Prtvi ki Gatiya - पृथ्वी की गतियाँ

Prtvi ki Gatiya - इस पोस्ट में हम पृथ्वी की गतियाँ notes, trick, के बारे में जानकारी प्राप्त करेगे पृथ्वी की गतियाँ टॉपिक आगामी प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे- RPSC, Bank, SSC, Railway, RRB, UPSC आदि में सहायक होगा।

पृथ्वी की गतियाँ और उसके प्रभाव तथा अक्षांश एवं देशांतर रेखाएँ

सौरमण्डल में कुल 8 ग्रह है, ग्रहों के प्रकार निम्न है 

1. आंतरिक ग्रह (पार्थिव ग्रह) -   

बुध, शुक्र, पृथ्वी एवं मंगल ग्रह को कहते हैं, इनका आधार छोटा तथा घनत्व अधिक होता है। पार्थिव ग्रहों के छोटे होने के कारण इनकी गुरुत्वाकर्षण शक्ति भी कम रही जिसके परिणामस्वरूप इनसे निकली हुई गैसें इन पर रूक नहीं पाई। ये सूर्य के समीप स्थित हैं। इनकी संरचना चट्टानी है।

2. बाह्य ग्रह (जोवियन ग्रह)

बृहस्पति, शनि, अरूण एवं वरुण को कहते हैं, इनका आकार बड़ा तथा घनत्व कम होता है। ये सूर्य से अपेक्षाकृत अधिक दूरी पर स्थित हैं। इन ग्रहों की संरचना गैसीय है। इनकी गुरुत्वाकर्षण शक्ति अधिक है। यहाँ हाइड्रोजन व हीलियम से बना सघन वायुमंडल है। 

क्षुद्रग्रह

आन्तरिक तथा बाह्य ग्रहों के बीच (अर्थात् मंगल व बृहस्पति के बीच) में क्षुद्रग्रह पाये जाते है।

ग्रहों का क्रम

सूर्य से दूरी के आधार पर - बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति, शनि, अरुण, वरुण 
पृथ्वी से दूरी के आधार पर - शुक्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शनि, अरुण, वरुण
आकार के आधार पर - बृहस्पति, शनि, अरुण, वरुण, पृथ्वी, शुक्र, मंगल, बुध


पृथ्वी एवं पृथ्वी की गतियाँ

पृथ्वी नीला ग्रह कहलाता है। ग्रहों में सर्वाधिक औसत घनत्व (5.5 g/cc) पृथ्वी का है। उपग्रह एक (चन्द्रमा) सूर्य से दूरी के हिसाब से पृथ्वी तीसरा ग्रह है। आकार में, यह पाँचवाँ सबसे बड़ा ग्रह है। यह ध्रुवों के पास थोड़ी चपटी है। यही कारण है कि इसके आकार को भू-आभ कहा जाता है। भू-आभ का अर्थ है, पृथ्वी के समान आकार।
दिन-रात बनने का कारण भू-परिभ्रमण होता है। अगर सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी एक-चौथाई कम हो जाए, तो वर्ष की अवधि कम हो जायेगी।

पृथ्वी की संरचना 

पृथ्वी की सबसे बाहरी परत सेब तथा संतरे के छिलके के समान है। पृथ्वी अपने अक्ष पर 23½° पर झुकी हुई है। इसकी मोटाई भिन्न-भिन्न स्थानों पर अलग-अलग है।

पृथ्वी सौर मण्डल का एक गृह है इसकी दो गतियां होती हैं

परिभ्रमण (घूर्णन अर्थात् दैनिक गति) एवं परिक्रमण अर्थात् वार्षिक गति।

1. परिभ्रमण / घूर्णन गति

पृथ्वी अपने अक्ष/धुरी पर पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती है एवं अपना एक चक्कर लगभग 23 घंटे, 56 मिनट 4.09 सैकण्ड (लगभग 24 घंटे में पूरा करती है अतः सूर्य पूर्व से पश्चिम की ओर जाता दिखाई देता है। पृथ्वी की इस गति को परिभ्रमण घूर्णन (चिरकालिक) या दैनिक गति कहते हैं। 
पृथ्वी का अक्ष एक काल्पनिक रेखा है, जो इसके कक्षीय सतह से 66% का कोण बनाती है।
पृथ्वी की परिभ्रमण गति से दिन-रात का बनना, किसी स्थान की स्थिति का निर्धारण, वायु व समुद्र की लहरों का दिशा परिवर्तन होता है।
किसी निश्चित मध्याह रेखा के ऊपर सूर्य के दो बार गुजरने की अवधि सौर दिवस (अवधि 24 घंटे) कहलाती है।पृथ्वी लगभग 24 घंटे में अपने अक्ष पर 360° घूम जाती है, अर्थात् वह 1 घंटे में 15° एवं 4 मिनट में 1° घूमती है


