रिजर्व, (कोटा) 
  10. जवाईबाँध कन्जर्वेशन रिजर्व, (पाली)
  11. बांसियाल-खेतड़ी कन्जर्वेशन रिजर्व, (झुंझुनूं) (01/03/ 2017)
  12. बांसियाल-खेतड़ी-बागौर कन्जर्वेशन रिवर्ज (2018), 
  13. जवाई बांध लैपर्ड कन्जर्वेशन रिजर्व (2018), 14. मनसा माता कन्जर्वेशन रिजर्व-झुंझुनूं (2019)
ध्यातव्य रहे - जीणमाता, मनसा माता, झालाना, ग्रास फार्म एवं सौरसेन क्षेत्रों को कन्जर्वेशन रिजर्व घोषित कराया जाना प्रक्रियाधीन है। श्रीगंगानगर जिले में घग्घर के आसपास के क्षेत्र को बड़ोपल पक्षी अभयारण्य घोषित किया जायेगा।

ये भी जानें :

राजस्थान में देश का पहला भालू अभयारण्य जालौर-सिरोही के मध्य जसवंतपुरा क्षेत्र के सुंधा माता के क्षेत्र में विकसित किये जाने की घोषणा केन्द्र की स्वीकृति के बाद 20 जुलाई, 2010 को की गई। इसके लिए 4468.42 वर्ग किमी. क्षेत्र को रिजर्व किया गया है। यह दुर्लभ क्षेत्र लगभग 300 भालूओं को प्राकृतिक आवास प्रदान किये हुए है। ज्ञातव्य है कि नाहरगढ़ अभयारण्य, जयपुर में भालू बचाव केन्द्र (Beer Resque Center) स्थापित किया गया है। 

मोर अभयारण्य झुंझुनूँ में प्रस्तावित है तो गाय अभयारण्य अजमेर संभाग में विकसित किया जायेगा। बड़ी तालाब (उदयपुर) मछली अभयारण्य से संबंधित है। 

टोंक जिले में बीसलपुर वन्य जीव अभयारण्य भी विकसित किया जाना प्रस्तावित है।

जैसलमेर के शाहगढ़ बल्ख क्षेत्र को केन्द्र सरकार ने देश का प्रथम चीता अभयारण्य (Panther Sanctuary ) घोषित किया है। जहाँ पर केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय भारत सरकार अफ्रीका व ईरान से चीतों को यहाँ पर स्थानान्तरित करेगी। ज्ञातव्य है कि चीता भारत से पूर्णतया विलुप्त हो चुका है।

रावली टॉडगढ़ के साथ-साथ रामगढ़ विषधारी को बाघ परियोजना में शामिल किया जाना प्रस्तावित है (नेशनल टाइगर) कन्जर्वेशन ऑथोरिटी ऑफ इण्डिया-2011)। यह प्रस्ताव पूर्ण होने पर राजस्थान में पाँच बाघ परियोजनाएँ - रणथम्भौर, सरिस्का, मुकन्दरा हिल्स, रावली टॉडगढ़ एवं रामगढ़ विषधारी हो जायेगी।

कुंभलगढ़ अभयारण्य में बघेरों को संरक्षित किया जायेगा। यहाँ पर लगभग 5 करोड़ रूपये के प्रोजेक्ट में 600 हैक्टेयर भूमि में बघेरा संरक्षण कार्य सम्पन्न होंगे।

गिद्धों को बचाने के लिए जोहड़बीड़ (बीकानेर) में राजस्थान का पहला गिद्ध कन्जर्वेशन रिजर्व स्थापित किया गया है जो भारत का तीसरा केन्द्र है। इससे पहले दो अन्य केन्द्र पिंजोर (हरियाणा) एवं जलपाई गुड्डी (पश्चिम बंगाल) में स्थापित है।

शेखावाटी में केवल इजिप्शियन गिद्ध बचे हैं जिन्हें स्कैवैन्जर या सफेद गिद्ध कहा जाता है। ये विलुप्ति की कगार पर है। विशेष रूप से चुरू में पाये जाते हैं। गिद्धों की घटती संख्या के पीछे डाइक्लोफिनेक सोडियम दवा महत्वपूर्ण कारण है। 10.गिद्धों को प्रकृति का निजी सफाईकर्मी कहा जाता है। पक्षी विशेषज्ञ डॉ. सालिम अली ने गिद्धों को भगवान की निजी भस्मक मशीन' कहा है।

चुरू की मरु क्षेत्रीय पक्षी अनुसंधान संस्थान (आजरी) शेखावाटी में सफेद गिद्धों के प्रजनन पर अनुसंधान कर रही है, तो बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी गिद्धों का तीसरा प्रजनन केन्द्र की स्थापना से संबंधित राज्य राजस्थान है।

प्रदेश में गिद्धों के संरक्षण एवं संवर्द्धन के लिए रेस्क्यू सेंटर की स्थापना से संबंधित जिला जोधपुर है।

ऐमू- 

यह ऑस्ट्रेलिया का राष्ट्रीय पक्षी है। हनुमानगढ़, बीकानेर तथा गंगानगर जिलों में सबसे पहले ऐमू फॉर्मिंग शुरू हुई है, तो वहीं किरडोली (सीकर) में ऐमू फार्म हाउस विकसित किया गया है।

पर्यावरण में बढ़ रहे कार्बन उत्सर्जन को रोकने के लिए राज्य का पहला सी. डी. एम. प्रोजेक्ट बीकानेर की बीकमपुर रेंज में लगाया जा रहा है। 

डूँडलोद (झुंझुनूँ) में देश का पाँचवाँ व राज्य का प्रथम गर्दभ अभयारण्य विकसित किया गया है।

वन्य जीव संरक्षण अधिनियम का निर्माण 1972 में हुआ परन्तु 1973 में इसे लागू किया गया। 1 सितम्बर, 1972 के वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के तहत राज्य में 48 प्रकार के जीव जन्तुओं के शिकार पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगा दिया गया। 

राजस्थान के 8 जिलों (सीकर, झुंझुनूं, डूंगरपुर, बाँसवाड़ा, हनुमानगढ़, गंगानगर, भीलवाड़ा, दौसा) में कोई राष्ट्रीय उद्यान, वन्य जीव अभयारण्य, आखेट निषिद्ध क्षेत्र, मृगवन एवं जन्तुआलय नहीं है।

भारत का पहला मरू वानस्पति मरू उद्यान माचिया सफारी पार्क (जोधपुर) है। उत्तरी भारत का प्रथम सर्प उद्यान-कोटा में अवस्थित है। जबकि प्रस्तावित सर्प उद्यान 'भरतपुर' में है। ध्यान रहे उत्तर भारत का सबसे बड़ा सर्प उद्यान कोटा में है, तो भारत का सबसे बड़ा उद्यान मैसूर में है।

Bharatpur Bird Paradlize नामक पुस्तक के लेखक K.L. सेनी है। रणथम्भौर राष्ट्रीय उद्यान और रामगढ़ विषधारी उद्यान (बूँदी) के बीच बाघों के आवागमन को सुगम बनाने के लिए संथाल सागर नामक आखेट निषिद्ध क्षेत्र की स्थापना की गई। 

गजनेर वन्य जीव अभयारण्य (बीकानेर) बटबड़ पक्षी जिसे रेत का तीतर / इम्पीरियल सैण्ड ग्राऊज कहते हैं व जंगली सुअर हेतु प्रसिद्ध है। यहां गजनेर झील है, जिससे कृषि हेतु सिंचाई की व्यवस्था की जाती है। इस अभयारण्य में जेठाबूठा पीर शाह की दरगाह स्थित है।

राजस्थान के खींचन गाँव (जोधपुर) मे कुरंजा पक्षी/डेमोसिल क्रेन बहुतायत में देखने को मिलता है जो पश्चिमी राजस्थान में भ्रमणशील पक्षी है।

वन कॉरीडोर के माध्यम से राज्य के प्रमुख अभयारण्य को राष्ट्रीय उद्यानों से जोड़ने की महत्त्वाकांक्षी परियोजना का नाम 'राजीव गाँधी बायोस्फीयर रिजर्व' है।

माउण्ट आबू अभयारण्य को अभयारण्यों में से हटा दिया गया है तथा बीसलपुर अभयारण्य को नवीन अभयारण्य घोषित किया गया है ।

राजस्थान के उदयपुर जिले में सर्वाधिक संख्या में वन्य जीव अभयारण्य है, तो वन्य जीवों की संख्या की दृष्टि से भारत (प्रथम असोम), राजस्थान का दूसरा स्थान है।