2.परिक्रमण / वार्षिक गति-

पृथ्वी का सूर्य के चारों ओर दीर्घवृत्तीय कक्षा में अंडाकार पथ पर घूमकर चक्कर लगाना परिक्रमण कहलाता है। इसे वार्षिक गति कहा जाता है। पृथ्वी सूर्य का एक चक्कर एक वर्ष 365 दिन अथवा 365 दिन, 5 घंटे, 48 मिनट और 46 सैकंड में पूरा करती है। वार्षिक गति के कारण रात-दिन छोटे-बड़े होते हैं तथा ऋतु परिवर्तन होता है।

21 जून को इन क्षेत्रों में सबसे लम्बा दिन तथा सबसे छोटी रात होती है। 22 दिसंबर को सबसे छोटा दिन व सबसे लम्बी रात होती है। पृथ्वी की इस अवस्था को उत्तर अयनांत या उत्तरायण कहते हैं।

भारत के सर्वाधिक पूर्व एवं सर्वाधिक पश्चिम में स्थित स्थानों के स्थानीय समय में लगभग दो घंटे का अंतर पाया जाता है।
सूर्य ग्रहण-सूर्य-चन्द्रमा पृथ्वी के एक परिक्रमण तल पर आने से सूर्य ग्रहण होता है। 
चन्द्रग्रहण जब सूर्य व चन्द्रमा के बीच पृथ्वी हो, तब चन्द्रग्रहण होता है।

अक्षांश रेखाएँ

Prtvi ki Gatiya
Prtvi ki Gatiya -  पृथ्वी की गतियाँ


ग्लोब पर किसी स्थान तथा भूमध्यरेखा के मध्य याम्योत्तर या ध्रुववृत्त के चाप के अंशों में मापी गयी कोणीय दूरी को उस स्थान का अक्षांश कहते हैं। ग्लोब पर समस्त याम्योत्तरों या ध्रुववृतों के भूमध्यरेखा से समदूरस्थ बिन्दुओं को मिलाने वाली रेखा को अक्षांश रेखा या अक्षांश वृत्त कहते हैं। विषुवत् वृत्त से ध्रुवों तक स्थित सभी समानांतर वृत्तों को अक्षांश रेखाएँ। कहा जाता है। अक्षांशों को अंश में मापा जाता है।

अक्षांश व देशान्तर रेखाओं के जाल को Graticul, Net, Grid or Mesh के नाम से जाना जाता है। विषुवत् वृत्त से ध्रुवों की ओर अक्षांशों की लम्बाई में कुछ परिवर्तन आता है। किसी स्थान का अक्षांश सूर्य की तुंगता या ध्रुवतारे की सहायता से निर्धारित किया जाता है।
एक ही अक्षांश पर स्थित स्थानों को मिलाने वाली रेखा समान्तर रेखा कहलाती है।
अक्षाश रेखा उत्तर तथा दक्षिण में भूमध्य रेखा के समान्तर पूर्व से पश्चिम की ओर खींची जाती है। अंक्षाश रेखाओं की कुल संख्या 90 + 1 + 90 = 181 होती है।
एक अंश में 60 मिनट (') तथा एक मिनट में 60 सैकण्ड (") होते हैं।
दो अक्षांशों के बीच की दूरी लगभग 111 किमी. होती है। इसके उत्तर और दक्षिण की ओर अक्षांश का मान क्रमशः बढ़ता है और ध्रुव 90° अक्षांश द्वारा प्रदर्शित होते हैं।  
सभी अक्षांश रेखाएँ पूर्ण वृत्त नहीं होती हैं।

कर्क रेखा

पृथ्वी पर 23½° उत्तरी अक्षांश रेखा, जो उत्तरी गोलार्द्ध में उन स्थितियों को इंगित करती हैं जिन पर सूर्य दोपहर के समय शीर्ष पर प्रतीत होता है। यह 21 जून की स्थिति होती है।