राज्य का दूसरा स्पाईस पार्क (मसाला बगीचा) जोधपुर के रामपुरा भाटिया गाँव में बनाया गया है, तो राज्य का पहला पहला सौर पार्क (सौलर पार्क) बड़ला (बाप-जोधपुर) में बनाया गया है।

कुलिश स्मृति वन- झालाना वन क्षेत्र (JLN मार्ग, जयपुर) में स्थापित है, जिसमें "इको ट्यूरिज्म पार्क, जीरोफिटिक गार्डन, होलिस्टिक वैलनेस पार्क व थैरोपेटिकल गार्डन" विकसित किये जा रहे हैं। इसी स्मृति वन के तर्ज पर त्रिपुर सुंदरी (बाँसवाड़ा), भरखमाता (भीलवाड़ा), शाहबाद किला (बाराँ), हिल्ली (बाड़मेर), सुन्धामाता (जालौर) में स्मृति वन विकसित किए गये हैं।

सीकर में राज्य के सबसे बड़े स्मृति वन का उद्घाटन मुख्यमंत्री द्वारा अगस्त, 2016 में किया गया। इसके पूर्व भीलवाड़ा में राज्य का प्रारंभ हो चुका है।

वनखण्ड नौलक्खा, जिला झालावाड़ में स्मृति वन 24 जनवरी, 2017 से शुरू कर दिया गया है। उदयपुर में गोवर्धन सागर तालाब के पास स्मृति वन विकसित किया गया है।

  1. मयूर गार्डन-मालवीय नगर (जयपुर) में है। 
  2. गंगानिवास पब्लिक पार्क (बीकानेर) 
  3. कैक्टस गार्डन-कुलधरा गाँव (जैसलमेर) में।
  4. 34.राष्ट्रीय मरुस्थल पार्क (जैसलमेर)
  5. 35.गार्डन कॉम्पलैक्स 'बड़ा बाग' (जैसलमेर) में
  6. 36.भारत सरकार द्वारा शाहगढ़ बल्ख (जैसलमेर) को 'चीता पुनर्वास योजना' के लिए चुना गया है।
  7. 37.सोहिनी उद्यान भीनमाल (जालौर) में
  8. 38.पर्यावरण पार्क-सोजत (पाली) में।
  9. 39.सत्याग्रह उद्यान पार्क-आऊवा (पाली) में।  40.लाखोटिया पक्षी उद्यान (पाली) )
  10. 41.प्रसिद्ध सार्वजनिक पार्क कम्पनी बाग (शिमला),अलवर
  11. 42.कनक सागर पक्षी अभयारण्य (बूँदी)
  12. 43.देववन (कोटा) सर्वाधिक जैव विविधता वाला वन ।
  13. 44.चन्दन वन (राजसमंद)

टाइगर रिजर्व क्षेत्रों में जलाऊ लकड़ी के लिए संरक्षित वनों पर निर्भरता कम करने के लिए तथा महिलाओं को चूल्हें के धुएँ से होने वाली स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों से छुटकारा दिलाने के लिए 'जलाऊ लकड़ी मुक्त ग्राम योजना के तहत टाइगर रिजर्व क्षेत्रों में गैस कनेक्शन अनुदान पर दिये जा रहे हैं। 

पैंथरों के संरक्षण के लिए देश में पहली बार पैंथर परियोजना झालाना (राजस्थान) में शुरू की गई। देश का पहला हाइटेक वर्म्युअल वर्ल्ड फिश एक्वेरियम उदयपुर (राजस्थान) में बनाया जा रहा है।

कन्सल्टेंसी कम्पनी मैं. ग्रीन प्रो इंडिया कन्सल्टेंट्स प्रा. लि. की योजना के तहत उदयपुर के गुलाब बाग में विश्व स्तरीय बर्ड पार्क की स्थापना की जायेगी।

राज्य के पाँच जिलों (जयपुर, अजमेर, कोटा, चुरू व उदयपुर) में पाँच वर्षों के लिए 'नगर वन उद्यान योजना' लागू की गई है।

22 जून, 2017 को अजमेर में राज्य के दूसरे नगर वन उद्यान का शिलान्यास रखते हुए पुष्कर में हर्बल गार्डन का लोकार्पण किया गया।

तेंदुओं के संरक्षण के लिए राज्य में ‘प्रोजेक्ट लैपर्ड’ आठ अभयारण्यों (1. जयसमंद अभयारण्य, उदयपुर, 2. बस्सी अभयारण्य, चित्तौड़गढ़, 3. शेरगढ़ अभयारण्य, बाराँ, 4. कुम्भलगढ़-रावली टॉडगढ़ अभयारण्य, राजसमंद 5. माउंट आबू अभयारण्य-सुधामाता कन्जर्वेशन रिजर्व, सिरोही व जालौर 6. झालाना आमगंढ़ कन्जर्वेशन रिजर्व, जयपुर, 7. जवाई कन्जर्वेशन रिजर्व, पाली, 8. खेतड़ी बनस्याल कन्जर्वेशन रिजर्व, झुंझुनूं।) में शुरू किये जाने की घोषणा बजट 2017-18 में की गई। झालाना, जयपुर में प्रोजेक्ट लैपर्ड का शुभारम्भ 4 अक्टूबर, 2018 को किया गया।

राज्य में टाइगर व लैपर्ड के संरक्षण तथा वन्य क्षेत्रों में शिकार व अन्य अवैध गतिविधियों की रोकथाम हेतु रणथम्भौर, सरिस्का,जवाई व मुकन्दरा वन्यजीव अभयारण्यों एवं झालाना आरक्षित

वन क्षेत्रों की सुरक्षा हेतु IT Security System लगाये गये हैं। WS & AP का 27 जुलाई, 2018 को बीकानेर डिजिफ़ेस्ट में उद्घाटन किया गया। 

उत्तराखण्ड को लैपर्ड के लिए सबसे संरक्षित राज्य माना जाता है। उदयपुर जिले में बागदड़ा वन क्षेत्र में मगरमच्छों को नेचर पार्क बन रहा है।

राज्य सरकार ने वन क्षेत्र के निकट रहने वाले लोगों के लिए 17 अगस्त, 2015 को 'वन-धन योजना' को मंजूरी दी गई।

देश की पहली और एशिया की दूसरी सबसे बड़ी खजूर पौध प्रयोगशाला चौपासनी (जोधपुर) में बनाई गई है।हनुमानगढ़ की पीलीबंगा तहसील के बड़ोपल गाँव में प्रदेश की दूसरी बर्ड सेंच्युरी बनाई जायेगी।

राज्य में आरक्षित वन क्षेत्रों के बाहर वन क्षेत्रों में पारिस्थितिकीय पर्यटन को बढ़ावा देने हेतु वन विभाग ने 4 फरवरी, 2010 को 'ईको-ट्यूरिज्म पॉलिसी' शुरू की है। जिसके तहत मेनाल एवं हमीरगढ़ (भीलवाड़ा), नाहरगढ़ (जयपुर), बस्सी एवं सीतामाता (चित्तौड़गढ़), पंचकुण्ड (अजमेर), सुण्डामाता (जालौर), गुढ़ा विश्नोई (जोधपुर), मुकन्दरा हिल्स राष्ट्रीय उद्यान (कोटा, झालावाड़), भैंसरोड़गढ़ (चित्तौड़गढ़) ईको ट्यूरिज्म साइट को खोला गया है। 

राजस्थान सरकार द्वारा दिनांक 2 मार्च, 2010 को राजस्थान जैव विविधता नियम, 2010 पारित कर, 14 सितम्बर 2010 से राजस्थान राज्य जैव विविधता बोर्ड की स्थापना की गई। 

राजस्थान में संकटापन्न घोषित प्रमुख प्रजातियाँ हरड़, रीठा, अर्जुन, गोंद कतीरा, गुग्गल व बहेड़ा हैं।

ऑकल वुड फॉसिल पार्क (जैसलमेर), केवड़ा की नाल (उदयपुर), राम-कुण्डा (उदयपुर), नाग पहाड़ (अजमेर) एवं छापोली मंसा माता (झुंझुनूं) को आरंभिक रूप से जैव विविधता विरासत स्थल के रूप में चयनित किया गया हैं।

सवाई माधोपुर के रामसिंहपुरा गाँव में देश का पाँचवाँ राजीव गाँधी क्षेत्रीय प्राकृतिक विज्ञान संग्रहालय 1 मार्च, 2014 से शुरू हो गया।

पीली किताब : 

अलवर के अंतिम शासक महाराजा सवाई तेजसिंह द्वारा 1947 में तैयार कराई गई फोरेस्ट सेटलमेंट रिपोर्ट को पीली किताब कहते हैं।

बियर रेस्क्यू सेंटर: 