मकर रेखा 

पृथ्वी पर 23½° दक्षिणी अक्षांश रेखा जो दक्षिणी गोलार्द्ध में उन स्थितियों को इंगित करती है जिन पर सूर्य दोपहर के समय शीर्ष पर प्रतीत होता है। यह 22 दिसंबर की स्थिति होती है

आर्कटिक वृत्त-66½° उत्तरी अक्षांश को आर्कटिक वृत्त कहा जाता है।
अंटार्कटिक वृत्त- 66½° दक्षिणी अक्षांश रेखा।
उत्तरी ध्रुव का अक्षांश 90° उत्तर तथा दक्षिणी ध्रुव का अक्षांश 90° दक्षिण होता है।

भूमध्य या विषुवत् रेखा- 

0° अक्षांश रेखा को भूमध्य रेखा कहते हैं। यह पृथ्वी की मध्य सतह से होकर जाने वाली वह अक्षांश रेखा जो उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुव के बराबर दूरी पर स्थित है। इसकी लम्बाई 40069 किमी. (2500 मील) है। विषुवत् रेखा के उत्तरी भाग को उत्तरी गोलार्द्ध कहा जाता है। भूमध्य रेखा पर पूरे वर्ष दिन एवं रात बराबर रहते हैं क्योंकि प्रकाश का घेरा हमेशा भूमध्य रेखा को दो समान भागों में बाँटता है। भूमध्य रेखा के उत्तर-दक्षिण में अक्षांश रेखाओं की लम्बाई कम होती है। भूमध्य रेखा सबसे बड़ा वृत्त है। भूमध्यरेखा पर 1° अक्षांश की दूरी 110.569 किमी. तथा ध्रुवों पर 111.700 किमी. होती है।

देशांतर रेखाएँ


ग्लोब पर प्रमुख याम्योत्तर (Prime meridian) तथा किसी दिये गये स्थान के मध्य स्थित अक्षांश वृत्त के छोटे चाप की अंशों में मापी गयी दूरी को उस स्थान का देशान्तर कहते हैं।
देशांतर रेखाएँ उत्तर से दक्षिण की ओर खींची जाने वाली काल्पनिक रेखाएँ होती हैं। ये रेखायें अर्द्ध-वृत्ताकार होती हैं जो भूमध्य रेखा को समकोण पर काटती हैं।
दो देशांतर रेखाओं के मध्य लगभग 11132 किमी. की दूरी होती है जो कि भूमध्य रेखा पर सर्वाधिक 60° अक्षांश वृत्त पर इसके लगभग आधी व ध्रुवों पर न्यूनतम (शून्य) होती है। प्रधान याम्योत्तर से किसी स्थान की कोणीय दूरी को उस स्थान का देशांतर कहा जाता है।
सभी देशांतर रेखाएँ एक अर्द्धवृत्त होती हैं और पृथ्वी को दो बराबर-बराबर भागों में बाँटती हैं। देशांतर रेखाओं की संख्या 180 + 180 =360 होती है।
15 देशांतरों का एक समय जोन माना जाता है। कुल 24 समय जोन हैं (360/15)। सभी देशांतर रेखाओं के बीच की चौड़ाई असमान होती है, जबकि लम्बाई एक समान होती है।

गोर 

ग्लोब पर दो संलग्न देशान्तर रेखाओं के बीच स्थित भाग को गोर कहते हैं जबकि संलग्न अक्षांश वृत्तों के बीच का क्षेत्र कटिबन्ध कहलाता है। 

निर्देशांक

अक्षांश एवं देशान्तर रेखाओं को भौगोलिक निर्देशांक कहते हैं क्योंकि ये रेखाएँ जाल का ए तन्त्र बनाती हैं जिस पर धरातल के विभिन्न लक्षणों की स्थिति को प्रदर्शित कर सकते हैं। निर्देशांको की सहायता से विभिन्न बिन्दुओं की अवस्थिति, दूरी, दिशा को निर्धारित किया जा सकता है।

ग्रीनविच रेखा (प्रधान याम्योत्तर)


ग्लोब पर समान देशान्तर वाले स्थानों को मिलाने वाली कल्पित रेखाएँ ध्रुववृत्त देशान्तर रेखाएँ व याम्योत्तर कहलाती हैं।