भालुओं की खत्म होती प्रजाति को बचाने के लिए नाहरगढ़ में देश का तीसरा बियर रेस्क्यू सेंटर वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया एवं राज्य सरकार द्वारा संयुक्त रूप से स्थापित किया गया हैं।

गागरोनी तोता- 

इसका वैज्ञानिक नाम एलेक्जेन्ड्रिया पेराकीट है। इसके कंधे पर लाल रंग इसकी पहचान है। 

गेडवेल- 

दुर्लभ प्रवासी जलीय पक्षी बतख, जो पूर्व सोवियत संघ, उत्तरी चीन व यूरोपीय देशों से अजमेर व आसपास के क्षेत्रों में सर्दियों में आकर प्रवास करते हैं।

दुनिया में सबसे ज्यादा शुतुरमुर्ग दक्षिणी अफ्रीका में पाये जाते हैं। इसका एक अण्डा करीब सवा सौ किलो का होता है जिस पर कई देशों में बेबी निकलने के बाद ऑर्टिस्ट कार्विंग करते हैं। यह दुनिया का सबसे बड़ा फ्लाइट लैस पक्षी माना जाता है।

राज्य सरकार द्वारा वन्य जीव संरक्षण हेतु किये गये प्रयास

29 नवम्बर, 2019 को मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने वन एवं पर्यावरण मंत्री की अध्यक्षता वाले 20 सदस्यीय राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण (स्टेट वेटलैण्ड अथॉरिटी) का गठन किया, जो पर्यावरण विभाग प्राधिकरण का नोडल विभाग होगा, तो वहीं, प्रदेश की सभी नदियाँ, नाले, झील, तालाब प्राधिकरण के अधीन होंगे। इस प्राधिकरण का गठन सांभर झील में पक्षियों की मौत के मामले में राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (NGT) के नोटिस के बाद मुख्यमंत्री द्वारा किया गया।

वन अपराध संबंधी विभिन्न प्रकार के प्रकरणों यथा अवैध कटान, अवैध खनन, वन भूमि पर अतिक्रमण तथा वन्यजीव अपराध आदि को ऑनलाइन दर्ज करने हेतु FMDSS पोर्टल तथा मोबाइल FMDSS app तैयार किया गया है। 

इंडिया कोड पोर्टल पर केन्द्र व राज्य सरकार से संबंधित समस्त अधिनियम/नियमों/नोटिफिकेशनों को अपलोड/अपडेट करने का कार्य किया जा रहा है। राज्य में पहली बार दरियाई घोड़े का जोड़ा 22 अगस्त, 2019 को नाहरगढ़ जैविक उद्यान में लाया गया।

सभी संरक्षित क्षेत्रों के चारों ओर 24 ईको सेंसिटिव जोन (ESZ) कराये जाने की कार्रवाई की जा रही है, जिसमें से 22 जनवरी, 2020 तक 8 क्षेत्रों के फाइनल नोटिफिकेशन जारी कर दिये गये हैं, जो निम्न है- 1. टॉडगढ़ रावली, 2. वन विहार, 3. सज्जनगढ़, 4. सीतामाता, 5. जमवारामगढ़, 6. बंध बारेठा, 7. नाहरगढ़ व 8 केवलादेव नेशनल पार्क। 

मुकन्दरा हिल्स टाइगर रिजर्व के लिए भारत सरकार से STPF के गठन हेतु MOU हस्ताक्षरित करा लिया गया है। रणथम्भौर टाइगर प्रोजेक्ट की सुरक्षा हेतु Special Tiger Protection on Force (STPF) का गठन किया गया है।

नाहरगढ़ जैविक उद्यान में 13 सितम्बर, 2018 कोलायत सफारी का उद्घाटन किया गया तथा 3 अक्टूबर, 2018 से आमजन के लिए लायन सफारी शुरू की गई है। इसके अलावा यहां हाथी सफारी की भी व्यवस्था की गई है।

राज्य में वन विभाग द्वारा 2018 में करायी गई मोरों की गणना के अनुसार प्रदेश में कुल 6 लाख 7 हजार 360 मोर पाये गये। । राज्य में सर्वाधिक मोर जोधपुर (95170) व बाड़मेर (87001) में है, जबकि चित्तौड़गढ़ (708) व टॉक (754) में इनकी संख्या सबसे कम है।

रस्सी स्पोटेड कैट दुनिया की सबसे छोटी बिल्ली है, तो वहीं ओपन बिल स्टॉर्क पक्षी को मानसून का दूत कहा जाता है, तो दक्षिण भारत के विभिन्न इलाकों से केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान (भरतपुर) में वर्षाकाल में प्रजनन करने के लिए आते हैं।

सरकार ने वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 की धारा 6 के तहत् राज्य वन्य जीव मण्डल (स्टेट वाइल्ड लाइफ बोर्ड) का गठन कर दिया है, जिसमें वन्यजीवों से संबंधित गैर सरकारी संस्थाओं के 3 सदस्यों के अलावा बतौर पर्यावरणविद् संरक्षणकर्ता और विज्ञानी 10 सदस्य (कुल 13 सदस्य) मनोनीत किये गये हैं। 

जोधपुर में कायलाना झील के पास स्थित वन खण्ड, बड़ा भाकर क्षेत्र को औषधीय पौधों के संरक्षण व विकास के उद्देश्य से कायलाना बायोडाइवर्सिटी पार्क के रूप में विकसित किया जायेगा।

राजस्थान प्रतिकरात्मक वनरोपण विधि प्रबंधन और योजना प्राधिकरण (CAMPA) वन भूमि/वनों की क्षतिपूर्ति के लिए एकत्रित राशि से वन व वन्यजीव सुरक्षा, विकास व प्रबंधन किये जाने हेतु भारत सरकार द्वारा प्रतिकरात्मक वनरोपण निधि अधिनियम, 2016 तथा तथा प्रतिकरात्मक वनरोपण निधि नियमावली, 2018 को दिनांक 30 सितम्बर, 2018 से प्रभावशाली किया गया है। इस अधिनियम/नियमावली के प्रावधानों के अंतर्गत जारी भारत सरकार की अधिसूचना 14 सितम्बर, 2018 के द्वारा CAMPA का गठन कर दिया गया है, जो 30 सितम्बर, 2018 में अस्तित्व में आया है। इस नये प्राधिकरण ने पूर्व में स्थापित स्टेट कैम्पा-राजस्थान राज्य स्टेट क्षतिपूर्ति वृक्षारोपण फण्ड मैनेजमेंट एवं प्लानिंग अथॉरिटी का स्थान ले लिया है। 

वन भूमि को राजस्थान वन अधिनियम, 1953 के प्रावधानों के अंतर्गत आरक्षित/रक्षित वन घोषित किये जाने की प्रक्रिया वन बंदोबस्त कहलाती है।

माचिया बायोलॉजिकल पार्क' जोधपुर का 20 जनवरी, 2016 को लोकार्पण किया गया। नाहरगढ़ (जयपुर) बायोलॉजिकल पार्क जून, 2016 में लोकार्पित कर दिया गया। इसके अलावा कोटा में अभेड़ा बॉयोलॉजिकल पार्क एवं बीकानेर में मरुधरा बॉयोलॉजिकल पार्क विकसित किये जा रहे हैं।

अजमेर में 22 जून, 2017 को राज्य के दूसरे नगर वन उद्यान का शिलान्यास किया गया तो 22 जून, 2017 को पुष्कर में हर्बल गार्डन का लोकार्पण किया गया।

जयपुर-पुष्कर बाईपास मुख्य मार्ग पर 20 हैक्टेयर क्षेत्र में हर्बल गार्डन तथा वन खंड नौलक्खा, जिला झालावाड़ में स्मृति वन विकसित किया जा रहा है।

राजस्थान वन (संशोधन) अधिनियम, 2014: दिनांक 4 मार्च, 2014 से राजस्थान वन (संशोधन) अधिनियम, 2014 लागू किया गया।

ऊँट, मोर व गोडावण को राज्य धरोहर घोषित किया जाएगा। 

राज्य सरकार द्वारा वर्ष 2013-14 में स्मृति वन में बटरफ्लाई वैली प्रोजेक्ट तथा आगरा रोड़, जयपुर पर सिल्वन पार्क बोगनवेलिया पार्क विकसित किया गया है। मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे द्वारा दिनांक 19 दिसम्बर, 2015 को सिल्वन पार्क व बटर फ्लाई वैली का लोकार्पण किया गया।

चुरू में प्रकृति पार्क (Natural Park) बनाया गया है। 

अरण्य भवनः झालाना में वन विभाग का नवनिर्मित भवन जिसका 23 मार्च, 2015 को उद्घाटन किया गया।