ग्रीनविच वैधशाला (लंदन) से गुजरने वाली रेखा को 0° देशांतर (प्रधान याम्योत्तर) रेखा मान गया है। यह रेखा विश्व के आठ देशों (यूरोप के यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस व स्पेन से तथा अफ्रीका के अल्जीरिया, माली, बुर्किनाफासो, घाना एवं टोगो) से गुजरती है। 0° देशांतर ब्रिटेन का मानक समय है। इसी को ग्रीनविच मीन टाइम कहते हैं। इसके दायीं ओर के 180° देशांतरों को पूर्वी देशांतर एवं बायीं ओर के 180° देशांतरों को पश्चिमी देशांतर कहा जाता है।

अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा 

अंतरराष्ट्रीय तिथि रेखा 180° देशांतर रेखा को कहा जाता है। यह किसी भी थल भाग से नहीं गुजरती है। यह बेरिंग जलडमरूमध्य से गुजरती है। इसे 1884 ई. में अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा माना गया जो प्रशांत महासागर से गुजरती हुई टेढ़ी-मेढ़ी रेखा है। यदि कोई व्यक्ति इस रेखा को पश्चिम से पूर्व की ओर पार करता है, तो एक दिन कम हो जाता है। यदि वह पूर्व से पश्चिम की ओर पार करता है, तो एक दिन बढ़ जाता है। 12वें जोन को 180वें याम्योत्तर रेखा (अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा) से बांटा गया है।

अंतरराष्ट्रीय तिथि रेखा प्रशांत महासागर से होकर गुजरती है। यह बेरिंग जल संधि से भी गुजर है। किरीबाती के सबसे पूर्वी द्वीप ( लाईन द्वीप) में पृथ्वी का सबसे एडवांस्ड टाइम है।

प्रमाणिक समय


पृथ्वी पर समय निर्धारण - समय का ज्ञान देशांतर रेखा से होता है। देशांतर का अंतर 4 मिनट होता है। पूर्व की ओर बढ़ने पर 4 मिनट बढ़ता जाता है तथा पश्चिम में 4 मिनट घटता जाता है।

स्थानीय समय - स्थानीय समय वह समय है जो कि सूर्य के अनुसार हर देशांतर पर निकाला जाता है। जब सूर्य उस देशांतर पर लम्बवत् चमके तो उसे दोपहर का 12 बजे माना जाता है। इसे स्थानीय समय कहते हैं। स्थानीय समय पृथ्वी के हर भाग पर भिन्न होता है। यह प्रत्येक देशांतर पर 4 मिनट के अंतर से भिन्न होता है।

भारत का मानक समय - भारत का मानक समय नैनी (इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश ) 82½° पूर्वी देशांतर रेखा से निर्धारित किया जाता है। यह मानक मध्याह्न रेखा मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडीशा एवं आंध्रप्रदेश से भी गुजरती है। यहाँ का समय ग्रीनविच समय से 5 घंटा 30 मिनट आगे है। इसलिए जब लंदन में दोपहर के 2 बजे होंगे,
तब भारत में शाम के 7.30 बजे होंगे।

पृथ्वी के ताप कटिबंध


प्रत्येक गोलार्द्ध को ताप के आधार पर कई भागों में बांटा जाता है। इन भागों को कटिबंध कहा जाता है। ये निम्न हैं 

उष्ण कटिबंध 

यह विषुवत् रेखा से 23½° उत्तर और 23½° दक्षिण के बीच का वह भाग है जो कर्क और मकर रेखाओं के बीच स्थित है, जहाँ सूर्य वर्ष में दो बार शीर्ष पर चमकता है। इस भाग में मौसम सदैव गर्म रहता है। 

उपोष्ण कटिबंध 

23½° से 45½° उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांशों के बीच स्थित क्षेत्र जहाँ कुछ महीने ताप अधिक और कुछ महीने ताप कम रहता है।

शीतोष्ण कटिबंध (मध्य अक्षांश) 

यह 45° से 66½° उत्तरी और दक्षिणी अक्षांशों के बीच का क्षेत्र है। यह उत्तरी गोलाद्धों में कर्क रेखा एवं आर्कटिक वृत तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में मकर रेखा एवं अंटार्कटिक वृत के बीच का क्षेत्र है, जहाँ सूर्य सिर के ऊपर कभी नहीं चमकता है बल्कि उसकी किरणें तिरछी पड़ती है। 

ध्रुवीय कटिबंध 

66½° से 90° उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांशों के मध्य स्थित क्षेत्र जहाँ ताप अत्यंत कम रहता है। जिसके परिणामस्वरूप यहाँ हमेशा बर्फ जमी रहती है।

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