पाली में जवाई बाँध तेंदुआ संरक्षण क्षेत्र को ईको-टूरिज्म प्रोजेक्ट के रूप में विकसित किया जाएगा। 

बाघ गणना में बढ़तः देश की प्रथम बाघ गणना 2006 में हुई उसके बाद प्रत्येक 4 वर्ष बाद बाघ गणना की जाती है। देश में चार सालों में बाघों की संख्या 33 प्रतिशत बढ़ गई है। देश में 2014 में 2226 बाघ थे जो 2018 में बढ़कर 2967 हो गए हैं। 29 जुलाई, 2019 को चार साल में एक बार होने वाली बाघों की गणना के आँकड़े जारी किए गए। बाघों की संख्या की दृष्टि से शीर्ष तीन राज्य मध्यप्रदेश (526), कर्नाटक (524) तथा उत्तराखण्ड (442) है। राजस्थान में बाघों की संख्या 69 हो गई है, जो वर्ष 2014 की गणना के अनुसार 45 थी।

भारत की पहली बाघ परियोजना जिम कार्बेट नेशनल पार्क है। क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ी बाघ परियोजना आन्ध्रप्रदेश की नागार्जुन सागर शेसाचलम् बाघ परियोजना है, जबकि सबसे छोटी बाघ परियोजना महाराष्ट्र की पेंच है। सबसे ऊँचा नामदफा (अरुणाचल प्रदेश ) तथा सबसे दक्षिणतम मुंडन थूराई (तमिलनाडु) है।

14 वीं एशियाई शेर गणना, 2015: इसके अनुसार कुल एशियाई शेर 523 है। सर्वाधिक एशियाई शेर जूनागढ़ (गुजरात) में है। यह गणना हर पाँचवें वर्ष में होती है।

हरित राजस्थान: माननीय मुख्यमंत्री महोदय द्वारा जयपुर में 18 जून, 2009 को 'हरित राजस्थान' योजना पूरे प्रदेश में लागू की गई योजना का उद्देश्य राजस्थान प्रदेश को हरा-भरा बनाने के लिए जन-जन सहयोग से वृक्षारोपण करना है।

राजस्थान वानिकी एवं जैव विविधता परियोजना (RIDF XX) फेज-I: यह परियोजना जापान के 'जापान एजेंसी फोर इंटरनेशनल कॉ-ऑपरेशन' (JICA) के सहयोग से अप्रैल, 2003 से राज्य के 18 जिलों में क्रियान्वित की गई

राजस्थान वानिकी एवं जैव विविधता परियोजना द्वितीय चरण: राजस्थान राज्य के दस मरुस्थलीय जिले (सीकर, झुंझुनू, चुरू,जालौर, बाड़मेर, जोधुपर, पाली, नागौर, जैसलमेर, बीकानेर) एवं सात वन्य जीव संरक्षित क्षेत्रों (कुंभलगढ़, फुलवारी की नाल, जयसमंद, सीतामाता, बस्सी, कैलादेवी व रावली टॉडगढ़ वन्य जीव अभयारण्य के आसपास 2 किलोमीटर की परिधि के क्षेत्र में स्थित कुल 650 गाँवों में वित्तीय वर्ष 2011-12 से जापान इन्टरनेशनल कॉर्पोरेशन एजेन्सी (JICA) द्वारा ऋण सहायता से वित्त पोषित राजस्थान वानिकी एवं जैव विविधिता परियोजना का द्वितीय चरण प्रारम्भ हो चुका है।

वन मित्रों की नियुक्तिः 

सीमित संसाधनों से वन जीव सुरक्षा तथा स्थानीय स्तर पर वन प्रशासन एवं स्थानीय समुदायों के मध्य संवाद बनाए रखने के इस उद्देश्य से राज्य सरकार द्वारा 'वन मित्रों' की नियुक्ति की जा रही है। योजनान्तर्गत 20-25 वर्ष के आठवीं पास युवकों का चयन 'वन मित्र' के रूप में किया जाता है।

राष्ट्रीय वनीकरण कार्यक्रम (National Afforestation Programme): 

पर्यावरण एवं वन मंत्रालय केन्द्र सरकार ने वानिकी गतिविधियों के सरलीकरण एवं उनके क्रियान्वयन में जन सहभागिता बढ़ाने के उद्देश्य से चार केन्द्रीय प्रवर्तित योजनाओं समन्वित वृक्षारोपण एवं पारिस्थितिकी विकास योजना (IAEP), ईंधन व चारा योजना (AOFP), अकाष्ठ वनोपज संरक्षण एवं विकास योजना (NTFP) तथा परिभ्रांषित वनों के पुनर्जीवीकरण में अनुसूचित जनजाति एवं ग्रामीण गरीबों को जोड़ने की योजना (STRP) को मिलाकर 10 वीं योजना में यह योजना प्रारंभ की है। इस कार्यक्रम में केन्द्र व राज्य का 60:40 का योगदान है। 

गूगल संरक्षण एवं विकास परियोजना राष्ट्रीय औषधीय पादप मंडल, नई दिल्ली द्वारा वर्ष 2008-09 से गूगल के विकास हेतु परियोजना क्रियान्वित की जा रही है। इसके अतिरिक्त गूगल के विकास हेतु जैसलमेर व बाड़मेर में दो औषधीय पौध विकास क्षेत्र (MPDA) भी बनाये जा रहे हैं। अब चम्बल के बीहड़ों में भी की खेती की जाएगी।

वन अनुसंधानः 

वन संरक्षक (वन वर्धन) कार्यालय के अधीन वन शोध एंव अनुसंधान हेतु निम्न कार्यरत हैं-

  1. ग्रास फार्म नर्सरी, जयपुर
  2. वन अनुसंधान फार्म, गोविन्दपुरा (जयपुर)
  3. विश्व वानिकी वृक्ष उद्यान, झालाना (जयपुर)
  4. वन अनुसंधान फार्म, बांकी (सिसारमा, उदयपुर)

नई IND-Food for work परियोजनाः चार आदिवासी जिलों उदयपुर, बाँसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़ एवं चित्तौड़गढ़ में अतिरिक्त वानिकी विकास एवं जनहित कार्य कराने हेतु प्रारम्भ की गई नई योजना। 

'Integrated Development of Wild Life Habitals' (वन्य प्राणी आवासों का एकीकृत विकास) एवं 'Project Ti ger' (बाघ परियोजना) के तहत वन एवं पर्यावरण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा किया जा रहा है। INtegrated Development of Wild Life Habitals का फंडिंग पैटर्न वर्ष 2015-16 से परिवर्तित पर केन्द्र व राज्य का योगदान 60:40 किया गया है।

देश की सबसे बड़ी पक्षी त्रासदी-नवम्बर, 2019 में राजस्थान में जयपुर के समीप स्थित सांभर झील में हजारों पक्षियों की मौत हो गई, जिसका कारण एवियन बांदुलिज्म नामक बीमारी थी, जो क्लॉस्टूिडियम बाटुलिज्म नामक बैक्टीरिया से फैलती है। यह सर्वाधिक जीवों के तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करती है।

17 फरवरी, 2016 से शुभंकर:- राजस्थान ऐसा पहला राज्य होगा, जहाँ पर स्थित प्रत्येक जिलों (33) में अलग-अलग प्रजातियों के वन्यजीवों (पशु-पक्षी) का पालन किया जाएगा और उन्हीं के नाम से वो जिले जाने जायेंगे जैसे-


जिला

वन्यजीव

अजमेर

खरमौर

अलवर

सांभर

बांसवाड़ा.

जलपीपी

बांरा

मगर

बाड़मेर

मरु लोमड़ी

भरतपुर

सारस

भीलवाड़ा

मोर

बीकानेर

भट्टतीतर

बूंदी

सुखीब

चितौड़गढ़

चौसिंगा

जालौर

भालू

झालावाड़

गागरोनी तोता

जोधपुर 

कुरजां

करौली

घड़ियाल

कोटा

उदबिलाव

नागौर

राजहंस

पाली

तेंदुआ 

राजसमंद

भेड़िया

प्रतापगढ़

उड़न गिलहरी

सवाई माधोपुर

बाघ

चुरू

काला हिरण 

दौसा

खरगोश

धौलपुर

पंछीरा (इंडियन स्क्रीमर)

डूंगरपुर

जंगली धोंक

हनुमानगढ़

छोटा किलकिल

जैसलमेर

गोडावण

झुंझुनूं

काला तीतर

श्रीगंगानगर

चिंकारा

सीकर

शाहीन

सिरोही

जंगली मुर्गी

टोंक

हंस

उदयपुर

बिज्जू

जयपुर

चीतल

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